वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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प्रयत्न के मादकता आदि आ जाती है। वैसे प्रत्येक व्यक्तियों के नियत संस्कार से जन्य
प्रतिभा भी प्रतिभा वालों के विकसित होने में यत्नान्तर की अपेक्षा नहीं करती।
यथा द्रव्यविशेषाणां परिपाकैरयत्नजाः। मदादिशक्तयो दृष्टाः प्रतिखास्तद्वतां तथा ॥
प्रतिभा ही एक ऐसी वस्तु है जो समय-समय पर स्फुरित होती रहती है। वसन्त में
कोयल के मीठे शब्द स्वयं हो जाते हैं, पक्षियों को घर बनाने की शिक्षा भी स्वयं आ जाती
है। किसी प्राणी को किसी आहार के प्रति प्रीति, दूसरे को द्वेष, जैसे ऊँट को आम के पल्लव से
द्वेष और नीम के पल्लव से प्रीति है। मनुष्य को बड़े प्रयत्न पर तैरना आता है किन्तु भैंस के
बच्चे जन्म लेते ही तैरने लगते हैं।
इस प्रकार यह मानना पड़ता है कि समस्त प्राणियों की समस्त क्रियायें प्रतिभा के ही
द्वारा हो रही हैं। प्रतिभा का कारण भी शब्द ही है। हाँ; यह भेद हो सकता है कि किसी
अवसर पर इस जन्म का अनुभूत शब्द प्रतिभा का कारण बने और किसी अवसर पर
पूर्वजन्म का अनुभूत शब्द प्रतिभा का कारण बने।
वाक्यार्थ प्रतिभा है यह पक्ष इस प्रकार का उपस्थित किया गया है जिससे व्याकरण के
सिद्धान्त की नींव दृढ़ हो जाती है। 'सर्वे सर्वार्थवाचकाः' सिद्धान्त उसी समय पुष्ट हो
जाता है जब हम स्वीकार कर लेते हैं कि 'प्रतिभा' में जितने अर्थ उपस्थित हैं सब उस शब्द
के अर्थ हैं क्योंकि प्रतिभा का कारण वह शब्द है जिससे विभिन्न प्रकार के अर्थों का प्रतिभान
हुआ है। मन्त्रों के जप में भी ध्यान का यही महत्त्व है कि आराधक मन्त्र के अर्थ का ध्यान
करता हुआ अपने ध्यान में स्थित आकार वाले देवता को उस योग्य साक्षात् करे।
अस्तु प्रतिभावाद के स्वीकार कर लेने से ही वैयाकरणों का एक-वृत्तिवाद भी समन्वित
हो जाता है। इन्हें लक्षणा अथवा व्यञ्जना भी सिद्धान्ततः नहीं मानना पड़ता। जब किसी
शब्द की विभिन्न आनुपूर्वी से विभिन्न अर्थों की उपस्थिति होती है तब कोई कारण नहीं कि
मुख्यार्थ और अमुख्यार्थ का विवेचन किया जाय तथा वाक्यार्थ बोध के लिये लक्षणा माना
जाय। इसी प्रकार व्यञ्जना भी मानने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब समस्त अर्थ
शब्दजन्या प्रतिभा से लभ्य हैं तब तो सब अर्थ समान रूप से प्रतिभा ही हैं, उनमें शक्ति,
लक्षणा और व्यञ्जना का भेद स्वीकार करना अयोग्यता ही है। अतः यदि किसी ने किसी
टीका में यह लिख दिया हो कि वैयाकरणों के मत में तीन वृत्तियाँ हैं शक्ति, लक्षणा और
व्यञ्जना' तो यह निश्चय जान लेना चाहिए कि इसे व्याकरण के मूल सिद्धान्त का परिज्ञान
नहीं है।
हाँ, एक बात है, शब्दशास्त्र में दो पहलू हैं एक सम्यग्ज्ञान और दूसरा सम्यक् प्रयोग।
व्याकरण द्वारा कृत्रिम उपायों से सम्यग्ज्ञान शब्दसाधुत्वज्ञान होता है अर्थात् शब्द के व्याव-
हारिक रूप से शब्द के पारमार्थिक रूप का प्रत्यक्ष होता है। किन्तु सम्यक् प्रयोग तो
पारमार्थिक नहीं शुद्ध व्यावहारिक ही है तथा व्यवहार में किसी शब्द की शक्ति नियत है फिर
व्यवहार में मुख्यार्थ बाध आदि के रहने से किसी रूप में तीन अथवा चार वृत्तियाँ भी मान्य
होती ही हैं।
हम तो यह मानते हैं कि 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधु-
ग्भवति' मन्त्र के सम्यग्ज्ञान का शास्त्र व्याकरण और सम्यक् प्रयोग का शास्त्र साहित्य है।
अत एव इसी मंत्र को आधार मानकर दोनों शास्त्र अपनी उपादेयता भी सिद्ध करते हैं।