वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचिकला और परिणाम की साक्षीभूता और परम अमृत रूप है। इसलिए इसका निरोध भी
सम्भव नहीं विनाश तो दूर की बात है।
सिद्धान्तशैवों का मत है कि परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नाम की चार वाणियाँ
हैं और ब्रह्म उनसे अलग है। पश्यन्ती आदि तीनों वाणियाँ परारूपा में परब्रह्म से संगत
होकर एक रूप में स्थिर हैं। फिर वाचस्पति परमेश्वर अपनी ज्योति से अपने से अभिन्न
वस्तु समुदाय को नित्य भासित करता है जिससे इच्छा उठती है और यही सृष्टिक्रम का
कारण बनता है।
नागेशभट्ट ने सिद्धान्तशैव के इसी मत और 'ए । वाङ्मूलचक्रस्था पश्यन्ती नाभि-
संस्थिता। हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा' इस तन्त्रशास्त्र के मत के आधार पर
वाणी के चार भेद परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी मान लिया जो वास्तव में व्याकरण
सिद्धान्त के विरुद्ध है। क्योंकि आचार्य भर्तृहरि ने 'वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्भु-
तम्। अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम्' कारिका में वाणी के तीन ही भेद
स्वीकार किए हैं। 'सारस्वती सुषमा' के लेख में जिस विद्वान् ने 'स्वरूपज्योतिरेवान्तः
परावागनपायिनी' कारिका को वाक्यपदीय की मानकर प्रमाण के रूप में उपस्थित कर परा
वाणी को भर्तृहरि सम्मत कहने का दुःसाहस किया है उसने वाक्यपदीय को न देखकर ही
ऐसा किया है अतः हम इस विषय में कुछ नहीं कहेंगे।
जिन लोगों ने 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि' महाभाष्यस्थ मन्त्र की नागेश की
टीका के आधार पर वाणी के चार भेदों की कल्पना का समर्थन किया है उन्हें इसी मन्त्र का
प्रदीप देखना चाहिए, जहाँ कैय्यट ने लिखा है कि—
'चतुर्णां ( नामाख्यातोपसर्गनिपातानाम् ) पदजातानामेकैकस्य चतुर्थभागं
मनुष्या अवैयाकरणा वदन्ति।'
यद्यपि 'चतुर्णाम्' की व्याख्या 'नामाख्यानोपसर्गनिपातानाम्' इस मन्त्र की व्याख्या में
कैय्यट ने नहीं लिखा है तथापि 'चत्वारि शृङ्गा' मन्त्र की व्याख्या में भाष्यकार ने स्वयं कण्ठतः
'नामाख्यात' आदि की गणना की है, इस प्रकार नागेश की वाणी के चार भेद स्वीकार करने
वाला सिद्धान्त व्याकरण सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध है।
हाँ, एक बात यह रह जाती है कि वे वाणी के चार भाग कौन हैं जिनमें अवैयाकरण केवल
चतुर्थ भाग बोलते हैं। इसका उत्तर दो अत्यन्त स्पष्ट हैं। एक तो यह कि अवैयाकरण
वाणी के उस रूप को जानते हैं जिसमें लोक व्यवहार होता है, शेष साधुत्वादि रूप नहीं
जानते। दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि—
'त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुषः पादोऽस्येहा भवत् पुनः।
पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥'
इस मन्त्र में वर्णित ब्रह्म के चार अंश का जो विवेचन है वही शब्द ब्रह्मवादियों के मत
में सुस्थिर है।
यह वाक् संस्कृतरूप वाक् है जिसके ज्ञान से पुण्य होता है जिसका फल है 'एकः शब्दः
सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति।'
द्वितीय-काण्ड का प्रतिपाद्य विषय
हम यहाँ द्वितीय काण्ड के प्रतिपाद्य समस्त विषयों की चर्चा न करके केवल उसकी मुख्य
विचारधारा का निर्देश मात्र देना उपयुक्त समझते हैं।