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सर्वकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 192 में से

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पृष्ठ 30

विषय-सूची
कारिका १-४ ( ब्रह्म का स्वरूप )
ब्रह्म के स्वरूप का निरुपण, एक ब्रह्म की शक्तिगतभेद से विभिन्नता, ब्रह्म
की कालशक्ति, एक ही ब्रह्म भोक्ता, भोक्तव्य और भोगरूप में स्थित है ।
कारिका ५-१० ( वेद ब्रह्म-प्राप्ति का उपाय और ब्रह्म की प्रतिमा )
ब्रह्म प्राप्ति का उपाय वेद, वेद की अनेक शाखायें, वेद की महिमा,
वेदों से स्मृति प्ररूपन, वेदों से दर्शन शास्त्र और उनमें परस्पर भेद, सत्य
विद्या क्या है, वेद से ही विभिन्न विद्याओं का उद्गम ।
कारिका ११-२२ ( वेद के प्रधान अंग व्याकरण का प्रयोजन )
वेद का प्रधान अंग व्याकरण, व्याकरणाध्ययन के रक्षा-ऊह-आगम-
लघु-असंदेह पाँच प्रयोजन, व्याकरण का मोक्ष द्वार होना, शक्तिग्राहक व्याकरण,
मोक्ष का प्रथम द्वार व्याकरण, व्याकरणज्ञान से आत्मज्ञान, वैकृतध्वनिरूप
अन्धकार में शुद्ध ब्रह्म का भास्वत् स्वरूप, स्फोटरूप ब्रह्म में अक्षरों की प्रतीति,
वेदों में विभिन्नरूप से ज्ञात ब्रह्म की व्याकरण द्वारा प्राप्ति ।
कारिका २३-२९ ( शब्द की नित्यता ही व्याकरण निर्माण में हेतु )
शब्द-अर्थ और सम्बन्ध की नित्यता, साधु शब्दों का ज्ञान करना लक्ष्य,
साधु शब्दों में धर्मजनकता, नित्यशब्दवादियों के मत में कूटस्थनित्यता और
अनित्यशब्दवादियों के मत में प्रवाहनित्यता कथन, नित्य व्यवस्था
निरर्थक नहीं ।
कारिका ३०-३४ ( अनुमान से अतिरिक्त आगम प्रमाण की सिद्धि )
साधुत्वज्ञान के लिए आगम की आवश्यकता, तर्क धर्ममार्ग का बाधक नहीं,
अवस्था-देश और काल के भेद से शक्ति में भेद, अनुमान से ही वस्तुसिद्धि
असम्भव, शक्ति के प्रतिबन्धक होनेके कारण भी अनुमान वस्तुसिद्धि में सहायक
नहीं, तर्क से सिद्ध भी वस्तु कुशल विद्वान् के तर्कों से असिद्ध ।
कारिका ३५-३६ ( अनुमान से अतिरिक्त अभ्यास और अदृष्ट
प्रमाण की सिद्धि )
अनुमान से भिन्न अभ्यास और अदृष्ट पृथक् प्रमाण ।
कारिका ३७-४३ ( वेदमूलक आर्ष आगम की श्रेष्ठता )
ऋषियों का प्रत्यक्ष भी अनुमान से बाधित नहीं, ऋषि वाक्यों पर जनता
का विश्वास, ऋषि के वचन पर सबका विश्वास, आगम के विश्वास पर चलने