सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

[ २८ ]
प्रथम काण्ड में वाक्यस्फोट को ही मुख्य सिद्ध किया गया है किन्तु वाक्य का स्वरूप
क्या है इसका विवेचन द्वितीय काण्ड का मुख्यतया प्रतिपाद्य विषय है। वाक्यपदीय के
द्वितीय काण्ड के आरम्भ में वाक्य के विषय में विभिन्न दृष्टिकोणों की चर्चा की गई है जिनमें
मुख्य ये हैं।
वाक्य विचार
वाक्य दो प्रकार के हैं एक अखण्ड और दूसरा सखण्ड। अखण्ड पक्ष में वाक्य के तीन
भेद हैं। ( १ ) संघातवर्तिनीजाति, ( २ ) एक अनवयव शब्द और ( ३ ) बुद्ध्द्यनुसंहति।
सखण्ड पक्ष में पाँच भेद हैं ( १ ) केवल आख्यातशब्द, ( २ ) क्रम, ( ३ ) संघात, ( ४ )
आद्यपद, ( ५ ) पृथक् सर्वपद साकांक्ष। सखण्डपक्ष के पाँच भेदों में संघात और क्रम
अभिहितान्वयवाद पक्ष में और आख्यातशब्द, आद्यपद, पृथक् सर्वपद साकांक्ष तीन लक्षण
अन्विताभिधानवादपक्ष में हैं। इस प्रकार विभिन्न दर्शनों के आधार पर आठ प्रकार के
वाक्यों के लक्षण किए गए हैं। इसके बाद वार्तिककार और मीमांसकों के मत से वाक्य के
लक्षण कहे गए हैं।
वाक्यार्थ विचार
वाक्यार्थ का विचार अनेक पक्षों में किया गया है। जिनमें अभिहितान्वयवाद, अन्विता-
भिधानवाद और प्रतिभावाद मुख्य हैं। उपर्युक्त प्रथम दो वादों में अनेक प्रकार के दोषों का
उद्भावन करके प्रतिभा को ही वाक्यार्थ रूप में स्थिर किया गया है।
प्रतिभा का स्वरूप
वैयाकरणों के मत में प्रतिभा ही वाक्यार्थ है। नागेश ने भी मंजूषा में स्वीकार किया है'
कि 'प्रतिभा वाक्यार्थः' । वाक्यपदीयकार ने कहा है कि संघातवाचक शब्दों में नियत अंशों की
ही प्रतीति होती है। अतः कल्पित पदार्थों से सिद्ध प्रतिभा को ही वाक्यार्थ कहा गया है—
विच्छेदग्रहणेऽर्थानां प्रतिभान्यैव जायते । वाक्यार्थ इति तामाहुः पदार्थैरुपपादिताम् ॥
यह प्रतिभा प्रत्येक आत्मा के लिए भिन्न भिन्न सिद्ध है तथा 'वह उसका स्वरूप है' यह
ज्ञानकार भी दूसरे को नहीं समझाया जा सकता।
इदं तदिति सान्येषामनाख्येया कथञ्चन । प्रत्यात्मवृत्तिसिद्धा सा कर्त्रापि न निरूप्यते ॥
उसका यह स्वभाव है बिना विचार का अवसर दिये ही समस्त अर्थों का मेल कर देती
है इसलिये विषय में सर्वरूपता प्राप्त कर गई है।
उपश्लेषमिवार्थानां सा करोत्यविचारिता । सार्वरूप्यमिवापन्ना विषयत्वेन वर्तते ॥
चाहे किसी की भावना से अथवा शब्द द्वारा उत्पन्न हुई इस प्रतिभा का कोई भी व्यक्ति
कार्य के प्रकार निर्णय करने में अतिक्रमण नहीं करता ।
साक्षाच्छब्देन जनितां भावनानुगमेन वा । इतिकर्तव्यतायां तां न कश्चिदतिवर्तते ॥
समस्त प्राणी इसी ( प्रतिभा ) को प्रमाण मानते हैं और मनुष्यों की भाँति पशु और
पक्षियों के भी समस्त कार्यों का आरम्भ प्रतिभा ही करती है ।
प्रमाणत्वेन तां लोकः सर्वः समनुपश्यति । समारम्भाः प्रतीयन्ते तिरश्चामपि तद्वशात् ॥
यह सर्व प्राणियों की सिद्धि है जैसे किन्हीं द्रव्यों के परिपाक के साथ ही बिना किसी-