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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

५८ विवाहवृन्दावनम्- [ षड्वर्ग-
अथ षड्वर्गाध्यायः ।
तत्रादौ लग्ने ज्ञाते सति द्वादशभावसाधनं कथयति-
कृत्वा लग्नादर्कवद्रात्रिखण्डं भूयो व्यस्तैस्तद्घटीभिर्विलग्नम् ।
चक्रार्धोने ते च तत्काल एव जायेयातामस्तमध्याह्नलग्ने ॥ १ ॥
सं०-लग्नात् अर्कवत् (यथा सायनसूर्य्यतश्चरं प्रसाध्य दिनमानं
साध्यते तद्वत् सायनलग्नाच्चरं प्रसाध्य) रात्रिखण्डं (रात्र्यर्धं) कृत्वा
भूयः (पुनः) व्यस्तैः (लङ्कोदयैः) तद्घटीभिः (रात्र्यर्धतुल्येष्टघटीभिः)
विलग्नं साध्यम् । तच्चतुर्थलग्नं भवति । च (पुनः) ते (लग्न-चतुर्थलग्ने)
चक्रार्धोने (षड्राश्यूने) तत्काले क्रमेण अस्तमध्याह्नलग्ने (सप्तम-दशम-
लग्ने) जायेयाताम् भवेताम् ॥ १ ॥
भा०-जैसे सायनसूर्य पर से चरसाधनकर दिनमान बनाया जाता है उसी
प्रकार सायन लग्न से चर बनाकर रात्र्यर्ध साधन कर उस रात्र्यर्ध को इष्टकाल
मान कर लङ्कोदय द्वारा लग्न साधन करना वह चतुर्थ लग्न होता है । लग्न में
६ राशि घटाने से सप्तम, और चतुर्थ में ६ राशि घटाने से दशम, लग्न होता है।
लग्नन्तुर्यात्तुर्यमस्ताद्विशोध्यं मध्यादस्तं मध्यमैन्द्रीविलग्नात् ।
शेषत्र्यंशान्द्विर्द्विराद्येषु दद्यादेवं भावाः सन्धिरेतद्दलैक्यम् ॥ २ ॥
सं०-तुर्यात् (चतुर्थभावात्) लग्नम्, अस्तात् (सप्तमात्) तुर्यम्,
मध्यात् (दशमात्) अस्तं सप्तमम्, ऐन्द्रीविलग्नात् (प्रथमलग्नात्) मध्यं
दशमं विशोध्यं, शेषत्र्यंशान् द्विर्द्विः क्रमेण आद्येषु (प्रथम-चतुर्थ-सप्तम-
दशमेषु) दद्यात् योजयेत । एवं द्वादश भावा भवन्ति । एतद्दलैक्यं
(एतेषु द्वयोर्द्वयोरर्धैक्यं = योगार्धमित्यर्थः) सन्धिः स्यात् ॥ २ ॥
भा०-लग्न को चतुर्थ में, चतुर्थ को सप्तम में, सप्तम को दशम में और
दशम को प्रथम लग्न में घटाकर प्रत्येक शेष के तृतीयांश को प्रथम आदि चारो
लग्न में दो दो बार जोड़ने से १२ द्वादश भाव होते हैं। और दो दो भावों के
योग का आधा सन्धि होती है ॥ २ ॥
वि०-जैसे-प्रथम को चतुर्थ में घटाकर शेष के तृतीयांश प्रथम लग्न में
जोड़ने से द्वितीय भाव, और द्वितीय में उसी तृतीयांश को जोड़ने से तृतीय भाव
होता है। इसी प्रकार चतुर्थ आदि में जोड़ने से पञ्चम आदि भाव होते हैं। तथा