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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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६८ विवाहवृन्दावनम्- -[ मिश्र-
मुख में तर्जनी मध्यमा और अनामिका ये तीनों अङ्गुली साथ जोड़कर न समाय,
स्नान करने पर जिसके मस्तक से धूमशिखा चले, अथवा जिसके मस्तक पर
खाली मुँहवाला पक्षी बैठे, जो कान झापने पर अन्तर का शब्द न सुने,
बहुत खाने पर भी जिसकी तृप्ति न हो, जो कान्तिमान अकस्मात् कान्तिरहित वा
कान्तिरहित भी कान्तियुक्त हो जाय, जो अकस्मात् दुबला से मोटा वा मोटा से
दुबला हो जाय, इस प्रकार के वरों का बरण नहीं करना चाहिये ॥६-७॥
अतीव तुच्छं बहु चाप्यहेतोरतीतसात्म्यः सदसत्प्रवृत्तौ ।
अप्यंगुलिक्रान्तविलोचनान्तो न मेचकं चान्द्रकमीक्षते यः ॥८॥
मध्येल्ललाटं मणिबन्धधारी न चाल्पिकां पश्यति यः कलावीम् ।
अहेतुकं यः शवगन्धिगात्रः सर्वत्र सीमन्तितमूर्धजो वा ॥६॥
सं०-यश्च अहेतोः ज्वरादिकारणं विनैव अतीवतुच्छं अतिशयाल्पं
अत्ति, यश्चाहेतोः भस्मकादिरोगहेतुं विनापि बहु अत्यधिकं अत्ति भक्षयति,
यश्च सदसत्प्रवृत्तौ अतीतसात्म्यः त्यक्तस्वभावगुणः, यश्च अङ्गुलिक्रान्तवि-
लोचनान्तः सन्नपि चान्द्रकं मेचकं मेचकवर्णवद्भासमानं नेक्षते । यश्च
मध्येल्ललाटं ललाटस्य मध्ये मणिबन्धधारी अल्पिकां कलावीं (मणिबन्धाधो
वलयधारणस्थानं ) न पश्यति, यश्च अहेतुकं शवगन्धिगात्रः, यश्च वा
सर्वत्र सीमन्तितमूर्धजः ( सीमन्तिता मूर्धजाः केशा यस्य स तथोक्तः )
अमुं वरं न वृणीरन् ॥ ८-९ ॥
भा०-जो ज्वर आदि बिना कारण के बहुत थोड़ा भोजन करै, वा भस्मक
आदि रोग बिना बहुत खाय, उचित अनुचित में जिसका स्वभाव बदल जाय
'अर्थात् जो सर्वदा उचित करनेवाला हो वह अनुचित करने लगे, वा सर्वदा
अनुचित करनेवाला उचित करने लगे; जो अङ्गुलियों से नेत्रप्रान्त को झाँपकर
मेचकवर्ण चान्द्रक ( खद्योतवत् भासमान ) न देखे, जो ललाट मध्य में मणिबन्ध
( तलहथ के नीचे का गाँठ ) को रखकर दुबला पहुँचा को न देखे, वा बिना
कारण मुर्दे के समान गन्ध शरीर में हो जावै, अथवा जिसके केश में सब जगह
सीमन्त ( ककवा से बनाई रेखा के समान रेखायें ) हो जायँ, इस प्रकार के वरों
का वरण नहीं करना चाहिये ॥ ८-९ ॥
अपि क्षरद्रोमनखः शरीरात् स्वप्ने स्रवद्दामविलोचनो वा ।
निरीक्षते सत्त्वममानुषं वा विस्रस्तनासानयनश्रुतिर्वा ॥१०॥