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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२१
शक्तिपात अवश्य स्वीकार्य है। इस प्रकार ( तीव्रमन्द, मध्यमन्द और
मन्दमन्द ) शक्तिपातों में तरतमभाव है इसलिए ये मुख्य शक्तिपात तीन
प्रकार हैं।
वैष्णवों का अनुग्रह राजा से प्राप्त अनुग्रह के समान है जिसका
अन्तिम लक्ष्य मोक्ष नहीं है, इसलिए यहाँ उसका विवेचन नहीं हुआ।
सभी प्रकार शक्तिपातों में शिवशक्ति का अधिष्ठान विद्यमान है ऐसा कहा
गया है। यह उत्कृष्ट ज्येष्ठाशक्ति नहीं है, अपितु घोरा या घोरतरा है।
यह शक्तिपात नानाप्रकार होने पर भी तरतमभाव रहने के कारण बहु-
प्रकार बन जाता है। जो वैष्णव आदि सम्प्रदाय में स्थित है वह समयी
आदि क्रम से स्रोतःपंचकमय शास्त्रों से ज्ञान प्राप्त कर उसमें परिपाक
आ जाने पर भगवान् से प्रकट सर्वोत्तीर्ण त्रिकशास्त्र में श्रेष्ठ अधिकार
प्राप्त करता है।
इससे भिन्न जो है वह अनन्त प्रकार उपायों के सहारे एक-एक क्रम
के अतिक्रमणके द्वारा परमार्थ को प्राप्त करता है। फिर कोई बिना किसी
क्रम से उसे प्राप्त करता है।¹ जो आचार्यगण निम्नकोटि के शास्त्र के
अनुशासन के अन्तर्गत हैं वे इस शास्त्र के द्वारा कथित मण्डल के दर्शन
करने का भी अधिकार नहीं रखता है।² लेकिन ऊर्ध्वशासन में जो गुरु
स्थित हैं वे निम्न निम्नकोटि के अनुशासन ( शास्त्रों ) की प्रेरणा देते हैं,
क्यों कि वे पूर्ण हैं इसलिए सब विषयों में उनका अधिकार वर्तमान है।³
१. सबसे ऊर्ध्व या उत्कृष्ट स्थिति प्राप्त करना आसान नहीं है, अधिकार के
अनुसार भिन्न-भिन्न स्थितियों को पार करते हुए अन्त में परमार्थ को प्राप्ति
होती है। क्रम शब्द से स्थितियों के क्रम को ही समझना चाहिए। भिन्न-
भिन्न भुवनों में भोग प्राप्त करने के बाद कृपा के अवतरण होने पर शुद्ध
स्थिति का लाभ होता है।
२. आगम या तन्त्र के अनुसार दीक्षा प्राप्त होने पर जिन अधिकारों की प्राप्ति
होती है उनकी प्राप्ति निम्नकोटि के आचार्यों को भी नहीं होती। यन्त्र,
मण्डल आदि की रचना तो दूर की बात है निम्नकोटी में स्थित आचार्य
गण उनके दर्शन से भी वर्जित है।
३. त्रिकशास्त्र के अनुसार जो आचार्यपदवी में आरूढ़ हैं वे पूर्णता प्राप्त हैं,
इसलिए निम्नकोटि के शास्त्रों के वे जैसे प्रेरक बनते हैं वैसे ऊर्ध्वकोटि के
शास्त्रों में भी वे अधिकार रखते हैं।

१२२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११
वह देशिक, गुरु, आचार्य, दीक्षाकर्त्ता, चुम्बक है । वह पूर्णज्ञानी हो
तो सर्वोत्तम है—ऐसे न होने पर दीक्षा आदि होना सम्भव नहीं होता ।
लेकिन योगी गुरु यदि फलाकाङ्क्षी शिष्य के साथ युक्त रहता है तो
उपाय के उपदेश के द्वारा व्यवधान रहित फल दे सकता है, उपाय के
उपदेश से ज्ञान में ही युक्त रहकर मोक्ष भी प्राप्त करता है । ज्ञान की
पूर्णता के अभिलाषी नाना गुरुओं का आश्रयण कर सकता है ।¹ उत्तम से
उत्तम और विभिन्न प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति के लिये भिन्न-भिन्न गुरुओं
के पास रहना चाहिए । जो गुरु पूर्णज्ञानवान् हैं उनके त्यागने से प्रायश्चित्त
आवश्यक है । अगर वे न बतलाते हैं या विपरीत बातें बतलाते हैं तो
भी क्या वे त्यागने योग्य नहीं हैं ? हम कहते हैं—नहीं, क्यों कि वे पूर्ण
ज्ञानवान है इसलिए उनमें राग आदि नहीं है । उनका न कहना
( अकथन ) शिष्य में किसी प्रकार अयोग्यता या श्रद्धा आदि के अभाव-
रूप कारण से ऐसा होता है । इसलिए उनकी उपासना में शिष्य को
प्रयत्नशील रहना चाहिए । उनके त्यागने से नहीं । इस प्रकार अनुग्रह
ही शक्तिपात का कारण है जो निरपेक्ष ही है ।
तिरोभाव कर्म आदि नियति की अपेक्षा रखता है । अब तिरोभाव
का वर्णन हो रहा है । तिरोभाव वास्तव में कर्म आदि की अपेक्षा रखता
है जिसके फलस्वरूप जीव गम्भीर दुःख और मोह आदि परिणाम प्राप्त
करता है ।
जैसे कि परमेश्वर प्रकाशरूप हैं। वह अपने स्वतन्त्रता के खेल से
प्रबुद्ध होकर भी मोहित जनों के सदृश ( मूर्ख की तरह ) आचरण करता
है और हृदय से मूर्ख के आचरण की निन्दा करता है, फिर मूर्ख होते
हुए भी प्रबुद्धजन के आचरण जैसे मंत्राराधन आदि करता है, निन्दा भी
करता है । उसकी मूढ़चेष्टा यद्यपि चलती रहती है तो भी उस प्रबुद्ध
की मूढ़चेष्टा ताकि नाश हो जाय इस प्रकार प्रबुद्ध का आचरण चलता
है । उस प्रबुद्धचेष्टा ( प्रबुद्ध का आचरण ) जब निन्दा के साथ की जाती
है तब वह निषिद्ध आचरण का रूप धारण करती है, वह स्वयं
हृदय से शंकाकुल रहता है जिसके कारण वैसे आचरण करने वाले को
१. विज्ञान या विशेषज्ञान के लिए जिसकी अभिलाषा है वह भिन्न-भिन्न गुरुओं
से ज्ञान प्राप्त कर सकता है । एक गुरु को त्याग करता हुआ दूसरे गुरु के
पास जाने से उसके गुरुत्याग का दोष नहीं लगता है ।

आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२३
तिरोभानशक्ति दुःखरूप मोहपंक में डाल देती है। लेकिन जिसमें
शक्तिपात हुआ है उसके लिए तिरोभाव कोई कार्य नहीं करता है। इसमें भी
कर्म आदि की अपेक्षा का निषेध पहले जैसे है। तिरोभाव में भी इच्छा
की विचित्रता के कारण केवल इस देह के द्वारा दुःख आदि फल का
भोग मात्र होता है, अथवा दीक्षा आदि समयचर्चा, गुरु, देव अग्नि आदि
की सेवा या निन्दन या उभय का होना पहले शिव शासन में रहकर
बाद में उसके त्याग करनेवाले के समान होता है। उसमें भी इच्छा
की विचित्रता के कारण तिरोधानशक्ति के अन्तर्गत रहकर भी स्वयं
शक्तिपात का पात्र बन जाता है या मरने पर बन्धु या गुरु की कृपा के
द्वारा शक्तिपात प्राप्त करता है। इस प्रकार अपने आत्मस्वरूप में पंचकृत्य
सम्पादन करने का अनुसन्धान होने पर वह स्वयं परमेश्वर ही बन जाता
है। अतः अपने को खण्डितरूप में न देखे।
निरावरणस्वभाव परमेश्वर जैसे अपने स्वातन्त्र्य से निज प्रकाशमय
स्वरूप को आवृत्त कर देते हैं उसी प्रकार उसे खोल भी देते हैं। उनकी
जो अप्रबुद्ध स्थिति है वे उस स्थिति में रहकर प्रबुद्ध के सदृश आचरण
भो करते है। फिर भी वे प्रबुद्ध हो जाते है, अतः शक्तिपात निरपेक्ष है।
श्री अभिनवगुप्तपादाचार्य द्वारा रचित तन्त्रसार के शक्तिपात
प्रकाशन नामक ग्यारह आह्निक है।

अथ द्वादशमाह्निकम्
दीक्षादिकं वक्तव्यम् इति उक्तम्, अतो दीक्षास्वरूपनिरूपणार्थं प्राक्
कर्तव्यं स्नानम् उपदिश्यते। स्नानं च शुद्धता उच्यते, शुद्धता च
परमेश्वरस्वरूपसमावेशः। कालुष्यापगमो हि शुद्धिः, कालुष्यं च तदेक-
रूपेऽपि अतत्स्वभावरूपान्तरसंवलनाभिमानः। तदिह स्वतन्त्रानन्द-
चिन्मात्रसारे स्वात्मनि विश्वत्रापि वा तदन्यरूपसंवलनाभिमानः अशुद्धिः,
सा च महाभैरवसमावेशेन व्यपोह्यते, सोऽपि कस्यचित् झटिति भवेत्,
कस्यापि उपायान्तरमुखप्रेक्षी। तत्रापि च एकद्वित्र्यादिभेदेन समस्त-
व्यस्ततया क्वचित् कस्यचित् कदाचित् च, तथा आश्वासोपलब्धेः
विचित्रो भेदः। स च अष्टधा—क्षितिजलपवनहुताशनाकाशसोमसूर्यात्म-
रूपासु अष्टासु मूर्तिषु मन्त्रन्यासमहिम्ना परमेश्वररूपतया भावितासु
तादात्म्येन च देहे परमेश्वरसमाविष्टे शरीरादिविभागवृत्तेः चैतन्यस्यापि
परमेश्वरसमावेशप्राप्तिः, कस्यापि तु स्नानवस्त्रादितुष्टिजनकत्वात्
परमेशोपायतामेतीति, उक्तं च श्रीमदानन्दादौ—धृतिः आप्यायो वीर्यं
मलदाहो व्याप्तिः सृष्टिसामर्थ्यं स्थितिसामर्थ्यम् अभेदश्च इत्येतानि तेषु
मुख्यफलानि—तेषु तेषु उपाहितस्य मन्त्रस्य तत्तद्रूपधारित्वात्।
वीरोद्देशेन तु विशेषः, तद्यथा—रणरेणु, वीराम्भः, महामरुत्, वीरभस्म
श्मशाननभः तदुपहितौ चन्द्राकौँ आत्मा निर्विकल्पकः। पुनरपि बाह्या-
भ्यन्तरतया द्वित्वम्, बहिरुपास्यमन्त्रतादात्म्येन तन्मयीकृते तत्र तत्र
निमज्जनम् इत्युक्तम्। विशेषस्तु आनन्दद्रव्यं वीराधारगतं निरीक्षणेन
शिवमयीकृत्य तत्रैव मन्त्रचक्रपूजनम्, ततः तेनैव देहप्राणोभयाश्रित-
देवताचक्रतर्पणम् इति मुख्यं स्नानम्। आभ्यन्तरं यथा—तत्तद्धरादिरूप-
धारणया तत्र तत्र पार्थिवादौ चक्रे तन्मयीभावः।
परभैरवसंमज्जनमाहुः स्नानं यथा तु तद्भवति।
तदपि बाह्यं स्नानं न मुख्यमुपचारतः किं तु॥
परमानन्दनिमज्जणु इउपरमत्थिण ह्लाणु।
तँहिं आविद्रुतरत्ति दिणु जाणइ पर अप्पाणु॥
इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचिते श्रीतन्त्रसारे स्नानप्रकाशनं
नाम द्वादशमाह्निकम् ॥१२॥

द्वादश आह्निक
दीक्षा आदि के सम्बन्ध में आलोचना होनी चाहिए—ऐसा कहा गया
है, इसलिए दीक्षा के स्वरूप के निरूपण के लिए दीक्षा के पूर्वभागी स्नान
जो अवश्यकरणीय है उसका उपदेश किया जा रहा है ।
स्नान शुद्धि का सम्पादक है—ऐसा कहा जाता है । शुद्धि वास्तव में
परमेश्वर समावेशमयी है । मलिनता को दूर करना ही वास्तव में शुद्धि है,
कलुषता ( मलिनता ) उन्हीं का ही एक रूप है, लेकिन इस प्रकार होते
हुए भी उसके सम्बन्ध में वह ( मलिनता ) उनके स्वभाव से भिन्न है
हृदय में इस प्रकार सुदृढ़ अभिमानात्मक ( निश्चय ) है । अतः स्वतन्त्र,
आनन्द और चित् ही जिसका सार है उस प्रकार स्वात्मस्वरूप में
अथवा समग्र विश्व में उनसे भिन्नतारूपी सुदृढ़ निश्चयात्मक अभिमान
ही अशुद्धि है । इस प्रकार अशुद्धि महाभैरवरूपी समावेश के द्वारा दूर
किया जाता है । अशुद्धि का दूरीकरण किसी को तत्काल सम्पन्न होता है,
फिर किसी को दूसरे उपायों के अवलम्बन के द्वारा होता है, उपायों के
द्वारा होने पर भी किसी को किसी समय एक, दो और तीन के भेदों से
समष्टि या अलग-अलग रूप से आश्वास ( शान्ति ) की प्राप्ति होती है¹ ।
इसलिए समापत्ति के नाना भेद हैं। भैरव के आठ मूर्तियाँ हैं जो पृथ्वी,
जल, पवन, अग्नि, आकाश, सोम और सूर्य आत्मक हैं, इन आठों मूर्तियों
में मंत्रन्यास के बल से परमेश्वर स्वरूप का समावेश के फलस्वरूप शरीर

१. शिवसमावेश प्राप्ति ही परम आश्वास हैं। उसकी प्राप्ति के लिए नाना
प्रकार उपाय वर्तमान हैं। उन उपायों में समावेश अक्रम से प्राप्त होता है
लेकिन बाह्य उपाय जो स्नान, न्यास और अर्चनरूप है वे क्रमिक हैं ।
उपायों में जो बाह्य है वे आन्तर या आध्यात्मिक उपायों की प्राप्ति के
सहायक होते हैं । शास्त्रों में कहा गया है अध्यात्म बाह्य के बिना और
बाह्य अध्यात्म के बिना नहीं बनता है । इसलिये जो क्रियात्मक बाह्य
उपाय है वह आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाशक बनता है ।

१२६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १२
आदि उन से भिन्न है इस प्रकार विभक्तता के बोध उत्पन्न करनेवाले
चैतन्य का भी परमेश्वर की समावेशता प्राप्त होता है ।१
किसी को स्नान, वस्त्र आदि का बदलना परितोष उत्पन्न करनेवाले होते
हैं और उसके द्वारा परमेश्वर स्वरूप प्राप्ति में उपाय बनते हैं । श्रीमदानन्द
आदि शास्त्र में कहा गया है—धृति, आप्यायन, वीर्य, मलदाह, व्याप्ति,
सृष्टिशक्ति, स्थितिशक्ति और अभेद२—ये उनके मुख्य फल हैं । पृथिवी
आदि तत्त्वों में न्यस्त मन्त्र उन-उन रूपों का धारण करता है । जो लोग
वीराचारी हैं उनके लिए ये तत्त्व विशेष प्रकार है,३ जैसे रणरेणु, वीराम्भ
महमरुत्, वीरभस्म, श्मसान का आकाश, उनसे सम्बन्धित चन्द्र और सूर्य
१. शरीर में आत्मबोध रूप जो मल वर्तमान हैं स्नान से उसकी निर्मलता
आती है और इसके फलस्वरूप बिना प्रयास से ही आभ्यन्तर निर्मलता
सम्पन्न होता है । परमेश्वर की आठ मूर्तियों ने जो पृथ्वी आदि का रूप
धारण किये हैं दीक्ष मंत्रों के द्वारा उन्हें अभिमन्त्रित कर स्नान करने पर
आभ्यन्तर मलों का नाश होता है ।
२. स्नान से फल किस प्रकार होता है उसी का वर्णन धृति आदि शब्दों से
किया गया है । धृति पृथ्वी का धर्म है, आप्यायन जल का, वीर्य तेज का,
दाह या शोष वायु का, आकाश व्याप्ति का, चन्द्र सृष्टि का, सूर्य स्थिति का
और अभेद आत्मा का बोधक है इसलिए मृत्तिका स्नान, जल स्नान, भस्म
स्नान, गोरजोवति निर्मल वायु में गमनागमन वायव्य स्नान, व्यापक
गगन में एकाग्र चित्त द्वारा आकाशस्नान अथवा निर्मल आकाश से पतित
वारिधारा से स्नान आकाश स्नान सम्पन्न होता है । सोम और सूर्यरूपी
ज्योतिर्मण्डल को शिवभावना करना भी एक प्रकार स्नान है । सर्वव्यापक
प्रकाश ही महान् ह्रद् के सदृश है जिसमें समग्र विश्व निमज्जित है और उसी
महाह्रद् में अपना आत्मस्वरूप स्थित है । इस प्रकार भावना उत्कृष्ट शधक
है—यही महास्नान है । क्षिति आदि यद्यपि जड़ हैं तो भी शिव स्वयं
अनुग्रहात्मक स्वरूप धारण करते हुए इन आठ मूर्तियों में विराजमान हैं,
अतः इन स्वरूपों में उनके ध्यान से उन-उन फलों की प्राप्ति होती है ।
केवल इतना ही नहीं अर्चना के समय मूलाधार आदि चक्रों में पृथ्वी आदि
तत्त्वों की धारणा भी फलाधायक है ।
३. वीराचारी साधकों के लिए धरा, जल आदि विशेष प्रकार द्रव्य हैं जिसका
उल्लेख रणरेणु आदि शब्दों से किया गया है ।

आ. १२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२७
एवम् निर्विकल्प स्वरूप आत्मा ही आठ मूर्तियाँ हैं। फिर स्नान बाह्य
और आन्तर के क्रम से दो प्रकार हैं। जो वस्तु बाहर विद्यमान है मन्त्र
के साथ वस्तु की तदात्मता सम्पन्न होने के बाद मन्त्रमयी स्थिति आ
जाती है तब उन-उन वस्तुओंमें निमज्जन ही स्नान है। उस स्नान में जो
विशेष है वह इस प्रकार है—आनन्दद्रव्य को वीराधार में स्थित देखकर
उसे शिवमय स्वरूप में भावना करने के अनन्तर उसी में मंत्रचक्र का
पूजन, फिर उसी से शरीर और प्राण उभय में स्थित देवताचक्र का तर्पण
ही मुख्य स्नान है। आन्तर स्नान इस प्रकार है धरा आदि तत्त्व की
धारणा पृथ्वी आदि चक्रों में करते हुए जो तन्मयता आती है वही आन्तर
स्नान है।
परभैरव स्वरूप में निमज्जन को ही स्नान कहते हैं। इस प्रकार
स्नान जब सम्पन्न होता है तब उस बाह्य स्नान को स्नान कहते हैं।
बाह्यस्नान मुख्य नहीं, गौणरूप में उस में स्नान शब्द का उपचार है।
श्री अभिनवगुप्त द्वारा रचित श्रीतन्त्रसार का स्नान प्रकाशन
नामक द्वादश आह्निक है।

अथ त्रयोदशमाह्निकम्
अथ प्रसन्नहृदयो यागस्थानं यायात्, तच्च यत्रैव हृदयं प्रसादयुक्तं
परमेश्वरसमावेशयोग्यं भवति तदेव, न तु अस्य अन्यल्लक्षणम्, उक्तावपि
ध्येयतादात्म्यमेव कारणम्, तदपि भावप्रसादादेव इति नान्यत् स्थानम्।
पीठपर्वताग्रम् इत्यादिस्तु शास्त्रे स्थानोद्देश एतत्पर एव बोद्धव्यः—तेषु तेषु
पीठादिस्थानेषु परमेशनिविष्ट्या परमेश्वराधिष्ठानां शक्तीनां देहग्रहणात्,
आर्यदेशा इव धार्मिकाणां म्लेच्छदेशा इव अधार्मिकाणाम्, पर्वताग्रादेश्चै-
कान्तत्वेन विक्षेपपरिहारात् एकाग्र्यप्रदत्वम् इति। तत्र यागगृहाग्रे बहिरेव
सामान्यन्यासं कुर्यात्, करयोः पूर्वं, ततो देहे। ह्रीं-न-फ-ह्रीं, ह्रीं-अ-क्ष-ह्रीं
इत्याभ्यां शक्तिशक्तिमद्वाचकाभ्यां मालिनीशब्दराशिमन्त्राभ्याम्, एकेनैव
आदौ शक्तिः ततः शक्तिमानिति, मुक्तौ पादाग्राच्छिरोऽन्तम्, भुक्तौ तु
सर्वो विपर्ययः। मालिनी हि भगवती मुख्यं शाक्तं रूपं बीजयोनिसंघट्टेन
समस्तकामदुघम्। अन्वर्थं चैतन्नाम रुद्रशक्तिमालाभिर्युक्ता फलेषु पुष्पिता
संसारशिशिरसंहारनादभ्रमरी सिद्धिमोक्षधारिणी दानादानशक्तियुक्ता
इति र-लयोरेकत्वस्मृतेः। अत एव हि भ्रष्टविधिरपि मन्त्र एतन्न्यासात्
पूर्णो भवति, साङ्गोऽपि गारुडवैष्णवादिनिरञ्जनताम् एत्य मोक्षप्रदो
भवति। देहन्यासानन्तरम् अर्धपात्रे अयमेव न्यासः। इह हि क्रिया-
कारकाणां परमेश्वराभेदप्रतिपत्तिदार्ढ्यसिद्धये पूजाक्रिया उदाहरणी
कृता, तत्र च सर्वकारकानाम् इत्थं परमेश्वरीभावः, तत्र यष्ट्राधारस्य
स्थानशुद्ध्यापादानकरणयोर्घपात्रशुद्धिन्यासाभ्याम् यष्टुर्देहन्यासात्,
याज्यस्य स्थण्डिलादिन्यासात्। एवं क्रियाक्रमेणापि परमेश्वरीकृत-
समस्तकारकः तयैव दृशा सर्वक्रियाः पश्यन् विनापि प्रमुखज्ञानयोगाभ्यां
परमेश्वर एव भवति। एवम् अर्धपात्रे न्यस्य पुष्पधूपाद्यैः पूजयित्वा
तद्विन्दुभिः यागसारं पुष्पादि च प्रोक्षयेत्। ततः प्रभामण्डले भूमौ खे
वा ओं-बाह्यपरिवाराय नम इति पूजयेत्। ततो द्वारस्थाने ओं-द्वार-
देवताचक्राय नम इति पूजयेत्। अगुप्ते तु बहिःस्थाने सति प्रविश्य
मण्डलस्थण्डिलाग्र एव बाह्यपरिवारद्वारदेवताचक्रपूजां पूर्वोक्तं च
न्यासादि कुर्यात्, न बहिः। ततोऽपि फट् फट् फट् इति अस्त्रजप्तपुष्पं
प्रक्षिप्य विघ्नानपसारितान् ध्यात्वा अन्तः प्रविश्य परमेश्वरकिरणेद्धया

दृष्ट्या अभितो यागगृहं पश्येत् । तत्र मुमुक्षुरुत्तराभिमुखस्तिष्ठेत्, यथा
भगवदघोरतेजसा झटित्येव प्लुष्टपाशो भवेत् । तत्र परमेश्वरस्वातन्त्र्यमेव
मूर्त्याभासनया दिक्त्तत्त्वम् अवभासयति । तत्र चित्प्रकाश एव मध्यं,
तत इतरप्रविभागप्रवृत्तेः प्रकाशस्वीकार्यमूर्ध्वम्, अतथाभूतम् अधः,
प्रकाशनसंमुखीनं पूर्वम्, इतरत् अपरम्, संमुखीभूतप्रकाशत्वात् अनन्तरं
तत्प्रकाशधारारोहस्थानं दक्षिणम् आनुकूल्यात्, तत्संमुखं तु अवभास्य-
त्वात् उत्तरम् इति दिक्कचतुष्कम् । तत्र मध्ये भगवान्, ऊर्ध्वस्य ऐशानं
वक्त्रम्, अधः पातालवक्त्रम्, पूर्वादिदिक्कचतुष्के श्रीतत्पुरुषाघोरसद्योवामा-
ख्यम्, दिक्कचतुष्कमध्ये अन्याश्चतस्रः—इत्येवं संविन्महिमैव मूर्तिकृतं
दिग्भेदं भासयति, इति दिक् न तत्त्वान्तरम् । यथा यथा च स्वच्छछाया
लङ्घयितुम् इष्टा सती पुरः पुरो भवति तथा परमेश्वरमध्यतामेति
सर्वाधिष्ठातृतैव माध्यस्थ्यम् इत्युक्तम् । एवं यथा भगवान् दिग्विभागकारी
तथा सूर्योऽपि, स हि पारमेश्वर्येव ज्ञानशक्तिरित्युक्तं तत्र तत्र, तत्र पूर्वं
व्यक्तेः पूर्वा यत्रैव च तथा तत्रैव, एवं स्वात्माधीनापि स्वसंमुखीनस्य
देशस्य पुरस्तात्त्वात् । एवं स्वात्मसूर्यपरमेशत्रितयैकोभावनया दिक्कचर्चा
इति अभिनवगुप्तगुरुवः । एवं स्थिते उत्तराभिमुखम् उपविश्य देहपर्यष्ट-
कादौ अहंभावत्यागेन देहतां दहेत् संनिधावपि परदेहवत्—अदेहत्वात्,
ततो निस्तरङ्गध्रुवधामरूढस्य दृष्टिखाभाव्यात् या किल आद्या स्पन्द-
कला सैव मूर्तिः, तदुपरि यथोपदिष्टयाज्यदेवताचक्रन्यासः, प्राधान्येन च
इह शक्तयो याज्याः—तदासनत्वात् भगवन्त्वात्मादीनां शक्तेरेव च
पूज्यत्वात्, इति गुरवः । तत्र च पञ्च अवस्था जाग्रदाद्याः, षष्ठी च
अनुत्तरा नाम स्वभावदशा अनुसंधेया,—इति षोढा न्यासो भवति ।
तत्र कारणानां ब्रह्मविष्णुरुद्रेशसदाशिवशक्तिरूपाणां प्रत्येकम् अधिष्ठानात्
षट्त्रिंशत्तत्त्वकलापस्य लौकिकतत्त्वोत्तीर्णस्य भैरवभट्टारकाभेदवृत्ते न्यासे
पूर्णत्वात् भैरवीभावः तेन एतत् अनवकाशम् । यदाहुः ‘अतरङ्गरूढौ
लब्धायां पुनः किं तत्त्वसृष्टिन्यासादिना’ इति । तावत् हि तदतरङ्गं
भैरववपुः यत् स्वात्मनि अवभासितसृष्टिसंहारवैचित्र्यकोटि । एवम्
अन्योन्यमेलकयोगेन परमेश्वरीभूतं प्राणदेहबुद्ध्यादि भावयित्वा बहि-
रन्तः पुष्पधूपवर्णणाद्यैर्यथासंभवं पूजयेत् । तत्र शरीरे प्राणे धियि च
तदनुसारेण शूलाब्जन्यासं कुर्यात्, तद्यथा—आधारशक्तिमूले मूलं, कन्द
आमूलसारकं लम्बिकान्ते, कलातत्त्वान्तो दण्डः, मायात्मको ग्रन्थिः,
चतुष्किकात्मा शुद्धविद्यापद्मं, तत्रैव सदाशिवभट्टारकः स एव महाप्रेतः—
९

१३० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
प्रकर्षेण लीनत्वात् बोधात् प्राधान्येन वेद्यात्मकदेहक्षात् नादामर्शात्मक-
त्वाच्च, इति । तन्नाभ्युत्थितं तन्मूर्धस्थशत्रपनिर्गतं नादान्तर्गतशक्ति-
व्यापिनीसमनारूपमशत्रयं द्विषट्कान्तं, तदुपरि शुद्धपद्मस्थाद् औन्मनसम्
एतस्मिन् विश्वमये भेदे आसनीकृते अधिष्ठातृतया व्यापकभावेन आधेय-
भूतां देवतां कल्पयित्वा यत् तत्रैव समस्तभावनिर्भर आत्मनि विश्वभावार्पणं
तदेव पूजनं, यदेव तन्मयीभवनं तद्ध्यानं, यत् तथाविधान्तःपरामर्शक्रम-
प्रबुद्धमहातेजसा तथाबलादेव विश्वात्मीकरणं स होमः, तदेवं कृत्वा
परिवारं तत एव वह्निरराशिविस्फुलिङ्गवत् ध्यात्वा तथैव पूजयेत् ।
द्वादशान्तमिदं प्राप्यं त्रिशूलं मूलतः स्मरन् ।
देवीचक्राप्रपं त्यक्तक्रमः खचरतां व्रजेत् ॥
मूलाधाराद्विषट्कान्तव्योमाग्रापूरणात्मिका ।
खेचरीयं खसंचारस्थितिभ्यां चामृताशनात् ॥
एवम् अन्तर्यागमात्रादेव वस्तुतः कृतकृत्यता । सत्यतः तदाविष्टस्य
तथापि बहिरपि कार्यो यागोऽवच्छेदहानय एव, योऽपि तथा समावेश-
भाक् न भवति तस्य मुख्यो बहिर्यागः, तदभ्यासात् समावेशलाभो—यत-
स्तस्यापि तु पशुतातिरोधानायान्तर्यागः—तदरूढावपि तत्संकल्पबलस्य
शुद्धिप्रदत्वात् । अथ यदा दीक्षां चिकीर्षेत् तदाधिवासनार्थं भूमिपरिग्रहं,
गणेशार्चनं, कुम्भकलशयोः पूजां, स्थण्डिलार्चनं, हवनं च कुर्यात् ।
नित्यनैमित्तिकयोस्तु स्थण्डिलाद्यर्चनहवने एव । तत्र अधिवासनं शिष्यस्य
संस्कृतयोग्यताधानम् अम्लीकरणमिव दन्तानां देवस्य कर्तव्योन्मुखत्व-
ग्रहणम्, गुरोस्तद्ग्रहणम् । उपकरणद्रव्याणां यागगृहान्तर्वर्तितया
परमेशतेजोबृंहणेन पूजोपकरणयोग्यतार्पणमिति । तत्र सर्वोपकरणपूर्णं
यागगृहं विधाय भगवतीं मालिनीं मातृकां वा स्मृत्वा तद्रणतेजःपुञ्जभरितं
गृहीतं भावयन् पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् । तत उक्तास्त्रपात्राणि यथासंभवं
सिद्धार्थधान्याक्षतलाजादीनि तेजोरूपाणि विकीर्य ऐशान्यां दिशि क्रमेण
संघट्टयेत्, इति भूपरिग्रहः । ततः शुद्धविद्यान्तमासनं दत्त्वा गणपतेः
पूजा, ततः कुम्भम् आनन्दद्रव्यपूरितम् अलंकृतं पूजयेत्, ततो याज्यमनु
पूगं न्यस्य तत्र मुख्यं मन्त्रं सर्वाधिष्ठातृतया विधिपूर्वकत्वेन स्मरन् अष्टो-
त्तरशतमन्त्रितं तेन तं कुम्भं कुर्यात् । द्वितीयकलशे विघ्नशमनाय अस्त्रं
यजेत् । ततः स्वस्वदिक्षु लोकपालान् सास्त्रान् पूजयेत् । ततः शिष्यस्य

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३१

प्राक् दीक्षितस्य हस्ते अस्त्रकलशं दद्यात् । स्वयं च गुरुः कुम्भम् आद-
दीत । ततः शिष्यं गृहपर्यन्तेषु विघ्नशमनाय धारां पातयंस्तं कुम्भोऽनु-
गच्छेत् इमं मन्त्रं पठन्—
भो भोः शक्र त्वया स्वस्यां दिशि विघ्नप्रशान्तये ।
सावधानेन कर्मान्तं भवितव्यं शिवाज्ञया ॥
त्र्यक्षरे नाम्नि—भो इत्येकमेव । तत ऐशान्यां दिशि कुम्भं स्थापयेत् ।
विकिरोपरि अस्त्रकलशम् । तत उभयपूजनम् । ततः स्थण्डिलमध्ये
परमेशपूजनम् । ततः अग्निकुण्डं परमेश्वरशक्तिरूपतया भावयित्वा तत्र
अग्निं प्रज्वाल्य हृदयान्तर्बोधाग्निना सह एकीकृत्य मन्त्रपरामर्शसाहित्येन
ज्वलन्तं शिवाग्निं भावयित्वा, तत्र न्यस्य अभ्यर्च्य मन्त्रान् तर्पयेत्
आज्येन तिलैश्च । अर्घपात्रेण च प्रोक्षणमेव तिलाज्यादीनां संस्कारः ।
स्रुक्स्रुवयोश्च परमेशाभेददृष्टिरेव हि संस्कारः । ततो यथाशक्ति हुत्वा
स्रुक्स्रुवौ ऊर्ध्वाधोमुखतया शक्तिशिवरूपौ परस्परोन्मुखौ विधाय सम्पा-
दोत्थितो द्वादशान्तगगनोदितशिवपूर्णचन्द्रनिःसृतपतत्परामृतधाराभावनां
कुर्वन् वौषडन्तं मन्त्रम् उच्चारयन् च आज्यक्षयान्तं तिष्ठेत्, इति पूर्णा-
हुतिः मन्त्रचक्रसंतर्पणी । ततश्चरुं प्रोक्षितमानीय स्थण्डिलकलशकुम्भव-
ह्निषु भागं भागं निवेद्य, एकभागम् अवशेष्य, शिष्याय भागं दद्यात् ।
ततो दन्तकाष्ठम् । तत्पातोऽग्नि-यमनिऋर्तिदिक्षु अधश्च न शुभ इति ।
तत्र होमोऽस्त्रमन्त्रेण कार्यः । ततो विक्षेपपरिहारेण भाविमन्त्रदर्शनयो-
ग्यतायै बद्धनेत्रं शिष्यं प्रवेश्य अनुत्थितं तं कृत्वा पुष्पाञ्जलिं क्षेपयेत् ।
ततः सहसा अपास्तनेत्रबन्धोऽसौ शक्तिपातानुगृहीतकरणत्वात् सन्नि-
हितमन्त्रं तत्स्थानं साक्षात्कारेण पश्यन् तन्मयो भवति, अनुगृहीतकर-
णानां मन्त्रसन्निधिः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षवतस्तान् इव भूतानाम् । ततः स्वद-
क्षिणहस्ते दीप्ततया देवताचक्रं पूजयित्वा तं हस्तं मूर्धहृन्नाभिषु शिष्यस्य
पाशान् दहन्तं निक्षिपेत् । ततो वामे सोम्यतया पूजयित्वा शुद्धतत्त्वा-
प्यायिनं, ततः प्रामाणं कुर्यात् । ततो भूतदेवतादिग्बलिं महामांसजलादि-
पूर्णं बहिर्दद्यात्, आचामेत् । ततः स्वयं चरुभोजनं कृत्वा शिवात्मना
सह ऐक्यमापन्नः प्रबुद्धवृत्तिः तिष्ठेत् । स्वप्नम् अपि प्रभाते शिष्यः चेत्
अशुभं स्वप्नं वदेत् तत् अस्मै न व्याकुर्यात्—शङ्कातङ्कौ हि तथास्य
स्याताम्, केवलम् अस्त्रेण तन्निष्कृतिं कुर्यात् । ततस्तथैव परमेश्वरं पूज-
यित्वा तदग्रे शिष्यस्य प्राणक्रमेण प्रविश्य हृत्कण्ठतालुललाटरन्ध्रद्वाद-

१३२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
शान्तेषु षट्सु कारणषट्कस्पर्शं कुर्वन् प्रत्येकमष्टौ संस्कारान् चिन्तयन्
कंचित्कालं शिष्यप्राणं तत्रैव विश्रमय्य पुनरवरोहेत् । इत्येवापादिताष्टा-
चत्वारिंशत्संस्कारोपरिकृतरुद्रांशापत्तिः समयीभवति । ततः अस्मै पूज्यं
मन्त्रं पुष्पाद्यैः सह अर्पयेत् । ततः समयान् अस्मै निरूपयेत् । गुरौ
सर्वात्मना भक्तिः, तथा शास्त्रे देवे, तत्प्रतिद्वन्द्विनि पराङ्मुखता, गुरुवत्
गुरुपुत्रादेः विद्यासंबंधकृतस्य तत्पूर्वदीक्षितादेः संदर्शनम् यौनसंबन्धस्य
तदाराधनार्थम्, न तु स्वत इति मन्तव्यम् । स्त्रियो वन्ध्यायास्तज्जु-
गुप्साहेतुं न कुर्यात् । देवतानाम गुरुनाम तथा मन्त्रं पूजाकालात् ऋते
न उच्चारयेत् । गुरुपभुक्तं शय्यादि न भुञ्जीत । यत् किंचित् लौकिकं
क्रीडादि तत् गुरुसन्निधौ न कुर्यात् । तद्व्यतिरेकेण न अन्यत्र उत्कर्षबुद्धि
कुर्यात् । सर्वत्र श्राद्धादौ गुरुमेव पूजयेत् । सर्वेषु च नैमित्तकेषु शाकिनी-
त्यादिशब्दान् न वदेत् । पर्वदिनानि पूजयेत् । वैष्णवाद्यैरधोदृष्टिभिः सह
संगतिं न कुर्यात् । अधोमार्गस्थितं कंचित् वैष्णवाद्यं तच्छास्त्रकुतूहलवत्
गुरुकृत्यापि त्यजेत् । तदापि न उत्कर्षबुद्ध्या पश्येत् । लिङ्गिभिः सह
समाचारमेलनं न कुर्यात्, तान् केवलं यथाशक्ति पूजयेत् । शङ्कास्त्यजेत् ।
चक्रे स्थितश्चरमाग्य्रादिविभागं जन्मकृतं न संकल्पयेत् । शरीरात् ऋते
न अन्यत् आयतनतीर्थादिकं बहुमानेन पश्येत् । मन्त्रहृदयम् अनवरतं
स्मरेत्, इत्येवं शिष्यः श्रुत्वा प्रणम्य अभ्युपगम्य गुरुं धनदारशरीरप-
र्यन्तया दक्षिणया परितोष्य पूर्वदीक्षितांश्च दीनानाथादिकान् तर्पयेत् ।
भाविविधिना च मूर्तिचक्रं तर्पयेत् । इत्थं समयीभवति । मन्त्राभ्यासे
नित्यपूजायां श्रवणेऽध्ययने अधिकारी, नैमित्तिके तु सर्वत्र गुरुमेव अभ्य-
र्थयेत, इति सामयिको विधिः ।
अध्वानमालोच्य समस्तमन्तः पूर्णं स्वमात्मानमथावलोक्य ।
पश्येदनुग्राह्यधिया द्विषट्कपर्वन्तमेवं समयी शिशु स्यात् ॥
सअलभा अपरि उण्णउ परभैरउ अत्ताणु
जाइवि अग्गणि सण्णउ जोअभिमी सत्ताणु ।
एहस समयदिक्ख परभइरव जलाणं हि मज्जणिण
इत्थति लज्जहवन बहुपरिववहोडउवाजिण ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे समयदीक्षाप्रकाशनं
नाम त्रयोदशमाह्निकम् ॥१३॥

त्रयोदश आह्निक
इसके अनन्तर प्रसन्न हृदय होकर यागभूमि को जाय । यह यागभूमि
वही है जहाँ जाने से हृदय प्रसन्न होता है और साथ ही परमेश्वर के
समावेश आने की योग्यता उत्पन्न होता है। इसका अन्य कोई लक्षण नहीं
है। अगर कोई लक्षण बताया गया भी हो तो उसका कारण ध्येयवस्तु
की तदात्मता ही समझना चाहिए और इस प्रकार तदात्मता भी भाव-
प्रसाद से उत्पन्न होता है—इससे अतिरिक्त कोई स्थान विशेष नहीं।¹
पीठ या पर्वत शिखर आदि स्थानों का जो उल्लेख शास्त्रों में हुआ है वह
इसी आशय से ही हुआ है—ऐसा जानना चाहिए। उन-उन पीठों में
परमेश्वर की नियतिशक्ति द्वारा परमेश्वर के स्वरूप में आविष्ट शक्तियों का
शरीर धारण हुआ। आर्यों के देश में जैसे धार्मिकों का म्लेच्छों के देशों में
उसी प्रकार अधार्मिकों का जन्म हुआ। पर्वतशिखर स्वभावतः एकान्त
होने के कारण विक्षेप दूर हो जाता है इसलिए एकाग्र शब्द का उल्लेख
हुआ है।
उस यागगृह के सम्मुख बाहर सामान्य न्यास करना चाहिए, पहले
करों में न्यास होना चाहिए बाद में शरीर में। ह्रीं न-फ ह्रीं, ह्रीं अ-
क्ष ह्रीं इस प्रकार से शक्ति और शक्तिमद् वाचक मालिनी तथा शब्द
१. पर्वतशिखर, नदीतट, कलिङ्ग आदि स्थान साधनाके लिए उपयोगी हैं इस
प्रकार प्रसिद्धि है, लेकिन इस विषय में आचार्य का कहना है कि ये स्थान
बाहरी हैं। अन्तरंग साधना के लिए इनकी उपयोगिता अधिक नहीं है।
विशेष प्रकार सिद्धि के लिए ही ये उपयोगी हैं, मुक्तिके लिए नहीं है। बाह्य
क्षेत्र के अतिरिक्त आभ्यन्तर क्षेत्र भी वर्तमान हैं जो प्रत्येक मनुष्य के शरीर
में हैं। योग प्रक्रिया के सहारे प्राण को शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों में ले
जाने से विभिन्न पीठ, उपपीठ आदि की प्राप्ति होती है। उन पीठ आदि
स्थानों में प्राण के योग होने पर साधक विशेष प्रकार सिद्धियाँ प्राप्त कर
लेते हैं—मुक्ति नहीं, क्योंकि मुक्ति स्थान के महत्त्व से उत्पन्न नहीं होती ।
स्थान या क्षेत्र का महत्त्व इसलिए है कि विशेष-विशेष क्षेत्रों में ज्ञान और
योग की स्थिति वर्तमान है, अतः उन स्थानों में रहने से ज्ञान और योग
का अधिगम होता है ।

१३४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
समूह के वाचक मन्त्रों से अर्थात् मातृकाओं से न्यास होना चाहिए । एक-
एक वर्ण से न्यास हो तो पहले शक्ति का ( मातृका ), १ बाद में मालिनी
का जो शक्तिमत् है न्यास होना चाहिए । जो मुक्ति के अभिलाषी
हैं वे पाद से मस्तक तक न्यास करें और जो भोग के अभिलाषी है वह
इसके विपरीत क्रम से करें २ । मालिनी ही भगवान सम्बन्धी मुख्य शाक्त
रूप है ३ । बीज और योनि के परस्पर मिलन होनेपर यही शाक्तरूप सब
१. मालिनी शब्दों से न ऋ ॠ ऌ ॡ थ च ध, ई ण उ ऊ ब क ख ग घ ङ
इ अ व भ य ड ढ ठ झ ञ ज र ट प छ ल आ स अः ह ष क्ष म श अं त
ए ऐ ओ औ द फ समझने चाहिए । मालिनी की संख्या कुल पचास हैं ।
मातृकाएँ अ से ह तक वर्णराशियाँ हैं इनकी संख्या भी पचास
हैं । मातृका न्यास ललाट, मुख, चक्षु कर्ण, नासा, गण्ड, दंत, ओष्ठ, ब्रह्म-
रंध्र, जिह्वा आदि सोलह स्थानों में सोलह स्वरों से क्रमशः किया जाता
है । शरीर के अन्य स्थानों में भिन्न-भिन्न वर्णों का न्यास की विधि शास्त्रों
में वर्णित हुआ है ।
२. न्यास सृष्टि तथा संहारक्रम से किया जाता है । संहारन्यास पैर से मस्तक
तक न्यास की एक विधि है, सृष्टिक्रम उसके विपरीत है ।
३. परा परमेश्वरी संवित् परनाद के रूप में विश्रान्त रहकर समग्र विश्वको
प्रकाशित करने की इच्छा से सब भावों को संजीवित करती हुई विमर्शन-
स्वभाव में विराजित रहती है । उनका यह विश्राम नाद स्वभाव में ही
चलता रहता है । नाद भी नाना प्रकार हैं--एक ही परनाद भिन्न-भिन्न
नादों के रूप धारण करता है—उनमें कुछ सूक्ष्मनाद हैं और कुछ स्थूल
हैं । जब स्थूल नाद का विकास सम्पन्न होता है तब उसी नादरूपी स्वरूप
में निषेधात्मक शून्य प्रकाशित होता है जिसमें समग्र अध्वमंडल उपसंहृत
रहता है । यही उनका स्वात्मविश्राम तथा परिपूर्ण रूप है जो न से फ तक
मालिनी का रूप है ।
पूर्णप्रकाशात्मक शब्दमय भगवत्स्वरूप प्रमाता के साथ तदात्मक जो
शक्ति है वह मातृका है । भविष्य में जो कुछ उत्पन्न होनेवाले हैं यही
शक्ति उनके माँ के समान है इसलिए इन्हें मातृका कहते हैं ।
मालिनी शब्द में 'मा' शब्द संहार का वाचक है । यह 'ला' संहार
का ग्रहण या 'रा' संहार का नाश उभय का बोधक है । मालिनी शब्द का
अर्थ संहाररूपी विमर्शन है । मातृका सृष्टिरूपी है ।

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३५
प्रकार अभीष्ट देनेवाला बनता हैं। यह एक सार्थक नाम क्योंकि रुद्र-
शक्तियों के द्वारा इन मालाओं का धारण होता है फलों की प्राप्ति कराने
में यह पुष्प के समान बनती है तथा संसाररूपी हिमों का नाश करती
है और नादरूपी भ्रमरी बनकर सिद्धि तथा मोक्ष के रूप धारण करती
है। यह दान और आदान उभय प्रकार शक्तियों से सम्बन्धित है, क्योंकि
'र' और 'ल' की अभिन्नता शास्त्रों में कथित हुआ है। इसलिए जो
मन्त्र विधिभ्रष्ट है इस न्यास के द्वारा पूर्ण बन जाता है। मलिन गारुड
तथा वैष्णव मन्त्रादि निर्मल बनकर मोक्ष देनेवाले बनते हैं।
शरीर में न्यास के अनन्तर अर्धपात्र में यही न्यास करना चाहिए।
इस विषय में क्रिया और कारकों का परमेश्वर के साथ अभिन्नताबोध
की दृढ़ता की सिद्धि के लिए पूजनरूपी क्रिया का उदाहरण उपस्थित
किया गया है। पूजनक्रिया में सभी कारकों का इस उपाय से परमेश्वर
का स्वरूप प्राप्त होता है। इस विषय में यज्ञकर्ता के द्वारा अधिकरण
रूपी स्थानशुद्धि के द्वारा, अपादान और करण अर्धपात्रशुद्धि और न्यास
के द्वारा, यज्ञकर्ता (कर्तृ कारक) का देहन्यास के द्वारा, याज्य जो कर्म है
स्थण्डिलादि न्यास के द्वारा सम्पन्न होता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार
क्रियाओं से सभी कारकों का परमेश्वर स्वरूप की प्राप्ति होती है। इस
दृष्टि से सब प्रकार क्रियाओं को देखने पर प्रमुख ज्ञान और योगरूपी
उपायों के बिना ही जीव परमेश्वर का स्वरूप प्राप्त करता है। अर्धपात्र
में इसी प्रकार न्यास के अनन्तर फूल और धूपों से उसके पूजन के
१. कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः कारक हैं।
पूजक के द्वारा जो भी क्रियायें सम्पन्न होते हैं वे सभी शिव से अभिन्न हैं।
निखिल कारकों का सन्निवेश पूजन क्रिया में स्थित है, अतः पूजनक्रिया में
शिवाभिन्नता सिद्ध हो जाने पर पूजक की लौकिक क्रियायें जैसे गमनादि भी
शिवाभिन्न सिद्ध होने लगती हैं। शिवभावना से भावित होकर पूजनकर्ता
न्यास तथा अर्चन आदि क्रियाएँ जैसे-जैसे करते रहते हैं तब धीरे-धीरे उनके
चित्त में लौकिक क्रियाओं में जो द्वैतबोध वर्तमान है वह कटने लगता है
और किसी समय समग्र विश्व अकस्मात् शिवमय उद्भास से भर जाता है।
न्यास, जप, अर्चन आदि यद्यपि क्रियारूप हैं तो भी शिवभावना अर्थात्
सभी क्रियाएँ शिव का ही स्वरूप हैं इस प्रकार भावना से सम्पन्न होने पर
क्रियाएँ भी उत्कृष्ट फल प्रदान करती हैं।

१३६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
अनन्तर अर्घपात्र में स्थित जलविन्दु से याग के सारभूत फूल आदि का
प्रोक्षण हो जाना चाहिए। इसके अनन्तर प्रभामण्डल में (यागगृह में),
सुलिप्त भूमि पर अथवा अपने शरीर के विशेष स्थान पर 'ॐ बाह्यपरि-
वाराय नमः' इस मन्त्र के द्वारा पूजन करना चाहिए। यागगृह के द्वार
पर 'ॐ द्वारदेवताचक्राय नमः' इस मन्त्र से पूजन होना आवश्यक है।१
उसके बाद अगर पूजन गुप्तरूप से न हो तो यागस्थान में प्रवेश कर
मण्डल और स्थण्डिल के सम्मुख बाह्य परिवार के साथ द्वारदेवताचक्र
का पूजन और पहले बताये गये न्यास करना चाहिए, बाहर पूजन नहीं
करना चाहिए। इसके बाद फट् फट् फट् इस अस्त्रमन्त्र के द्वारा मन्त्रित
पुष्प को निक्षेप कर२ विघ्न दूर हो गया ऐसे ध्यान करने का अनन्तर
यागगृह के अभ्यन्तर में अनन्त परमेश्वर के किरणों से भास्वर दृष्टि के
द्वारा यागगृह के चारों दिशाओं को देखना चाहिए।
मुक्तिकामी शिष्य उत्तर दिशा के अभिमुख होकर बैठे, ताकि अघोर
से उत्पन्न अग्नि उसके सभी पाशों को जला दें। परमेश्वर की स्वातन्त्र्य-
शक्ति ही मूर्ति के आभासन के द्वारा दिक् रूप तत्त्वको प्रकाशित करती
है।३ उस दिक् रूपी तत्त्व अर्थात् पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर आदि
१. द्वार के ऊर्ध्व में गणेश और लक्ष्मी का, इसके दाहिने और बाँये में दिण्डी
और महोदर का और मध्य में वागीश्वरी का पूजन करना आवश्यक है।
अपने दाहिने नन्दी का, बाँये काल का, मध्ये गंगा का, द्वार के ऊर्ध्वशाखा
में यमुना का, छाग और मेषास्य का, द्वार के निम्नभाग में अनन्त और
आधार शक्ति और मध्य में सरस्वती का पूजन होना चाहिए।
२. पुष्प का प्रक्षेप नाराचमुद्रा के द्वारा होना चाहिए। अस्त्र मंत्र (फट्) से
मन्त्रित पुष्प विघ्नरूप पाश को जला डालता है। दिव्यदृष्टि से देखने का
तात्पर्य यह है कि उस में विशेष प्रकार गुणों का आधान हो। विघ्नों का
पुनः प्रवेश न हो इसलिए दिशाओं का बन्धन भी होना आवश्यक है। मुमुक्षु
उत्तराभिमुख होकर और भोगेच्छु पूर्वाभिमुख होकर बैठे।
३. अद्वैत सिद्धान्त के अनुसार दिक् नाम का कोई पृथक् पदार्थ नहीं है।
क्योंकि संवित्प्रकाश ही अपने स्वातन्त्र्य से विभिन्न वस्तुओं (मूर्तियों) को
आभासित करता है। इसके फलस्वरूप एक आभास दूसरे आभास से दूर
और निकट रूप में प्रकाशित होता है। पूर्व पश्चिम ऊर्ध्व अधः आदि
दिग्विभाग भी आभास से अतिरिक्त कोई विषय नहीं है। तो भी व्यवहार

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३७
दिशाओं में जो चित्प्रकाशरूप है वही मध्य है। यहीं से अर्थात् मध्य से
ही भिन्न-भिन्न दिशाओं के विभाग उत्पन्न होते हैं। जहाँ प्रकाशस्वरूप
को अपनाया जाता है वह ऊर्ध्व है, जो दिशा उस प्रकार नहीं है अर्थात्
जहाँ प्रकाश को अस्वीकृत किया गया है वह अधः है, प्रकाश की
उन्मुखता जहाँ है वह पूर्व है, इससे भिन्न पश्चिम है। सम्मुख में स्थित
प्रकाश उस प्रकाशधारा का आरोह स्थान है वह दक्षिण है क्योंकि उस
दक्षिण दिशा में प्रकाश की ओर अनुकूलता वर्तमान है। इसी दक्षिण
दिशा के सम्मुख जो दिशा अवभासित होता है वह उत्तर दिशा है। ये
ही चार दिशाएँ हैं।१ मध्यभाग में भगवान् हैं, ऊर्ध्व में उनका ईशान
की सिद्धि के लिए दिक् के जो विभाग हैं वे निम्नप्रकार है। परप्रकाश
रूप परमेश्वर के पर, परापर और अपर रूपों में कभी प्रकाशभाग मुख्य
गौण बन जाता है जिससे दिग्विभाग की विचित्रताएँ आती हैं। जब
परमेश्वर का परस्वरूप जो एकमात्र प्रकाश ही प्रकाश है तब उस स्थिति
का नाम ऊर्ध्व पड़ता है। प्रकाश के स्पर्श प्राप्त करने में असमर्थ स्थिति अधः
है। इन दो स्थितियों के अन्तराल में जो प्रकाश और अप्रकाशरूप है वह
मध्य है। जिस दिशा में प्रकाश की ओर किंचित् उन्मुखता आती है वह पूर्व
है। इसी प्रकार अप्रकाश के योग के कारण प्रकाश के प्रति जो विमुखता है
वह पश्चिम है। वही किंचित् प्रकाश जब अपने प्रकाश में स्थित विक्षेप को
परामर्शन करते हुए स्वप्रकाशमय परिपूर्ण आत्मस्वरूप में स्थित रहता है तब
वह दक्षिण दिशा है जिसमें प्रकाश की अनुकूलता वर्तमान है। उत्तर दिशा
में अप्रकाश स्थिति पुनः जग उठती है—जिसमें प्रमेयबोध की मुख्यता है।
१. परमेश्वर का ईशानरूपी मुख ऊर्ध्व में स्थित है, जो परिपूर्ण प्रकाशमय है।
तत्पुरुष प्रकाश की ओर उन्मुख है। यह पूर्व दिशा में है। अघोर वक्त्र
प्रसृतप्रकाश के उद्रेक से अनुकूल है, इसलिए इस दिशा का नाम दक्षिण
पड़ा। वामदेव में प्रकाश की प्रतिकूलता वर्तमान है, यह उत्तर दिशा है।
यहाँ प्रमेयरूपी इन्दु का संस्पर्श वर्तमान है, अतः यह सोमारूप उत्तर दिशा
में है। फिर सद्योजात मुख प्रकाश की विपरीतता या वैमुख्य है, इसलिए
यह पश्चिम दिशा में है। अधोवक्त्र प्रकाश संस्पर्श का अयोग्य है। इसलिए
इस वक्त्र का नाम है पिचुवक्त्र। इन वक्त्रों के साथ पञ्चभूतों का भी
सम्बन्ध है। आकाश, वायु, वह्नि, जल और पृथ्वी आदि इन पाँचों का
सम्बन्ध ईशान आदि वक्त्रों से है।

१३८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
वक्त्र है, अधोभाग में पाताल वक्त्र है, पूर्व आदि चार दिशाओं में क्रमशः
तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात तथा वामदेव सम्बन्धी मुख हैं। इन चारों
के बीच में अन्य चार हैं¹—इस प्रकार संवित् ही अपनी महिमा से
मूर्तियों के भेद से दिशाओं के भेदों को प्रकाशित करती है। अतः दिक्
कोई अलग तत्त्व नहीं है। अपने शरीर की छाया लाँघने की इच्छा
होने पर भी वह जैसे सामने ही रह जाती है उसी प्रकार परमेश्वर मध्य
में ही स्थित रहते हैं। सभी वस्तुओं का अधिष्ठातृत्व हो माध्यस्थ्य है
ऐसा कहा जाता है।
इसी प्रकार भगवान् जैसे दिशाओं के भेदों को उत्पन्न करने वाले
होते हैं सूर्य भी उसी प्रकार है।² सूर्य स्वयं परमेश्वर सम्बन्धी ज्ञानशक्ति
है ऐसा विभिन्न स्थानों में वर्णित हुआ है। इस ज्ञानशक्ति की अभिव्यक्ति
जहाँ पहले होती है वह पूर्व है जहाँ सूर्य भी वहाँ है। इस सिद्धान्त के
अनुसार पूर्व आदि दिशा आत्माधीन है इसलिए स्वसम्मुख देश का ही
नाम पूर्व है। अतः निजी आत्मा, सूर्य और परमेश्वर इन त्रितय की
एकात्मकभावना के द्वारा दिशा सम्बन्धी विचार होना चाहिए—यही
श्री अभिनवगुप्त के गुरुओं का सिद्धान्त है।
इस स्थिति के अनुसार उत्तराभिमुख होकर³ बैठ कर देहरूपी
पुर्यष्टक आदि में अहं भाव (अहं अभिमान) को छोड़कर देहस्वरूप
को जला देना चाहिए। जैसे दूसरे का देह निकट रहने पर उसमें
१. ऊर्ध्व और अधः को छोड़कर अग्नि, नैऋत, वायु और ईशान जो क्रमशः
पूर्व-दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम-उत्तर, उत्तर-पूर्व आदि दिशाएँ हैं ये
मध्यरूपी परप्रकाश के सम्बन्ध से उदित होती हैं। जिसे माध्यस्थ्यरूप
में वर्णित किया गया है वह सब दिशाओं का ही नहीं सभी के ही आधार
हैं, वे प्रकाश-ही-प्रकाश है, किसी का प्रकाश्य नहीं बनते ।
२. शास्त्रीय दिग्विभाग जैसे प्रकाशरूपी शिव पर आश्रित है उसी प्रकार
लौकिक दिग्विभाग भी सूर्य पर आश्रित है। ज्ञानशक्ति ही आदित्य-विग्रह के
रूप में आकाश में भासमान है। सूर्य के द्वारा दिग्विभाजन निम्न उपाय
से किया जाता है। विषुवत् दिन में जब दिन और रात समानकाल-स्थायी
होते हैं उस दिन सूर्य जिस दिशा में स्थित रहता है वही पूर्व-दिशा है।
३. परमेश्वर जो मध्यस्थित हैं उन्हें ग्रहण करने की इच्छा से पूजक जिस दिशा
की ओर बैठते हैं वह दक्षिण है। उसका पिछला भाग ही उत्तर है।

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३९
अभिमान न रहने के कारण वह अदेह है। १ उसके अनन्तर निस्तरंग
ध्रुवधाम में सुदृढ़निष्ठा उत्पन्न कर फिर से नवीन देह की रचना करनी
चाहिए। वह ध्रुवधाम स्वभावतः सृष्टि का उदय करनेवाला है। संविद्
जब तरंगित हो उठती है तब उसकी जो आद्या (प्रथम) कला है वह मूर्ति
है। २ उस नवनिर्मित मूर्ति पर उपदिष्ट विधि के अनुसार याज्य देवता-
चक्र का न्यास होना चाहिए। मुख्यतया शक्तियों का ही पूजन यहां
अभिप्रेत है। भगवत्स्वरूप नवात्मा ३ आदि शक्तियों का आसन रूप होने
१. शरीर में जो दृढ़ आत्माभिमान है—'मैं शरीरी हूँ' इस प्रकार भावना का
नाश दीक्ष मन्त्र के द्वारा सम्पन्न होता है। यद्यपि देहरूपी पुर्यष्टक का नाश
मन्त्ररूपी अग्नि के द्वारा सम्पन्न होने पर भी प्राकृत देह का नाश जली
हुई लकड़ी के समान नहीं होता है, तो भी देह के विषय में जो अभिमान
पहले था मन्त्र के प्रयोग से वह शुद्ध प्रमाता की विमर्शरूपता प्राप्त कर
लेता है जिसके फलस्वरूप स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों शरीरों में अभिमान कट
जाता है। उस समय स्थूल देह के रहते हुए भी उसमें अभिमान नहीं
रहता है। वह शरीर दूसरे के शरीर के समान बन जाता है। केवल मन्त्र
से देह का नाश ही इष्ट नहीं। स्थूल और सूक्ष्म शरीर का जो संस्कार है
वह भस्म के सदृश है। वर्म मन्त्र के प्रयोग से उस भस्मराशि को हटाकर
शुद्धचिदात्मक स्थिति में योगी को रहना चाहिए। वही निस्तरङ्ग ध्रुवधाम
है। उसी ध्रुवधाम से शुद्धशरीर की उत्पत्ति होती है। सूक्ष्मशरीर की
शुद्धि की विधि निम्न प्रकार हैं—हृदयकमल में सूक्ष्म जुगुनु के समान
और दीप्त तारा की तरह उज्ज्वल जीवात्मा को हृदय, कण्ठ, तालु, ब्रह्मरन्ध्र
इत्यादि स्थानों से ऊर्ध्व रेचक के द्वारा भेदन कराकर द्वादशान्त में ले
जाना चाहिए और परतत्त्व में मन, बुद्धि और अहङ्कार को विलयन कर
आत्मा को शून्यरूप में चिन्तन करना चाहिए।
२. यह मूर्ति 'सोऽहं' इस प्रकार महामन्त्रात्मक है। सृष्टि के प्रति उन्मुख
संवित् का जो आद्य स्पन्द है वही मूर्ति है। भैरव का ही उच्छ्राय (वहि-
रुन्मेष) ही मूर्ति का तात्पर्य है।
३. प्रकृति, पुरुष, नियति, काल, माया, विद्या, ईश्वर, सदाशिव और शिव ये
नौ हैं। आत्मस्वरूप विमर्शन ही वास्तव में पूजन का वास्तविक तात्पर्य
है। विमर्श ही शक्ति है। शिव जो प्रकाशरूप हैं उनका स्वात्मविमर्श ही
शक्ति है।

४. आह्निक १७-२२: कुलाचार, मुद्रा-विधान, समावेश एवं उपसंहार

१४० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
के कारण है और गुरुओं के कथन के अनुसार शक्ति ही पूजनीय है।
उस पूजन क्रम में पाँच अवस्थाएँ हैं जो जाग्रदादि हैं¹ और जो षष्ठ
है वह अनुत्तर नामक स्वभावदशा है जिसका अनुसन्धान सबमें होना
चाहिए। अतः न्यास छः प्रकार के हैं, उसमें कारणरूपी ब्रह्मा, विष्णु,
रुद्र, ईश्वर सदाशिव और शक्ति आदि रूपों का अधिष्ठान अलग-अलग
रूप से छत्तीस तत्त्वों में वर्तमान है। लौकिक तत्त्वों से परे भैरव भट्टारक
के साथ अभिन्नता लाने वाले न्यास के द्वारा वह पूजक पूर्ण हो जाता है
और उसमें भैरवभाव आ जाता है। इसलिए इस विषय की आवश्यकता
क्या है—जैसे कहा गया है—
अतः केवल अन्तर्याग से ही वास्तविक कृतकृत्यता आती है।² क्योंकि
अन्तर्याग से ही वास्तविक समावेश की प्राप्ति होती है, तो भी बाहर भी
याग करणीय है क्योंकि उससे परिच्छिन्नता दूर हो जाती है। जिस
साधक में उस प्रकार समावेश की प्राप्ति नहीं होती है उसके लिए
बहिर्याग ही मुख्य है। बहिर्याग के अभ्यास से समावेश लाभ होता है—
उसमें जो पशुभाव वर्तमान है, उसे हटाने के लिए उसे अन्तर्याग करना
उचित है। अन्तर्याग में दृढ़ निष्ठा या परिपक्वता न आने पर भी उस
विषय में संकल्प के बल से ही विशुद्धता आती है।
इसके अनन्तर जो दीक्षा की अभिलाषी है उसके अधिवास³ के लिए
१. अवस्थाएँ पांच हैं जो जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्य और तुर्यातीत हैं अनुत्तर
इनसे परे हैं अथच वह सबमें अनुस्यूत है।
२. अन्तर्याग से ही जब स्वरूप प्राप्ति होती है तो बहिर्याग का क्या महत्त्व है,
इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि मानसयाग किये बिना बाह्ययाग
करने पर वह शुभ फल प्रदान नहीं करता है और उस याग से मोक्ष की
प्राप्ति नहीं होती। जहाँ बहिर्याग मुख्य है वहाँ भी अन्तर्यजन परम आव-
श्यक समझा जाता है क्योंकि बहिर्याग के द्वारा आन्तर वृत्तियों का विकास
सम्पन्न होता है। योगमार्ग में चलने वालों के लिये बाह्ययजन आन्तर
क्रम में आरूढ़ होने के लिए एक सोपान है। बाह्यविधि ही किसी समय
आन्तर क्रम में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए बाह्यविधि उपेक्षणीय
नहीं है।
३. देवता, गुरु, शिष्य और भविष्य में जो दीक्षा शिष्य को दी जायेगी उन
सभी में योग्यताधायक संस्कार ही अधिवास है। यागगृह में वास करना