तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
समूह के वाचक मन्त्रों से अर्थात् मातृकाओं से न्यास होना चाहिए । एक-
एक वर्ण से न्यास हो तो पहले शक्ति का ( मातृका ), १ बाद में मालिनी
का जो शक्तिमत् है न्यास होना चाहिए । जो मुक्ति के अभिलाषी
हैं वे पाद से मस्तक तक न्यास करें और जो भोग के अभिलाषी है वह
इसके विपरीत क्रम से करें २ । मालिनी ही भगवान सम्बन्धी मुख्य शाक्त
रूप है ३ । बीज और योनि के परस्पर मिलन होनेपर यही शाक्तरूप सब
१. मालिनी शब्दों से न ऋ ॠ ऌ ॡ थ च ध, ई ण उ ऊ ब क ख ग घ ङ
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ए ऐ ओ औ द फ समझने चाहिए । मालिनी की संख्या कुल पचास हैं ।
मातृकाएँ अ से ह तक वर्णराशियाँ हैं इनकी संख्या भी पचास
हैं । मातृका न्यास ललाट, मुख, चक्षु कर्ण, नासा, गण्ड, दंत, ओष्ठ, ब्रह्म-
रंध्र, जिह्वा आदि सोलह स्थानों में सोलह स्वरों से क्रमशः किया जाता
है । शरीर के अन्य स्थानों में भिन्न-भिन्न वर्णों का न्यास की विधि शास्त्रों
में वर्णित हुआ है ।
२. न्यास सृष्टि तथा संहारक्रम से किया जाता है । संहारन्यास पैर से मस्तक
तक न्यास की एक विधि है, सृष्टिक्रम उसके विपरीत है ।
३. परा परमेश्वरी संवित् परनाद के रूप में विश्रान्त रहकर समग्र विश्वको
प्रकाशित करने की इच्छा से सब भावों को संजीवित करती हुई विमर्शन-
स्वभाव में विराजित रहती है । उनका यह विश्राम नाद स्वभाव में ही
चलता रहता है । नाद भी नाना प्रकार हैं--एक ही परनाद भिन्न-भिन्न
नादों के रूप धारण करता है—उनमें कुछ सूक्ष्मनाद हैं और कुछ स्थूल
हैं । जब स्थूल नाद का विकास सम्पन्न होता है तब उसी नादरूपी स्वरूप
में निषेधात्मक शून्य प्रकाशित होता है जिसमें समग्र अध्वमंडल उपसंहृत
रहता है । यही उनका स्वात्मविश्राम तथा परिपूर्ण रूप है जो न से फ तक
मालिनी का रूप है ।
पूर्णप्रकाशात्मक शब्दमय भगवत्स्वरूप प्रमाता के साथ तदात्मक जो
शक्ति है वह मातृका है । भविष्य में जो कुछ उत्पन्न होनेवाले हैं यही
शक्ति उनके माँ के समान है इसलिए इन्हें मातृका कहते हैं ।
मालिनी शब्द में 'मा' शब्द संहार का वाचक है । यह 'ला' संहार
का ग्रहण या 'रा' संहार का नाश उभय का बोधक है । मालिनी शब्द का
अर्थ संहाररूपी विमर्शन है । मातृका सृष्टिरूपी है ।