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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

१३६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३
अनन्तर अर्घपात्र में स्थित जलविन्दु से याग के सारभूत फूल आदि का
प्रोक्षण हो जाना चाहिए। इसके अनन्तर प्रभामण्डल में (यागगृह में),
सुलिप्त भूमि पर अथवा अपने शरीर के विशेष स्थान पर 'ॐ बाह्यपरि-
वाराय नमः' इस मन्त्र के द्वारा पूजन करना चाहिए। यागगृह के द्वार
पर 'ॐ द्वारदेवताचक्राय नमः' इस मन्त्र से पूजन होना आवश्यक है।१
उसके बाद अगर पूजन गुप्तरूप से न हो तो यागस्थान में प्रवेश कर
मण्डल और स्थण्डिल के सम्मुख बाह्य परिवार के साथ द्वारदेवताचक्र
का पूजन और पहले बताये गये न्यास करना चाहिए, बाहर पूजन नहीं
करना चाहिए। इसके बाद फट् फट् फट् इस अस्त्रमन्त्र के द्वारा मन्त्रित
पुष्प को निक्षेप कर२ विघ्न दूर हो गया ऐसे ध्यान करने का अनन्तर
यागगृह के अभ्यन्तर में अनन्त परमेश्वर के किरणों से भास्वर दृष्टि के
द्वारा यागगृह के चारों दिशाओं को देखना चाहिए।
मुक्तिकामी शिष्य उत्तर दिशा के अभिमुख होकर बैठे, ताकि अघोर
से उत्पन्न अग्नि उसके सभी पाशों को जला दें। परमेश्वर की स्वातन्त्र्य-
शक्ति ही मूर्ति के आभासन के द्वारा दिक् रूप तत्त्वको प्रकाशित करती
है।३ उस दिक् रूपी तत्त्व अर्थात् पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर आदि
१. द्वार के ऊर्ध्व में गणेश और लक्ष्मी का, इसके दाहिने और बाँये में दिण्डी
और महोदर का और मध्य में वागीश्वरी का पूजन करना आवश्यक है।
अपने दाहिने नन्दी का, बाँये काल का, मध्ये गंगा का, द्वार के ऊर्ध्वशाखा
में यमुना का, छाग और मेषास्य का, द्वार के निम्नभाग में अनन्त और
आधार शक्ति और मध्य में सरस्वती का पूजन होना चाहिए।
२. पुष्प का प्रक्षेप नाराचमुद्रा के द्वारा होना चाहिए। अस्त्र मंत्र (फट्) से
मन्त्रित पुष्प विघ्नरूप पाश को जला डालता है। दिव्यदृष्टि से देखने का
तात्पर्य यह है कि उस में विशेष प्रकार गुणों का आधान हो। विघ्नों का
पुनः प्रवेश न हो इसलिए दिशाओं का बन्धन भी होना आवश्यक है। मुमुक्षु
उत्तराभिमुख होकर और भोगेच्छु पूर्वाभिमुख होकर बैठे।
३. अद्वैत सिद्धान्त के अनुसार दिक् नाम का कोई पृथक् पदार्थ नहीं है।
क्योंकि संवित्प्रकाश ही अपने स्वातन्त्र्य से विभिन्न वस्तुओं (मूर्तियों) को
आभासित करता है। इसके फलस्वरूप एक आभास दूसरे आभास से दूर
और निकट रूप में प्रकाशित होता है। पूर्व पश्चिम ऊर्ध्व अधः आदि
दिग्विभाग भी आभास से अतिरिक्त कोई विषय नहीं है। तो भी व्यवहार