तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश आह्निक
इसके अनन्तर प्रसन्न हृदय होकर यागभूमि को जाय । यह यागभूमि
वही है जहाँ जाने से हृदय प्रसन्न होता है और साथ ही परमेश्वर के
समावेश आने की योग्यता उत्पन्न होता है। इसका अन्य कोई लक्षण नहीं
है। अगर कोई लक्षण बताया गया भी हो तो उसका कारण ध्येयवस्तु
की तदात्मता ही समझना चाहिए और इस प्रकार तदात्मता भी भाव-
प्रसाद से उत्पन्न होता है—इससे अतिरिक्त कोई स्थान विशेष नहीं।¹
पीठ या पर्वत शिखर आदि स्थानों का जो उल्लेख शास्त्रों में हुआ है वह
इसी आशय से ही हुआ है—ऐसा जानना चाहिए। उन-उन पीठों में
परमेश्वर की नियतिशक्ति द्वारा परमेश्वर के स्वरूप में आविष्ट शक्तियों का
शरीर धारण हुआ। आर्यों के देश में जैसे धार्मिकों का म्लेच्छों के देशों में
उसी प्रकार अधार्मिकों का जन्म हुआ। पर्वतशिखर स्वभावतः एकान्त
होने के कारण विक्षेप दूर हो जाता है इसलिए एकाग्र शब्द का उल्लेख
हुआ है।
उस यागगृह के सम्मुख बाहर सामान्य न्यास करना चाहिए, पहले
करों में न्यास होना चाहिए बाद में शरीर में। ह्रीं न-फ ह्रीं, ह्रीं अ-
क्ष ह्रीं इस प्रकार से शक्ति और शक्तिमद् वाचक मालिनी तथा शब्द
१. पर्वतशिखर, नदीतट, कलिङ्ग आदि स्थान साधनाके लिए उपयोगी हैं इस
प्रकार प्रसिद्धि है, लेकिन इस विषय में आचार्य का कहना है कि ये स्थान
बाहरी हैं। अन्तरंग साधना के लिए इनकी उपयोगिता अधिक नहीं है।
विशेष प्रकार सिद्धि के लिए ही ये उपयोगी हैं, मुक्तिके लिए नहीं है। बाह्य
क्षेत्र के अतिरिक्त आभ्यन्तर क्षेत्र भी वर्तमान हैं जो प्रत्येक मनुष्य के शरीर
में हैं। योग प्रक्रिया के सहारे प्राण को शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों में ले
जाने से विभिन्न पीठ, उपपीठ आदि की प्राप्ति होती है। उन पीठ आदि
स्थानों में प्राण के योग होने पर साधक विशेष प्रकार सिद्धियाँ प्राप्त कर
लेते हैं—मुक्ति नहीं, क्योंकि मुक्ति स्थान के महत्त्व से उत्पन्न नहीं होती ।
स्थान या क्षेत्र का महत्त्व इसलिए है कि विशेष-विशेष क्षेत्रों में ज्ञान और
योग की स्थिति वर्तमान है, अतः उन स्थानों में रहने से ज्ञान और योग
का अधिगम होता है ।