स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ४७
नामपि इह पटे तन्तव इत्येव प्रतीतिदर्शनात् । इह भूतले घटाभाव इत्यत्रापि समवायप्रसङ्गात् ।
अत एवाह 'अपि च लोकबाध' इति । अपि चेति — दूषणाभ्युच्चये, लोकः — प्रामाणिकलोकः,
सामान्यलोको वा; तेन बाधो — विरोधः; लोकबाधः । तदप्रतीतव्यवहारसाधनात् बाधशब्दस्य
“ईहाद्याः प्रत्ययभेदतः'” इति पुंस्त्रीलिङ्गता । तस्माद्धर्मधर्मिणोरविष्वग्भावलक्षण एव सम्बन्धः
प्रतिपत्तव्यो नान्यः समवायादिः ॥ इति काव्यार्थः ॥ ७ ॥
अथ सत्ताभिधानं पदार्थान्तरम्, आत्मनश्च व्यतिरिक्तं ज्ञानाख्यं गुणम्, आत्मविशेष-
गुणोच्छेदस्वरूपां च मुक्तिम्, अज्ञानादङ्गीकृतवतः परानुपहसन्नाह--
सतामपि स्यात् क्वचिदेव सत्ता चैतन्यमौपाधिकमात्मनोऽन्यत् ।
न संविदानन्दमयी च मुक्तिः सुसूत्रमासूत्रितमत्वदीयैः ॥८॥
पुरुषको भी 'इन तन्तुओंमें पट है' यह प्रतीति न होकर 'इस पटमें तन्तु हैं' ऐसी प्रतीति होती है । अन्यथा इस
भूतलमें घटाका अभाव है, यहाँ भी समवाय मानना चाहिए क्योंकि यहाँ भी इहप्रत्यय होता है । इसीलिए
ग्रन्थकारने कहा है 'अपि च लोकबाधः'—यह अप्रतीत व्यवहार साधारण लोगोंके भी अनुभवके विरुद्ध है [ बाध
शब्द 'ईहाद्याः प्रत्ययभेदतः' इस सूत्रसे पुलिंग और स्त्रीलिंग दोनोंमें प्रयुक्त होता है ] । इसलिए धर्म और
धर्मीमें तादात्म्य सम्बन्ध ही स्वीकार करना चाहिए, समवाय सम्बन्ध नहीं ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥ ७ ॥
भावार्थ—इस श्लोकमें वैशेषिकोंके समवाय पदार्थका खण्डन किया गया है । वैशेषिकोंकी मान्यता
है कि धर्म और धर्मी सर्वथा भिन्न हैं । इन दोनों भिन्न पदार्थोंका सम्बन्ध समवायसे होता है। जैनोंका कथन
है कि जिस प्रकार दो पत्थरके टुकड़ोंको जोड़नेवाले लाख आदि पदार्थका हमें प्रत्यक्षसे ज्ञान होता है, वैसे
धर्म और धर्मीका सम्बन्ध करानेवाले समवाय सम्बन्धको हम प्रत्यक्षसे नहीं जानते, इसलिए समवायको धर्म-
धर्मीसे पृथक् तीसरा पदार्थ मानना प्रत्यक्षसे बाधित है । इसके अतिरिक्त, वैशेषिक लोग समवायको एक, नित्य
और सर्वव्यापक मानते हैं, अतएव एक पदार्थमें समवायके नष्ट हो जानेपर संसारके समस्त पदार्थोंमें रहनेवाला
समवाय नष्ट हो जाना चाहिए । क्योंकि समवाय एक और सर्वव्यापक है । तथा, वैशेषिक लोग इहप्रत्यय
( इन तन्तुओंमें पट है ) से समवाय सम्बन्धका ज्ञान करते हैं, परन्तु जैसे पटमें पटत्व समवाय सम्बन्धसे
स्वीकार करते हैं, वैसे ही वे लोग समवायमें भी समवायत्व दूसरे समवायसे और दूसरेमें तीसरे समवायसे,
क्यों नहीं मानते ? तथा समवायमें समवायान्तर माननेसे अनवस्था दोष आता है ।
यदि वैशेषिक लोग पृथिवी आदिके अनेक होनेसे पृथिवीमें पृथिवीत्व मुख्य-समवायसे, तथा समवायके
एक होनेसे समवायमें समवायत्व गौण-समवायसे मानकर मुख्य और गौणके भेदसे समवाय सम्बन्ध
स्वीकार करते हैं, तो यह भो कल्पना मात्र है । क्योंकि समवाय-बहुत्व भी अनुभवसे सिद्ध है । कारण कि
घट और घटरूपका समवाय पट और पटरूपके समवायसे भिन्न है । तथा इहप्रत्यय हेतु समवाय माननेसे लोक-
बाधा भी आती है । क्योंकि जनसाधारण को 'इन तन्तुओंमें पट हैं' यह प्रतीति न होकर 'इस पटमें तन्तु हैं'-
यही ज्ञान होता है । अतएव धर्म-धर्मीमें समवाय सम्बन्ध मानना ठीक नहीं, इसलिए धर्म और धर्मीमें अत्यन्त
भेद मानना भी युक्तियुक्त नहीं है ।
( १ ) सत्ता भिन्न पदार्थ है, ( २ ) आत्मासे ज्ञान भिन्न है, ( ३ ) आत्माके विशेष गुणोंका नष्ट हो
जाना मोक्ष है—इन मान्यताओंको अज्ञानसे स्वीकार करनेवाले वादियोंका उपहास करते हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—सत् पदार्थोंमें भी सब पदार्थोंमें सत्ता नहीं रहती; ज्ञान उपाधिजन्य है, इसलिए ज्ञान
१. हैमलिङ्गानुशासने पुंस्त्रीलिंगप्रकरणे श्लोक ५.
४८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
वैशेषिकाणां द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाख्याः षट्पदार्थास्तत्त्वतयाभिप्रेताः ।
तत्र “पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशः कालो दिगात्मा मन१” इति नव द्रव्याणि । गुणाश्चतुर्विंशतिः ।
तद्यथा “रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे बुद्धिः सुख-
दुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नश्च”२ इति सूत्रोक्ताः सप्तदश । चशब्दसमुच्चिताश्च सप्त३–द्रवत्वं गुरुत्वं
संस्कारः स्नेहो धर्माधर्मौ शब्दश्च इत्येवं चतुर्विंशतिगुणाः । संस्कारस्य वेगभावनास्थितिस्था-
पकभेदाद् त्रैविध्येऽपि संस्कारत्वजात्यपेक्षया एकत्वात्, शौर्यौदार्यादीनां चात्रैवान्तर्भावाद्
नाधिक्यम् । कर्माणि पञ्च । तद्यथा-उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति४। गमन-
ग्रहणाद् भ्रमणरेचनस्यन्दनाद्यविरोधः ॥
अत्यन्तव्यावृत्तानां पिण्डानां यतः कारणाद् अन्योऽन्यस्वरूपानुगमः प्रतीयते,
तदनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सामान्यम् । तच्च द्विविधं परमपरं च । तत्र परं सत्ता५ भावो महासामान्य-
मिति चोच्यते । द्रव्यत्वाद्यवान्तरसामान्यापेक्षया महाविषयत्वात् । अपरसामान्यं च द्रव्य-
त्वादि । एतच्च सामान्यविशेष इत्यपि व्यपदिश्यते । तथाहि । द्रव्यत्वं नवसु द्रव्येषु वर्तमान-
त्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तत्वाद् विशेषः । ततः कर्मधारये सामान्यविशेष इति ।
एवं द्रव्यत्वाद्यपेक्षया पृथिवीत्वादिकमपरं, तदपेक्षया घटत्वादिकम् । एवं चतुर्विंशतौ गुणेषु
वृत्तेर्गुणत्वं सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तेश्च विशेषः । एवं गुणत्वापेक्षया रूपत्वादिकं,
तदपेक्षया नीलत्वादिकम् । एवं पञ्चसु कर्मसु वर्तनात् कर्मत्वं सामान्यम्, द्रव्यगुणेभ्यो
व्यावृत्तत्वाद् विशेषः । एवं कर्मत्वापेक्षया उत्क्षेपणत्वादिकं ज्ञेयम् ॥
आत्मासे भिन्न है; मोक्ष ज्ञान और आनन्दरूप नहीं है-इस प्रकारकी मान्यताओंको प्रतिपादन करनेवाले
शास्त्र, हे भगवन्, आपकी आज्ञासे बाह्य वैशेषिक लोगोंके रचे हुए हैं।
व्याख्यार्थ-वैशेषिकोंने द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय-इन छह पदार्थोंको तत्त्वरूप-
से स्वीकार किया है । "पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन"-ये नौ द्रव्य हैं।
“रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा,
द्वेष, प्रयत्न,” तथा (च शब्दसे) द्रवत्व, गुरुत्व, संस्कार, स्नेह, धर्म, अधर्म, और शब्द-ये चौबीस गुण हैं । इन
गुणोंमें वेग, भावना, और स्थितिस्थापकसे भेदसे संस्कार तीन प्रकारका है, परन्तु वह संस्कारत्व जातिकी
अपेक्षासे एक ही है; शौर्य, औदार्य आदिका इसीमें अन्तर्भाव हो जाता है। कर्म उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन,
प्रसारण और गमनके भेदसे पाँच प्रकारका है । गमनके साथ भ्रमण, रेचन, स्पन्दन आदिका विरोध नहीं है ।
जिस कारण एक-दूसरेसे अत्यन्त व्यावृत्त पदार्थोंमें से अन्य पदार्थके स्वरूपका उससे भिन्न पदार्थमें
अन्वय प्रतीत होता है, उस कारण जो अनुवृत्तिके अन्वयके ज्ञानका कारण होता है, वह सामान्य है । यह
सामान्य दो प्रकारका है-पर सामान्य और अपर सामान्य । पर सामान्यको सत्ता, भाव अथवा महासामान्य
भी कहते हैं; क्योंकि यह पर सामान्य द्रव्यत्व आदि अपर सामान्यकी अपेक्षा महत् विषयवाला है;
परन्तु पर सामान्य द्रव्य, गुण और कर्म तीनोंमें रहता है । द्रव्यत्व आदि अपर सामान्य है, इसे सामान्य
विशेष भी कहते हैं । जैसे; द्रव्यत्व नौ द्रव्योंमें रहनेसे सामान्य; तथा गुण और कर्ममें न रहनेसे विशेष
कहा जाता है। इससे 'सामान्यं च तद्विशेषश्च' इस प्रकार कर्मधारय समासमें 'जो सामान्य होता है
वही विशेष होता है' ऐसा 'सामान्य विशेषः' इस सामासिक पदका अर्थ है । इस प्रकार द्रव्यत्व आदिकी
अपेक्षा पृथिवीत्व आदि, और पृथिवीत्व आदिकी अपेक्षा घटत्व आदि जो अपर सामान्य है, वह सामान्य
१. वैशेषिकदर्शने १-१-५ । २. वैशेषिकदर्शने १-१-६ । ३. प्रशस्तपादभाष्ये उद्देशप्रकरणे । ९-१० ।
४. ऊर्ध्वदेशसंयोगकारणं कर्मोत्क्षेपणम् । अधोदेशसंयोगकारणं कर्मापक्षेपणम् । वक्रत्वापादकं कर्मा-
कुञ्चनम् । ऋजुत्वापादकं कर्म प्रसारणम् । अनियतदेशसंयोगकारणं कर्म गमनम् । प्रशस्तपादभाष्ये
उद्देशप्रकरणे । ५. 'द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु सत्ता परतयोच्यते' । कारिकावली प्रत्यक्षखण्डे का. ८ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ४९
तत्र सत्ता द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं कया युक्त्या इति चेद्, उच्यते । न द्रव्यं सत्ता,
द्रव्यादन्येत्यर्थः, एकद्रव्यवत्त्वाद्—एकैकस्मिन् द्रव्ये वर्तमानत्वादित्यर्थः, द्रव्यत्ववत् । यथा
द्रव्यत्वं नवसु द्रव्येषु प्रत्येकं वर्तमानं द्रव्यं न भवति, किन्तु सामान्यविशेषलक्षणं द्रव्यत्वमेव ।
एवं सत्तापि । वैशेषिकाणां हि अद्रव्यं वा द्रव्यम्, अनेकद्रव्यं वा द्रव्यम् १। तत्राद्रव्यं आकाशः
कालो दिग् आत्मा मनः परमाणवः । अनेकद्रव्यं तु द्वयणुकादिस्कन्धाः । एकद्रव्यं तु द्रव्यमेव
न भवति; एकद्रव्यवती च सत्ता । इति द्रव्यलक्षणविलक्षणत्वाद् न द्रव्यम् । एवं न गुणः सत्ता,
गुणेषु भावाद्, गुणत्ववत् । यदि हि सत्ता गुणः स्याद् न तर्हि गुणेषु वर्तते, निर्गुणत्वाद् गुणा-
नाम् । वर्तते च गुणेषु सत्ता । सन् गुण इति प्रतीतेः । तथा न सत्ता कर्म, कर्मसु भावात्,
विशेष रूप है । इसी तरह गुणत्व चौबीस गुणोंमें रहनेसे सामान्य रूप; तथा द्रव्य और कर्ममें न रहनेसे विशेष
रूप है । अतएव गुणत्वकी अपेक्षा रूपत्व आदि, और रूपत्व आदिकी अपेक्षा नीलत्व आदि अपर सामान्य है ।
इसी प्रकार कर्मत्व पाँच कर्मोंमें रहता है, इसलिए सामान्य, तथा द्रव्य और गुणोंमें नहीं रहता, इसलिए विशेष
है, तथा कर्मत्वकी अपेक्षा उत्क्षेपण आदि अपर सामान्य है । ( वैशेषिक लोग सामान्यको पर सामान्य और
अपर सामान्यके भेदसे दो प्रकारका मानते हैं । इनके मतानुसार पर सामान्य केवल द्रव्य, गुण और कर्म तीन
पदार्थोंमें ही रहता है, अन्यत्र नहीं । पर सामान्यको महासामान्य भी कहते हैं । पर सामान्यका विषय अपर
सामान्यसे अधिक है । द्रव्यत्व, गुणत्व आदि अपर सामान्यके विषय हैं; 'पदार्थत्व' ( द्रव्य, गुण आदि पदार्थोंमें
रहनेवाला ) पर सामान्यका विषय कहा जा सकता है । अपर सामान्यको सामान्य-विशेष भी कहते हैं । क्योंकि
यह अपर सामान्य अपने विशेषोंको सामान्यरूपसे ग्रहण करनेके साथ उनकी अन्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति भी करता
है । द्रव्यत्व द्रव्योंमें रहता है, इसलिए सामान्य, तथा गुण और कर्मसे व्यावृत्त होता है, इसलिए विशेष कहा
जाता है । इसीलिए अपर सामान्यको सामान्य-विशेष भी कहा है । )
पूर्वपक्ष—( १ ) सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे भिन्न है ( द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता—वैशेषिक-
सूत्र १—२—४)—सत्ता द्रव्यत्वकी तरह द्रव्यसे भिन्न है, क्योंकि वह प्रत्येक द्रव्यमें रहती है। जैसे द्रव्यत्व
नौ द्रव्योंमें प्रत्येक द्रव्यमें रहता है, इसलिए द्रव्य नहीं कहा जाता, किन्तु सामान्य-विशेषरूप द्रव्यत्व कहा
जाता है, इसी तरह सत्ता भी प्रत्येक द्रव्यमें रहनेके कारण द्रव्य नहीं कही जाती । वैशेषिकोंके मतमें अद्रव्यत्व
अथवा अनेकद्रव्यत्व ही द्रव्यका लक्षण है। आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन और परमाणु अद्रव्यत्व (जो द्रव्योंसे
उत्पन्न नहीं हुआ हो, अथवा द्रव्योंका उत्पादक न हो ) के उदाहरण हैं, क्योंकि न तो आकाश आदि किसी
द्रव्यसे बनाये गये हैं, और न किसी द्रव्यके उत्पादक हैं। तथा द्वयणुकादिस्कंध अनेकद्रव्यत्व ( जो अनेक द्रव्योंसे
उत्पन्न हुए हों, अथवा अनेक द्रव्यों के उत्पादक हों ) के उदाहरण हैं । एक द्रव्यमें रहनेवाला द्रव्य नहीं होता ।
सत्ता एक द्रव्यमें रहती है, इसलिए सत्तामें द्रव्यका लक्षण नहीं घटता, अतएव वह द्रव्य नहीं है । इसी प्रकार
सत्ता गुण भी नहीं है, क्योंकि वह गुणत्वकी तरह गुणोंमें रहती है । यदि सत्ता गुण होती, तो वह गुणोंमें न
रहती, क्योंकि गुणोंमें गुण नहीं रहते । सत्ता गुणोंमें रहती है, और गुण सत् है—ऐसी प्रतीति होती है, इस-
लिए सत्ता गुणोंमें विद्यमान है । इसी तरह सत्ता कर्म भी नहीं है, क्योंकि वह कर्मत्वकी तरह कर्ममें रहती है ।
यदि सत्ता कर्म हो, तो कर्ममें न रहे, क्योंकि कर्ममें कर्म नहीं रहते । सत्ता कर्ममें रहती है । अतएव सत्ताको
पदार्थान्तर ही मानना चाहिए । ( भाव यह है कि वैशेषिक सिद्धान्तके अनुसार सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे
भिन्न पदार्थ है । सत्ताको द्रव्यसे पृथक् बतानेके लिए वैशेषिक लोग 'एकद्रव्यवत्त्व' हेतु देते हैं । उनके मतानु-
सार द्रव्य 'अद्रव्य' और 'अनेकद्रव्य' के भेदसे दो प्रकारका माना गया है । आकाश, काल आदि द्रव्योंसे उत्पन्न
नहीं होते, और न द्रव्योंको उत्पन्न करते हैं, अतएव वे अद्रव्य-द्रव्य हैं । तथा द्वयणुकादि अनेक द्रव्योंसे उत्पन्न
१ द्रव्यं द्विधा । अद्रव्यमनेकद्रव्यं च । न विद्यते द्रव्यं जन्यतया जनकत्या च यस्य तदद्रव्यं द्रव्यम् ।
यथाकाशाकालादि । अनेकं द्रव्यं जन्यतया च जनकत्या च यस्य तदनेकद्रव्यं द्रव्यम् ।
७
५० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
कर्मत्ववत् । यदि च सत्ता कर्म स्याद् न तर्हि कर्मसु वर्तेत, निष्कर्मत्वात् कर्मणाम् । वर्तते च
कर्मसु भावः; सत् कर्मेति प्रतीतेः । तस्मात् पदार्थान्तरं सत्ता ॥
तथा विशेषा नित्यद्रव्यवृत्तयः अन्त्याः १—अत्यन्तव्यावृत्तिहेतवः, ते द्रव्यादिवैलक्षण्यात्
पदार्थान्तरम् । तथा च प्रशस्तकारः— “अन्तेषु भवा अन्त्याः; स्वाश्रयविशेषकत्वाद् विशेषाः ।
विनाशाऽरम्भरहितेषु नित्यद्रव्येष्वण्वाकाशकालादिगात्ममनस्सु प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्तमाना
अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतवः । यथास्मदादीनां गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्याकृतिगुणक्रियावयवोप-
चयावयवविशेषसंयोगनिमित्ता प्रत्ययव्यावृत्तिर्दृष्टा । गौः शुक्लः शीघ्रगतिः पीनः ककुद्मान्
महाघण्ट इति; तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां नित्येषु तुल्याकृतिगुणक्रियेषु परमाणुषु, मुक्तात्ममन-
स्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः प्रत्याधारं विलक्षणोऽयं विलक्षणोऽयमिति
प्रत्ययव्यावृत्तिः देशकालविप्रकृष्टे च परमाणौ स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं च भवति, तेऽन्त्या
विशेषाः” २ इति । अमी च विशेषरूपा एव न तु द्रव्यत्वादिवत् सामान्यविशेषोभयरूपाः,
व्यावृत्तेरेव हेतुत्वात् ॥
तथा अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानामिहप्रत्ययहेतुः सम्बन्धः समवाय इति । अयुत-
सिद्धयोः परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयानाश्रितयोराश्रयाश्रयिभावः इह तन्तुषु पटः इत्यादेः
प्रत्ययस्यासाधारणं कारणं समवायः । यद्वशात् स्वकारणसामर्थ्यादुपजायमानं पटाद्याधार्यं
तन्त्वाद्याधारे सम्बद्ध्यते, यथा छिदिक्रिया छेद्येनेति सोऽपि द्रव्यादिलक्षणवैधर्म्यात् पदार्था-
न्तरम् । इति षट् पदार्थाः ॥
होते हैं, और अनेक द्रव्योंको उत्पन्न करनेवाले हैं, इसलिए वे अनेकद्रव्य-द्रव्य हैं । सत्ता न 'अद्रव्य' है और न
'अनेकद्रव्य'; वह द्रव्यत्वकी तरह प्रत्येक पदार्थमें रहनेवाली है, इसलिए सत्ताका द्रव्यमें अन्तर्भाव नहीं हो
सकता । इसी प्रकार सत्ता गुण और कर्म भी नहीं है, क्योंकि वह गुणत्व और कर्मत्वकी तरह क्रमसे प्रत्येक
गुण और कर्ममें रहती है । अतएव सत्ता द्रव्य, गुण और कर्म तीनोंसे भिन्न है । )
तथा, नित्य द्रव्योंमें रहनेवाले अत्यन्त व्यावृत्ति रूप 'विशेष' भी द्रव्यादिसे विलक्षण होनेके कारण
पदार्थान्तर हैं । प्रशस्तकारने कहा है “अन्तमें होनेके कारण ये अन्त्य हैं, और अपने आश्रयके नियामक हैं,
इसलिये विशेष हैं । ये विशेष आदि और अन्त रहित अणु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन—इन
नित्य द्रव्योंमें रहते हैं, और अत्यन्त व्यावृत्ति रूप ज्ञानके कारण हैं । जैसे गौ और घोड़े आदिमें तुल्य आकृति,
गुण, क्रिया, अवयवोंकी वृद्धि, अवयवोंका संयोग देखकर यह गौ सफेद है, शीघ्र चलनेवाली है, मोटी है,
कुब्बेवाली है, महान् घण्टेवाली है आदि रूपसे व्यावृत्तिप्रत्यय ( विशेषज्ञान ) होता है; वैसे ही हमसे विशिष्ट
योगी लोगों को नित्य, तुल्य आकृति, गुण और क्रियायुक्त परमाणुओं में, तथा मुक्त आत्मा और मनमें जिन
निमित्तोंके कारण पदार्थोंकी विलक्षणताका ज्ञान होता है, तथा देश और कालकी दूरी होनेपर भी यह वही
परमाणु है, यह प्रत्यभिज्ञान होता है, वे विशेष हैं ।” ये विशेष विशेष रूप ही हैं, द्रव्यत्व आदिकी तरह
सामान्य-विशेष रूप नहीं हैं, क्योंकि ये केवल व्यावृत्तिप्रत्ययके ही हेतु हैं । ( भाव यह है कि विशेष सजातीय
और विजातीय पदार्थोंके व्यवच्छेद करनेवाले अत्यन्त व्यावृत्ति रूप होते हैं । दो पदार्थोंमें तुल्य आकृति, गुण,
क्रिया आदि देखकर उनमें से अन्य पदार्थोंको अलग करके एक पदार्थको जानना विशेष है । ये विशेष विशेष
रूप होते हैं, सामान्य-विशेष रूप नहीं । )
अयुतसिद्ध आधार्य, और आधार पदार्थोंका इहप्रत्यय हेतु समवाय सम्बन्ध है । एक दूसरेको छोड़-
कर भिन्न आश्रयोंमें न रहनेवाले गुण, गुणी आदि अयुतसिद्धोंके 'इन तन्तुओंमें पट है' इत्यादि ज्ञानका
असाधारण कारण समवाय है । जैसे छेदन क्रियाका छेद्य ( छेदने योग्य ) के साथ सम्बन्ध है, वैसे ही जिसके
१ अन्तेऽवसाने वर्तन्त इत्यन्त्या यदपेक्षया विशेषो नास्तीत्यर्थः । एकमात्रवृत्तय इति भावः ।
२ विशेषप्रकरणे प्रशस्तपादभाष्ये पृ० १६८ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५१
साम्प्रतमक्षरार्थो व्याक्रियते । सतामपीत्यादि । सतामपि—सद्बुद्धिवेद्यतया साधारणा-
नामपि, षण्णां पदार्थानां मध्ये क्वचिदेव केषुचिदेव पदार्थेषु सत्ता—सामान्ययोगः, स्याद्—
भवेत्, न सर्वेषु । तेषामेषा वाचोयुक्तिः सदिति । यतो “द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता” इति वचनाद्
यत्रैव सत्प्रत्ययस्तत्रैव सत्ता । सत्प्रत्ययश्च द्रव्यगुणकर्मस्वेव, अतस्तेष्वेव, सत्तायोगः । सामा-
न्यादिपदार्थत्रये तु न, तदभावात् । इदमुक्तं भवति । यद्यपि वस्तुस्वरूपं अस्तित्वं सामान्यादि-
त्रयेऽपि विद्यते तथापि तदनुवृत्तिप्रत्ययहेतुर्न भवति । य एव चानुवृत्तिप्रत्ययः स एव सदिति-
प्रत्यय इति, तदभावाद् न सत्तायोगस्तत्र । द्रव्यादीनां पुनस्त्रयाणां षट्पदार्थसाधारणं वस्तु-
स्वरूपम् अस्तित्वमपि विद्यते । अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सत्तासम्बन्धोऽप्यस्ति । निः
Here is the complete, line-by-line transcription of the text shown in the image:
५२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
इति। ततः स्थितमेतत्सतार्मपि स्यात् क्वचिदेव सत्तेति ॥
तथा, चैतन्यमित्यादि । चैतन्यं-ज्ञानम्, आत्मनः-क्षेत्रज्ञाद्, अन्यद्-अत्यन्तव्यति-
रिक्तम्, असमासकरणादत्यन्तमिति लभ्यते । अत्यन्तभेदे सति कथमात्मनः सम्बन्धि ज्ञान-
मिति. व्यपदेशः, इति पराशङ्कापरिहारार्थं औपाधिकमिति विशेषणद्वारेण हेत्वभिधानम् ।
उपाधेरागतमौपाधिकम्-समवायसम्बन्धलक्षणेनोपाधिना आत्मनि समवेतम्, आत्मनः स्वयं
जडरूपत्वात् समवायसम्बन्धोपढौकितमिति यावत्। यद्यात्मनो ज्ञानादव्यतिरिक्तत्वमिष्यते,
तदा दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये¹ तदनन्तराभावाद् बुद्ध्यादीनां नवा-
नामात्मविशेषगुणानामुच्छेदावसर आत्मनोऽप्युच्छेदः स्यात्, तदव्यतिरिक्तत्वात् । अतो
भिन्नमेवात्मनो ज्ञानं यौक्तिकमिति ॥
तथा न संविदित्यादि । मुक्तिः-मोक्षः, न संविदानन्दमयी-न ज्ञानसुखस्वरूपा ।
संविद्-ज्ञानं, आनन्दः-सौख्यम्, ततो द्वन्द्वः, संविदानन्दौ प्रकृतौ यस्यां सा संविदानन्दमयी।
एतादृशी न भवति बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काररूपाणां नवानामात्मनो वैशेषिक-
रहता, क्योंकि आकाश एक व्यक्ति रूप है। (२) घटत्व और कलशत्व में भी सामान्य नहीं रहता, क्योंकि
घटत्व और कलशत्व दोनों एक ही पदार्थमें रहते हैं (तुल्यत्व )। (३) भूतत्व और मूर्तत्वमें भी सामान्य
नहीं रहता, क्योंकि इसमें संकर दोष आता है। अर्थात् भूतत्व केवल आकाशमें और मूर्तत्व केवल मनमें रहता
है; लेकिन पृथिवी, अप्, तेज और वायुमें भूतत्व और मूर्तत्व दोनों रहते हैं, इसलिए संकर दोष आनेसे भूतत्व
और मूर्तत्वमें भी सामान्य नहीं रहता। (४) अनवस्था दोष आनेसे सामान्य में भी सामान्य नहीं रहता ।
(५) विशेष में भी सामान्य नहीं है, क्योंकि विशेषमें सामान्य माननेसे विशेषके स्वरूपकी हानि होती है ।
(६) समवायमें भी सामान्य नहीं रहता, क्योंकि समवाय एक है, समवायमें समवायत्वका सम्बन्ध करनेवाला
दूसरा समवाय नहीं है ।)
अतएव सिद्ध है कि सत् पदार्थोंमें भी सबमें सत्ता नहीं रहती ।
(२) ज्ञान आत्मासे अत्यन्त भिन्न है । समास न करनेसे 'अत्यन्त' अर्थ प्राप्त होता है। 'ज्ञान के
आत्मासे सर्वथा भिन्न होनेपर, ज्ञान और आत्माका सम्बन्ध कैसे रहता है ?' जैनों की इस शंकाका परिहार
करनेके लिए 'औपाधिक' विशेषण-द्वारा हेतुका प्रतिपादन किया गया है। जो उपाधिसे प्राप्त होता है, वह औप-
धिक है। समवाय सम्बन्ध रूप उपाधि के कारण आत्मामें जो सम्बन्धको प्राप्त होता है वह औपाधिक है; अर्थात्
ज्ञान आत्मासे सर्वथा भिन्न होनेपर भी समवाय सम्बन्धसे आत्मासे सम्बद्ध है। ज्ञान आत्माका गुण नहीं है,
वह उससे सर्वथा भिन्न है । आत्मा स्वयं जड़ है, इसलिए ज्ञान आत्मामें समवाय सम्बन्धसे रहता है। यदि
आत्मा और ज्ञानको एक ही माना जाय, तो दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञानके नाश होनेपर आत्मा
के विशेषगुण बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार का उच्छेद होनेसे आत्माका भी
अभाव हो जाना चाहिए, क्योंकि जैनमतमें आत्मा इन गुणोंसे भिन्न नहीं है। अतएव आत्मा और ज्ञानका
भिन्न मानना ही युक्तियुक्त है।
(३) मोक्ष ज्ञान और आनन्द रूप नहीं है, क्योंकि आत्माके गुण बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष,
प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार-आत्माके इन नौ विशेष गुणोंका अत्यंत उच्छेद हो जाना ही मुक्ति है, ऐसा कहा
आकाशे भूतत्वस्यैव मनसि च मूर्तत्वस्यैव सद्भावेऽपि पृथिव्यादिचतुष्टय उभयोः सद्भावात् संकरप्रसंगः ।
(४) जातेरपि जात्यन्तरांगीकारेऽनवस्थाप्रसंगः । (५) अन्त्यविशेषता न जातिः । तदंगीकारे तत्स्वरूपव्या-
वृत्तिहानिः स्यात् । (६) समवायत्वं न जातिः । सम्बन्धाभावात् । इत्येते जातिबाधकाः ॥
१. तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानापाये रागद्वेषमोहाख्या दोषा अपयान्ति, दोषापाये वाङ्मनःकायव्यापाररूपायाः
शुभाशुभफलायाः प्रवृत्तेरपायः । प्रवृत्त्यपाये जन्मापायः । जन्मापाये एकविंशतिभेदस्य दुःखस्यापायः ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५३
गुणानामात्यन्तोच्छेदो मोक्ष इति वचनात् । चशब्दः पूर्वोक्ताभ्युपगमद्वयसमुच्चये । ज्ञानं हि
क्षणिकत्वादित्यं, सुखं च सप्रक्षयतया सातिशयत्या च न विशिष्यते संसारावस्थातः । इति
तदुच्छेदे आत्मस्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इति । प्रयोगश्चात्र-नवानामात्मविशेषगुणानां सन्तानः
अत्यन्तमुच्छिद्यते, सन्तानत्वात्, यो यः सन्तानः स सोऽत्यन्तमुच्छिद्यते, यथा प्रदीपसन्तानः ।
तथा चायम्, तस्मात्तदत्यन्तमुच्छिद्यते इति । तदुच्छेद एव महोदयः, न कृत्स्नकर्मक्षयलक्षण
इति । ‘“न हि वै सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसन्तं प्रियाप्रिये न
स्पृशतः’’१ । इत्यादयोऽपि वेदान्तास्तादृशीमेव मुक्तिमादिशन्ति । अत्र हि प्रियाप्रिये सुखदुःखे,
ते चाशरीरं मुक्तं न स्पृशतः । अपि च-
“यावदात्मगुणाः सर्वे नोच्छिन्ना वासनादयः ।
तावदात्यन्तिकी दुःखव्यावृत्तिर्न विकल्प्यते ॥ १ ॥
धर्माधर्मनिमित्तो हि सम्भवः सुखदुःखयोः ।
मूलभूतौ च तावेव स्तम्भौ संसारसद्मनः ॥ २ ॥
तदुच्छेदे च तत्कार्यशरीराद्यनुपप्लवात् ।
नात्मनः सुखदुःखे स्त इत्यसौ मुक्त उच्यते ॥ ३ ॥
इच्छाद्वेषप्रयत्नाद्दि भोगायतनबन्धनम् ।
उच्छिन्नभोगायतनो नात्मा तैरपि युज्यते ॥ ४ ॥
तदेवं धिषणादीनां नवानामपि मूलतः ।
गुणानामात्मनो ध्वंसः सोऽपवर्गः प्रतिष्ठितः ॥ ५ ॥
ननु तस्यामवस्थायां कीदृगात्मावशिष्यते ।
स्वरूपैकप्रतिष्ठानः परित्यक्तोऽखिलैर्गुणैः ॥ ६ ॥
है । ज्ञान क्षणिक है, इसलिये वह अनित्य है, और सुखमें हानि, वृद्धि होती रहती है, इसलिये सुख संसारकी
अवस्थासे भिन्न नहीं है । अतएव जिस समय अनित्य ज्ञान और अनित्य सुखका उच्छेद हो जाता है, उस
समय आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित होता है, वही मोक्ष है । अनुमान प्रयोगसे यह सिद्ध है—'मोक्षमें बुद्धि
आदि आत्माके नौ विशेष गुणोंका सर्वथा नाश हो जाता है, क्योंकि बुद्धि आदि सन्तान हैं । (अर्थात् आत्माके
नित्य स्वभाव नहीं हैं ) । जो जो सन्तान होते हैं, उनका सर्वथा नाश होता है, जैसे प्रदीपकी सन्तान । बुद्धि
आदि विशेष गुण भी सन्तान हैं, इसलिए उनका भी नाश होता है । बुद्धि आदि गुणोंका अत्यन्त नाश ही
मोक्ष है, सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय होना नहीं ।' वेदान्तियोंने भी इसी प्रकारका मोक्ष माना है । उनका कथन है—
“शरीरधारियोंके सुख-दुखका नाश नहीं होता, तथा अशरीरीको सुख-दुख स्पर्श नहीं करते ।” तथा—
“जब तक वासना आदि आत्माके सम्पूर्ण गुण नष्ट नहीं होते तब तक दुःखकी अत्यन्त व्यावृत्ति नहीं
होती ॥ १ ॥
सुख-दुःख धर्म और अधर्मसे ही सम्भव है, इसलिये धर्म-अधर्म ही संसारके मूल भूत स्तम्भ हैं ॥ २ ॥
धर्म और अधर्मके नाश हो जानेपर धर्म-अधर्मके कार्य शरीर आदिका नाश हो जाता है । उस समय
सुख-दुःख भी नष्ट हो जाते हैं । यही मुक्तावस्था है ॥ ३ ॥
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि शरीरके कारण हैं, अतएव शरीरके उच्छेद होनेपर आत्मा इच्छा, द्वेष,
प्रयत्न आदिसे भी सम्बद्ध नहीं होती ॥ ४ ॥
इसलिये बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार—आत्माके इन नौ गुणोंका
जड़मूलसे नष्ट हो जाना ही मोक्ष है ॥ ५ ॥
१. न हि वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ इति
छान्दोग्य० उ० ८-१२ ।
५४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
ऊर्मिषट्कातिगं रूपं तदस्याहुर्मनीषिणः
संसारबन्धनाधीनदुःखशोकाद्यदूषितम् ॥ ७॥
-कामक्रोधलोभगर्वदम्भहर्षाः ऊर्मिषट्कमिति ।”
तदेतदभ्युपगमत्रयमित्थं समर्थयद्भिः अत्वदीयैः-त्वदाज्ञाबहिर्भूतैः कणादमतानुगा-
मिभिः, सुसूत्रमासूत्रितम्-सम्यगागमः प्रपञ्चितः। अथवा सुसूत्रमिति क्रियाविशेषणम् ।
शोभनं सूत्रं वस्तुव्यवस्थाघटनाविज्ञानं यत्रैवमासूत्रितं-तत्तच्छास्त्रार्थोपनिबन्धः कृतः, इति
हृदयम् । “सूत्रं तु सूचनाकारि ग्रन्थे तन्तुन्यवस्थयोः२।” इत्यनेकार्थवचनात् । अत्र च सुसूत्र-
मिति विपरीतलक्षणयोपहासगर्भं प्रशंसावचनम् । यथा-“उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते सुजनता
प्रथिता भवता चिरम्३ ।” इत्यादि । उपहसनीयता च युक्तिरिक्तत्वात् तदङ्गीकरणम् । तथाहि ।
अविशेषेण सद्बुद्धिवेद्येष्वपि सर्वपदार्थेषु द्रव्यादिष्वेव त्रिषु सत्तासम्बन्धः स्वीक्रियते, न
सामान्यादित्रये इति महतीयं पश्यतोहरता४ । यतः परिभाव्यतां सत्ताशब्दार्थः । अस्तीति सन्
सतो भावः सत्ता अस्तित्वं तद्वस्तुस्वरूपं । तच्च निर्विशेषमशेषेष्वपि पदार्थेषु त्वयाप्युक्तम्५ ।
तत्किमिदमर्द्धजरतीयं६ यद् द्रव्यादित्रय एव सत्तायोगो, नेतरत्र त्रये इति ॥
अनुवृत्तिप्रत्ययाभावाद् न सामान्यादित्रये सत्तायोग इति चेत्, न । तत्राप्यनुवृत्ति-
प्रत्ययस्यानिवार्यत्वात् । पृथिवीत्वगोत्वघटत्वादिसामान्येषु सामान्यं सामान्यमिति; विशे-
षेष्वपि बहुत्वाद् अयमपि विशेषोऽयमपि विशेष इति; समवाये च प्रागुक्तयुक्त्या तत्तदवच्छे-
दकभेदाद् एकाकारप्रतीतेरनुभवात् ॥
मोक्षावस्था में आत्मा सम्पूर्ण गुणोंसे रहित होकर अपने ही स्वरूपमें अवस्थित रहता है ॥ ६ ॥
मुक्त जीव संसारके बन्धन दुःख, शोक आदिसे मुक्त होता हुआ काम, क्रोध, लोभ, गर्व, दम्भ और
हर्ष (अथवा क्षुधा, पिपासा, शोक, मूढ़ता, जरा और मृत्यु) इन छह ऊर्मियोंसे निर्लिप्त रहता है ॥ ७ ॥”
उत्तरपक्ष—(१) इस प्रकार आपकी आज्ञासे बाह्य कणाद मतानुयायी वैशेषिक लोग उपर्युक्त
सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करते हैं ('सुसूत्र' शब्द यहाँ पर कटाक्षसूचक है, जैसे “उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते
सुजनता प्रथिता भवता चिरम् । विदधदीदृशमेव सदा सखे सुखितमास्व ततः शरदां शतम् ॥” इस श्लोकमें
कटाक्ष किया गया है) । सब पदार्थोंके सत् बुद्धिसे ज्ञेय होने पर भी वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण और कर्ममें,
ही सत्ता-सम्बन्ध स्वीकार करते हैं, सामान्य, विशेष और समवायमें नहीं-यह उनका महान् साहस है । क्योंकि
सत् (अस्तित्व) के भावको सत्ता कहते हैं, यह अस्तित्व वस्तुका स्वरूप है । अस्तित्वको आप लोगोंने भी
सम्पूर्ण पदार्थोंमें स्वीकृत किया है, फिर आप लोग द्रव्य, गुण और कर्ममें ही सत्ता मानते हैं, और सामान्य
विशेष और समवायमें नहीं, इसका क्या कारण है? यह ऐसी ही बात है जैसे कोई स्त्री आधी वृद्धा हो
और आधी युवती ।
शंका—सामान्य आदिमें अनुवृत्तिप्रत्यय (सामान्य ज्ञान) नहीं होता, इसलिये इनमें सत्ता सम्बन्ध
नहीं है । समाधान—सामान्य, विशेष और समवायमें अनुवृत्तिप्रत्यय अवश्य होता है । क्योंकि पृथिवीत्व,
गोत्व, घटत्व आदि सामान्योंमें 'यह सामान्य है;' विशेषोंमें 'यह विशेष है,' 'वह विशेष है;' और समवायमें
१. जयन्तविरचितन्यायमञ्जर्यां पृ० ५०८। ऊर्मिषट्कं तत्र—
प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे लोभमोहौ च चेतसः ।
शीतातपौ शरीरस्य षडूर्मीरहितः शिवः ॥
२. हेमचन्द्रकृतेनेकार्थसंग्रहे २-४५८ ।
३. “विदधदीदृशमेव सदा सखे सुखितमास्व ततः शरदां शतम्” इत्युत्तरार्धम् ।
४ पश्यतोहरता चौर्यम् ।
५. ‘षण्णां पदार्थानां साधर्म्यमस्तित्वं ज्ञेयत्वमभिधेयत्वं च’ इति प्रशस्तकारवचनात् ।
६. अर्धा जरती अर्धा युवतिरितिवत् ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५५
स्वरूपसत्त्वसाधर्म्येण सत्ताध्यारोपात् सामान्यादिष्वपि सत्सदित्यनुगम इति चेत्,
तर्हि मिथ्याप्रत्ययोऽयमापद्यते । अथ भिन्नस्वभावेष्वेकानुगमो मिथ्यैवेति चेद् द्रव्यादिष्वपि
सत्ताध्यारोपकृत एवास्तु प्रत्ययानुगमः । असति मुख्येऽध्यारोपस्यासम्भवाद् द्रव्यादिषु
मुख्योऽयमनुगतः प्रत्ययः, सामान्यादिषु तु गौण इति चेत् । न । विपर्ययस्यापि शक्यकल्प-
नत्वात् ।।
सामान्यादिषु बाधकसंभवाद् न मुख्योऽनुगतः प्रत्ययः, द्रव्यादिषु तु तदभावाद् मुख्य
इति चेद्, ननु किमिदं बाधकम् । अथ सामान्येऽपि सत्ताऽभ्युपगमे अनवस्था, विशेषेषु पुनः
सामान्यसद्भावे स्वरूपहानिः, समवायेऽपि सत्ताकल्पने तद्वृत्त्यर्थं सम्बन्धान्तराभाव इति
बाधकानीति चेत्, न । सामान्येऽपि सत्ताकल्पने यद्यनवस्था, तर्हि कथं न सा द्रव्यादिषु ।
तेषामपि स्वरूपसत्तायाः प्रागेव विद्यमानत्वात् । विशेषेषु पुनः सत्ताभ्युपगमेऽपि न रूपहानिः,
स्वरूपस्य प्रत्युत्तेजनात् । निःसामा१न्यस्य विशेषस्य क्वचिदप्यनुपलम्भात् । समवायेऽपि
समवायत्वलक्षणायाः स्वरूपसत्तायाः स्वीकारे उपपद्यत एवाविष्षग्भावात्मकः सम्बन्धः,
अन्यथा तस्य स्वरूपाभावप्रसङ्गः । इति बाधकाभावात् तेष्वपि द्रव्यादिवद् मुख्य एव सत्ता-
सम्बन्ध इति व्यर्थं द्रव्यगुणकर्मस्वेव सत्ताकल्पनम् ॥
'यह घट समवाय है,' 'यह पट समवाय है' यह सामान्य ज्ञान होता ही है।
शंका—जिस प्रकार द्रव्य आदिमें स्वरूप सत्ताके साधर्म्यसे सत्ता रहती है, उसी प्रकार सामान्य
आदिमें भी उपचारसे सत्ता विद्यमान है, इसलिये सामान्य आदिमें 'यह सत् है' ऐसा ज्ञान होता है ।
समाधान—यदि सामान्य आदिमें सत्ताको उपचारसे स्वीकार करोगे, तो सामान्य आदिमें सत्का ज्ञान भी
मिथ्या मानना चाहिये । यदि कहो कि भिन्न स्वभाववाले पदार्थोंमें एकताकी प्रतीति मिथ्या ही है, तो इस
तरह द्रव्य, गुण और कर्ममें भी सत्ताको उपचारसे मानकर सत्का ज्ञान मिथ्या मानना चाहिये । यदि कहो
कि मुख्यका अभाव होने पर उपचारका सम्भव होनेसे 'यह सत् है', इस प्रकारका अनुवृत्तिज्ञान द्रव्य, गुण
और कर्ममें मुख्य रूपसे तथा सामान्य, विशेष और समवायमें गौण रूपसे होता है; अर्थात् द्रव्यादिमें मुख्य
सत्ता स्वीकार करके ही सामान्य आदिमें उपचार सत्ता मानी जा सकती है, क्योंकि मुख्य अर्थके न
होनेपर ही उपचार होता है, तो हमारा ( जैनोंका ) उत्तर है कि मुख्य और गौण सत्ताकी इससे उल्टी
कल्पना भी की जा सकती है, अर्थात् सामान्य आदिमें मुख्य और द्रव्यादिमें गौण सत्ता भी मान सकते हैं ।
शंका—द्रव्य आदिमें मुख्य सत्ता माननेसे कोई बाधा नहीं आती, लेकिन सामान्य आदिमें मुख्य सत्ता
स्वीकार करनेसे बाधा आती है। ऊपर कहा भी है कि सामान्यमें सामान्य माननेसे अनवस्था, विशेषमें
सामान्य माननेसे रूपहानि, और समवायमें सामान्य माननेसे समवायान्तरका असम्बन्ध—दोष आते हैं।
समाधान—यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि सामान्यमें सत्ता माननेसे अनवस्था दोष आता है, तो द्रव्य,
गुण, कर्ममें सत्ता माननेसे भी अनवस्था दोष क्यों नहीं आना चाहिए ? क्योंकि सामान्यमें स्वरूप सत्ताकी
तरह द्रव्य, गुण और कर्ममें भी पहलेसे ही स्वरूपसत्ता विद्यमान है। तथा, विशेषोंमें सत्ता अंगीकार करनेपर
स्वरूपकी हानि नहीं होती, बल्कि विशेषोंमें सामान्य माननेपर उल्टी विशेषोंकी सिद्धि होती है; क्योंकि
सामान्यरहित विशेष कहीं भी नहीं पाये जाते । इसी तरह समवायमें भी समवायरूप सत्ता स्वीकार करनेपर
तादात्म्य सम्बन्ध सिद्ध होता है; क्योंकि यदि समवाय समवायस्वरूप स्वरूप सत्ता न मानें, तो समवायके
स्वरूप का ही अभाव होगा। इसलिये सामान्य आदिमें भी द्रव्यादिकी तरह मुख्य सत्ता माननेसे कोई
बाधा नहीं आती, अतएव इनमें भी मुख्य सत्ता ही माननी चाहिये । अतएव द्रव्य, गुण, कर्ममें ही सत्ता है
और सामान्य, विशेष और समवायमें नहीं, यह कल्पना व्यर्थ है।
१. “निर्विशेषं हि सामान्यं भवेत्खरविषाणवत् । सामान्यरहितत्वे तु विशेषास्तद्वदेव हि” ।।
५६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
किञ्च, भवद्भिर्यो द्रव्यादित्रये मुख्यः सत्तासम्बन्धः कक्षीकृतः, सोऽपि विचार्यमाणो
विशीर्येत। तथाहि। यदि द्रव्यादिभ्योऽत्यन्तविलक्षणा सत्ता, तदा द्रव्यादीन्यसद्रूपाणि स्युः।
सत्तायोगात् सत्त्वमस्त्येवेति चेत्, असतां सत्तायोगेऽपि कुतः सत्त्वम्। सतां तु निष्फलः
सत्तायोगः। स्वरूपसत्त्वं भावाना मस्त्येवेति चेत्, तर्हि किं शिखण्डिना सत्तायोगेन। सत्ता-
योगात् प्राग् भावो न सन्, नाप्यसन्, सत्तायोगात् तु सन्निति चेद्, वाङ्मात्रमेतत्। सद्-
सद्विलक्षणस्य प्रकारान्तरस्यासम्भवात्। तस्मात् 'सतामपि स्यात् क्वचिदेव सत्ते'ति तेषां वचनं
विदुषां परिषदि कथमिव नोपहासाय जायते॥
ज्ञानमपि यद्येकान्तेनात्मनः सकाशाद् भिन्नमिष्यते, तदा तेन चैत्रज्ञानेन मैत्रस्येव नैव
विषयपरिच्छेदः स्यादात्मनः। अथ यत्रैवात्मनि समवायसम्बन्धेन समवेतं ज्ञानं तत्रैव
भावावभासं करोतीति चेत्, न। समवायस्यैकत्वाद् नित्यत्वाद् व्यापकत्वाच्च सर्वत्र वृत्तेरवि-
शेषात् समवायवदात्मनामपि व्यापकत्वादेकज्ञानेन सर्वेषां विषयावबोधप्रसङ्गः। यथा च घटे
रूपादयः समवायसम्बन्धेन समवेताः, तद्विनाशे च तदाश्रयस्य घटस्यापि विनाशः, एवं
ज्ञानमप्यात्मनि समवेतं, तच्च क्षणिकं, ततस्तद्विनाशे आत्मनोऽपि विनाशापत्तेरनित्यत्वापत्तिः॥
अथास्तु समवायेन ज्ञातात्मनोः सम्बन्धः। किन्तु स एव समवायः केन तयोः सम्ब-
ध्यते? समवायान्तरेण चेद् अनवस्था। स्वेनैव चेत् किं न ज्ञानात्मनोरपि तथा। अथ यथा
तथा, वैशेषिकोंने द्रव्य, गुण और कर्ममें जो मुख्य सत्ता स्वीकार की है, वह भी विचार करनेसे
युक्तियुक्त नहीं ठहरती। क्योंकि यदि सत्ता द्रव्य आदिसे अत्यन्त भिन्न है, तो द्रव्यादिको असत् मानना चाहिए।
यदि द्रव्यादिको सत्ताके सम्बन्धसे सत् मानो तो स्वयं असत् द्रव्यादि सत्ताके सम्बन्धसे भी सत् कैसे हो सकते
हैं? और यदि द्रव्यादि स्वयं सत् हैं, तो फिर उनमें सत्ताका सम्बन्ध मानना ही निष्प्रयोजन है। अर्थात् यदि
पदार्थोंमें स्वरूपसत्त्व स्वीकार करनेपर भी सत्ता मानी जाये तो ऐसी अकार्यकारी सत्ताका सम्बन्ध माननेसे
ही क्या प्रयोजन ? यदि कहो कि सत्ताके सम्बन्धसे पहले द्रव्यादि पदार्थ न सत् थे, न असत्, किन्तु सत्ताके
सम्बन्धसे संत्रूप होते हैं तो यह भी कथनमात्र है। क्योंकि सत् और असत्से विलक्षण कोई प्रकारान्तर
आपके मतमें सम्भव नहीं जिससे आप लोग सत्ता सम्बन्धके पहले द्रव्यको 'न सत्' और 'न असत्' रूप मान
सकें। अतएव 'सत् पदार्थोंमें भी सब पदार्थोंमें सत्ता नहीं रहती'—वैशेषिकोंका यह वचन उपहासके
ही योग्य है।
(२) यदि ज्ञानको आत्मासे सर्वथा भिन्न मानो तो मैत्रसे भिन्न चैत्रके ज्ञानसे जिस प्रकार मैत्रको
विषयोंका ज्ञान नहीं होता, उसी प्रकार आत्मासे सर्वथा भिन्न ज्ञानसे आत्माको (ज्ञेय) विषयोंका ज्ञान नहीं
होगा। (अर्थात् जैसे मैत्रसे चैत्रका ज्ञान भिन्न है, इसलिए चैत्रके ज्ञानसे मैत्रकी आत्माको पदार्थका ज्ञान नहीं
होता, वैसे ही चैत्रका ज्ञान भी चैत्रकी आत्मासे भिन्न है, इस कारण चैत्रके ज्ञानसे चैत्रकी आत्माको भी पदार्थ-
का ज्ञान न होना चाहिए)। यदि कहो कि जिस आत्मामें ज्ञान समवाय सम्बन्धसे विद्यमान है, उसी आत्मामें
ज्ञान पदार्थोंको जानता है, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि समवाय एक, नित्य और व्यापक है, इसलिए वह
सब पदार्थोंमें समान रूपसे रहता है। तथा समवायकी तरह आत्मा भी व्यापक है, इसलिए एक आत्मामें ज्ञान
होनेसे सब आत्माओंको पदार्थोंका ज्ञान होना चाहिये। तथा जिस प्रकार रूपादि घटमें समवाय सम्बन्धसे
रहते हैं, उसी तरह ज्ञान भी आत्मामें समवाय सम्बन्धसे रहता है। और जैसे रूपांदिका नाश होनेपर रूपादि-
के आश्रय घटादिका भी नाश होता है, वैसे ही क्षणिक ज्ञानके नाश होनेपर आत्माका भी नाश हो जाना
चाहिये। इस तरह आत्मा अनित्य ठहरती है।
यदि समवायसे ज्ञान और आत्माका सम्बन्ध मान भी लिया जाय, तो वह समवाय आत्मा और ज्ञानमें
कौनसे सम्बन्धसे रहता है ? यदि ज्ञान और आत्मामें रहनेवाला समवाय दूसरे समवायसे रहता है तो इस
प्रकार अनन्त समवाय माननेसे अनवस्था दोष आता है। यदि कहो कि समवायमें समवायान्तर मानने की
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५७
प्रदीपस्तत्स्वभावाद्याद् आत्मनं, परं च प्रकाशयति, तथा समवायस्येदृगेव स्वभावो यदात्मानं,
ज्ञानात्मानौ च सम्बन्धयतीति चेत्, ज्ञानात्मनोरपि किं न तथास्वभावता, येन स्वयमेवैतौ
सम्बध्येते । किञ्च, प्रदीपदृष्टान्तोऽपि भवत्पक्षे न जाघटीति । यतः प्रदीपस्तावद् द्रव्यं,
प्रकाशश्च तस्य धर्मः, धर्मधर्मिणोश्च त्वयात्यन्तं भेदोऽभ्युपगम्यते तत्कथं प्रदीपस्य प्रकाशात्म-
कता ? तदभावे च स्वपरप्रकाशस्वभावता भणितिर्निर्मूलैव ॥
यदि च प्रदीपात् प्रकाशस्यात्यन्तभेदेऽपि प्रदीपस्य स्वपरप्रकाशकत्वमिष्यते, तदा
घटादीनामपि तदनुपज्यते, भेदाविशेषात् । अपि च तौ स्वपरसम्बन्धस्वभावौ समवायाद्
भिन्नौ स्याताम्, अभिन्नौ वा ? यदि भिन्नौ, ततस्तस्यैतौ स्वभावाविति कथं सम्बन्धः ।
सम्बन्धनिबन्धनस्य समवायान्तरस्यानवस्थाभयादनभ्युपगमात् । अथाभिन्नौ, ततः समवाय-
मात्रमेव । न तौ । तद्व्यतिरिक्तत्वात् तत्स्वरूपवदिति । किञ्च, यथा इह समवायिषु समवाय
इति मतिः समवायं विनाप्युपपन्ना, तथा इहात्मनि ज्ञानमित्ययमपि प्रत्ययस्तं विनैव चेदु-
च्यते तदा को दोषः ॥
अथात्मा कर्ता, ज्ञानं च करणं, कर्तृकरणयोश्च वर्धकिवासीव¹ भेद एव प्रतीतः, तत्कथं
ज्ञानात्मनोरभेदः इति चेत्, न । दृष्टान्तस्य वैषम्यात् । वासी हि बाह्यं करणं, ज्ञानं चान्तरं,
आवश्यकता नहीं, समवाय अपने आप ही रहता है तो ज्ञान और आत्मामें भी वह अपने आप ही क्यों नहीं
रहता ? यदि आप लोग कहें कि जैसे दीपक स्वप्रकाशन स्वभाववाला होनेसे अपने आपको और दूसरेको
प्रकाशित करता है, वैसे ही समवायका इसी प्रकारका स्वभाव है कि जब वह ज्ञान और आत्माके साथ
अपना सम्बन्ध कराता है तथा ज्ञान और आत्माका भी सम्बन्ध कराता है, तो फिर ज्ञान और आत्मा का उस
प्रकारका स्वभाव क्यों नहीं मान लेते, जिसके कारण ये दोनों अपने-आप ही अन्योन्य सम्बन्ध को प्राप्त होते हैं ?
तथा, इस कथनकी पुष्टिमें दीपकका दृष्टान्त ही नहीं घटता; क्योंकि दीपक द्रव्य है, और प्रकाश उसका धर्म
है। तथा, आप लोग धर्म और धर्मीका अत्यन्त भेद मानते हैं, अतएव दीपक प्रकाश रूप कैसे हो सकता है ?
दीपकके प्रकाश रूप न रहनेसे आपने जो दीपकको स्वपर-प्रकाशक कहा, वह निराधार ही सिद्ध होगा ।
यदि दीपकसे प्रकाशके अत्यन्त भिन्न होनेपर भी दीपकको स्वपर-प्रकाशक कहो, तो घट आदिको भी
स्वपर-प्रकाशक कहनेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये, क्योंकि दीपककी तरह घट आदि भी प्रकाशसे अत्यन्त
भिन्न हैं। तथा, समवायियोंके साथ अपना सम्बन्ध करानेका स्वभाव तथा समवायियोंका एक दूसरेसे सम्बन्ध
करानेका स्वभाव — समवायके ये दोनों स्वभाव समवायसे भिन्न हैं या अभिन्न ? यदि ये दोनों स्वभाव समवायसे
भिन्न हों तो समवायियोंके साथ अपना सम्बन्ध करानेका तथा समवायियोंका एक दूसरेके साथ सम्बन्ध कराने-
में कारणभूत अन्य समवायको अनवस्थाके भयसे स्वीकार नहीं किया जा सकता । फिर, ये दोनों स्वभाव
समवायके हैं, इस प्रकार समवाय और उसके दोनों स्वभावोंका सम्बन्ध कैसे हो सकता है ? यदि समवायके
ये दोनों स्वभाव समवायसे अभिन्न हैं तो फिर उसे समवायमात्र ही कहना चाहिये । समवायका स्वरूप सम-
वायत्व समवाय से भिन्न न होनेसे जिस प्रकार स्वतन्त्र नहीं होता, उसी प्रकार ये दोनों स्वभाव समवायसे
भिन्न न होनेसे स्वतन्त्र नहीं हो सकते । तथा, जैसे 'इन समवायियोंमें समवाय है' यह बुद्धि प्रत्येक समवाय
और समवायान्तरके बिना माने भी हो सकती है, इसी तरह 'इस आत्मामें ज्ञान है' यह ज्ञान भी समवायको
भिन्न पदार्थ माने बिना ही क्यों नहीं होता ?
शंका—आत्मा कर्ता है, और ज्ञान करण है। जैसे, बढ़ई कर्ता है, और वह अपनेसे भिन्न कुठार
रूप करणसे कार्यको करता है, वैसे ही आत्मा कर्ता है, और वह अपनेसे भिन्न ज्ञान रूप करणसे पदार्थको
जानता है, अतएव ज्ञान और आत्मा भिन्न हैं। समाधान—यह ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ पर बढ़ई और
१. वर्धकिस्त्वष्टा, वासी तच्छस्त्रम् ।
८
५८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
तत्कथमनयोः साधर्म्यम् । न चैवं करणस्य द्वैविध्यमप्रसिद्धम् । यदाहुर्लाक्षणिकाः—
“करणं द्विविधं ज्ञेयं बाह्यमाभ्यन्तरं बुधैः ।
यथा लुनाति दात्रेण मेरुं गच्छति चेतसा” ॥
यदि हि किञ्चित्करणमान्तरमेकान्तेन भिन्नमुपदर्श्येत, ततः स्याद् दृष्टान्तदाष्टर्नान्तिकयोः
साधर्म्यम्, न च तथाविधमस्ति । न च बाह्यकरणगतो धर्मः सर्वोऽप्यान्तरे योजयितुं शक्यते,
अन्यथा दीपेन चक्षुषा देवदत्तः पश्यतीत्यत्रापि दीपादिवत् चक्षुषोऽप्येकान्तेन देवदत्तस्य भेदः
स्यात् । तथा च सति लोकप्रतीतिविरोध इति ॥
अपि च, साध्यविकलोऽपि वासीवर्धकिदृष्टान्तः । तथाहि । नायं वर्धकिः ‘काष्ठमिद-
मनया वास्या घटयिष्ये’ इत्येवं वासीग्रहणपरिणामेनापरिणतः सन् तामगृहीत्वा घटयति,
किन्तु तथा परिणतस्तां गृहीत्वा । तथा परिणामे च वासिरपि तस्य काष्ठस्य घटने व्याप्रियते
पुरुषोऽपि । इत्येवंलक्षणैककार्यसाधकत्वात् वासीवर्धकयोरभेदोऽप्युपपद्यते । तत्कथमनयोर्भेद
एव इत्युच्यते । एवमात्मापि ‘विवक्षितमर्थमनेन ज्ञानेन ज्ञास्यामि’ इति ज्ञानग्रहणपरिणामवान्
ज्ञानं गृहीत्वार्थं व्यवस्यति । ततश्च ज्ञानात्मनोरुभयोरपि संवित्तिलक्षणैककार्यसाधकत्वादभेद
एव । एवं कर्तृकरणयोरभेदे सिद्धे संवित्तिलक्षणं कार्यं किमात्मनि व्यवस्थितं, आहोस्वित् विषये
इति वाच्यम् । आत्मनि चेत्, सिद्धं नः समीहितम् । विषये चेत्, कथमात्मनोऽनुभवः प्रतीयते ।
कुठारका दृष्टान्त विषम है। कारण कि कुठार बाह्य और ज्ञान आभ्यन्तर करण है, इसलिये दोनोंमें साधर्म्य
नहीं हो सकता । इन बाह्य और अन्तरंग करणोंको वैयाकरणोंने भी स्वीकार किया है—
“बाह्य और अन्तरंगके भेदसे करण दो प्रकारका है। जैसे, वह कुठारसे काटता है, यहाँ कुठार बाह्य
करण है; और वह मनसे मेरु पर्वतपर पहुँचता है, यहाँ मन अन्तरंग करण है ।”
अतएव जैसे कुठार रूप बाह्य करण बढ़ई रूप कर्तासे भिन्न है, वैसे ही यदि ज्ञान रूप अन्तरंग करण
आत्मा रूप कर्तासे भिन्न होता, तो दृष्टान्त और दार्शन्तिकमें साधर्म्य हो सकता था, लेकिन आत्मा और
ज्ञान भिन्न नहीं हैं। तथा बाह्य करणका धर्म अन्तरंग करणसे सम्बद्ध नहीं हो सकता, अन्यथा देवदत्त
दीपक और नेत्रसे देखता है, यहाँ दीपककी तरह नेत्र भी देवदत्तसे सर्वथा भिन्न होना चाहिये । परन्तु ऐसा
माननेसे लोकविरोध आता है ।
तथा, बढ़ई और कुठारका दृष्टान्त साध्यविकल भी है । क्योंकि ‘मैं इस कुठारसे इस लकड़ीको
बनाऊँगा’ इस प्रकार कुठार ग्रहण करनेके मनोगत परिणामसे अपरिणत हुआ बढ़ई, कुठारको ग्रहण न कर
लकड़ीको नहीं बनाता; किन्तु मनोगत परिणामसे परिणत हुआ बढ़ई लकड़ीको बनाता है। बढ़ईका
उस प्रकारका मनोगत परिणाम उत्पन्न होनेपर लकड़ीको बनानेकी क्रियामें कुठार भी संलग्न हो जाता है,
और बढ़ई भी । इस प्रकार लकड़ीको बनानेकी क्रिया रूप एक कार्यके साधक होनेसे कुठार और बढ़ईमें भेद
नहीं रहता । ऐसी दशामें बढ़ई और कुठारमें, अर्थात् कर्ता और करणमें भेद ही होता है, यह कैसे कहा जा
सकता है ? इसी प्रकार आत्मा भी ‘विवक्षित अर्थको मैं इस ज्ञानके द्वारा जान लूँगा’, इस प्रकार अपने ज्ञानको
करण रूपसे ग्रहण करनेके परिणामसे परिणत हुई आत्मा ज्ञानको करण रूपसे ग्रहण कर अर्थको जानती है।
अतएव ज्ञान और आत्मा दोनोंमें ज्ञानलक्षण रूप एक ही कार्यके साधक होनेके कारण, भेद नहीं रहता ।
( इसलिए बढ़ई और कुठारका दृष्टान्त आत्मा और ज्ञानमें ‘भेद’ सिद्ध नहीं करता, अतएव साध्यविकल है ।
भाव यह है, कि जैसे काष्ठ कुठारसे बनाया जाता है, वैसे ही काष्ठ बढ़ईसे भी बनाया जाता है, इसलिये
बढ़ई और कुठार दोनों एक ही क्रिया करते हैं, अतएव अभिन्न हैं। उसी प्रकार आत्मा और ज्ञान दोनों
पदार्थके जानने रूप एक ही अर्थके साधक हैं, अतएव परस्पर अभिन्न हैं ।) इस प्रकार कर्ता और करणमें
अभेदकी सिद्धि होनेपर प्रश्न होता है कि संवित्ति ( ज्ञान ) रूप कार्य आत्मामें (आत्माश्रित ) होता है, या
पदार्थमें ( ज्ञेयाश्रित ) ? यदि ज्ञान आत्मामें ही उत्पन्न होता है, तो यह सिद्धान्त हमारे अनुकूल ही है। क्योंकि
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५९
अथ विषयस्थितसंवित्तेः सकाशादात्मनोऽनुभवः, तर्हि किं न पुरुषान्तरस्यापि, तद्भेदाविशेषात् ॥
अथ ज्ञानात्मनोरभेदपक्षे कथं कर्तृकरणभावः इति चेत्, ननु यथा सर्प आत्मानमा-
त्मना वेष्टयतीत्यत्र अभेदे यथा कर्तृकरणभावस्तथात्रापि । अथ परिकल्पितोऽयं कर्तृकरणभाव
इति चेद्, वेष्टनावस्थायां प्रागवस्थाविलक्षणगतिनिरोधलक्षणार्थक्रियादर्शनात् कथं परिकल्पि-
तत्वम् । न हि परिकल्पनाशतैरपि शैलस्तम्भ आत्मानमात्मना वेष्टयतीति वक्तुं शक्यम् ।
तस्मादभेदेऽपि कर्तृकरणभावः सिद्ध एव । किञ्च, चैतन्यमिति शब्दस्य चिन्त्यतामन्वर्थः ।
चेतनस्य भावश्चैतन्यम् । चेतनश्चात्मा त्वयापि कीर्त्यते । तस्य भावः स्वरूपं चैतन्यम् । यच्च
यस्य स्वरूपं, न तत् ततो भिन्नं भवितुमर्हति, यथा वृक्षाद् वृक्षस्वरूपम् ॥
अथास्ति चेतन आत्मा, परं चेतनासमवायसम्बन्धात्, न स्वतः, तथाप्रतीतेः इति चेत् ।
तदयुक्तम् । यतः प्रतीतिश्चेत् प्रमाणीक्रियते, तर्हि निर्वाधमुपयोगात्मक एवात्मा प्रसिद्धयति । न
हि जातुचित् स्वयमचेतनोऽहं चेतनायोगात् चेतनः, अचेतने वा मयि चेतनायाः समवाय इति
प्रतीतिरस्ति । ज्ञाताहमिति समानाधिकरणतया प्रतीतेः । भेदे तथाप्रतीतिरिति चेत्, न । कथं-
चित् तादात्म्याभावे सामानाधिकरण्यप्रतीतेरदर्शनात् । यष्टिः पुरुष इत्यादिप्रतीतिस्तु भेदे
सत्युपचाराद् दृष्टा, न पुनस्तात्त्विकी । उपचारस्य तु बीजं पुरुषस्य यष्टिगतस्तब्धत्वादिगुणैर-
भेदः, उपचारस्य मुख्यार्थस्पर्शित्वात् । तथा चात्मनि ज्ञाताहमिति प्रतीतिः कथञ्चित् चेतनात्मतां
हमलोग (जैन) भी ज्ञानको आत्मामें ही मानते हैं । यदि कहो कि संवित्तिलक्षण कार्य ज्ञेय पदार्थमें उत्पन्न
होता है, तो अन्य पुरुषको—जिसने अपने ज्ञानको कारण रूपसे ग्रहण नहीं किया, उस पुरुषको—भी ज्ञेयका
ज्ञान क्यों नहीं होता ? अपने ज्ञानको करण रूपसे ग्रहण करनेवाले पुरुषसे जिस प्रकार ज्ञेय भिन्न होता है,
उसी प्रकार अन्य पुरुष से भी वह भिन्न होता है ।
शंका—ज्ञान और आत्मामें अभेद माननेपर कर्ता और करण सम्बन्ध नहीं बन सकता ।
समाधान—जैसे, 'सर्प अपने आपको अपनेसे वेष्टित करता है'—यहाँ कर्ता और करणके अभेद होनेपर भी
कर्ता और करण भाव बनता है, वैसे ही आत्मा और ज्ञानके अभिन्न होनेपर भी कर्ता और करण भावमें कोई
बाधा नहीं आती । यदि कहो कि यह कर्ता और करण भाव कल्पना मात्र है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि सर्प-
की वेष्टन अवस्था में प्राक् अवस्थासे विलक्षण गतिनिरोध लक्षण रूप अर्थ क्रिया देखी जाती है। तथा, सैकड़ों
कल्पनायें करनेसे भी पाषाणका स्तंभ अपने आपको अपनेसे वेष्टित नहीं कर सकता । इसलिए कर्ता और करण
भावको कल्पित कहना ठीक नहीं है । अतएव ज्ञान और आत्मा में अभेद मानने पर भी कर्ता और करण
भाव सिद्ध होता है । तथा, चेतनके भावको चैतन्य कहते हैं । आत्माको आप लोगोंने भी चेतन स्वीकार
किया है । चैतन्य आत्माका स्वरूप है । जो जिसका स्वरूप होता है, वह उससे भिन्न नहीं होता; जैसे, वृक्षका
स्वरूप वृक्षसे भिन्न नहीं है । इसलिए ज्ञान और आत्माको भिन्न मानना ठीक नहीं है ।
यदि कहो कि आत्मा समवाय सम्बन्धसे चेतन है, स्वयं चेतन नहीं, क्योंकि इसी प्रकारका ज्ञान
होता है, तो यह भी ठीक नहीं । कारण कि यदि आप लोग ज्ञान (प्रतीति) को ही प्रमाण मानते हैं, तो
आत्माको निश्चयसे उपयोग रूप ही मानना चाहिये । क्योंकि कभी भी ऐसा ज्ञान नहीं होता कि मैं स्वयं
अचेतन होकर चेतनाके सम्बन्धसे चेतन हूँ, अथवा मेरी अचेतन आत्मामें चेतनका समवाय होता है ।
इसके विपरीत, आत्मा और ज्ञानके एक-अधिकरणमें रहनेका ही ज्ञान होता है कि मैं ज्ञाता हूँ । यदि आप
कहें कि आत्मा और ज्ञानका भेद माननेपर भी आत्मा और ज्ञानका एक-अधिकरण बन सकता है, तो
यह भी ठीक नहीं । क्योंकि कथंचित् तादात्म्य (अभिन्न) सम्बन्धके बिना एक-अधिकरणकी प्रतीति नहीं
हो सकती । 'पुरुष यष्टि है' यह ज्ञान पुरुष और यष्टिके वास्तविक भेद होनेपर भी वास्तविक नहीं है, यह
केवल उपचारसे होता है । 'पुरुष यष्टि है' इस उपचारका कारण यष्टिके स्तब्धता आदि गुणोंका पुरुषके
स्तब्धता आदि गुणों के साथ अभेद है, क्योंकि उपचार मुख्य अर्थको स्पर्श करनेवाला होता है (यहाँ यष्टिका
६० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
गमयति तामन्तरेण ज्ञाताऽहमिति प्रतीतेरनुपद्यमानत्वात् घटादिवत्। न हि घटादिरचेतनात्मकौ
ज्ञाताहमिति प्रत्येति। चैतन्ययोगाभावात् असौ न तथा प्रत्येतीति चेत्, न। अचेतनस्यापि
चैतन्ययोगात् चेतनोऽहमिति प्रतिपत्तेरनन्तरमेव निरस्तत्वात्। इत्यचेतनत्वं सिद्धमात्मनो
जडस्यार्थपरिच्छेदं पराकरोति। तं पुनरिच्छता चैतन्यस्वरूपतास्य स्वीकारणीया॥
ननु ज्ञानवानहमिति प्रत्ययादात्मात्मज्ञानयोर्भेदः, अन्यथा धनवानिति प्रत्ययादपि
धनधनवतोर्भेदाभावानुषङ्गः। तदसत्। ज्ञानवानहमिति नात्मा भवन्मते प्रत्येति, जडैकान्त-
रूपत्वात्, घटवत्। सर्वथा जडश्च स्यादात्मा, ज्ञानवानहमिति प्रत्ययश्च स्याद् अस्य विरोधा-
भावात् इति मा निगैषीः। तस्य तथोत्पत्त्यसम्भवात्। ज्ञानवानहमिति हि प्रत्ययो नागृहीते
ज्ञानाख्ये विशेषणे, विशेष्ये चात्मनि जातूत्पद्यते, स्वमतविरोधात्। “नागृहीतविशेषणा
विशेष्ये बुद्धिः” इति वचनात्॥
गृहीतयोस्तयोरुत्पद्यत इति चेत्, कुतस्तद्गृहीतिः। न तावत् स्वतः, स्वसंवेदनानानभ्युप-
गमात्। स्वसंविदिते ह्यात्मनि ज्ञाने च स्वतः सा युज्यते, नान्यथा, सन्तानान्तरवत्।
परतश्चेत्, तदपि ज्ञानान्तरं विशेष्यं नागृहीते ज्ञानत्वविशेषणे ग्रहीतुं शक्यम्। गृहीते हि घटत्वे
घटग्रहणमिति ज्ञानान्तरात् तद्ग्रहणेन भाव्यम्, इत्यनवस्थानात् कुतः प्रकृतप्रत्ययः। तदेवं
स्तब्धता आदि गुण मुख्यार्थ है)। इसी तरह आत्मामें 'मैं ज्ञाता हूँ' यह प्रतीति आत्माके कथंचित् चैतन्य
स्वभावको ही द्योतित करती है, क्योंकि बिना चैतन्य स्वभावके 'मैं ज्ञाता हूँ' ऐसी प्रतीति नहीं होती; जैसे,
घटमें चैतन्य रूप नहीं है, इसलिए उसमें 'मैं ज्ञाता हूँ' यह प्रतीति भी नहीं होती। यदि कहो कि घटमें
चैतन्यका सम्बन्ध नहीं होता है, इसलिए उसमें 'मैं ज्ञाता हूँ' ऐसी प्रतीति नहीं होती, तो यह ठीक नहीं।
क्योंकि अचेतनमें चैतन्यके सम्बन्धसे ही 'मैं चेतन हूँ' यह प्रतीति होती है, इस मतका खण्डन हमने अभी
किया है अतएव यदि आत्माको अचेतन माना जाय, तो उससे पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिए
आत्मासे पदार्थोंका ज्ञान करनेके लिये आत्माको चैतन्य स्वीकार करना चाहिए।
शंका—'मैं ज्ञानवान हूँ' इस ज्ञानसे ही आत्मा और ज्ञानमें भेद सिद्ध होता है, अन्यथा 'मैं धनवान
हूँ' इस ज्ञानसे भी धन और धनवानमें भेद न होना चाहिये। समाधान—यह ठीक नहीं, क्योंकि वैशेषिकोंके
मतमें घटकी तरह आत्मा सर्वथा जड़ है, इसलिये उसमें 'मै ज्ञानवान हूँ' यह ज्ञान ही नहीं हो सकता। यदि
आप लोग कहें कि आत्माके सर्वथा जड़ होते हुए भी 'मैं ज्ञानवान हूँ' ऐसा प्रत्यय होता है, इसमें कोई
विरोध नहीं है, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि 'मैं ज्ञानवान हूँ' यह प्रतीति ही आत्मामें नहीं हो सकती।
कारण कि 'मैं ज्ञानवान हूँ' यह प्रत्यय ज्ञानरूप विशेषण और आत्मारूप विशेष्य ज्ञानके बिना कभी उत्पन्न
नहीं हो सकता। ऐसा माननेसे आपके मतसे विरोध आयेगा, क्योंकि कहा है "बिना विशेषणको ग्रहण किये
हुए विशेष्यका ज्ञान नहीं होता।”
शंका—जब आत्मा विशेषण (ज्ञान) और विशेष्य (आत्मा) को ग्रहण करता है, उस समय
'मैं ज्ञानवान हूँ' यह प्रतीति होती है। समाधान—यहाँ प्रश्न होता है कि यह प्रतीति स्वतः होती हैं,
या परतः? यह प्रतीति स्वयं नहीं हो सकती, क्योंकि आप लोग आत्मामें स्वसंवेदन ज्ञान नहीं मानते हैं।
तथा, दूसरी सन्तानोंकी तरह आत्मा और ज्ञानके स्वसंविदित होनेपर यह प्रतीति स्वयं हो सकती है, अन्यथा
नहीं। (अर्थात् जैसे घट पटादि दूसरी संतानोंसे स्वसंविदित नहीं हैं, इसलिये उनमें 'मैं ज्ञाता हूँ' यह प्रतीति
नहीं होती, वैसे ही आत्मामें भी यह प्रतीति नहीं होनी चाहिये।) यदि कहो कि आत्मा दूसरे ज्ञानके द्वारा
अपने ज्ञानरूप विशेषणको ग्रहण करती है तो वह दूसरा ज्ञानरूप विशेष्य भी अपने ज्ञानत्व विशेषणको
ग्रहण किये बिना आत्माके ज्ञानरूप विशेषणको ग्रहण नहीं कर सकता। अर्थात् जैसे घटत्वके ज्ञानके द्वारा
घटत्वका ज्ञान होनेपर जो घटका ज्ञान होता है, उस ज्ञानका ज्ञान भी उस ज्ञानके ज्ञानत्वका ज्ञान होनेपर
ज्ञानत्वके ज्ञानसे होना चाहिये। ज्ञानत्वका ज्ञान उस ज्ञानत्व के अन्य ज्ञानसे होगा। इस प्रकार अनवस्था
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ६१
नात्मनो जडस्वरूपता संगच्छते । तदसङ्गतौ च चैतन्यमौपाधिकमात्मनोऽन्यदिति
वाङ्मात्रम् ॥
तथा यदपि न संविदानन्दमयी च मुक्तिरिति व्यवस्थापनाय अनुमानमवादि
सन्तानत्वादिति । तत्राभिधीयते । ननु किमिदं सन्तानत्वं स्वतन्त्रमपरापरपदार्थोत्पत्तिमात्रं वा,
एकाश्रयापरापरोत्पत्तिर्वा ? तत्राद्यः पक्षः सव्यभिचारः । अपरापरेषामुत्पादकानां घटपटकटा-
दीनां सन्तानत्वेऽप्यत्यन्तममुच्छिद्यमानत्वात् । अथ द्वितीयः पक्षः, तर्हि तादृशं सन्तानत्वं
प्रदीपे नास्तीति साधनविकलो दृष्टान्तः । परमाणुपाकजरूपादिभिश्च व्यभिचारी हेतुः ।
तथाविधसन्तानत्वस्य तत्र सद्भावेऽप्यत्यन्तोच्छेदाभावात् । अपि च सन्तानत्वमपि भविष्यति
अत्यन्तानुच्छेदश्च भविष्यति विपर्यये बाधकप्रमाणाभावात् । इति संदिग्धविपक्षव्यावृत्तिक-
त्वादप्यनैकान्तिकोऽयम् । किञ्च, स्याद्वादवादिनां नास्ति कचिदत्यन्तमुच्छेदः, द्रव्यरूपतया
दोष आनेसे प्रकृत ज्ञानका ज्ञान कैसे हो सकता है ? इसलिये 'मैं ज्ञानवान हूँ' ऐसी प्रतीति किसी भी तरह
आत्मामें न हो सकेगी । अतएव आत्माको जड़ स्वीकार करना ठीक नहीं है । तथा आत्माके जड़ न सिद्ध
होनेपर आत्माके ज्ञानको उपाधिजन्य मानना भी केवल कथन मात्र है ।
( ३ ) मुक्ति ज्ञानमय और आनन्दमय नहीं है, यह सिद्ध करनेके लिये आप लोगोंने जो
सन्तानत्व हेतु दिया है, वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि यह सन्तानत्व क्या है ? क्या वह भिन्न-भिन्न स्वतन्त्र
पदार्थोंकी उत्पत्ति मात्र है, अथवा एक पदार्थरूप आश्रयमें भिन्न-भिन्न परिणामोंकी उत्पत्ति मात्र ( एकाश्रया-
परापरोत्पत्ति ) है ? पहला पक्ष सदोष है कारण कि भिन्न-भिन्न उत्पादक घट, पट, कट आदि पदार्थोंका
सन्तानत्व विद्यमान होनेपर भी उनका आत्यन्तिक उच्छेद ( नाश ) नहीं देखा जाता ( वैशेषिक मतमें जो जो
सन्तान होता है उसका आत्यन्तिक रूपमें विनाश होता है ) । यदि दूसरा पक्ष—अर्थात् एक पदार्थ रूप
आश्रयमें भिन्न-भिन्न परिणामोंकी उत्पत्ति सन्तान है—स्वीकार किया जाये तो एकाश्रयापरापरोत्पत्ति रूप
सन्तानत्व प्रदीप दृष्टान्तमें घटित न होनेसे प्रदीपका दृष्टान्त साधनविकल है । ( प्रदीपकी सन्तानका एक आश्रय
नहीं है, क्योंकि पूर्व अग्निकी ज्वाला रूप दीपक पूर्व अग्निकी ज्वालाके नष्ट होनेके क्षणमें नष्ट हो जाता है,
इसलिये दीपकका दृष्टान्त साधनसे शून्य है । ) तथा, एकाश्रयापरापरोत्पत्ति लक्षण सन्तानत्वका परमाणुपाकज
रूप ( अग्निके द्वारा परमाणुमें उत्पन्न किया हुआ रूप ) आदिमें सद्भाव होनेपर भी परमाणुओंके पाकजरूप
आदिका आत्यन्तिक नाश न होनेसे परमाणुओंके साथ सन्तानत्व हेतु व्यभिचारी है ( परमाणुपाकज रूपादि
का आत्यन्तिक नाश न होनेसे वह विपक्ष है, अतः उसमें उक्त हेतुका सद्भाव होनेसे वह हेतु व्यभिचारी है ।
वैशेषिक लोग 'पीलुपाक' सिद्धान्तको मानते हैं । उनके मतमें जिस समय कच्चा घड़ा अग्निमें पकानेके लिये
रक्खा जाता है, उस समय यह कच्चा घड़ा नष्ट होकर परमाणु रूप हो जाता है । उसके बाद अग्निके
संयोगसे परमाणुओंमें लाल रंग उत्पन्न होता है । ये परमाणु एकत्र होकर पक्के घड़ेके रूपमें बदलते हैं ।
यह परमाणुपाकज प्रक्रिया अत्यन्त शीघ्रतासे होती है, और नौ क्षणों में समाप्त हो जाती है । जैन लोगोंका
कहना है, कि अग्निके द्वारा उत्पन्न किये हुए परमाणुमें रूप-सन्तान होनेपर भी उसका अत्यन्त उच्छेद नहीं
होता, इसलिये उक्त हेतु व्यभिचारी है । क्योंकि कच्चे घड़ेके अग्निमें रखनेसे जब उस घटका परमाणुपर्यन्त
विभाग होता है, तब उन परमाणुओंमें पूर्व घटकी रूप-सन्तान बदलकर दूसरे रूपमें उत्पन्न होती है, इसलिये
यद्यपि पूर्व और अपर सन्तान परमाणुरूप एक आश्रयमें रहती है तो भी सन्तानका अत्यन्त नाश नहीं
होता । ) तथा, सन्तानत्वके रहनेपर भी आत्यन्तिक नाश रह सकता है, इसमें किसी बाधक प्रमाणका अभाव
है । इस प्रकार विपक्षव्यावृत्ति सन्दिग्ध होनेसे यह हेतु अनैकान्तिक भी है । ( अतएव 'मुक्तिमें बुद्धि आदि
गुणोंका अत्यन्त उच्छेद हो जाता है, क्योंकि बुद्धि आदि सन्तान हैं' इस अनुमानमें सन्तानत्व हेतु विपक्ष
घटादिमें उच्छेद्यत्व साध्यके अभाव अनुच्छेद्यत्वके साथ रहता है, इसलिये सन्दिग्ध विपक्षव्यावृत्ति होनेसे
अनैकान्तिक हेत्वाभास है । ) तथा, स्याद्वादियोंके किसी भी पदार्थका अत्यन्त उच्छेद नहीं होता, क्योंकि द्रव्य
६२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
स्थास्नूनामेव सतां भावानामुत्पादव्यययुक्तत्वात् इति विरुद्धश्च। इति नाधिकृतानुमानाद्
बुद्ध्यादिगुणोच्छेदरूपा सिद्धिः सिद्धयति ॥
नापि “न हि वै सशरीरस्य” इत्यादेरागमात् । स हि शुभाशुभादृष्टपरिपाकजन्ये
सांसारिकप्रियाप्रिये परस्परानुषक्ते अपेक्ष्य व्यवस्थितः। मुक्तिदशायां तु सकलादृष्टक्षयहेतु-
कम्मैकान्तिकमात्यन्तिकं च केवलं प्रियमेव, तत्कथं प्रतिषिध्यते । आगमस्य चायमर्थः,
‘सशरीरस्य’—गतिचतुष्टयान्यतमस्थानवर्तिन आत्मनः, ‘प्रियाप्रिययोः’—परस्परानुषक्तयोः
सुखदुःखयोः ‘अपहतिः’—अभावो, ‘नास्ती’ति । अवश्यं हि तत्र सुखदुःखाभ्यां भाव्यम् ।
परस्परानुषक्तत्वं च समासकरणादभ्यूह्यते । ‘अशरीरं’—मुक्तात्मानं, ‘वा’शब्दस्यैवकारार्थत्वात्
अशरीरमेव; ‘वसन्तं’—सिद्धिक्षेत्रमध्यासीनं, ‘प्रियाप्रिये’—परस्परानुषक्ते सुखदुःखे, ‘न
स्पृशतः’ ॥
इदमत्र हृदयम् । यथा किल संसारिणः सुखदुःखे परस्परानुषक्ते स्यातां, न तथा
मुक्तात्मनः किन्तु केवलं सुखमेव । दुःखमूलस्य शरीरस्याभावात् । सुखं त्वात्मस्वरूपत्वाद-
वस्थितमेव । स्वस्वरूपावस्थानं हि मोक्षः। अत एव चाशरीरमित्युक्तम् । आगमार्थश्चाय-
मित्थमेव समर्थनीयः । यत एतदर्थानुपातिन्येव स्मृतिरपि दृश्यते—
“सुखमात्यन्तिकं यत्र बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
तं वै मोक्षं विजानीयाद् दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥”
रूपसे ध्रुव रहनेवाले पदार्थोंके ही उत्पाद और व्यय होते हैं । आत्यन्तिक नाशका अभाव होनेपर भी एक
ही पदार्थमें क्रमभावी परिणामोंकी उत्पत्ति होनेसे सन्तानत्व हेतु जैनों द्वारा स्वीकृत पदार्थके साथ अविनाभावी
होनेसे विरुद्ध है । इस प्रकार सन्तानत्व हेतुसे बुद्धि आदिके उच्छेदरूप मोक्षकी सिद्धि नहीं होती ।
तथा, मोक्ष अवस्थामें सुखका अभाव सिद्ध करनेके लिए आप लोगोंने “न हि वै सशरीरस्य सतः
प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति” जो आगमका प्रमाण दिया है, वह भी साध्यकी सिद्धि नहीं करता । क्योंकि यहाँ
जो मोक्षमें प्रिय-अप्रिय ( सुख-दुःख ) का प्रतिषेध किया गया है, वह केवल शुभ-अशुभ अदृष्टके परिणामसे
उत्पन्न, एक दूसरेसे सम्बद्ध, सांसारिक सुख-दुःख की अपेक्षासे ही किया गया है । मुक्तावस्थाका सुख समस्त
पुण्य-पापके क्षयसे उत्पन्न होता है, इसलिए यह सुख ऐकान्तिक ( एकरूप ) और आत्यन्तिक ( नाश न
होनेवाला ) होता है; इस नित्य सुखका प्रतिषेध कैसे किया जा सकता है ? अतएव उक्त आगममें प्रिय-अप्रिय
शब्दोंसे पुण्य-पापसे उत्पन्न होनेवाले सांसारिक सुख-दुःखका ही प्रतिषेध किया गया है, मुक्तावस्थाके अनन्त
और अव्याबाध सुखका नहीं । इसलिये आगमका निम्नप्रकारसे अर्थ करना चाहिये:—‘सशरीरस्य प्रिया-
प्रिययोः अपहतिः नास्ति’—संसारी आत्माके परस्पर अपेक्षित सुख-दुःखका अभाव नहीं होता । ( यहाँ
‘प्रियाप्रिय’ में द्वंद्व समास करनेसे सुख-दुःखको परस्पर अपेक्षित समझना चाहिये ) । ‘अशरीरं वा वसन्तं
प्रियाप्रिये न स्पृशतः’—मुक्तावस्थामें रहनेवाले मुक्तात्माको परस्पर अपेक्षित सुख-दुःखका स्पर्श नहीं होता ।
तात्पर्य यह है कि जैसे संसारी जीवके सुख-दुःख परस्पर अपेक्षित होते हैं, वैसे मुक्त जीवके नहीं
होते । मुक्त जीवोंके केवल सुख ही होता हैं, क्योंकि उनके दुःखके कारण शरीरका अभाव है । तथा मुक्त जीव
अपने आत्मस्वरूपमें स्थित रहते हैं, इसलिये उनके सुख ही होता है । कारण कि अपने स्वरूपमें अवस्थित
होना ही मोक्ष है । इसीलिये मुक्त जीव शरीर रहित हैं । आगमसे इसका समर्थन होता है । स्मृतिने इसका
समर्थन किया है—
“जिस अवस्थामें इन्द्रियोंसे बाह्य केवल बुद्धिसे ग्रहण करने योग्य आत्यन्तिक सुख विद्यमान है, वही
मोक्ष है । पापी आत्माओंके लिये वह दुष्प्राप्य है ।”
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ६३
न चायं सुखशब्दो दुःखाभावमात्रे वर्तते । मुख्यसुखवाचकतायां बाधकाभावात् । अयं
रोगाद् विप्रमुक्तः सुखी जात इत्यादिवाक्येषु च सुखीति प्रयोगस्य पौनरुक्त्यप्रसङ्गाच्च ।
दुःखाभावमात्रस्य रोगाद् विप्रमुक्त इतीयतैव गतत्वात् ॥
न च भवदुदीरितो मोक्षः पुंसामुपादेयतया संमतः । को हि नाम शिलाकल्पमपगत-
सकलसुखसंवेदनमात्मानमुपपादयितुं यतेत । दुःखसंवेदनरूपत्वादस्य सुखदुःखयोरेकस्या-
भावेऽपरस्यावश्यम्भावात् । अत एव त्वदुपहासः श्रूयते—
“वरं वृन्दावने रम्ये क्रोष्टुत्वमभिवाञ्छितम् ।
न तु वैशेषिकीं मुक्तिं गौतमो गन्तुमिच्छति ॥”
सोपाधिकसावधिकपरिमितानन्दनिष्यन्दात् स्वर्गादप्यधिकं तद्विपरीतानन्दमम्लान-
ज्ञानं
६४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
तदेतदसत्यम् । सांसारिकसुखस्य मधूद्ग्धधाराकरालमण्डलाग्राभासवद् दुःखरूपत्वादेव
युक्तैव मुमुक्षूणां तज्जिहासा, किन्त्वात्यन्तिकसुखविशेषलिप्सूनामेव । इहापि विषयनिवृत्तिजं
सुखमनुभवसिद्धमेव, तद् यदि मोक्षे विशिष्टं नास्ति, ततो मोक्षो दुःखरूप एवापद्यत इत्यर्थः ।
ये अपि विषमधुनो एकत्र सम्पृक्ते त्यज्येते, ते अपि सुखविशेषलिप्सयैव । किञ्च, यथा प्राणिनां
संसारावस्थायां सुखमिष्टं दुःखं चानिष्टम्, तथा मोक्षावस्थायां दुःखनिवृत्तिरिष्टा, सुखनिवृत्ति-
स्त्वनिष्टैव । ततो यदि त्वदभिमतो मोक्षः स्यात्, तदा न प्रेक्षावतामत्र प्रवृत्तिः स्यात् । भवति
चेयम् । ततः सिद्धो मोक्षः सुखसंवेदनस्वभावः प्रेक्षावत्प्रवृत्तेरन्यथानुपपत्तेः ॥
अथ यदि सुखसंवेदनैकस्वभावो मोक्षः स्यात् तदा तद्रागेण प्रवर्तमानो मुमुक्षुर्न
मोक्षमधिगच्छेत् । न हि रागिणां मोक्षोऽस्ति रागस्य बन्धनात्मकत्वात् । नैवम् । सांसारिक-
सुखमेव रागो बन्धनात्मकः विषयादिप्रवृत्तिहेतुत्वात् । मोक्षसुखे तु रागः तन्निवृत्तिहेतुत्वाद्
न बन्धनात्मकः । परां कोटिमारूढस्य च स्पृहामात्ररूपोऽप्यसौ निवर्तते “मोक्षे भवे च सर्वत्र
निःस्पृहो मुनिसत्तमः” इति वचनात् । अन्यथा भवत्पक्षेऽपि दुःखनिवृत्त्यात्मकमोक्षाङ्गीकृतौ
दुःखविषयं कषायकालुष्यं केन निषिध्येत । इति सिद्धं कृत्स्नकर्मक्षयात् परमसुखसंवेदनात्मको
मोक्षो, न बुद्ध्यादिविशेषगुणोच्छेदरूप इति ॥
अपि च भोस्तपस्विन्, कथञ्चिदेषामुच्छेदोऽस्माकमप्यभिमत एवेति मा विरूपं मनः
कृथाः । तथाहि । बुद्धिशब्देन ज्ञानमुच्यते । तच्च मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेवलभेदात्
पञ्चधा । तत्राद्यं ज्ञानचतुष्टयं क्षायोपशमिकत्वात् केवलज्ञानाविर्भावकाल एव प्रलीनम् ।
समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि सांसारिक सुख शहदसे लिपटी हुई तीक्ष्ण धारवाली तलवारकी
नोकको चाटनेके समान है, इसलिये सांसारिक सुख दुःखरूप है, अतएव मुमुक्षु लोगोंको उसे त्यागना ही
ठीक है । अविनाशी सुख चाहनेवालोंको सांसारिक दुःख छोड़ना ही चाहिये । तथा, संसारमें भी विषयोंकी
निवृत्तिसे उत्पन्न होनेवाला सुख अनुभवसे सिद्ध है । वह यदि विशिष्टरूपसे मोक्षमें नहीं है, तो मोक्षके दुःखरूप
होनेसे मोक्ष त्याज्य है । तथा, एक साथ सम्मिलित विष और शहदका त्याग भी विशेष सुखकी इच्छासे ही
किया जाता है ! तथा, जैसे प्राणियोंको सांसारिक अवस्थामें सुख इष्ट और दुःख अनिष्ट है, वैसे ही मोक्षा-
वस्थामें दुःखकी निवृत्ति इष्ट और सुखकी निवृत्ति अनिष्ट है । अतएव यदि मोक्षमें ज्ञान और आनन्दका
अभाव है, तो मोक्षमें किसी भी बुद्धिमानकी प्रवृत्ति न होनी चाहिये । अतएव मोक्ष सुख और ज्ञान रूप है ।
शंका—यदि मोक्षको सुख और ज्ञानरूप माना जाय, तो मोक्षमें राग भावसे प्रवृत्ति करनेवाले
मुमुक्षुको मोक्षकी प्राप्ति न होनी चाहिये । क्योंकि राग बन्ध करनेवाला है, इसलिये रागी पुरुषोंको मोक्ष
नहीं मिलता । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि सांसारिक सुख हो रागबन्धका हेतु है, क्योंकि यह
सांसारिक सुखरूप राग ही विषय आदिकी प्रवृत्तिमें कारण है । किन्तु मोक्षसुखका अनुराग विषय आदिकी
प्रवृत्तिमें कारण नहीं है, इसलिये वह बन्धनका कारण नहीं । तथा, उत्कृष्ट दशाको प्राप्त हुए आत्माके
इच्छामात्र भी यह राग नहीं रहता । कहा भी है—“उत्तम मुनि मोक्ष और संसार दोनोंमें निस्पृह रहते
हैं ।” अन्यथा रागका सद्भाव होनेपर दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति रूपवैशेषिकोंके मोक्षमें भी दुःखरूप कषायका
उत्पन्न होना सम्भव है । अतएव सम्पूर्ण कर्मोंके क्षयसे उत्पन्न होनेवाला परम सुख और आनन्द स्वरूप ही
मोक्ष मानना युक्तियुक्त है, बुद्धि आदि आत्माके विशेष गुणोंका उच्छेद होना नहीं ।
तथा, हम लोग भी बुद्धि आदिका कथंचित् उच्छेद ही मानते हैं, अतएव हे तपस्वी, आप निराश न
हों । बुद्धिका अर्थ ज्ञान होता है । यह ज्ञान मति, श्रुति, अवधि, मनपर्यय और केवलज्ञानके भेदसे पांच
प्रकारका है । इनमें आदिके चार ज्ञान क्षायोपशमिक ( ज्ञानावरणीय कर्मके एकदेश क्षय और उपशमसे
उत्पन्न होनेवाले ) हैं, इसलिये केवलज्ञानके उत्पन्न होनेके समय नष्ट हो जाते हैं । आगममें कहा है—
“नट्ठेमि य छाउमत्थिए नाणे१” इत्यागमात् । केवलं तु सर्वद्रव्यपर्यायगतं क्षायिकत्वेन
निष्कलङ्कात्मस्वरूपत्वाद् अस्त्येव मोक्षावस्थायाम् । सुखं तु वैषयिकं तत्र नास्ति, तद्धेतोर्वेद-
नीयकर्मणोऽभावात् । यत्तु निरतिशयक्षयमनपेक्षमनन्तं च सुखं तद् बाढं विद्यते । दुःखस्य
चाधर्ममूलत्वात् तदुच्छेदादुच्छेदः ॥
नन्वेवं सुखस्यापि धर्ममूलत्वाद् धर्मस्य चोच्छेदात् तदपि न युज्यते । “पुण्यपापक्षयो
मोक्षः” इत्यागमवचनात् । नैवम् । वैषयिकसुखस्यैव धर्ममूलत्वाद् भवतु तदुच्छेदः न पुनरन-
पेक्षस्यापि सुखस्योच्छेदः । इच्छाद्वेषयोः पुनर्मोहभेदत्वात् तस्य च समूलकाषंकषितत्वादभावः ।
प्रयत्नश्च क्रियाव्यापारगोचरो नास्त्येव, कृतकृत्यत्वात् । वीर्यान्तरायक्षयोपनतस्त्वस्त्येव
प्रयत्नः, दानादिलब्धिवत्३ । न च क्वचिदुपयुज्यते, कृतार्थत्वात् । धर्माधर्मयोस्तु पुण्यपापा-
“छाद्मस्थिक (केवलज्ञानके अतिरिक्त सब ज्ञानोंको छद्मस्थ ज्ञान कहते हैं) ज्ञानके नष्ट होनेपर (केवलज्ञान
उत्पन्न होता है )१”। केवलज्ञान सब द्रव्य और सब पर्यायोंको जानता है, और वह ज्ञानावरणीय कर्मके सर्वथा
क्षयसे उत्पन्न होता है, इसलिये मोक्षावस्थामें निर्दोष केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है । वैषयिक सुख मोक्षमें
नहीं है, क्योंकि वहाँ वैषयिक सुखके कारण वेदनीय कर्मका अभाव है। निरतिशय, अक्षय और अनन्त सुख
मोक्षमें विद्यमान है । तथा दुःखके कारण अधर्मका नाश हो जानेसे मोक्षमें दुःखका भी अभाव हो जाता है।
शंका—सुखका कारण भी धर्म ही है, अतएव धर्मके उच्छेद हो जानेसे मुक्तात्माके सुख भी नहीं
मानना चाहिये । आगममें कहा है—“पुण्य और पापके क्षय होनेपर मोक्ष होता है ।” समाधान—यह ठीक
नहीं है। क्योंकि वैषयिक सुख धर्मका कारण है, इसलिये मुक्त जीवके वैषयिक सुखका नाश हो जाता है,
परन्तु उसके निरपेक्ष सुखका नाश नहीं होता । क्योंकि इच्छा और द्वेष मोहके भेद हैं, और मुक्त जीवके
मोहका समूल नाश हो जाता है। तथा मुक्त जीवके कोई प्रयत्न भी नहीं होता, क्योंकि मुक्त जीव कृतकृत्य
है। अथवा मुक्त जीवके दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य इन पाँच लब्धियों की तरह वीर्यान्तराय कर्म
(जिस कर्मके उदयसे नीरोग बलवान युवक एक तृणके टुकड़ेको भी हिलानेमें असमर्थ होता है, उसे
वीर्यान्तरायकर्म कहते हैं) के क्षयसे उत्पन्न वीर्यलब्धि रूप प्रयत्न मुक्त जीवके होता है । किन्तु मुक्त जीव
कृतकृत्य रहते हैं, अतएव वे प्रयत्नका कभी उपयोग नहीं करते। तथा मुक्त जीवके धर्म-अधर्म अथवा पुण्य-
पापका उच्छेद भी रहता ही है, क्योंकि धर्म-अधर्मके रहनेपर मोक्ष नहीं मिल सकता । संस्कार मतिज्ञानका
ही भेद है, अतएव मतिज्ञानके क्षय होनेके बाद ही संस्कारका भी नाश हो जाता है । इसलिये मुक्त आत्माके
संस्कार भी नहीं होता । अतएव मुक्त अवस्थामें ज्ञान और सुखका अभाव है, यह कहना युक्तियुक्त नहीं है।
यह श्लोकका अर्थ है ॥
भावार्थ—इस श्लोकमें वैशेषिक लोगोंके तीन सिद्धान्तोंपर विचार किया गया है—(१) सत्ता द्रव्य,
गुण आदिसे भिन्न है; (२) आत्मा ज्ञानसे भिन्न है; (३) मुक्त अवस्थामें ज्ञान और सुखका अभाव हो
जाता है।
वैशेषिक—(१) क—सत्ता द्रव्य, गुण और कर्ममें ही रहती है (द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता)—सत्ता
(पर सामान्य अथवा महासामान्य) द्रव्य, गुण और कर्ममें ही रहती है, सामान्य, विशेष और समवायमें
नहीं । वैशेषिकोंके अनुसार द्रव्य आदि तीन पदार्थोंमें ही सत्ता रहती है, क्योंकि इन तीनमें ही सत् प्रत्यय
१. उप्पण्णंमि अगंते नठ्ठम्मि य छाउमत्थिए नाणे । राईए संपत्तो महसेणवणंमि उज्जाणे ॥
छाया—उत्पन्नेऽनन्ते नष्टे च छाद्मस्थिके ज्ञाने । रात्र्यां संप्राप्तो महसेनवनं उद्यानं ॥५३९॥
आवश्यकपूर्वविभागः । २ बलवता यूना रोगरहितेनापि पुंसा यस्य कर्मण उदयात्तृणमपि न तिर्यक्कर्तुं पार्यते
तत्कर्म वीर्यान्तरायाख्यम् । ३ लब्धयः पञ्च । तथाहि—दानलाभभोगोपभोगवीर्यभेदात्पञ्चधा । सूत्रकृताङ्ग
१–१२; तत्त्वार्थसू. २–५ ।
९
६६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
परपर्याययोरुच्छेदोऽस्त्येव । तदभावे मोक्षस्यैवायोगात् । संस्कारश्च मतिज्ञानविशेष एव ।
तस्य च मोहक्षयानन्तरं क्षीणत्वादभाव इति । तदेवं न संविदानन्दमयी च मुक्तिरिति युक्ति-
रिक्तेयमुक्तिः । इति काव्यार्थः ॥ ८ ॥
होता है। यद्यपि द्रव्य आदि छहों पदार्थोंमें 'अस्तित्व' रहता है, तथापि वह सामान्य आदि तीनमें अनुवृत्ति-
प्रत्यय (सामान्यज्ञान) का कारण नहीं है, और द्रव्यादि तीन पदार्थोंमें है, इसलिये द्रव्यादि तीन पदार्थोंमें
ही सत्ता रहती है। यदि सामान्य, विशेष और समवायमें सत्तासम्बन्ध स्वीकार किया जाय, तो क्रमसे
अनवस्था, रूपहानि और असम्बन्ध दोष आते हैं, अतएव सत्ताको सामान्य आदि तीन में स्वीकार न करके
द्रव्य, गुण और कर्ममें ही स्वीकार करना चाहिये ।
ख—सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे भिन्न है (सत्ता द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं) । (अ) सत्ता द्रव्यसे
भिन्न है। जो द्रव्योंसे उत्पन्न न हुआ हो, अथवा द्रव्योंका उत्पादक न हो (अद्रव्यत्व), तथा जो अनेक द्रव्योंसे
उत्पन्न हुआ हो, अथवा अनेक द्रव्यों का उत्पादक हो (अनेकद्रव्यत्व), उसे द्रव्य कहते हैं। सत्तामें द्रव्यका
उक्त लक्षण घटित नहीं होता। सत्ता द्रव्यत्वकी तरह प्रत्येक द्रव्यमें रहती है, इसलिये सत्ता द्रव्य नहीं है।
(ब) सत्ता गुणसे भी भिन्न है। क्योंकि सत्ता गुणत्वकी तरह गुणोंमें रहती है। तथा गुण गुणोंमें नहीं रहते
(निर्गुणत्वाद् गुणानाम्) । (स) सत्ता कर्मसे भी भिन्न है, क्योंकि वह कर्मत्वकी तरह कर्ममें रहती है।
तथा कर्म कर्ममें नहीं रहते ।
'सत्ता' (सामान्य) पर सामान्य और अपर सामान्यके भेदसे दो प्रकारकी है। 'पदार्थत्व'
(द्रव्य, गुण आदि छह पदार्थोंमें रहनेवाले) को पर सामान्य अथवा महासामान्य कहते हैं। द्रव्यत्व,
गुणत्व आदि अपर सामान्य है। द्रव्यत्व आदिकी अपेक्षासे पृथिवीत्व आदि, और पृथिवीत्व आदिकी अपेक्षासे
घटत्व आदि अपर सामान्य कहे जाते हैं। अपर सामान्य एक पदार्थको जानते समय उस पदार्थकी दूसरे
पदार्थसे व्यावृत्ति करता है, इसलिये इसे सामान्य-विशेष भी कहते हैं। सत्ता अथवा सामान्यकी तरह 'विशेष'
भी भिन्न पदार्थ हैं । 'विशेष' सजातीय और विजातीय पदार्थोंसे अत्यन्त व्यावृत्ति कराते हैं, अतएव 'विशेष'
विशेष रूप ही हैं, सामान्य-विशेष रूप ये नहीं हो सकते। आधार और आधेय पदार्थोंमें इहप्रत्ययका कारण
'समवाय' भी भिन्न पदार्थ है। 'इन तंतुओंमें पट है' यह इहप्रत्यय हेतु तंतु और पटमें समवाय संबन्ध
स्थापित करता है।
जैन—(१) क—सत्ता (अस्तित्व—वस्तुका स्वरूप) को सम्पूर्ण छहों पदार्थोंमें स्वीकार करके
भी वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण और कर्ममें ही 'अस्तित्व' (सत्ता) स्वीकार करते हैं, यह युक्तियुक्त नहीं है।
तथा द्रव्य, गुण, कर्मकी तरह 'सामान्यप्रत्यय' (सत्ता) सामान्य, विशेष और समवायमें भी होता है,
फिर कुछ पदार्थोंमें सामान्य (सत्ता) स्वीकार करना, और कुछमें नहीं, यह न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता ।
तथा सामान्य, विशेष और समवायमें सत्ता माननेसे अनवस्था, रूपहानि, और असंबन्ध नामक दोष आते
हैं, यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि सामान्यकी तरह द्रव्य, गुण, कर्ममें सत्ता स्वीकार करनेसे भी अनवस्था दोष
नहीं बच सकता । तथा विशेषमें सत्ता स्वीकार करनेपर उल्टी विशेषकी ही सिद्धि होती है, क्योंकि कहीं
भी सामान्य रहित विशेषकी उपलब्धि नहीं होती। इसी प्रकार समवायमें भी सत्ता (स्वरूपसत्ता)
माननी ही होगी।
ख—यदि सत्ताको द्रव्य, गुण और कर्मसे भिन्न माना जाय, तो द्रव्यादिको असत् मानना होगा।
इसलिये सत्ता द्रव्य आदिसे भिन्न नहीं हो सकती ।
वैशेषिक—(२)—ज्ञान आत्मासे भिन्न है, अर्थात् ज्ञान समवाय संबन्धसे आत्माके साथ रहता
है। आत्मा स्वयं जड़ है। जिस समय हम किसी पदार्थका ज्ञान करते हैं, उस समय पहले पदार्थ और
इन्द्रियका संयोग होता है, बादमें इन्द्रिय मनसे, और मन आत्मासे संबद्ध होता है। यदि आत्मा और ज्ञान