सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 458 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

६४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
तदेतदसत्यम् । सांसारिकसुखस्य मधूद्ग्धधाराकरालमण्डलाग्राभासवद् दुःखरूपत्वादेव
युक्तैव मुमुक्षूणां तज्जिहासा, किन्त्वात्यन्तिकसुखविशेषलिप्सूनामेव । इहापि विषयनिवृत्तिजं
सुखमनुभवसिद्धमेव, तद् यदि मोक्षे विशिष्टं नास्ति, ततो मोक्षो दुःखरूप एवापद्यत इत्यर्थः ।
ये अपि विषमधुनो एकत्र सम्पृक्ते त्यज्येते, ते अपि सुखविशेषलिप्सयैव । किञ्च, यथा प्राणिनां
संसारावस्थायां सुखमिष्टं दुःखं चानिष्टम्, तथा मोक्षावस्थायां दुःखनिवृत्तिरिष्टा, सुखनिवृत्ति-
स्त्वनिष्टैव । ततो यदि त्वदभिमतो मोक्षः स्यात्, तदा न प्रेक्षावतामत्र प्रवृत्तिः स्यात् । भवति
चेयम् । ततः सिद्धो मोक्षः सुखसंवेदनस्वभावः प्रेक्षावत्प्रवृत्तेरन्यथानुपपत्तेः ॥
अथ यदि सुखसंवेदनैकस्वभावो मोक्षः स्यात् तदा तद्रागेण प्रवर्तमानो मुमुक्षुर्न
मोक्षमधिगच्छेत् । न हि रागिणां मोक्षोऽस्ति रागस्य बन्धनात्मकत्वात् । नैवम् । सांसारिक-
सुखमेव रागो बन्धनात्मकः विषयादिप्रवृत्तिहेतुत्वात् । मोक्षसुखे तु रागः तन्निवृत्तिहेतुत्वाद्
न बन्धनात्मकः । परां कोटिमारूढस्य च स्पृहामात्ररूपोऽप्यसौ निवर्तते “मोक्षे भवे च सर्वत्र
निःस्पृहो मुनिसत्तमः” इति वचनात् । अन्यथा भवत्पक्षेऽपि दुःखनिवृत्त्यात्मकमोक्षाङ्गीकृतौ
दुःखविषयं कषायकालुष्यं केन निषिध्येत । इति सिद्धं कृत्स्नकर्मक्षयात् परमसुखसंवेदनात्मको
मोक्षो, न बुद्ध्यादिविशेषगुणोच्छेदरूप इति ॥
अपि च भोस्तपस्विन्, कथञ्चिदेषामुच्छेदोऽस्माकमप्यभिमत एवेति मा विरूपं मनः
कृथाः । तथाहि । बुद्धिशब्देन ज्ञानमुच्यते । तच्च मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेवलभेदात्
पञ्चधा । तत्राद्यं ज्ञानचतुष्टयं क्षायोपशमिकत्वात् केवलज्ञानाविर्भावकाल एव प्रलीनम् ।
समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि सांसारिक सुख शहदसे लिपटी हुई तीक्ष्ण धारवाली तलवारकी
नोकको चाटनेके समान है, इसलिये सांसारिक सुख दुःखरूप है, अतएव मुमुक्षु लोगोंको उसे त्यागना ही
ठीक है । अविनाशी सुख चाहनेवालोंको सांसारिक दुःख छोड़ना ही चाहिये । तथा, संसारमें भी विषयोंकी
निवृत्तिसे उत्पन्न होनेवाला सुख अनुभवसे सिद्ध है । वह यदि विशिष्टरूपसे मोक्षमें नहीं है, तो मोक्षके दुःखरूप
होनेसे मोक्ष त्याज्य है । तथा, एक साथ सम्मिलित विष और शहदका त्याग भी विशेष सुखकी इच्छासे ही
किया जाता है ! तथा, जैसे प्राणियोंको सांसारिक अवस्थामें सुख इष्ट और दुःख अनिष्ट है, वैसे ही मोक्षा-
वस्थामें दुःखकी निवृत्ति इष्ट और सुखकी निवृत्ति अनिष्ट है । अतएव यदि मोक्षमें ज्ञान और आनन्दका
अभाव है, तो मोक्षमें किसी भी बुद्धिमानकी प्रवृत्ति न होनी चाहिये । अतएव मोक्ष सुख और ज्ञान रूप है ।
शंका—यदि मोक्षको सुख और ज्ञानरूप माना जाय, तो मोक्षमें राग भावसे प्रवृत्ति करनेवाले
मुमुक्षुको मोक्षकी प्राप्ति न होनी चाहिये । क्योंकि राग बन्ध करनेवाला है, इसलिये रागी पुरुषोंको मोक्ष
नहीं मिलता । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि सांसारिक सुख हो रागबन्धका हेतु है, क्योंकि यह
सांसारिक सुखरूप राग ही विषय आदिकी प्रवृत्तिमें कारण है । किन्तु मोक्षसुखका अनुराग विषय आदिकी
प्रवृत्तिमें कारण नहीं है, इसलिये वह बन्धनका कारण नहीं । तथा, उत्कृष्ट दशाको प्राप्त हुए आत्माके
इच्छामात्र भी यह राग नहीं रहता । कहा भी है—“उत्तम मुनि मोक्ष और संसार दोनोंमें निस्पृह रहते
हैं ।” अन्यथा रागका सद्भाव होनेपर दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति रूपवैशेषिकोंके मोक्षमें भी दुःखरूप कषायका
उत्पन्न होना सम्भव है । अतएव सम्पूर्ण कर्मोंके क्षयसे उत्पन्न होनेवाला परम सुख और आनन्द स्वरूप ही
मोक्ष मानना युक्तियुक्त है, बुद्धि आदि आत्माके विशेष गुणोंका उच्छेद होना नहीं ।
तथा, हम लोग भी बुद्धि आदिका कथंचित् उच्छेद ही मानते हैं, अतएव हे तपस्वी, आप निराश न
हों । बुद्धिका अर्थ ज्ञान होता है । यह ज्ञान मति, श्रुति, अवधि, मनपर्यय और केवलज्ञानके भेदसे पांच
प्रकारका है । इनमें आदिके चार ज्ञान क्षायोपशमिक ( ज्ञानावरणीय कर्मके एकदेश क्षय और उपशमसे
उत्पन्न होनेवाले ) हैं, इसलिये केवलज्ञानके उत्पन्न होनेके समय नष्ट हो जाते हैं । आगममें कहा है—