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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 458 में से

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पृष्ठ 105

अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५३
गुणानामात्यन्तोच्छेदो मोक्ष इति वचनात् । चशब्दः पूर्वोक्ताभ्युपगमद्वयसमुच्चये । ज्ञानं हि
क्षणिकत्वादित्यं, सुखं च सप्रक्षयतया सातिशयत्या च न विशिष्यते संसारावस्थातः । इति
तदुच्छेदे आत्मस्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इति । प्रयोगश्चात्र-नवानामात्मविशेषगुणानां सन्तानः
अत्यन्तमुच्छिद्यते, सन्तानत्वात्, यो यः सन्तानः स सोऽत्यन्तमुच्छिद्यते, यथा प्रदीपसन्तानः ।
तथा चायम्, तस्मात्तदत्यन्तमुच्छिद्यते इति । तदुच्छेद एव महोदयः, न कृत्स्नकर्मक्षयलक्षण
इति । ‘“न हि वै सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसन्तं प्रियाप्रिये न
स्पृशतः’’१ । इत्यादयोऽपि वेदान्तास्तादृशीमेव मुक्तिमादिशन्ति । अत्र हि प्रियाप्रिये सुखदुःखे,
ते चाशरीरं मुक्तं न स्पृशतः । अपि च-
“यावदात्मगुणाः सर्वे नोच्छिन्ना वासनादयः ।
तावदात्यन्तिकी दुःखव्यावृत्तिर्न विकल्प्यते ॥ १ ॥
धर्माधर्मनिमित्तो हि सम्भवः सुखदुःखयोः ।
मूलभूतौ च तावेव स्तम्भौ संसारसद्मनः ॥ २ ॥
तदुच्छेदे च तत्कार्यशरीराद्यनुपप्लवात् ।
नात्मनः सुखदुःखे स्त इत्यसौ मुक्त उच्यते ॥ ३ ॥
इच्छाद्वेषप्रयत्नाद्दि भोगायतनबन्धनम् ।
उच्छिन्नभोगायतनो नात्मा तैरपि युज्यते ॥ ४ ॥
तदेवं धिषणादीनां नवानामपि मूलतः ।
गुणानामात्मनो ध्वंसः सोऽपवर्गः प्रतिष्ठितः ॥ ५ ॥
ननु तस्यामवस्थायां कीदृगात्मावशिष्यते ।
स्वरूपैकप्रतिष्ठानः परित्यक्तोऽखिलैर्गुणैः ॥ ६ ॥
है । ज्ञान क्षणिक है, इसलिये वह अनित्य है, और सुखमें हानि, वृद्धि होती रहती है, इसलिये सुख संसारकी
अवस्थासे भिन्न नहीं है । अतएव जिस समय अनित्य ज्ञान और अनित्य सुखका उच्छेद हो जाता है, उस
समय आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित होता है, वही मोक्ष है । अनुमान प्रयोगसे यह सिद्ध है—'मोक्षमें बुद्धि
आदि आत्माके नौ विशेष गुणोंका सर्वथा नाश हो जाता है, क्योंकि बुद्धि आदि सन्तान हैं । (अर्थात् आत्माके
नित्य स्वभाव नहीं हैं ) । जो जो सन्तान होते हैं, उनका सर्वथा नाश होता है, जैसे प्रदीपकी सन्तान । बुद्धि
आदि विशेष गुण भी सन्तान हैं, इसलिए उनका भी नाश होता है । बुद्धि आदि गुणोंका अत्यन्त नाश ही
मोक्ष है, सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय होना नहीं ।' वेदान्तियोंने भी इसी प्रकारका मोक्ष माना है । उनका कथन है—
“शरीरधारियोंके सुख-दुखका नाश नहीं होता, तथा अशरीरीको सुख-दुख स्पर्श नहीं करते ।” तथा—
“जब तक वासना आदि आत्माके सम्पूर्ण गुण नष्ट नहीं होते तब तक दुःखकी अत्यन्त व्यावृत्ति नहीं
होती ॥ १ ॥
सुख-दुःख धर्म और अधर्मसे ही सम्भव है, इसलिये धर्म-अधर्म ही संसारके मूल भूत स्तम्भ हैं ॥ २ ॥
धर्म और अधर्मके नाश हो जानेपर धर्म-अधर्मके कार्य शरीर आदिका नाश हो जाता है । उस समय
सुख-दुःख भी नष्ट हो जाते हैं । यही मुक्तावस्था है ॥ ३ ॥
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि शरीरके कारण हैं, अतएव शरीरके उच्छेद होनेपर आत्मा इच्छा, द्वेष,
प्रयत्न आदिसे भी सम्बद्ध नहीं होती ॥ ४ ॥
इसलिये बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार—आत्माके इन नौ गुणोंका
जड़मूलसे नष्ट हो जाना ही मोक्ष है ॥ ५ ॥
१. न हि वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ इति
छान्दोग्य० उ० ८-१२ ।