सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 458 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ४९
तत्र सत्ता द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं कया युक्त्या इति चेद्, उच्यते । न द्रव्यं सत्ता,
द्रव्यादन्येत्यर्थः, एकद्रव्यवत्त्वाद्—एकैकस्मिन् द्रव्ये वर्तमानत्वादित्यर्थः, द्रव्यत्ववत् । यथा
द्रव्यत्वं नवसु द्रव्येषु प्रत्येकं वर्तमानं द्रव्यं न भवति, किन्तु सामान्यविशेषलक्षणं द्रव्यत्वमेव ।
एवं सत्तापि । वैशेषिकाणां हि अद्रव्यं वा द्रव्यम्, अनेकद्रव्यं वा द्रव्यम् १। तत्राद्रव्यं आकाशः
कालो दिग् आत्मा मनः परमाणवः । अनेकद्रव्यं तु द्वयणुकादिस्कन्धाः । एकद्रव्यं तु द्रव्यमेव
न भवति; एकद्रव्यवती च सत्ता । इति द्रव्यलक्षणविलक्षणत्वाद् न द्रव्यम् । एवं न गुणः सत्ता,
गुणेषु भावाद्, गुणत्ववत् । यदि हि सत्ता गुणः स्याद् न तर्हि गुणेषु वर्तते, निर्गुणत्वाद् गुणा-
नाम् । वर्तते च गुणेषु सत्ता । सन् गुण इति प्रतीतेः । तथा न सत्ता कर्म, कर्मसु भावात्,
विशेष रूप है । इसी तरह गुणत्व चौबीस गुणोंमें रहनेसे सामान्य रूप; तथा द्रव्य और कर्ममें न रहनेसे विशेष
रूप है । अतएव गुणत्वकी अपेक्षा रूपत्व आदि, और रूपत्व आदिकी अपेक्षा नीलत्व आदि अपर सामान्य है ।
इसी प्रकार कर्मत्व पाँच कर्मोंमें रहता है, इसलिए सामान्य, तथा द्रव्य और गुणोंमें नहीं रहता, इसलिए विशेष
है, तथा कर्मत्वकी अपेक्षा उत्क्षेपण आदि अपर सामान्य है । ( वैशेषिक लोग सामान्यको पर सामान्य और
अपर सामान्यके भेदसे दो प्रकारका मानते हैं । इनके मतानुसार पर सामान्य केवल द्रव्य, गुण और कर्म तीन
पदार्थोंमें ही रहता है, अन्यत्र नहीं । पर सामान्यको महासामान्य भी कहते हैं । पर सामान्यका विषय अपर
सामान्यसे अधिक है । द्रव्यत्व, गुणत्व आदि अपर सामान्यके विषय हैं; 'पदार्थत्व' ( द्रव्य, गुण आदि पदार्थोंमें
रहनेवाला ) पर सामान्यका विषय कहा जा सकता है । अपर सामान्यको सामान्य-विशेष भी कहते हैं । क्योंकि
यह अपर सामान्य अपने विशेषोंको सामान्यरूपसे ग्रहण करनेके साथ उनकी अन्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति भी करता
है । द्रव्यत्व द्रव्योंमें रहता है, इसलिए सामान्य, तथा गुण और कर्मसे व्यावृत्त होता है, इसलिए विशेष कहा
जाता है । इसीलिए अपर सामान्यको सामान्य-विशेष भी कहा है । )
पूर्वपक्ष—( १ ) सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे भिन्न है ( द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता—वैशेषिक-
सूत्र १—२—४)—सत्ता द्रव्यत्वकी तरह द्रव्यसे भिन्न है, क्योंकि वह प्रत्येक द्रव्यमें रहती है। जैसे द्रव्यत्व
नौ द्रव्योंमें प्रत्येक द्रव्यमें रहता है, इसलिए द्रव्य नहीं कहा जाता, किन्तु सामान्य-विशेषरूप द्रव्यत्व कहा
जाता है, इसी तरह सत्ता भी प्रत्येक द्रव्यमें रहनेके कारण द्रव्य नहीं कही जाती । वैशेषिकोंके मतमें अद्रव्यत्व
अथवा अनेकद्रव्यत्व ही द्रव्यका लक्षण है। आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन और परमाणु अद्रव्यत्व (जो द्रव्योंसे
उत्पन्न नहीं हुआ हो, अथवा द्रव्योंका उत्पादक न हो ) के उदाहरण हैं, क्योंकि न तो आकाश आदि किसी
द्रव्यसे बनाये गये हैं, और न किसी द्रव्यके उत्पादक हैं। तथा द्वयणुकादिस्कंध अनेकद्रव्यत्व ( जो अनेक द्रव्योंसे
उत्पन्न हुए हों, अथवा अनेक द्रव्यों के उत्पादक हों ) के उदाहरण हैं । एक द्रव्यमें रहनेवाला द्रव्य नहीं होता ।
सत्ता एक द्रव्यमें रहती है, इसलिए सत्तामें द्रव्यका लक्षण नहीं घटता, अतएव वह द्रव्य नहीं है । इसी प्रकार
सत्ता गुण भी नहीं है, क्योंकि वह गुणत्वकी तरह गुणोंमें रहती है । यदि सत्ता गुण होती, तो वह गुणोंमें न
रहती, क्योंकि गुणोंमें गुण नहीं रहते । सत्ता गुणोंमें रहती है, और गुण सत् है—ऐसी प्रतीति होती है, इस-
लिए सत्ता गुणोंमें विद्यमान है । इसी तरह सत्ता कर्म भी नहीं है, क्योंकि वह कर्मत्वकी तरह कर्ममें रहती है ।
यदि सत्ता कर्म हो, तो कर्ममें न रहे, क्योंकि कर्ममें कर्म नहीं रहते । सत्ता कर्ममें रहती है । अतएव सत्ताको
पदार्थान्तर ही मानना चाहिए । ( भाव यह है कि वैशेषिक सिद्धान्तके अनुसार सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे
भिन्न पदार्थ है । सत्ताको द्रव्यसे पृथक् बतानेके लिए वैशेषिक लोग 'एकद्रव्यवत्त्व' हेतु देते हैं । उनके मतानु-
सार द्रव्य 'अद्रव्य' और 'अनेकद्रव्य' के भेदसे दो प्रकारका माना गया है । आकाश, काल आदि द्रव्योंसे उत्पन्न
नहीं होते, और न द्रव्योंको उत्पन्न करते हैं, अतएव वे अद्रव्य-द्रव्य हैं । तथा द्वयणुकादि अनेक द्रव्योंसे उत्पन्न
१ द्रव्यं द्विधा । अद्रव्यमनेकद्रव्यं च । न विद्यते द्रव्यं जन्यतया जनकत्या च यस्य तदद्रव्यं द्रव्यम् ।
यथाकाशाकालादि । अनेकं द्रव्यं जन्यतया च जनकत्या च यस्य तदनेकद्रव्यं द्रव्यम् ।
७