सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 458 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

४८ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
वैशेषिकाणां द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाख्याः षट्पदार्थास्तत्त्वतयाभिप्रेताः ।
तत्र “पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशः कालो दिगात्मा मन१” इति नव द्रव्याणि । गुणाश्चतुर्विंशतिः ।
तद्यथा “रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे बुद्धिः सुख-
दुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नश्च”२ इति सूत्रोक्ताः सप्तदश । चशब्दसमुच्चिताश्च सप्त३–द्रवत्वं गुरुत्वं
संस्कारः स्नेहो धर्माधर्मौ शब्दश्च इत्येवं चतुर्विंशतिगुणाः । संस्कारस्य वेगभावनास्थितिस्था-
पकभेदाद् त्रैविध्येऽपि संस्कारत्वजात्यपेक्षया एकत्वात्, शौर्यौदार्यादीनां चात्रैवान्तर्भावाद्
नाधिक्यम् । कर्माणि पञ्च । तद्यथा-उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति४। गमन-
ग्रहणाद् भ्रमणरेचनस्यन्दनाद्यविरोधः ॥
अत्यन्तव्यावृत्तानां पिण्डानां यतः कारणाद् अन्योऽन्यस्वरूपानुगमः प्रतीयते,
तदनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सामान्यम् । तच्च द्विविधं परमपरं च । तत्र परं सत्ता५ भावो महासामान्य-
मिति चोच्यते । द्रव्यत्वाद्यवान्तरसामान्यापेक्षया महाविषयत्वात् । अपरसामान्यं च द्रव्य-
त्वादि । एतच्च सामान्यविशेष इत्यपि व्यपदिश्यते । तथाहि । द्रव्यत्वं नवसु द्रव्येषु वर्तमान-
त्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तत्वाद् विशेषः । ततः कर्मधारये सामान्यविशेष इति ।
एवं द्रव्यत्वाद्यपेक्षया पृथिवीत्वादिकमपरं, तदपेक्षया घटत्वादिकम् । एवं चतुर्विंशतौ गुणेषु
वृत्तेर्गुणत्वं सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तेश्च विशेषः । एवं गुणत्वापेक्षया रूपत्वादिकं,
तदपेक्षया नीलत्वादिकम् । एवं पञ्चसु कर्मसु वर्तनात् कर्मत्वं सामान्यम्, द्रव्यगुणेभ्यो
व्यावृत्तत्वाद् विशेषः । एवं कर्मत्वापेक्षया उत्क्षेपणत्वादिकं ज्ञेयम् ॥
आत्मासे भिन्न है; मोक्ष ज्ञान और आनन्दरूप नहीं है-इस प्रकारकी मान्यताओंको प्रतिपादन करनेवाले
शास्त्र, हे भगवन्, आपकी आज्ञासे बाह्य वैशेषिक लोगोंके रचे हुए हैं।
व्याख्यार्थ-वैशेषिकोंने द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय-इन छह पदार्थोंको तत्त्वरूप-
से स्वीकार किया है । "पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन"-ये नौ द्रव्य हैं।
“रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा,
द्वेष, प्रयत्न,” तथा (च शब्दसे) द्रवत्व, गुरुत्व, संस्कार, स्नेह, धर्म, अधर्म, और शब्द-ये चौबीस गुण हैं । इन
गुणोंमें वेग, भावना, और स्थितिस्थापकसे भेदसे संस्कार तीन प्रकारका है, परन्तु वह संस्कारत्व जातिकी
अपेक्षासे एक ही है; शौर्य, औदार्य आदिका इसीमें अन्तर्भाव हो जाता है। कर्म उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन,
प्रसारण और गमनके भेदसे पाँच प्रकारका है । गमनके साथ भ्रमण, रेचन, स्पन्दन आदिका विरोध नहीं है ।
जिस कारण एक-दूसरेसे अत्यन्त व्यावृत्त पदार्थोंमें से अन्य पदार्थके स्वरूपका उससे भिन्न पदार्थमें
अन्वय प्रतीत होता है, उस कारण जो अनुवृत्तिके अन्वयके ज्ञानका कारण होता है, वह सामान्य है । यह
सामान्य दो प्रकारका है-पर सामान्य और अपर सामान्य । पर सामान्यको सत्ता, भाव अथवा महासामान्य
भी कहते हैं; क्योंकि यह पर सामान्य द्रव्यत्व आदि अपर सामान्यकी अपेक्षा महत् विषयवाला है;
परन्तु पर सामान्य द्रव्य, गुण और कर्म तीनोंमें रहता है । द्रव्यत्व आदि अपर सामान्य है, इसे सामान्य
विशेष भी कहते हैं । जैसे; द्रव्यत्व नौ द्रव्योंमें रहनेसे सामान्य; तथा गुण और कर्ममें न रहनेसे विशेष
कहा जाता है। इससे 'सामान्यं च तद्विशेषश्च' इस प्रकार कर्मधारय समासमें 'जो सामान्य होता है
वही विशेष होता है' ऐसा 'सामान्य विशेषः' इस सामासिक पदका अर्थ है । इस प्रकार द्रव्यत्व आदिकी
अपेक्षा पृथिवीत्व आदि, और पृथिवीत्व आदिकी अपेक्षा घटत्व आदि जो अपर सामान्य है, वह सामान्य
१. वैशेषिकदर्शने १-१-५ । २. वैशेषिकदर्शने १-१-६ । ३. प्रशस्तपादभाष्ये उद्देशप्रकरणे । ९-१० ।
४. ऊर्ध्वदेशसंयोगकारणं कर्मोत्क्षेपणम् । अधोदेशसंयोगकारणं कर्मापक्षेपणम् । वक्रत्वापादकं कर्मा-
कुञ्चनम् । ऋजुत्वापादकं कर्म प्रसारणम् । अनियतदेशसंयोगकारणं कर्म गमनम् । प्रशस्तपादभाष्ये
उद्देशप्रकरणे । ५. 'द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु सत्ता परतयोच्यते' । कारिकावली प्रत्यक्षखण्डे का. ८ ।