स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
स्थास्नूनामेव सतां भावानामुत्पादव्यययुक्तत्वात् इति विरुद्धश्च। इति नाधिकृतानुमानाद्
बुद्ध्यादिगुणोच्छेदरूपा सिद्धिः सिद्धयति ॥
नापि “न हि वै सशरीरस्य” इत्यादेरागमात् । स हि शुभाशुभादृष्टपरिपाकजन्ये
सांसारिकप्रियाप्रिये परस्परानुषक्ते अपेक्ष्य व्यवस्थितः। मुक्तिदशायां तु सकलादृष्टक्षयहेतु-
कम्मैकान्तिकमात्यन्तिकं च केवलं प्रियमेव, तत्कथं प्रतिषिध्यते । आगमस्य चायमर्थः,
‘सशरीरस्य’—गतिचतुष्टयान्यतमस्थानवर्तिन आत्मनः, ‘प्रियाप्रिययोः’—परस्परानुषक्तयोः
सुखदुःखयोः ‘अपहतिः’—अभावो, ‘नास्ती’ति । अवश्यं हि तत्र सुखदुःखाभ्यां भाव्यम् ।
परस्परानुषक्तत्वं च समासकरणादभ्यूह्यते । ‘अशरीरं’—मुक्तात्मानं, ‘वा’शब्दस्यैवकारार्थत्वात्
अशरीरमेव; ‘वसन्तं’—सिद्धिक्षेत्रमध्यासीनं, ‘प्रियाप्रिये’—परस्परानुषक्ते सुखदुःखे, ‘न
स्पृशतः’ ॥
इदमत्र हृदयम् । यथा किल संसारिणः सुखदुःखे परस्परानुषक्ते स्यातां, न तथा
मुक्तात्मनः किन्तु केवलं सुखमेव । दुःखमूलस्य शरीरस्याभावात् । सुखं त्वात्मस्वरूपत्वाद-
वस्थितमेव । स्वस्वरूपावस्थानं हि मोक्षः। अत एव चाशरीरमित्युक्तम् । आगमार्थश्चाय-
मित्थमेव समर्थनीयः । यत एतदर्थानुपातिन्येव स्मृतिरपि दृश्यते—
“सुखमात्यन्तिकं यत्र बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
तं वै मोक्षं विजानीयाद् दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥”
रूपसे ध्रुव रहनेवाले पदार्थोंके ही उत्पाद और व्यय होते हैं । आत्यन्तिक नाशका अभाव होनेपर भी एक
ही पदार्थमें क्रमभावी परिणामोंकी उत्पत्ति होनेसे सन्तानत्व हेतु जैनों द्वारा स्वीकृत पदार्थके साथ अविनाभावी
होनेसे विरुद्ध है । इस प्रकार सन्तानत्व हेतुसे बुद्धि आदिके उच्छेदरूप मोक्षकी सिद्धि नहीं होती ।
तथा, मोक्ष अवस्थामें सुखका अभाव सिद्ध करनेके लिए आप लोगोंने “न हि वै सशरीरस्य सतः
प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति” जो आगमका प्रमाण दिया है, वह भी साध्यकी सिद्धि नहीं करता । क्योंकि यहाँ
जो मोक्षमें प्रिय-अप्रिय ( सुख-दुःख ) का प्रतिषेध किया गया है, वह केवल शुभ-अशुभ अदृष्टके परिणामसे
उत्पन्न, एक दूसरेसे सम्बद्ध, सांसारिक सुख-दुःख की अपेक्षासे ही किया गया है । मुक्तावस्थाका सुख समस्त
पुण्य-पापके क्षयसे उत्पन्न होता है, इसलिए यह सुख ऐकान्तिक ( एकरूप ) और आत्यन्तिक ( नाश न
होनेवाला ) होता है; इस नित्य सुखका प्रतिषेध कैसे किया जा सकता है ? अतएव उक्त आगममें प्रिय-अप्रिय
शब्दोंसे पुण्य-पापसे उत्पन्न होनेवाले सांसारिक सुख-दुःखका ही प्रतिषेध किया गया है, मुक्तावस्थाके अनन्त
और अव्याबाध सुखका नहीं । इसलिये आगमका निम्नप्रकारसे अर्थ करना चाहिये:—‘सशरीरस्य प्रिया-
प्रिययोः अपहतिः नास्ति’—संसारी आत्माके परस्पर अपेक्षित सुख-दुःखका अभाव नहीं होता । ( यहाँ
‘प्रियाप्रिय’ में द्वंद्व समास करनेसे सुख-दुःखको परस्पर अपेक्षित समझना चाहिये ) । ‘अशरीरं वा वसन्तं
प्रियाप्रिये न स्पृशतः’—मुक्तावस्थामें रहनेवाले मुक्तात्माको परस्पर अपेक्षित सुख-दुःखका स्पर्श नहीं होता ।
तात्पर्य यह है कि जैसे संसारी जीवके सुख-दुःख परस्पर अपेक्षित होते हैं, वैसे मुक्त जीवके नहीं
होते । मुक्त जीवोंके केवल सुख ही होता हैं, क्योंकि उनके दुःखके कारण शरीरका अभाव है । तथा मुक्त जीव
अपने आत्मस्वरूपमें स्थित रहते हैं, इसलिये उनके सुख ही होता है । कारण कि अपने स्वरूपमें अवस्थित
होना ही मोक्ष है । इसीलिये मुक्त जीव शरीर रहित हैं । आगमसे इसका समर्थन होता है । स्मृतिने इसका
समर्थन किया है—
“जिस अवस्थामें इन्द्रियोंसे बाह्य केवल बुद्धिसे ग्रहण करने योग्य आत्यन्तिक सुख विद्यमान है, वही
मोक्ष है । पापी आत्माओंके लिये वह दुष्प्राप्य है ।”