स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
३६ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
बहिर्निर्गत्य प्रमेयं परिच्छिनत्तीति । तत्रेदमुत्तरम् । किरणानां गुणत्वमसिद्धम्; तेषां तैजस-
पुद्गलमयत्वेन द्रव्यत्वात् । यश्च तेषां प्रकाशात्मा गुणः स तेभ्यो न जातु पृथग् भवतीति ।
तथा च धर्मसङ्ग्रहिण्यां श्रीहरिभद्राचार्यपादाः—
“किरणा गुणा न दव्वं तेसिं पयासो गुणो न वा दव्वं ।
जं णाणं आयगुणो कहमद्दव्वो स अन्नत्थ ॥ १ ॥
गन्तूण न परिच्छिन्दइ णाणं णेयं तयम्मि देसम्मि ।
आयत्थं चिय नवरं अचिंतसत्तीउ विण्णेयं ॥२॥
लोहोवलस्स सत्ती आयत्था चेव भिन्नदेसंपि ।
लोहं आगरिसंती दीसइ इह कज्जपच्चक्खा ॥३॥
एवमिह नाणसत्ती आयत्था चेव हंदि लोगंतं ।
जइ परिछिंदइ सम्मं को णु विरोहो भवे एत्थं”१ ॥४॥
इत्यादि ॥
चलती है, उसी तरह यहां भी हमने जिनेन्द्रके ज्ञानकी शक्तिको देखकर जिनेन्द्रको ज्ञानकी अपेक्षा सर्वव्यापक
कहा है । तथा ज्ञान प्राप्यकारी नहीं है, क्योंकि वह आत्माका धर्म है, इसलिये ज्ञान आत्मासे बाहर निकल
कर नहीं जा सकता । यदि ज्ञान आत्माके बाहर निकल कर जाने लगे तो आत्माके अचेतनत्वकी आपत्ति खड़ी
हो जानेसे उसके अजीवत्वका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । लेकिन यह संभव नहीं, क्योंकि धर्मीको छोड़कर
केवल धर्म कहीं भी नहीं रहता । तथा वैशेषिक लोगोंने जो सूर्यका दृष्टांत दिया है कि जैसे सूर्यकी किरणें
गुणरूप होकर भी सूर्यसे बाहर जाकर संसारको प्रकाशित करती हैं, उसी तरह ज्ञान आत्माका गुण होकर भी
आत्मासे बाहर जाकर प्रमेय पदार्थको जानता है, यह भी ठीक नहीं । क्योंकि किरणोंका गुणत्व ही असिद्ध
है, कारण कि किरणें तैजस पुद्गलरूप हैं, इसलिये वे द्रव्य हैं । तथा किरणोंका प्रकाशात्मक गुण कभी
किरणोंसे अलग नहीं होता । हरिभद्राचार्यने धर्मसंग्रहिणीमें भी कहा है—
“किरणें द्रव्य हैं, गुण नहीं हैं । किरणोंका प्रकाश गुण है । यह प्रकाशरूप गुण द्रव्यको छोड़कर
अन्यत्र नहीं रहता । इसी तरह ज्ञान आत्माका गुण है, वह आत्माको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाता ॥१॥
जिस देशमें ज्ञेय पदार्थ स्थित है उस प्रदेशमें ज्ञान जाकर ज्ञेयको नहीं जानता, किन्तु आत्मामें रहते
हुए ही दूर देशमें स्थित ज्ञेयको जानता है; आत्माके ज्ञानमें अचिंत्य शक्ति है ॥२॥
जिस प्रकार चुम्बक पत्थरकी शक्ति चुम्बकमें ही रहकर दूर रखे हुए लोहेको अपनी ओर
खींचती है; ॥३॥
इसी प्रकार ज्ञान शक्ति आत्मामें ही रहकर लोकके अंत तक रहनेवाले पदार्थोंको भलीभांति जानती
है, इसमें कोई विरोध नहीं है ॥४॥” इत्यादि ।
१. किरणा गुणा न द्रव्यं तेषां प्रकाशो गुणो न वा द्रव्यं ।
यज्ज्ञानमात्मगुणः कथमद्रव्यः सः अन्यत्र ॥
गत्वा न परिच्छिनत्ति ज्ञानं ज्ञेयं तस्मिन्देशे ।
आत्मस्थमेव नवरं अचिन्त्यशक्त्या तु विज्ञेयम् ॥
लोहोपलस्य शक्तिः आत्मस्थैव भिन्नदेशमपि ।
लोहमाकर्षती दृश्यते इह कार्यप्रत्यक्षा ॥
एवमिह ज्ञानशक्तिः आत्मस्थैव हन्त लोकान्तम् ।
यदि परिच्छिनत्ति सम्यक् को नु विरोधो भवेदत्र ॥
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३७
अथ सर्वगः सर्वज्ञ इति व्याख्यातम् । तत्रापि प्रतिविधीयते । ननु तस्य सार्वज्ञ्यं
केन प्रमाणेन गृहीतम् । प्रत्यक्षेण, परोक्षेण वा ? न तावत् प्रत्यक्षेण, तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षो-
त्पन्नतयातीन्द्रियग्रहणासामर्थ्यात् । नापि परोक्षेण । तद्धि अनुमानं, शाब्दं वा स्यात् ? न
तावदनुमानम्, तस्य लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धस्मरणपूर्वकत्वात् । न च तस्य सर्वज्ञत्वेऽनुमेये
किञ्चिदव्यभिचारी लिङ्गं पश्यामः । तस्यात्यन्तविप्रकृष्टत्वेन तत्प्रतिबद्धलिङ्गसम्बन्धग्रहणा-
भावात् ॥
अथ तस्य सर्वज्ञत्वं विना जगद्वैचित्र्यमनुपपद्यमानं सर्वज्ञत्वमर्थादापादयतीति चेत्
न । अविनाभावाभावात् । न हि जगद्वैचित्री तत्सार्वज्ञ्यं विनान्यथा नोपपन्ना । द्विविधं हि
जगत् स्थावरजङ्गमभेदात् । तत्र जङ्गमानां वैचित्र्यं स्वोपात्तशुभाशुभकर्मपरिपाकवशेनैव ।
स्थावराणां तु सचेतनानामियमेव गतिः । अचेतनानां तु तदुपभोगयोग्यतासाधनत्वेनानादिकाल-
सिद्धमेव वैचित्र्यमिति ॥
नाप्यागमस्तत्साधकः । स हि तत्कृतोऽन्यकृतो वा स्यात् ? तत्कृत एव चेत् तस्य सर्व-
ज्ञतां साधयति तदा तस्य महत्त्वक्षतिः । स्वयमेव स्वगुणोत्कीर्त्तनस्य महतामनधिकृतत्वात् ।
अन्यच्च, तस्य शास्त्रकर्तृत्वमेव न युज्यते । शास्त्रं हि वर्णात्मकम् । ते च तालुवादिव्यापार-
( ३) सर्वज्ञत्व—वैशेषिकोंके ईश्वरका सर्वज्ञत्व प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी प्रमाणसे सिद्ध
नहीं होता । प्रत्यक्ष प्रमाणसे ईश्वरका सर्वज्ञत्व इसलिये सिद्ध नहीं हो सकता कि प्रत्यक्ष इंद्रिय और मनके
संयोगसे उत्पन्न होता है, इसलिये वह अतीन्द्रिय ज्ञानको नहीं जान सकता । परोक्ष ज्ञानसे भी ईश्वरके
सर्वज्ञत्वकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि वह परोक्ष ज्ञान अनुमानसे सर्वज्ञत्वको जानता है, अथवा शब्दसे ? अनु-
मानसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि लिंगी और लिंग (साध्य और हेतु) दोनोंके संबंधके
स्मरणपूर्वक ही अनुमान होता है । (जैसे 'पर्वत अग्निवाला है, धूमवान् होनेसे—' यहाँ पहले धूमरूप
लिंगका ग्रहण होता है और फिर अग्निरूप लिंगीके साथ लिंगके संबंधका स्मरण होता है । इसी तरह
'ईश्वर सर्वज्ञ है, क्योंकि वह अपनी इच्छासे ही संपूर्ण प्राणियोंको सुख-दुःखका अनुभव करानेमें समर्थ है—'
इस अनुमानमें लिंगका ग्रहण और इस लिंगका सर्वज्ञत्वरूप लिंगीके साथ संबंधका स्मरण होना चाहिये ।
परन्तु ऐसा नहीं होता; इसलिये अनुमानसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान नहीं हो सकता ।) तथा ईश्वरके
सर्वज्ञत्वरूप अनुमेयमें हम कोई भी अव्यभिचारी लिंग नहीं देखते, क्योंकि वह ईश्वर अत्यन्त दूर है,
इसलिये ईश्वरसे संबद्ध लिंगका सर्वज्ञत्वरूप लिंगीके साथ संबंधका ग्रहण नहीं हो सकता ।
यदि वादी लोग कहें कि ईश्वरके सर्वज्ञत्वके बिना जगत्की विचित्रता नहीं बन सकती, इस कारण
अर्थापत्तिसे ईश्वरके सर्वज्ञत्वकी सिद्धि होती है, तो यह कथन भी ठीक नहीं । क्योंकि जगत्की विचित्रता
और सर्वज्ञताकी व्याप्तिका अभाव है । जगत्की विचित्रता ईश्वरकी सर्वज्ञताके बिना अन्य प्रकारसे घटित
नहीं होती, ऐसी बात नहीं है । जंगम (त्रस) और स्थावरके भेदसे संसार दो प्रकारका है । जंगम
जीवोंकी विचित्रता स्वयं उपार्जित शुभ और अशुभ कर्मोंके उदयसे ही होती है और स्थावर जीवोंकी यही
दशा होती है । अचेतन पदार्थोंका वैचित्र्य स्थावर और जंगमके उपभोगकी योग्यताके साधन रूपमें अनादि-
कालसे सिद्ध ही है ।
आगमसे भी ईश्वरकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि ईश्वरको सिद्ध करनेवाला आगम ईश्वरका बनाया
हुआ है, या किसी दूसरेका ? यदि वह आगम ईश्वरप्रणीत होकर ही ईश्वरकी सिद्धि करता है तो ईश्वरकी
महान् क्षति होगी । क्योंकि महात्मा लोग स्वयं ही अपने गुणोंकी प्रशंसा नहीं करते हैं । तथा ईश्वरका शास्त्र-
कर्तृत्व ही सिद्ध नहीं होता । क्योंकि शास्त्र वर्णात्मक होता है । ये वर्ण तालु आदिकी क्रियासे उत्पन्न होते
३८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
जन्याः । स च शरीरे एव सम्भवी । शरीराभ्युपगमे च तस्य पूर्वोक्ता एव दोषाः । अन्यकृतञ्चेत्
सोऽन्यः सर्वज्ञोऽसर्वज्ञो वा ? सर्वज्ञत्वे तस्य द्वैतापत्त्या प्रागुक्ततदेकत्वाभ्युपगमबाधः तत्सा-
धकप्रमाणचर्चायामनवस्थापातश्च । असर्वज्ञश्चेत् कस्तस्य वचसि विश्वासः ।
अपरं च भवदभीष्ट आगमः प्रत्युत तत्प्रणेतुरसर्वज्ञत्वमेव साधयति । पूर्वापरविरुद्धार्थ-
वचनोपेतत्वात् । तथाहि "न हिंस्यात् सर्वभूतानि" इति प्रथममुक्त्वा, पश्चात् तत्रैव पठितम्-
“षट्शतानि नियुज्यन्ते पशूनां मध्यमेऽहनि ।
अश्वमेधस्य वचनान्न्यूनानि पशुभिस्त्रिभिः” ॥
तथा “अग्नीषोमीयं पशुमालभेत²”, “सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभेत³” इत्यादि वच-
नानि कथमिव न पूर्वापरविरोधमनुरुध्यन्ते । तथा "नानृतं ब्रूयात्” इत्यादिना अनृतभाषणं
प्रथमं निषिध्य, पश्चात् "ब्राह्मणार्थेऽनृतं ब्रूयात्⁴” इत्यादि । तथा-
“न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले ।
प्राणात्यये सर्वधनापहारे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि⁵” ॥
तथा “परद्रव्याणि लोष्ठवत्” इत्यादिना अदत्तादानमनेकधा निरस्य, पश्चादुक्तम्
“यद्यपि ब्राह्मणो हठेन परकीयमादत्ते छलेन वा तथापि तस्य नादत्तादानम् । यतः सर्वमिदं
ब्राह्मणेभ्यो दत्तम् ब्राह्मणानां तु दौर्बल्याद् वृषलाः परिभुञ्जते । तस्मादपहरन् ब्राह्मणः स्वमादत्ते
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति⁶" इति । तथा "अपुत्रस्य गतिर्नास्ति⁷" इति
लपित्वा,
हैं। यह तालु आदिकी क्रिया शरीर होनेपर ही संभव है। यदि ईश्वरको शरीरी मानोगे तो ईश्वरमें पूर्वोक्त
दोष मानने पड़ेंगे। यदि आप कहें कि ईश्वरको सिद्ध करनेवाला आगम दूसरेका बनाया हुआ है, तो वह
दूसरा पुरुष सर्वज्ञ है, या असर्वज्ञ ? यदि सर्वज्ञ है तो ईश्वरके द्वैतका प्रसंग होनेसे आपने जो पहले ईश्वरको
एक माना है, उसमें बाधा उपस्थित होगी । तथा अन्य पुरुषको सर्वज्ञ माननेपर बहुत-से पुरुषोंके सर्वज्ञ
स्वीकार करनेमें अनवस्था दोष आयेगा । तथा यदि आगमका प्रणेता अन्य पुरुष असर्वज्ञ है, तो उसके
वचनोंमें विश्वास कौन करेगा ?
इसके अतिरिक्त, आप लोगोंका आगम अपने प्रणेताको असर्वज्ञ ही सिद्ध करता है। क्योंकि वह
आगम पूर्वापरविरुद्ध है। जैसे "किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनी चाहिए"- यह कहकर तत्पश्चात्
“अश्वमेध यज्ञके मध्यम दिनमें ५९७ पशुओंका वध किया जाता है,”
तथा “अग्नि और सोम सम्बन्धी पशुका वध करना चाहिये", "प्रजापति सम्बन्धी सत्रह पशुओंको
मारना चाहिए” आदि वचनोंका कथन करना शास्त्रोंके पूर्वापरविरोधको सिद्ध करता है। तथा "असत्य नहीं
बोलना चाहिए" आदि वचनोंसे असत्यका निषेध करके, तत्पश्चात् "ब्राह्मणके लिए असत्य बोलनेमें दोष
नहीं है", तथा-
"हास्यमें, स्त्रियोंके साथ संभोगके समय, विवाहके अवसरपर, प्राणोंका नाश होनेपर और सर्वधनके
हरण होनेके समय असत्य बोलना पाप नहीं है।"
आदि वचनोंका कथन पूर्वापर विरुद्ध है । इसी प्रकार पहले "दूसरेकी सम्पत्ति मिट्टीके ढेलेके
१. छान्दोग्य उ. ८ अ. । २. ऐतरेय ६-३ । ३. तैत्तरीयसंहिता १-४ ।
४. आपस्तंबसूत्रे ।
५. “उद्वाहकाले रतिसम्प्रयोगे प्राणात्यये सर्वधनापहारे ।
विप्रस्य चार्थे ह्यनृतं वदेयुः पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ वसिष्ठधर्मसूत्रे १६-३६ ।
६. मनुस्मृतौ १-१०१ इत्यत्रल्पांशेनैतत्समम् । ७. देवीभागवते ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ३९
“अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ।
दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम्”१॥
इत्यादि । कियन्तो वा दधिमाषभोजनात् कृपणा विवेच्यन्ते । तदेवमागमोऽपि न
तस्य सर्वज्ञतां वक्ति । किञ्च, सर्वज्ञः सन्नसौ चराचरं चेद् विरचयति, तदा जगदुपप्लवकरण-
वैरिणः पश्चादपि कर्त्तव्यनिग्रहान् सुरवैरिणः एतदधिक्षेपकारिणश्चास्मदादीन् किमर्थं सृजति
इति, तन्नायं सर्वज्ञः ।
तथा स्ववशतत्त्वं-स्वातन्त्र्यं । तदपि तस्य न क्षोदक्षमम् । स हि यदि नाम स्वाधीनः
सन् विश्वं विधत्ते, परमकारुणिकश्च त्वया वर्ण्यते, तत् कथं सुखितदुःखिताद्यवस्थाभेदवृन्द-
स्थपुटितं घटयति भुवनम् एकान्तशर्मसंपत्कान्तमेव तु किं न निर्मिमीते ? अथ जन्मान्तरोपा-
र्जिततत्तत्तदीयशुभाशुभकर्मप्रेरितः सन् तथा करोतीति, दत्तस्तर्हि स्ववशतत्त्वाय जलाञ्जलिः२॥
कर्मजन्ये च त्रिभुवनवैचित्ये शिपिविष्ट३हेतुकविष्टप४सृष्टिकल्पनायाः कष्टैकफलत्वात्
अस्मन्मतमेवाङ्गीकृतं प्रेक्षावता । तथा चायातोऽयं “घटकुट्यां प्रभातम्५” इति न्यायः ।
किञ्च, प्राणिनां धर्माधर्मावपेक्षमाणश्चेदयं सृजति, प्राप्तं तर्हि यदयमपेक्षते तन्न करोतीति ।
समान हैं" आदि वचनोंसे चोरीका निषेध करके, “यदि कोई ब्राह्मण हठसे या छलसे दूसरेके द्रव्यको हरण
करता है, तो भी उसे चोरीका दोष नहीं लगता, क्योंकि जगत्की सर्वसंपत्ति ब्राह्मणोंको ही दी गयी है;
ब्राह्मणोंकी दुर्बलतासे शूद्र लोग इस संपत्तिका उपभोग करते हैं । इसलिये यदि ब्राह्मण दूसरेके धनको
छीनता है, तो भी वह अपने ही धनको लेता है, अपने ही का उपभोग करता है, अपना ही पहनता है
और अपना ही देता है" आदि वाक्योंका उल्लेख पूर्वापरविरोधको सूचित करता है । इसीप्रकार “पुत्ररहितकी
गति नहीं होती” कहकर,
हजारों कुमार ब्रह्मचारी ब्राह्मण अपने कुलकी संततिको उत्पन्न न करके स्वर्ग गये हैं ।”
आदि वाक्योंका कथन आगमके पूर्वापरविरोधको स्पष्टरूपसे प्रगट करता है । दही और उड़दके
भोजनसे कितने कृपणोंको सन्तुष्ट किया जाये ? इसलिये आगमसे भी ईश्वरकी सर्वज्ञता सिद्ध नहीं होती ।
और कहाँतक कहा जाये, यदि सर्वज्ञ ईश्वर इस स्थावर-जंगमरूप जगत्को बनाता है, तो वह जगत्में
उपद्रव करनेवाले, जिनका निग्रह करना आवश्यक है ऐसे दानवों को, तथा ईश्वरपर आक्षेप करनेवाले हम
जैसे लोगोंको क्यों बनाता है ? इससे मालूम होता है कि ईश्वर सर्वज्ञ नहीं है ।
( ४ ) स्वतंत्र—तथा स्ववशतत्वका अर्थ है स्वातन्त्र्य । ईश्वर स्वतंत्र भी नहीं है । यदि ईश्वर
स्वाधीन होकर जगत्को रचता है, और वह परम दयालु है, तो वह सर्वथा सुख-सम्पदाओंसे परिपूर्ण जगत्को
न बनाकर सुख-दुःखरूप जगत्का क्यों सर्जन करता है ? यदि कहो कि जीवोंके जन्मान्तरमें उपार्जन किये
हुए शुभ-अशुभ कर्मोंसे प्रेरित ईश्वर जगत्को बनाता है, तो फिर ईश्वरके स्वाधीनत्वका ही लोप हो
जाता है ।
तथा, संसारकी विचित्रताको कर्मजन्य स्वीकार करनेपर सृष्टिको ईश्वरजन्य मानना केवल कष्टरूप
हो है । इससे अच्छा तो आप हमारा ही मत स्वीकार कर लें । तथा हमारे मतको स्वीकार करनेपर आपको
“घटकुट्यां प्रभातम्” न्यायका प्रसंग होगा । ( अर्थात् जैसे कोई मनुष्य महसूली सामानका महसूल न देनेके
विचारसे रास्तेमे आनेवाले चुंगीघरको छोड़कर किसी दूसरे रास्तेसे शहरके भीतर जानेके लिये रातभर इधर-
उधर चक्कर मारकर प्रातःकाल फिरसे उसी चुंगीघरपर जा पहुँचता है ( घटकुट्यां प्रभातम् ), उसी प्रकार
आप लोगोंने ईश्वरको जगत्का नियन्ता सिद्ध करनेमें बहुत कुछ प्रयत्न किया, पर आखिरमें हमारा ही मत
१. आपस्तंबसूत्रे । २. स्ववशतवं नष्टमित्यर्थः । ३. महेश्वरः ४. विश्वं ५. उद्देश्यासिद्धिर्यत्र प्रतीयते
तत्रायं उपयुज्यते । न्यायार्थः—कश्चित् शाकटिको मध्ये मार्गं राजदेयं द्रव्यं दातुमनिच्छन्मार्गान्तरं समासाद-
यति परं रात्रौ भ्रष्टमार्गः प्रभाते राजग्राह्याद्रव्यग्राहिकुटीसविधावेवागच्छति । तेन तदुद्देश्यं न सिध्यतीति ।
न हि कुलालो दण्डादि करोति । एवं कर्मापेक्षश्चेदीश्वरो जगत्कारणं स्यात् तर्हि कर्मणीश्वरत्वम्,
ईश्वरोऽनीश्वरः स्यादिति ॥
तथा नित्यत्वमपि तस्य स्वगृह एव प्रणिगद्यमानं हृद्यम् । स खलु नित्यत्वेनैकरूपः
सन्, त्रिभुवनसर्गस्वभावोऽतत्स्वभावो वा ? प्रथमविधायां जगन्निर्माणात् कदाचिदपि
नोपरमेत । तदुपरमे तत्स्वभावत्वहानिः एवं च सर्गक्रियाया अपर्यवसानाद् एकस्यापि कार्यस्य
न सृष्टिः । घटो हि स्वारम्भक्षणादारभ्य परिसमाप्तेरुपान्त्यक्षणं यावद् निश्चयनयाभिप्रायेण
न घटव्यपदेशमासादयति । जलाहरणाद्यर्थक्रियायामसाधकतमत्वात् ॥
अतत्स्वभावपक्षे तु न जातु जगन्ति सृजेत् तत्स्वभावायोगाद् गगनवत् । अपि च
तस्यैकान्तनित्यस्वरूपत्वे सृष्टिवत् संहारोऽपि न घटते । नानारूपकार्यकरणेऽनित्यत्वापत्तेः। स
हि येनैव स्वभावेन जगन्ति सृजेत् तेनैव तानि संहरेत्, स्वभावान्तरेण वा ? तेनैव चेत् सृष्टि-
संहारयोर्यौगपद्यप्रसङ्गः, स्वभावाभेदात् । एकस्वभावात् कारणादनेकस्वभावकार्योत्पत्तिविरो-
धात् । स्वभावान्तरेण चेद् नित्यत्वहानिः । स्वभावभेद एव हि लक्षणमनित्यतायाः । यथा
पार्थिवशरीरस्याहारपरमाणुसहकृतस्य प्रत्यहमपूर्वापूर्वोत्पादेन स्वभावभेदादनित्यत्वम् । इष्टश्च
स्वीकार करना पड़ा । ) तथा, ईश्वर जीवोंके पुण्य-पापकी अपेक्षा रखता हुआ जगत्को बनाता है तो
वह जिसकी अपेक्षा रखता है उसको नहीं बनाता । जैसे कुम्हार घटके बनानेमें दण्डकी सहायता लेता है,
इसलिये वह दण्डको नहीं बनाता, उसी तरह यदि ईश्वर जगत्के बनानेमें जीवोंके पुण्य-पापकी अपेक्षा
रखता है, तो वह पुण्य-पापकी सृष्टि नहीं करता है, इसलिये यदि ईश्वर जगत्के बनानेमें कर्मोंकी अपेक्षा
रखता है, तो वह कर्मोंके बनानेवाला नहीं कहा जा सकता । अतएव ईश्वर अनीश्वर ( असमर्थ ) है,
स्वतंत्र नहीं ।
( ५ ) नित्यत्व—तथा ईश्वर नित्य भी नहीं है । क्योंकि नित्य होनेसे एकरूपके धारक उस
ईश्वरके त्रिभुवनकी रचना करनेका स्वभाव है, या बिना स्वभावके भी वह त्रिभुवनकी रचना करता है ? यदि
ईश्वरका त्रिभुवनकी रचना करनेका स्वभाव है, तो वह रचनासे कभी विश्राम ही न लेगा। यदि विश्राम
लेगा तो ईश्वरके स्वभावकी हानि होगी । इस प्रकार जगत्की रचनाका कभी अन्त न होगा, और फिर
एक भी कार्यकी रचना न हो सकेगी। क्योंकि वास्तवमें घटकी रचनाके आरंभ होनेके प्रथम क्षणसे लगाकर
घटकी रचनाकी समाप्तिके अंतिम क्षण तक निश्चयनयकी दृष्टिसे घट व्यवहार नहीं होता। कारण कि उत्पद्यमान
घट जल लाना आदि प्रयोजनभूत क्रियाका साधकतम नहीं होता—जबतक घट बन कर तैयार न हो जाय,
उस समय तक घटमें जल लाने आदिकी क्रिया नहीं हो सकती । ( भाव यह है कि यदि ईश्वर नित्य है,
तो उसका जगत् बनानेका स्वभाव भी नित्य होना चाहिये । इसलिये उसे सदा जगत्को बनाते ही
रहना चाहिये । जगत्के इस अविराम निर्माणसे एक भी कार्यकी रचना समाप्त न हो सकेगी । तथा, जब तक
किसी कार्यको रचना समाप्त न हो, उस समय तक हम ईश्वरको स्रष्टा नहीं कह सकते ) ।
यदि ईश्वरका जगत्के रचनेका स्वभाव नहीं है, तो ईश्वर कभी भी जगत्को नहीं बना सकता ।
जैसे आकाशका स्वभाव जगत्को बनानेका नहीं है, वैसे ही ईश्वरका स्वभाव भी जगत्को बनानेका न
रहेगा । तथा, ईश्वरको एकान्त-नित्य माननेपर सृष्टिकी तरह संहार भी न बन सकेगा। क्योंकि यदि
ईश्वर सृष्टि और संहार आदि अनेक कार्योंको करेगा, तो वह अनित्य हो जायगा। तथा, जिस स्वभावसे
ईश्वर सृष्टिकी रचना करता है, उसी स्वभावसे वह सृष्टिका संहार करता है, अथवा दूसरे स्वभावसे ?
यदि ईश्वर उसी स्वभावसे संहार करता है, तो सृष्टि और संहार एककालीन हो जायेंगे, क्योंकि
ईश्वरके स्वभावमें भेद नहीं है । एक स्वभावरूप कारणसे अनेक स्वभावरूप कार्योंकी उत्पत्ति नहीं
हो सकती । यदि कहो कि जिस स्वभावसे ईश्वर सृष्टिको बनाता है, उस स्वभावके अतिरिक्त
भवतां सृष्टिसंहारयोः शम्भो स्वभावभेदः । रजोगुणात्मकतया सृष्टौ, तमोगुणात्मकतया संह-
रणे, सात्त्विकतया च स्थितौ, तस्य व्यापारस्वीकारात् । एवं चावस्थाभेदः, तद्भेदे, चावस्था-
वतोऽपि भेदाद् नित्यत्वक्षतिः ॥
अथास्तु नित्यः, तथापि कथं सततमेव सृष्टौ न चेष्टते । इच्छावशान् चेत्, ननु ता
अपीच्छाः स्वसत्तामात्रनिबन्धनात्मलाभाः सदैव किं न प्रवर्तयन्तीति स एवोपालम्भः । तथा
शम्भोरष्टगुणाधिकरणत्वे, कार्यभेदानुमेयानां तदिच्छानामपि विषमरूपत्वाद् नित्यत्वहानिः
केन वार्यते ॥
किञ्च, प्रेक्षावतां प्रवृत्तिः स्वार्थकरुणाभ्यां व्याप्ता । ततश्चायं जगत्सर्गे व्याप्रियते
स्वार्थात्, कारुण्याद् वा ? न तावत् स्वार्थात् तस्य कृतकृत्यत्वात् । न च कारुण्यात्, परदुःख-
प्रहाणेच्छा हि कारुण्यम् । ततः प्राक् सर्गाज्जीवानामिन्द्रियशरीरविषयानुत्पत्तौ दुःखाभावेन
कस्य प्रहाणेच्छा कारुण्यम् ? सर्गोत्तरकाले तु दुःखिनोऽवलोक्य कारुण्याभ्युपगमे दुरुत्तर-
मितरेतराश्रयम् । कारुण्येन सृष्टिः सृष्ट्या च कारुण्यम् । इति नास्य जगत्कर्तृत्वं कथमपि
सिद्धयति ॥
दूसरे स्वभावसे वह संहार करता है, तो यह माननेमें ईश्वर नित्य नहीं कहा जा सकता । क्योंकि स्वभावका
भेद होना ही अनित्यताका लक्षण है । जिस प्रकार आहारके परमाणुओंसे युक्त पार्थिव शरीरमें प्रतिदिन
नवीन-नवीन उत्पत्ति होनेके कारण स्वभावभेद होता है, इसलिए पार्थिव शरीर अनित्य है, उसी तरह
ईश्वरके स्वभावका भेद माननेपर ईश्वर भी अनित्य होगा । परन्तु आप लोग जगत्की सृष्टि और संहारमें
ईश्वरके स्वभाव-भेदको स्वीकार करते हैं । क्योंकि आपके अनुसार ईश्वर सृष्टिमें रजोगुणरूप, संहारमें
तमोगुणरूप, और स्थितिमें सत्त्वगुणरूप प्रवृत्ति करता है । इस प्रकार अनेक अवस्थाओंके भेद होनेसे ईश्वर
नित्य नहीं कहा जा सकता ।
यदि ईश्वरको नित्य मान भी लिया जाय, तो वह जगतके बनानेमें सदा ही प्रयत्नवान् क्यों नहीं
रहता ? यदि कहो कि अपनी इच्छाके कारण ईश्वर जगत्को बनानेमें सदा ही प्रयत्नवान् नहीं होता तो
अपनी सत्तामात्रसे उत्पन्न हुई इच्छाएँ भी ईश्वरको सदा काल प्रवृत्त क्यों नहीं करतीं ? इस प्रकार पूर्वोक्त
दोष ही आता है । तथा आप लोग ईश्वरमें बुद्धि, इच्छा, प्रयत्न, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और
विभाग-नामके आठ गुणोंको स्वीकार करते हैं । परन्तु कार्य-भेदसे अनुमेय ईश्वरकी इच्छाओंके विषमरूप
होनेसे ईश्वरके नित्यत्वकी हानिको कौन दूर कर सकता है ? (अर्थात् यदि ईश्वर नित्य है, तो उसकी इच्छाएँ
भी सदा समान ही रहनी चाहिए । परन्तु संसारके नाना कार्योंको देखकर अनुमान होता है कि ईश्वरकी
इच्छाएँ भी नाना प्रकारकी (विषम) हैं, और ईश्वरकी इच्छाओंके विषम होनेसे ईश्वरको भी अनित्य
मानना चाहिए ।)
तथा, बुद्धिमान् पुरुषोंकी प्रवृत्ति स्वार्थ (किसी प्रयोजनसे) अथवा करुणाबुद्धिपूर्वक ही होती है ।
यहाँ प्रश्न होता है कि जगत्को सृष्टिमें ईश्वर स्वार्थसे प्रवृत्त होता है अथवा करुणासे ? स्वार्थसे ईश्वरकी
प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वह कृतकृत्य है । यह प्रवृत्ति करुणासे भी सम्भव नहीं, क्योंकि दूसरेके दुःखों-
को दूर करनेकी इच्छाको करुणा कहते हैं । परन्तु ईश्वरके सृष्टि रचनेसे पहले जीवोंके इन्द्रिय, शरीर और
विषयोंका अभाव था, इसलिये जीवोंके दुःख भी नहीं था, फिर किस दुखको दूर करनेकी इच्छासे ईश्वरके
करुणाका भाव उत्पन्न हुआ ? यदि कहो कि सृष्टिके बाद दुखी जीवोंको देखकर ईश्वरके करुणाका भाव
उत्पन्न होता है, तो इतरेतराश्रय नामका दोष आता है । क्योंकि करुणासे जगत्की रचना हुई, और जगत्की
रचनासे करुणा हुई । इस प्रकार ईश्वरके किसी भी तरह जगत्का कर्तृत्व सिद्ध नहीं होता ।
१. बुद्धीच्छाप्रयत्नसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाख्या अष्टौ गुणाः ।
६
४२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
तदेवमेवंविधदोषकलुषिते पुरुषविशेषे यस्तेषां सेवाहेवाकः स खलु केवलं बलवन्मोह-
विडम्बनापरिपाक इति । अत्र च यद्यपि मध्यवर्तिनो नकारस्य “घण्टालालान्यायेन” योज-
नादर्थान्तरमपि स्फुरति यथा इमाः कुहेवाकविडम्बनास्तेषां न स्युर्येषां त्वमनुशासक इति
तथापि सोऽर्थः सहृदयैर्न हृदये धारणीयः, अन्ययोगव्यवच्छेदस्याधिकृतत्वात् ॥ इति
काव्यार्थः ॥ ६ ॥
इस प्रकार अनेक दोषोंसे दूषित पुरुषविशेष ईश्वर को जगत्के कर्ता माननेका आग्रह केवल बलवान्
मोहकी विडम्बनाका ही फल है । 'इमाः कुहेवाकविडम्बनाः स्युस्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम्', यहाँ मध्यवर्ती
नकारका 'घण्टालालान्याय' से ( मध्यमणिन्याय अथवा देहलीदीपकन्याय या घण्टालालान्याय एक ही अर्थको
सूचित करते हैं । जैसे एक ही मणि, अथवा दीपक घरकी देहलीपर रखनेसे दोनों ओरकी वस्तुओंको प्रकाशित
करते हैं; अथवा एक ही घण्टा अपनी दोनों तरफ बजता है, उसी तरह यहाँ भी एक ही 'नकार' का दो तरह-
से अन्वय होता है ) श्लोकका दूसरा अर्थ भी निकलता है कि जिनके आप अनुशासक हैं, उनके कदाग्रहरूप
विडम्बनायें नहीं हैं । परन्तु यह अर्थ विद्वानोंको नहीं लेना चाहिये । क्योंकि यहाँ स्तुतिकारने अन्ययोग-
व्यवच्छेदका अवलम्बन लिया है ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥६॥
भावार्थ—इस श्लोकमें वैशेषिकोंके ईश्वरके स्वरूपका खण्डन किया गया है । वैशेषिकोंके अनुसार
ईश्वर ( १ ) जगत्का कर्ता है, ( २ ) एक है, ( ३ ) सर्वव्यापी है, ( ४ ) स्वतन्त्र है, और ( ५ ) नित्य है ।
( १ ) वैशेषिक—'पृथिवी, पर्वत आदि किसी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योंकि ये कार्य हैं;
जो-जो कार्य होता है, वह किसी बुद्धिमान् कर्ताका बनाया हुआ देखा जाता है, जैसे घर । पृथिवी, पर्वत आदि
भी कार्य हैं, इसलिये ये भी किसी कर्ताके बनाये हुए हैं; जो किसी कर्ताका बनाया हुआ नहीं होता, वह कार्य
भी नहीं होता, जैसे आकाश' । जैन—( क ) उक्त अनुमान प्रत्यक्षसे बाधित है, क्योंकि हमें पृथिवी, पर्वत
आदिका कोई कर्ता दृष्टिगोचर नहीं होता । ( ख ) घटका दृष्टान्त विषम है । क्योंकि घटादि कार्य सशरीर
कर्ताके ही बनाये हुए देखे जाते हैं, तथा ईश्वरको अशरीर कर्ता माना गया है । तथा ईश्वरको सशरीर
माननेमें इतरेतराश्रय आदि अनेक दोष आते हैं ।
( २ ) वैशेषिक—ईश्वर एक है, क्योंकि अनेक ईश्वर होनेसे जगत्में एकरूपता और क्रम नहीं रह
सकता । जैन—उक्त मान्यता एकान्तरूपसे सत्य नहीं है । क्योंकि शहदके छत्ते आदि पदार्थोंको अनेक
मधुमक्खियां तैयार करती हैं, फिर भी छत्तेमें क्रम और एकरूपता देखी जाती है ।
( ३ ) वैशेषिक—ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है । जैन—ईश्वर सर्वव्यापी नहीं हो सकता, क्योंकि
उसके सर्वव्यापी होनेसे प्रमेय पदार्थोंके लिये कोई स्थान न रहेगा । ईश्वरका सर्वज्ञत्व भी किसी प्रमाणसे सिद्ध
नहीं हो सकता । क्योंकि स्वयं सर्वज्ञत्व प्राप्त किये बिना हम प्रत्यक्षसे ईश्वरका साक्षात् ज्ञान नहीं कर सकते ।
अनुमानसे भी हम ईश्वरको नहीं जान सकते, क्योंकि वह बहुत दूर हैं, इसलिए सर्वज्ञत्वसे सम्बद्ध किसी हेतुसे
उसका ग्रहण नहीं हो सकता । 'सर्वज्ञत्वके बिना जगत्की विचित्र रचना नहीं हो सकती'—इस अर्थापत्ति
प्रमाणसे भी सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं होता । क्योंकि जगत्की विचित्रताकी व्याप्ति सर्वज्ञत्वके साथ नहीं है । आगम
प्रमाणसे भी हम सर्वज्ञको नहीं जान सकते, क्योंकि वेद आदि आगम पूर्वापरविरोध आदि दोषोंसे युक्त हैं,
इसलिए आगम विश्वसनीय नहीं है ।
( ४ ) वैशेषिक—ईश्वर स्वतन्त्र है । जैन—यदि ईश्वर स्वतन्त्र है, तो वह दुःखोँसे परिपूर्ण
विश्वकी क्यों रचना करता है ? अन्यथा ईश्वरको क्रूर और निर्दय मानना चाहिये । यदि कहा जाय कि
१. मध्यमणिन्यायः, देहलीदीपकन्यायस्तद्वदेवाय घण्टालालान्याय उपयुज्यते ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ४३
अथ चैतन्यादयो रूपादयश्च धर्मा आत्मादेर्घटादेश्च धर्मिणोऽत्यन्तं व्यतिरिक्ता¹ अपि
समवायसम्बन्धेन² संबद्धाः सन्तो धर्मधर्मिव्यपदेशमश्नुवते तन्मतं दूषयन्नाह—
न धर्मधर्मित्वमतीवभेदे वृत्त्यास्ति चेन्न त्रितयं चकास्ति ।
इहेदमित्यस्ति मतिश्च वृत्तौ न गौणभेदोऽपि च लोकबाधः ॥७॥
धर्मधर्मिणोरतीवभेदे [ अतीवेत्यत्र इवशब्दो वाक्यालंकारे तं च प्रायोऽतिशब्दात्
किं वृत्ते च प्रयुञ्जते शाब्दिकाः, यथा-“आवर्जिता किञ्चिदिव स्तनाभ्याम्³, “उद्वृत्तः क इव
सुखावहः परेषाम्⁴” इत्यादि ] ततश्च धर्मधर्मिणोः अतीवभेदे-एकान्तभिन्नत्वेऽङ्गीक्रियमाणे,
स्वभावहानेर्धर्मधर्मित्वं न स्यात् । अस्य धर्मिण इमे धर्माः, एषां च धर्मानामयमाश्रयभूतो
धर्मी इत्येवं सर्वप्रसिद्धो धर्मधर्मिव्यपदेशो न प्राप्नोति । तयोरत्यन्तभिन्नत्वेऽपि तत्कल्पनायां
पदार्थान्तरधर्मानामपि विवक्षितधर्मधर्मित्वापत्तेः ॥
प्राणियोंके अदृष्टवलसे ही ईश्वर जीवोंको सुख-दुःख देता है, तो फिर कर्म-प्रधान ही सृष्टि माननी चाहिए,
ईश्वरको कर्त्ता माननेकी आवश्यकता नहीं ।
(५) वैशेषिक-ईश्वर नित्य है। जैन-सर्वथा नित्य ईश्वर सतत क्रियाशील है, अथवा
अक्रियाशील ? ईश्वरको सतत क्रियाशील माननेपर कोई कार्य कभी समाप्त ही नहीं हो सकेगा। तथा अक्रिया-
शील माननेपर ईश्वर जगत्का निर्माण नहीं कर सकता ।
'चैतन्य तथा रूप आदि धर्म, आत्मा तथा घट आदि धर्मियोंसे सर्वथा भिन्न हैं, तथा धर्म-धर्मीका
सम्बन्ध समवाय सम्बन्धसे होता हैं'-वैशेषिकोंकी इस मान्यताको सदोष सिद्ध करते हैं—
श्लोकार्थ-धर्म और धर्मीके सर्वथा भिन्न माननेपर 'यह धर्मी है', 'ये इस धर्मीके धर्म हैं' और
'यह धर्म-धर्मीमें सम्बन्ध करानेवाला समवाय है'-इस प्रकार तीन बातोंका अलग-अलग ज्ञान नहीं हो सकता ।
यदि कहो कि समवाय सम्बन्धसे परस्पर भिन्न धर्म और धर्मीका सम्बन्ध होता है, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि
जिस तरह हमें धर्म और धर्मीका ज्ञान होता है, वैसे समवायका ज्ञान नहीं होता । यदि कहो कि एक समवायको
मुख्य मानकर समवायमें समवायत्वको गौणरूपसे स्वीकार करेंगे, तो यह कल्पना मात्र है । तथा इसे माननेमें
लोकविरोध आता है ।
व्याख्यार्थ - 'धर्मधर्मिणोरतीवभेदे' [यहाँ अतीवमें 'इव' शब्द वाक्यके अलंकारमें प्रयुक्त हुआ है,
इसका कोई अर्थ नहीं है । शाब्दिक लोग 'इव' शब्दका 'अति' और 'किम्' शब्दके साथ प्रयोग करते हैं;
जैसे—“आवर्जिता किंचिदिव स्तनाभ्यां'', ''उद्वृत्तः क इव सुखावहः परेषाम्”] धर्म और धर्मीका एकान्त
भेद माननेपर, स्वभावका अभाव हो जाने से धर्मत्व और धर्मित्व नहीं बनता, इसलिये इस धर्मीके ये धर्म
हैं, और इन धर्मोंका आश्रय यह धर्मी है, इस प्रकारका व्यवहार नहीं हो सकता । धर्म-धर्मीको सर्वथा भिन्न
मानकर भी यदि धर्म-धर्मी भावकी कल्पना की जायगी, तो एक पदार्थके धर्म दूसरे पदार्थके धर्म हो जाया
करेंगे । (वैशेषिक लोग द्रव्य (धर्मी) और गुण (धर्म) को सर्वथा भिन्न मानते हैं । उनके अनुसार उत्पन्न
होनेके प्रथम क्षणमें द्रव्य गुणोंसे रहित होता है। जैनदर्शनके अनुसार, धर्म और धर्मीका एकान्त-भेद सम्भव
नहीं है, क्योंकि एकान्त-भेद माननेमें एक पदार्थका धर्म दूसरे पदार्थका धर्म हो जाना चाहिये । जैसे अग्निका
उष्णत्व धर्म अग्निसे और जलका शीतत्व धर्म जलसे सर्वथा भिन्न हो तो अग्निके उष्णत्व धर्मका जलके साथ
और जलके शीतत्व धर्मका अग्निके साथ सम्बन्ध हो जाना चाहिये, क्योंकि धर्म और धर्मी सर्वथा भिन्न हैं।)
१. उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं निष्क्रियं च तिष्ठतीति समयात् गुणानां गुणिनो व्यतिरिक्तत्वम् ।
२. 'अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः संबन्ध इहप्रत्ययेहेतुः स समवायः' इति प्रशस्तपादभाष्ये
समवायप्रकरणे । ३. कुमारसम्भवमहाकाव्ये ३-५४ । ४. शिशुपालवधमहाकाव्ये ।
४४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
एवमुक्ते सति परः प्रत्यवतिष्ठते । वृत्त्यास्तीति-अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानामिह-
प्रत्ययहेतुतः सम्बन्धः समवायः। स च समवयनात् समवाय इति द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषेषु
पञ्चसु पदार्थेषु वर्तनाद् वृत्तिरिति चाख्यायते । तया वृत्त्या समवायसम्बन्धेन, तयोधर्म-
धर्मिणोः इतरेतरविनिर्लुठितत्त्वेऽपि धर्मधर्मिव्यपदेश इष्यते । इति नानन्तरोक्तो दोष इति ।।
अत्राचार्यः समाधत्ते । चेदिति । यद्येवं तव मतिः सा प्रत्यक्षप्रतिक्षिप्ता । यतो न त्रितयं
चकास्ति । अयं धर्मी, इमे चास्य धर्माः, अयं चैतत्सम्वन्धनिबन्धनं समवाय इत्येतत् त्रितयं-
वस्तुत्रयं, न चकास्ति-ज्ञानविषयतया न प्रतिभासते । यथा किल शिलाशकलयुगलस्य मिथोऽनु-
संधायकं रालादिद्रव्यं तस्मात् पृथक् तृतीयतया प्रतिभासते, नैवमत्र समवायस्यापि प्रतिभा-
सनम्, किन्तु द्वयोरेव धर्मधर्मिणोः इति शपथप्रत्यायनीयोऽयं समवाय इति भावार्थः ॥
किञ्च, अयं तेन वादिना एको नित्यः सर्वव्यापकोऽमूर्तश्च परिकल्पते । ततो यथा
घटाश्रिताः पाकजरूपादयो धर्माः समवायसम्बन्धेन घटे समवेतास्तथा किं न पटेऽपि ।
तस्यैकत्वनित्यत्वव्यापकत्वैः सर्वत्र तुल्यत्वात् ।।
यथाकाश एको नित्यो व्यापकोऽमूर्तश्च सन् सर्वैः सम्बन्धिभिर्युगपदविशेषेण सम्बध्यते,
तथा किं नायमपीति । विनश्यदेकवस्तुसमवायाभावे च समस्तवस्तुसमवायाभावः प्रसज्यते ।
तत्तदवच्छेदकभेदाद् नायं दोष इति चेत्, एवमनित्यत्वापत्तिः । प्रतिवस्तुस्वभावभेदादिति ।
वैशेषिक—हम वृत्ति ( समवाय ) से धर्म और धर्मीमें सम्बन्ध मानते हैं । अयुतसिद्ध ( एक दूसरेके
विना न रहनेवाले ) आधार्य ( पट ) और आधार ( तन्तु ) पदार्थोंका इहप्रत्यय हेतु ( इन तन्तुओंमें पट है )
सम्बन्ध 'समवाय' है । समवायसे पदार्थोंमें सम्बन्ध होता है, इसलिये इसे समवाय कहते हैं । यह समवाय
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थोंमें रहता है, इसलिये इसे वृत्ति भी कहते हैं। समवाय
सम्बन्धसे सर्वथा भिन्न धर्म और धर्मीमें धर्म-धर्मीका व्यवहार होता है। (यह समवाय अवयव-अवयवी, गुण-
गुणी, क्रिया-क्रियावान्, जाति-व्यक्ति, नित्यद्रव्य और विशेषमें रहता है ।)
जैन—उक्त मान्यता प्रत्यक्षसे बाधित है । क्योंकि हमें 'यह धर्मी है', 'ये इस धर्मीके धर्म' और 'यह
धर्म-धर्मीमें सम्बन्ध करानेवाला समवाय है'—इस प्रकार तीन पदार्थोंका अलग-अलग ज्ञान नहीं होता । जिस
प्रकार एक पत्थरके दो टुकड़ोंको परस्पर जोड़नेवाले राल आदि पदार्थ पत्थर के दो टुकड़ोंसे अलग दिखाई
देते हैं, उस तरह धर्म और धर्मीका सम्बन्ध करानेवाला समवाय कोई अलग पदार्थ प्रत्यक्षसे दृष्टिगोचर नहीं
होता । हमें केवल धर्म और धर्मीका ही प्रतिभास होता है । इसलिये धर्म-धर्मी सम्बन्ध करानेवाला समवाय
कोई अलग पदार्थ नहीं है ।
तथा, वैशेषिक लोग समवायको एक, नित्य, सर्वव्यापक और अमूर्त स्वीकार करते हैं । इसलिये
घटके अग्निमें पकानेसे उत्पन्न होनेवाले रूप आदि धर्म यदि समवाय सम्बन्धसे घटमें रहते हैं, तो ये रूप
आदि पटमें भी क्यों नहीं रहते ? क्योंकि समवाय एक, नित्य और व्यापक होनेसे सर्वत्र विद्यमान है । अतएव
समवाय-सम्बन्धसे घटमें रहनेवाले धर्म पटमें भी रहने चाहिए; क्योंकि घटधर्म समवाय और पटधर्म समवाय
दोनों ही एक, नित्य, व्यापक और अमूर्त हैं ।
जैसे एक, नित्य, व्यापक और अमूर्त आकाश एक ही साथ सब सम्बन्धियोंसे समानरूपसे सम्बद्ध होता
है, उसी तरह समवाय भी सब सम्बन्धियोंसे समानरूपसे ही क्यों सम्बद्ध नहीं होता ? तथा, घटके नष्ट होने-
पर घटके समवायका अभाव हो जाता है, इसलिए समवायका ही सर्वथा अभाव मानना चाहिए । क्योंकि
समवाय एक है, इसलिए घटके नष्ट होनेसे नष्ट होनेवाले घट-समवायका फिर कभी सद्भाव ही नहीं होगा ।
यदि वैशेषिक लोग कहें कि समवाय वास्तवमें एक ही है, लेकिन वह घटत्वावच्छेदक-समवाय, पटत्वावच्छेदक-
समवाय आदि भिन्न-भिन्न अवच्छेदकोंके भेदसे घट, पट आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें रहता है, इसलिए घट-
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ४५
अथ कथं समवायस्य न ज्ञाने प्रतिभासनम् यतस्तस्येहेतिप्रत्ययः सावधानं साधनम् ।
इह प्रत्ययाश्चानुभवसिद्ध एव । इह तन्तुषु पटः, इहात्मनि ज्ञानम्, इह घटे रूपादय इति
प्रतीतेरुपलम्भात् । अस्य च प्रत्ययस्य केवलधर्मधर्म्यनालम्बनत्वादस्ति समवायाख्यं पदार्था-
न्तरं तद्धेतुरिति पराशङ्कामभिसन्धाय पुनराह । 'इहेदमित्यस्ति मतिश्च वृत्ताविति ।' इहेद-
मिति-इहेदमिति आश्रयाश्रयिभावहेतुक इहप्रत्ययो वृत्तावप्यस्ति-समवायसंबन्धेऽपि विद्यते ।
चशब्दोऽपिशब्दार्थः । तस्य च व्यवहितः सम्बन्धस्तथैव च व्याख्यातम् ॥
इदमत्र हृदयम् । यथा तन्मते पृथिवीत्वाभिसंबन्धात् पृथिवी, तत्र पृथिवीत्वं पृथिव्या
एव स्वरूपमस्तित्वाख्यं नापरं वस्त्वन्तरम् । तेन स्वरूपेणैव समं योऽसावभिसम्बन्धः पृथिव्याः
स एव समवाय इत्युच्यते । “प्राप्तानामेव प्राप्तिः समवायः” इति वचनात् । एवं समवाय-
त्वाभिसम्बन्धात् समवाय इत्यपि किं न कल्प्यते । यतस्तस्यापि यत् समवायत्वं स्वस्वरूपं,
तेन सार्धं सम्बन्धोऽस्त्येव । अन्यथा निःस्वभावत्वात् शशविषाणवद्वस्तुत्वमेव भवेत् ।
ततश्च इह समवाये समवायत्वमित्युल्लेखेन इहप्रत्ययः समवायेऽपि युक्त्या घटत एव । ततो
यथा पृथिव्यां पृथिवीत्वं समवायेन समवेतं, एवं समवायेऽपि समवायत्वं समवायान्तरेण
सम्बन्धनीयम्, तदप्यपरेण, इत्येवं दुस्तरानवस्थामहानदी ॥
एवं समवायस्यापि समवायत्वाभिसम्बन्धे युक्त्या उपपादिते साहसिक्यमालम्ब्य पुनः
पूर्वपक्षवादी वदति । ननु पृथिव्यादीनां पृथिवीत्वाद्यभिसम्बन्धनिबन्धनं समवायो मुख्यः ।
त्वावच्छेदक-समवायके नाश होनेसे पटत्वावच्छेदक-समवायका नाश नहीं होता, यह भी ठीक नहीं। क्योंकि
इस तरह प्रत्येक वस्तुके साथ समवायके स्वभावका भेद होनेसे समवाय अनित्य ठहरेगा ।
वैशेषिक—आप कैसे कह सकते हैं कि समवायका ज्ञान नहीं होता ? 'इहप्रत्य' ( इन तन्तुओंमें पट
है ) समवायके ज्ञान करानेमें प्रबल साधन है 'इन तन्तुओंमें पट है,' 'इस आत्मामें ज्ञान है,' 'इस घटमें रूप
आदि हैं'—यह 'इहप्रत्यय' अनुभवसे सिद्ध है। यह 'इहप्रत्यय' केवल धर्म और धर्मीके आधारसे नहीं होता,
इस कारण धर्म-धर्मीसे भिन्न 'इहप्रत्यय'का हेतु समवाय अवश्य मानना चाहिए । इस प्रकार दूसरोंकी शंकाको
लक्ष्य करके यहाँ फिरसे कहा गया है—'यहाँ यह है, इस प्रकारकी बुद्धि समवायमें होती है।' 'यहाँ यह
है'—इस प्रकारके आश्रयाश्रियभावके कारण व्यक्त होनेवाला इहप्रत्यय समवायमें भी होता है । 'च' शब्द-
का अर्थ 'अपि' है । इसका सम्बन्ध व्यवहित है ।
जैन—धर्म ( आश्रयी ) और धर्मी ( आश्रय ) में 'इहप्रत्यय' हेतु समवाय सम्बन्ध ठीक नहीं बनता ।
क्योंकि धर्म और धर्मीका हेतु 'इहप्रत्यय' समवाय सम्बन्धमें भी रहता है । वैशेषिकोंके मतमें पृथिवीत्वके
सम्बन्धसे पृथिवीका ज्ञान होता है, तथा पृथिवीत्व ही पृथिवीका अस्तित्व नामक स्वभाव है । इसी
पृथिवीत्वके साथ पृथिवीके सम्बन्धको समवाय कहते हैं । कहा भी है—"प्राप्त पदार्थोंकी प्राप्ति ही
समवाय है।" इसी तरह वैशेषिक लोग समवायत्वके सम्बन्धसे ही समवाय क्यों नहीं मानते ? क्योंकि सम-
वायत्व समवायका स्वभाव है, और समवायका समवायत्वके साथ सम्बन्ध है । अन्यथा यदि समवायत्वको
समवायका स्वभाव नहीं मानोगे, तो समवायको स्वाभावरहित मानना होगा, और स्वाभावरहित होनेसे खर-
गोशके सींगकी तरह समवाय अवस्तु ठहरेगा । इसलिए 'समवायमें समवायत्व हैं'—यह 'इहप्रत्यय' समवायमें
भी युक्तिसे सिद्ध होता है । अतएव जिस प्रकार पृथिवीमें पृथिवीत्व समवाय सम्बन्धसे है, वैसे ही समवायमें
समवायत्व दूसरे समवायसे, दूसरेमें तीसरेसे—इस प्रकार एक समवायकी सिद्धिमें अनन्त समवाय माननेसे
अनवस्था दोष आता है ।
इस प्रकार समवायका भी समवायत्वके साथ होने वाले सम्बन्धकी युक्तिसे सिद्धि की जानेपर साहसका
अवलम्बन करके पूर्वपक्षवादी ( वैशिषिक ) पुनः कहता है : समवाय मुख्य और गौणके भेदसे दो प्रकारका है ।
पृथिवीमें पृथिवीत्व मुख्य-समवाय सम्बन्धसे रहता है। इस मुख्य-समवायका ज्ञान 'त्व', 'तल' आदि प्रत्ययोंसे
४६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
तत्र त्वतलादिप्रत्ययाभिव्यङ्ग्यस्य सङ्गृहीतसकलावान्तरजातिलक्षणव्यक्तिभेदस्य सामान्य-
स्योद्गवात् । इह तु समवायस्यैकत्वेन व्यक्तिभेदाभावे जातेरनुद्भूतत्वाद् गौणोऽयं युष्मत्परि-
कल्पित इहेतिप्रत्ययसाध्यः समवायत्वाभिसम्बन्धः तत्साध्यश्च समवाय इति ॥
तदेतद् न विपश्चिच्चमत्कारकारणम् । यतोऽत्रापि जातिरुद्भवन्ती केन निरुध्यते । व्यक्ते-
रभेदेनेति' चेत् । न । तत्तदवच्छेदकवशात् तत्तद्भेदोपपत्तौ व्यक्तिभेदकल्पनाया दुर्वारत्वात् ।
अन्यो घटसमवायोऽन्यश्च पटसमवाय इति व्यक्त एव समवायस्यापि व्यक्तिभेद इति, तत्सिद्धौ
सिद्ध एव जात्युद्भवः । तस्मादन्यत्रापि मुख्य एव समवायः इहप्रत्ययस्योभयत्राप्यव्यभिचारात् ॥
तदेतत्सकलं सपूर्वपक्षं समाधानं मनसि निधाय सिद्धान्तवादी प्राह । न गौणभेद इति ।
गौण इति योऽयं भेदः स नास्ति । गौणलक्षणाभावात् । तल्लक्षणं चेत्थमाचक्षते—
“ अव्यभिचारी मुख्योऽविकलोऽसाधारणोऽन्तरङ्गश्च ।
विपरीतो गौणोऽर्थः सति मुख्ये धीः कथं गौणे ” ॥
तस्माद् धर्मधर्मिणोः सम्बन्धेन मुख्यः समवायः, समवाये च समवायत्वाभिसम्बन्धे गौण
इत्ययं भेदो नानात्वं नास्तीति भावार्थः ॥
किञ्च, योऽयमिह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययात् समवायसाधनमनोरथः स खल्वनुहरते
नपुंसकादपत्यप्रसवमनोरथम् । इह तन्तुषु पट इत्यादिर्व्यवहारस्यालौकिकत्वात् । पांशुलपादा-
होता है, और यह समवाय पृथिवी आदिकी सम्पूर्ण अवान्तर जातिरूप व्यक्तिभेदको सामान्यसे ग्रहण करता
है। परन्तु समवायत्वमें समवाय एक है, इसलिए उसमें व्यक्तियोंके भेदका अभाव है, अतएव वह सामान्यका
उत्पादक नहीं। अतएव आप लोगोंने जो कहा था कि 'इन समवायियोंमें समवाय रहते हैं, क्योंकि इन
समवायियोंमें समवाय हैं ऐसा ज्ञान होता है'—सो यह गौण समवाय है।
जैन—यह मान्यता ठीक नहीं। क्योंकि जिस प्रकार आप लोग पृथिवीमें मुख्य समवायसे रहनेवाले
पृथिवीत्वको सामान्य ( जाति ) का ग्राहक मानते हैं, उसी प्रकार समवायमें रहनेवाले समवायत्वको भी सामा-
न्यका ग्राहक क्यों नहीं मानते ? यदि आप लोग कहें कि यहाँ व्यक्तिका भेद नहीं है—अर्थात् समवाय एक ही है,
इस कारण समवायमें जातिका अभाव है—तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि यहाँ भी अमुक अवच्छेदकोंसे यह घट-
समवाय है, यह पट-समवाय है, इस प्रकार समवायके भी व्यक्तिभेद सिद्ध हैं। क्योंकि घटत्वावच्छेदकसे होने-
वाला घटसमवाय पटत्वावच्छेदकसे होनेवाले पटसमवायसे भिन्न है। इसलिए समवायमें भी व्यक्तिका भेद सिद्ध
होता है। अतएव जिस प्रकार पृथिवीमें पृथिवीत्व मुख्य-समवाय सम्बन्धसे रहता है, उसी तरह समवायमें
समवायत्व भी मुख्य-समवाय सम्बन्धसे मानना चाहिए, क्योंकि इहप्रत्ययकी दोनों जगह समानता है।
तथा, वैशेषिकोंद्वारा समवायमें गौणरूपसे स्वीकृत समवायत्व भी नहीं बन सकता। क्योंकि यहाँ गौण-
का लक्षण ही ठीक नहीं बैठता, कारण कि,
“व्यभिचारी, विकल, साधारण और वहिरंग अर्थको गौण कहते हैं। मुख्य अर्थके रहनेपर गौण बुद्धि
नहीं हो सकती।”
समवायमें समवायत्व माननेमें मुख्य अर्थ मौजूद है, इसलिए समवायका गौणरूप नहीं बन सकता।
अतएव धर्म और धर्मीका सम्बन्ध मुख्य-समवायसे होता है, तथा समवाय और समवायत्वका सम्बन्ध गौण-सम-
वाय है—समवायका यह मुख्य और गौण भेद मानना ठीक नहीं हैं।
तथा 'इन तन्तुओंमें पट हैं'—इस प्रत्ययसे समवायकी सिद्धि करना नपुंसकसे पुत्र उत्पन्न करनेकी इच्छा-
के समान है। क्योंकि 'इन तन्तुओंमें पट हैं' यह व्यवहार लोकसे बाधित है, कारण कि साधारणसे साधारण
१. व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं संकरोऽथानवस्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥—
इति किरणावल्यामुदयनाचार्यकृतायाम् ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ६ ] स्याद्वादमञ्जरी ४७
नामपि इह पटे तन्तव इत्येव प्रतीतिदर्शनात् । इह भूतले घटाभाव इत्यत्रापि समवायप्रसङ्गात् ।
अत एवाह 'अपि च लोकबाध' इति । अपि चेति — दूषणाभ्युच्चये, लोकः — प्रामाणिकलोकः,
सामान्यलोको वा; तेन बाधो — विरोधः; लोकबाधः । तदप्रतीतव्यवहारसाधनात् बाधशब्दस्य
“ईहाद्याः प्रत्ययभेदतः'” इति पुंस्त्रीलिङ्गता । तस्माद्धर्मधर्मिणोरविष्वग्भावलक्षण एव सम्बन्धः
प्रतिपत्तव्यो नान्यः समवायादिः ॥ इति काव्यार्थः ॥ ७ ॥
अथ सत्ताभिधानं पदार्थान्तरम्, आत्मनश्च व्यतिरिक्तं ज्ञानाख्यं गुणम्, आत्मविशेष-
गुणोच्छेदस्वरूपां च मुक्तिम्, अज्ञानादङ्गीकृतवतः परानुपहसन्नाह--
सतामपि स्यात् क्वचिदेव सत्ता चैतन्यमौपाधिकमात्मनोऽन्यत् ।
न संविदानन्दमयी च मुक्तिः सुसूत्रमासूत्रितमत्वदीयैः ॥८॥
पुरुषको भी 'इन तन्तुओंमें पट है' यह प्रतीति न होकर 'इस पटमें तन्तु हैं' ऐसी प्रतीति होती है । अन्यथा इस
भूतलमें घटाका अभाव है, यहाँ भी समवाय मानना चाहिए क्योंकि यहाँ भी इहप्रत्यय होता है । इसीलिए
ग्रन्थकारने कहा है 'अपि च लोकबाधः'—यह अप्रतीत व्यवहार साधारण लोगोंके भी अनुभवके विरुद्ध है [ बाध
शब्द 'ईहाद्याः प्रत्ययभेदतः' इस सूत्रसे पुलिंग और स्त्रीलिंग दोनोंमें प्रयुक्त होता है ] । इसलिए धर्म और
धर्मीमें तादात्म्य सम्बन्ध ही स्वीकार करना चाहिए, समवाय सम्बन्ध नहीं ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥ ७ ॥
भावार्थ—इस श्लोकमें वैशेषिकोंके समवाय पदार्थका खण्डन किया गया है । वैशेषिकोंकी मान्यता
है कि धर्म और धर्मी सर्वथा भिन्न हैं । इन दोनों भिन्न पदार्थोंका सम्बन्ध समवायसे होता है। जैनोंका कथन
है कि जिस प्रकार दो पत्थरके टुकड़ोंको जोड़नेवाले लाख आदि पदार्थका हमें प्रत्यक्षसे ज्ञान होता है, वैसे
धर्म और धर्मीका सम्बन्ध करानेवाले समवाय सम्बन्धको हम प्रत्यक्षसे नहीं जानते, इसलिए समवायको धर्म-
धर्मीसे पृथक् तीसरा पदार्थ मानना प्रत्यक्षसे बाधित है । इसके अतिरिक्त, वैशेषिक लोग समवायको एक, नित्य
और सर्वव्यापक मानते हैं, अतएव एक पदार्थमें समवायके नष्ट हो जानेपर संसारके समस्त पदार्थोंमें रहनेवाला
समवाय नष्ट हो जाना चाहिए । क्योंकि समवाय एक और सर्वव्यापक है । तथा, वैशेषिक लोग इहप्रत्यय
( इन तन्तुओंमें पट है ) से समवाय सम्बन्धका ज्ञान करते हैं, परन्तु जैसे पटमें पटत्व समवाय सम्बन्धसे
स्वीकार करते हैं, वैसे ही वे लोग समवायमें भी समवायत्व दूसरे समवायसे और दूसरेमें तीसरे समवायसे,
क्यों नहीं मानते ? तथा समवायमें समवायान्तर माननेसे अनवस्था दोष आता है ।
यदि वैशेषिक लोग पृथिवी आदिके अनेक होनेसे पृथिवीमें पृथिवीत्व मुख्य-समवायसे, तथा समवायके
एक होनेसे समवायमें समवायत्व गौण-समवायसे मानकर मुख्य और गौणके भेदसे समवाय सम्बन्ध
स्वीकार करते हैं, तो यह भो कल्पना मात्र है । क्योंकि समवाय-बहुत्व भी अनुभवसे सिद्ध है । कारण कि
घट और घटरूपका समवाय पट और पटरूपके समवायसे भिन्न है । तथा इहप्रत्यय हेतु समवाय माननेसे लोक-
बाधा भी आती है । क्योंकि जनसाधारण को 'इन तन्तुओंमें पट हैं' यह प्रतीति न होकर 'इस पटमें तन्तु हैं'-
यही ज्ञान होता है । अतएव धर्म-धर्मीमें समवाय सम्बन्ध मानना ठीक नहीं, इसलिए धर्म और धर्मीमें अत्यन्त
भेद मानना भी युक्तियुक्त नहीं है ।
( १ ) सत्ता भिन्न पदार्थ है, ( २ ) आत्मासे ज्ञान भिन्न है, ( ३ ) आत्माके विशेष गुणोंका नष्ट हो
जाना मोक्ष है—इन मान्यताओंको अज्ञानसे स्वीकार करनेवाले वादियोंका उपहास करते हुए कहते हैं—
श्लोकार्थ—सत् पदार्थोंमें भी सब पदार्थोंमें सत्ता नहीं रहती; ज्ञान उपाधिजन्य है, इसलिए ज्ञान
१. हैमलिङ्गानुशासने पुंस्त्रीलिंगप्रकरणे श्लोक ५.
४८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
वैशेषिकाणां द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाख्याः षट्पदार्थास्तत्त्वतयाभिप्रेताः ।
तत्र “पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशः कालो दिगात्मा मन१” इति नव द्रव्याणि । गुणाश्चतुर्विंशतिः ।
तद्यथा “रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे बुद्धिः सुख-
दुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नश्च”२ इति सूत्रोक्ताः सप्तदश । चशब्दसमुच्चिताश्च सप्त३–द्रवत्वं गुरुत्वं
संस्कारः स्नेहो धर्माधर्मौ शब्दश्च इत्येवं चतुर्विंशतिगुणाः । संस्कारस्य वेगभावनास्थितिस्था-
पकभेदाद् त्रैविध्येऽपि संस्कारत्वजात्यपेक्षया एकत्वात्, शौर्यौदार्यादीनां चात्रैवान्तर्भावाद्
नाधिक्यम् । कर्माणि पञ्च । तद्यथा-उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति४। गमन-
ग्रहणाद् भ्रमणरेचनस्यन्दनाद्यविरोधः ॥
अत्यन्तव्यावृत्तानां पिण्डानां यतः कारणाद् अन्योऽन्यस्वरूपानुगमः प्रतीयते,
तदनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सामान्यम् । तच्च द्विविधं परमपरं च । तत्र परं सत्ता५ भावो महासामान्य-
मिति चोच्यते । द्रव्यत्वाद्यवान्तरसामान्यापेक्षया महाविषयत्वात् । अपरसामान्यं च द्रव्य-
त्वादि । एतच्च सामान्यविशेष इत्यपि व्यपदिश्यते । तथाहि । द्रव्यत्वं नवसु द्रव्येषु वर्तमान-
त्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तत्वाद् विशेषः । ततः कर्मधारये सामान्यविशेष इति ।
एवं द्रव्यत्वाद्यपेक्षया पृथिवीत्वादिकमपरं, तदपेक्षया घटत्वादिकम् । एवं चतुर्विंशतौ गुणेषु
वृत्तेर्गुणत्वं सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तेश्च विशेषः । एवं गुणत्वापेक्षया रूपत्वादिकं,
तदपेक्षया नीलत्वादिकम् । एवं पञ्चसु कर्मसु वर्तनात् कर्मत्वं सामान्यम्, द्रव्यगुणेभ्यो
व्यावृत्तत्वाद् विशेषः । एवं कर्मत्वापेक्षया उत्क्षेपणत्वादिकं ज्ञेयम् ॥
आत्मासे भिन्न है; मोक्ष ज्ञान और आनन्दरूप नहीं है-इस प्रकारकी मान्यताओंको प्रतिपादन करनेवाले
शास्त्र, हे भगवन्, आपकी आज्ञासे बाह्य वैशेषिक लोगोंके रचे हुए हैं।
व्याख्यार्थ-वैशेषिकोंने द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय-इन छह पदार्थोंको तत्त्वरूप-
से स्वीकार किया है । "पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन"-ये नौ द्रव्य हैं।
“रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा,
द्वेष, प्रयत्न,” तथा (च शब्दसे) द्रवत्व, गुरुत्व, संस्कार, स्नेह, धर्म, अधर्म, और शब्द-ये चौबीस गुण हैं । इन
गुणोंमें वेग, भावना, और स्थितिस्थापकसे भेदसे संस्कार तीन प्रकारका है, परन्तु वह संस्कारत्व जातिकी
अपेक्षासे एक ही है; शौर्य, औदार्य आदिका इसीमें अन्तर्भाव हो जाता है। कर्म उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन,
प्रसारण और गमनके भेदसे पाँच प्रकारका है । गमनके साथ भ्रमण, रेचन, स्पन्दन आदिका विरोध नहीं है ।
जिस कारण एक-दूसरेसे अत्यन्त व्यावृत्त पदार्थोंमें से अन्य पदार्थके स्वरूपका उससे भिन्न पदार्थमें
अन्वय प्रतीत होता है, उस कारण जो अनुवृत्तिके अन्वयके ज्ञानका कारण होता है, वह सामान्य है । यह
सामान्य दो प्रकारका है-पर सामान्य और अपर सामान्य । पर सामान्यको सत्ता, भाव अथवा महासामान्य
भी कहते हैं; क्योंकि यह पर सामान्य द्रव्यत्व आदि अपर सामान्यकी अपेक्षा महत् विषयवाला है;
परन्तु पर सामान्य द्रव्य, गुण और कर्म तीनोंमें रहता है । द्रव्यत्व आदि अपर सामान्य है, इसे सामान्य
विशेष भी कहते हैं । जैसे; द्रव्यत्व नौ द्रव्योंमें रहनेसे सामान्य; तथा गुण और कर्ममें न रहनेसे विशेष
कहा जाता है। इससे 'सामान्यं च तद्विशेषश्च' इस प्रकार कर्मधारय समासमें 'जो सामान्य होता है
वही विशेष होता है' ऐसा 'सामान्य विशेषः' इस सामासिक पदका अर्थ है । इस प्रकार द्रव्यत्व आदिकी
अपेक्षा पृथिवीत्व आदि, और पृथिवीत्व आदिकी अपेक्षा घटत्व आदि जो अपर सामान्य है, वह सामान्य
१. वैशेषिकदर्शने १-१-५ । २. वैशेषिकदर्शने १-१-६ । ३. प्रशस्तपादभाष्ये उद्देशप्रकरणे । ९-१० ।
४. ऊर्ध्वदेशसंयोगकारणं कर्मोत्क्षेपणम् । अधोदेशसंयोगकारणं कर्मापक्षेपणम् । वक्रत्वापादकं कर्मा-
कुञ्चनम् । ऋजुत्वापादकं कर्म प्रसारणम् । अनियतदेशसंयोगकारणं कर्म गमनम् । प्रशस्तपादभाष्ये
उद्देशप्रकरणे । ५. 'द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु सत्ता परतयोच्यते' । कारिकावली प्रत्यक्षखण्डे का. ८ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ४९
तत्र सत्ता द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं कया युक्त्या इति चेद्, उच्यते । न द्रव्यं सत्ता,
द्रव्यादन्येत्यर्थः, एकद्रव्यवत्त्वाद्—एकैकस्मिन् द्रव्ये वर्तमानत्वादित्यर्थः, द्रव्यत्ववत् । यथा
द्रव्यत्वं नवसु द्रव्येषु प्रत्येकं वर्तमानं द्रव्यं न भवति, किन्तु सामान्यविशेषलक्षणं द्रव्यत्वमेव ।
एवं सत्तापि । वैशेषिकाणां हि अद्रव्यं वा द्रव्यम्, अनेकद्रव्यं वा द्रव्यम् १। तत्राद्रव्यं आकाशः
कालो दिग् आत्मा मनः परमाणवः । अनेकद्रव्यं तु द्वयणुकादिस्कन्धाः । एकद्रव्यं तु द्रव्यमेव
न भवति; एकद्रव्यवती च सत्ता । इति द्रव्यलक्षणविलक्षणत्वाद् न द्रव्यम् । एवं न गुणः सत्ता,
गुणेषु भावाद्, गुणत्ववत् । यदि हि सत्ता गुणः स्याद् न तर्हि गुणेषु वर्तते, निर्गुणत्वाद् गुणा-
नाम् । वर्तते च गुणेषु सत्ता । सन् गुण इति प्रतीतेः । तथा न सत्ता कर्म, कर्मसु भावात्,
विशेष रूप है । इसी तरह गुणत्व चौबीस गुणोंमें रहनेसे सामान्य रूप; तथा द्रव्य और कर्ममें न रहनेसे विशेष
रूप है । अतएव गुणत्वकी अपेक्षा रूपत्व आदि, और रूपत्व आदिकी अपेक्षा नीलत्व आदि अपर सामान्य है ।
इसी प्रकार कर्मत्व पाँच कर्मोंमें रहता है, इसलिए सामान्य, तथा द्रव्य और गुणोंमें नहीं रहता, इसलिए विशेष
है, तथा कर्मत्वकी अपेक्षा उत्क्षेपण आदि अपर सामान्य है । ( वैशेषिक लोग सामान्यको पर सामान्य और
अपर सामान्यके भेदसे दो प्रकारका मानते हैं । इनके मतानुसार पर सामान्य केवल द्रव्य, गुण और कर्म तीन
पदार्थोंमें ही रहता है, अन्यत्र नहीं । पर सामान्यको महासामान्य भी कहते हैं । पर सामान्यका विषय अपर
सामान्यसे अधिक है । द्रव्यत्व, गुणत्व आदि अपर सामान्यके विषय हैं; 'पदार्थत्व' ( द्रव्य, गुण आदि पदार्थोंमें
रहनेवाला ) पर सामान्यका विषय कहा जा सकता है । अपर सामान्यको सामान्य-विशेष भी कहते हैं । क्योंकि
यह अपर सामान्य अपने विशेषोंको सामान्यरूपसे ग्रहण करनेके साथ उनकी अन्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति भी करता
है । द्रव्यत्व द्रव्योंमें रहता है, इसलिए सामान्य, तथा गुण और कर्मसे व्यावृत्त होता है, इसलिए विशेष कहा
जाता है । इसीलिए अपर सामान्यको सामान्य-विशेष भी कहा है । )
पूर्वपक्ष—( १ ) सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे भिन्न है ( द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता—वैशेषिक-
सूत्र १—२—४)—सत्ता द्रव्यत्वकी तरह द्रव्यसे भिन्न है, क्योंकि वह प्रत्येक द्रव्यमें रहती है। जैसे द्रव्यत्व
नौ द्रव्योंमें प्रत्येक द्रव्यमें रहता है, इसलिए द्रव्य नहीं कहा जाता, किन्तु सामान्य-विशेषरूप द्रव्यत्व कहा
जाता है, इसी तरह सत्ता भी प्रत्येक द्रव्यमें रहनेके कारण द्रव्य नहीं कही जाती । वैशेषिकोंके मतमें अद्रव्यत्व
अथवा अनेकद्रव्यत्व ही द्रव्यका लक्षण है। आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन और परमाणु अद्रव्यत्व (जो द्रव्योंसे
उत्पन्न नहीं हुआ हो, अथवा द्रव्योंका उत्पादक न हो ) के उदाहरण हैं, क्योंकि न तो आकाश आदि किसी
द्रव्यसे बनाये गये हैं, और न किसी द्रव्यके उत्पादक हैं। तथा द्वयणुकादिस्कंध अनेकद्रव्यत्व ( जो अनेक द्रव्योंसे
उत्पन्न हुए हों, अथवा अनेक द्रव्यों के उत्पादक हों ) के उदाहरण हैं । एक द्रव्यमें रहनेवाला द्रव्य नहीं होता ।
सत्ता एक द्रव्यमें रहती है, इसलिए सत्तामें द्रव्यका लक्षण नहीं घटता, अतएव वह द्रव्य नहीं है । इसी प्रकार
सत्ता गुण भी नहीं है, क्योंकि वह गुणत्वकी तरह गुणोंमें रहती है । यदि सत्ता गुण होती, तो वह गुणोंमें न
रहती, क्योंकि गुणोंमें गुण नहीं रहते । सत्ता गुणोंमें रहती है, और गुण सत् है—ऐसी प्रतीति होती है, इस-
लिए सत्ता गुणोंमें विद्यमान है । इसी तरह सत्ता कर्म भी नहीं है, क्योंकि वह कर्मत्वकी तरह कर्ममें रहती है ।
यदि सत्ता कर्म हो, तो कर्ममें न रहे, क्योंकि कर्ममें कर्म नहीं रहते । सत्ता कर्ममें रहती है । अतएव सत्ताको
पदार्थान्तर ही मानना चाहिए । ( भाव यह है कि वैशेषिक सिद्धान्तके अनुसार सत्ता द्रव्य, गुण और कर्मसे
भिन्न पदार्थ है । सत्ताको द्रव्यसे पृथक् बतानेके लिए वैशेषिक लोग 'एकद्रव्यवत्त्व' हेतु देते हैं । उनके मतानु-
सार द्रव्य 'अद्रव्य' और 'अनेकद्रव्य' के भेदसे दो प्रकारका माना गया है । आकाश, काल आदि द्रव्योंसे उत्पन्न
नहीं होते, और न द्रव्योंको उत्पन्न करते हैं, अतएव वे अद्रव्य-द्रव्य हैं । तथा द्वयणुकादि अनेक द्रव्योंसे उत्पन्न
१ द्रव्यं द्विधा । अद्रव्यमनेकद्रव्यं च । न विद्यते द्रव्यं जन्यतया जनकत्या च यस्य तदद्रव्यं द्रव्यम् ।
यथाकाशाकालादि । अनेकं द्रव्यं जन्यतया च जनकत्या च यस्य तदनेकद्रव्यं द्रव्यम् ।
७
५० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
कर्मत्ववत् । यदि च सत्ता कर्म स्याद् न तर्हि कर्मसु वर्तेत, निष्कर्मत्वात् कर्मणाम् । वर्तते च
कर्मसु भावः; सत् कर्मेति प्रतीतेः । तस्मात् पदार्थान्तरं सत्ता ॥
तथा विशेषा नित्यद्रव्यवृत्तयः अन्त्याः १—अत्यन्तव्यावृत्तिहेतवः, ते द्रव्यादिवैलक्षण्यात्
पदार्थान्तरम् । तथा च प्रशस्तकारः— “अन्तेषु भवा अन्त्याः; स्वाश्रयविशेषकत्वाद् विशेषाः ।
विनाशाऽरम्भरहितेषु नित्यद्रव्येष्वण्वाकाशकालादिगात्ममनस्सु प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्तमाना
अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतवः । यथास्मदादीनां गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्याकृतिगुणक्रियावयवोप-
चयावयवविशेषसंयोगनिमित्ता प्रत्ययव्यावृत्तिर्दृष्टा । गौः शुक्लः शीघ्रगतिः पीनः ककुद्मान्
महाघण्ट इति; तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां नित्येषु तुल्याकृतिगुणक्रियेषु परमाणुषु, मुक्तात्ममन-
स्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः प्रत्याधारं विलक्षणोऽयं विलक्षणोऽयमिति
प्रत्ययव्यावृत्तिः देशकालविप्रकृष्टे च परमाणौ स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं च भवति, तेऽन्त्या
विशेषाः” २ इति । अमी च विशेषरूपा एव न तु द्रव्यत्वादिवत् सामान्यविशेषोभयरूपाः,
व्यावृत्तेरेव हेतुत्वात् ॥
तथा अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानामिहप्रत्ययहेतुः सम्बन्धः समवाय इति । अयुत-
सिद्धयोः परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयानाश्रितयोराश्रयाश्रयिभावः इह तन्तुषु पटः इत्यादेः
प्रत्ययस्यासाधारणं कारणं समवायः । यद्वशात् स्वकारणसामर्थ्यादुपजायमानं पटाद्याधार्यं
तन्त्वाद्याधारे सम्बद्ध्यते, यथा छिदिक्रिया छेद्येनेति सोऽपि द्रव्यादिलक्षणवैधर्म्यात् पदार्था-
न्तरम् । इति षट् पदार्थाः ॥
होते हैं, और अनेक द्रव्योंको उत्पन्न करनेवाले हैं, इसलिए वे अनेकद्रव्य-द्रव्य हैं । सत्ता न 'अद्रव्य' है और न
'अनेकद्रव्य'; वह द्रव्यत्वकी तरह प्रत्येक पदार्थमें रहनेवाली है, इसलिए सत्ताका द्रव्यमें अन्तर्भाव नहीं हो
सकता । इसी प्रकार सत्ता गुण और कर्म भी नहीं है, क्योंकि वह गुणत्व और कर्मत्वकी तरह क्रमसे प्रत्येक
गुण और कर्ममें रहती है । अतएव सत्ता द्रव्य, गुण और कर्म तीनोंसे भिन्न है । )
तथा, नित्य द्रव्योंमें रहनेवाले अत्यन्त व्यावृत्ति रूप 'विशेष' भी द्रव्यादिसे विलक्षण होनेके कारण
पदार्थान्तर हैं । प्रशस्तकारने कहा है “अन्तमें होनेके कारण ये अन्त्य हैं, और अपने आश्रयके नियामक हैं,
इसलिये विशेष हैं । ये विशेष आदि और अन्त रहित अणु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन—इन
नित्य द्रव्योंमें रहते हैं, और अत्यन्त व्यावृत्ति रूप ज्ञानके कारण हैं । जैसे गौ और घोड़े आदिमें तुल्य आकृति,
गुण, क्रिया, अवयवोंकी वृद्धि, अवयवोंका संयोग देखकर यह गौ सफेद है, शीघ्र चलनेवाली है, मोटी है,
कुब्बेवाली है, महान् घण्टेवाली है आदि रूपसे व्यावृत्तिप्रत्यय ( विशेषज्ञान ) होता है; वैसे ही हमसे विशिष्ट
योगी लोगों को नित्य, तुल्य आकृति, गुण और क्रियायुक्त परमाणुओं में, तथा मुक्त आत्मा और मनमें जिन
निमित्तोंके कारण पदार्थोंकी विलक्षणताका ज्ञान होता है, तथा देश और कालकी दूरी होनेपर भी यह वही
परमाणु है, यह प्रत्यभिज्ञान होता है, वे विशेष हैं ।” ये विशेष विशेष रूप ही हैं, द्रव्यत्व आदिकी तरह
सामान्य-विशेष रूप नहीं हैं, क्योंकि ये केवल व्यावृत्तिप्रत्ययके ही हेतु हैं । ( भाव यह है कि विशेष सजातीय
और विजातीय पदार्थोंके व्यवच्छेद करनेवाले अत्यन्त व्यावृत्ति रूप होते हैं । दो पदार्थोंमें तुल्य आकृति, गुण,
क्रिया आदि देखकर उनमें से अन्य पदार्थोंको अलग करके एक पदार्थको जानना विशेष है । ये विशेष विशेष
रूप होते हैं, सामान्य-विशेष रूप नहीं । )
अयुतसिद्ध आधार्य, और आधार पदार्थोंका इहप्रत्यय हेतु समवाय सम्बन्ध है । एक दूसरेको छोड़-
कर भिन्न आश्रयोंमें न रहनेवाले गुण, गुणी आदि अयुतसिद्धोंके 'इन तन्तुओंमें पट है' इत्यादि ज्ञानका
असाधारण कारण समवाय है । जैसे छेदन क्रियाका छेद्य ( छेदने योग्य ) के साथ सम्बन्ध है, वैसे ही जिसके
१ अन्तेऽवसाने वर्तन्त इत्यन्त्या यदपेक्षया विशेषो नास्तीत्यर्थः । एकमात्रवृत्तय इति भावः ।
२ विशेषप्रकरणे प्रशस्तपादभाष्ये पृ० १६८ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५१
साम्प्रतमक्षरार्थो व्याक्रियते । सतामपीत्यादि । सतामपि—सद्बुद्धिवेद्यतया साधारणा-
नामपि, षण्णां पदार्थानां मध्ये क्वचिदेव केषुचिदेव पदार्थेषु सत्ता—सामान्ययोगः, स्याद्—
भवेत्, न सर्वेषु । तेषामेषा वाचोयुक्तिः सदिति । यतो “द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता” इति वचनाद्
यत्रैव सत्प्रत्ययस्तत्रैव सत्ता । सत्प्रत्ययश्च द्रव्यगुणकर्मस्वेव, अतस्तेष्वेव, सत्तायोगः । सामा-
न्यादिपदार्थत्रये तु न, तदभावात् । इदमुक्तं भवति । यद्यपि वस्तुस्वरूपं अस्तित्वं सामान्यादि-
त्रयेऽपि विद्यते तथापि तदनुवृत्तिप्रत्ययहेतुर्न भवति । य एव चानुवृत्तिप्रत्ययः स एव सदिति-
प्रत्यय इति, तदभावाद् न सत्तायोगस्तत्र । द्रव्यादीनां पुनस्त्रयाणां षट्पदार्थसाधारणं वस्तु-
स्वरूपम् अस्तित्वमपि विद्यते । अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सत्तासम्बन्धोऽप्यस्ति । निः
Here is the complete, line-by-line transcription of the text shown in the image:
५२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
इति। ततः स्थितमेतत्सतार्मपि स्यात् क्वचिदेव सत्तेति ॥
तथा, चैतन्यमित्यादि । चैतन्यं-ज्ञानम्, आत्मनः-क्षेत्रज्ञाद्, अन्यद्-अत्यन्तव्यति-
रिक्तम्, असमासकरणादत्यन्तमिति लभ्यते । अत्यन्तभेदे सति कथमात्मनः सम्बन्धि ज्ञान-
मिति. व्यपदेशः, इति पराशङ्कापरिहारार्थं औपाधिकमिति विशेषणद्वारेण हेत्वभिधानम् ।
उपाधेरागतमौपाधिकम्-समवायसम्बन्धलक्षणेनोपाधिना आत्मनि समवेतम्, आत्मनः स्वयं
जडरूपत्वात् समवायसम्बन्धोपढौकितमिति यावत्। यद्यात्मनो ज्ञानादव्यतिरिक्तत्वमिष्यते,
तदा दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये¹ तदनन्तराभावाद् बुद्ध्यादीनां नवा-
नामात्मविशेषगुणानामुच्छेदावसर आत्मनोऽप्युच्छेदः स्यात्, तदव्यतिरिक्तत्वात् । अतो
भिन्नमेवात्मनो ज्ञानं यौक्तिकमिति ॥
तथा न संविदित्यादि । मुक्तिः-मोक्षः, न संविदानन्दमयी-न ज्ञानसुखस्वरूपा ।
संविद्-ज्ञानं, आनन्दः-सौख्यम्, ततो द्वन्द्वः, संविदानन्दौ प्रकृतौ यस्यां सा संविदानन्दमयी।
एतादृशी न भवति बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काररूपाणां नवानामात्मनो वैशेषिक-
रहता, क्योंकि आकाश एक व्यक्ति रूप है। (२) घटत्व और कलशत्व में भी सामान्य नहीं रहता, क्योंकि
घटत्व और कलशत्व दोनों एक ही पदार्थमें रहते हैं (तुल्यत्व )। (३) भूतत्व और मूर्तत्वमें भी सामान्य
नहीं रहता, क्योंकि इसमें संकर दोष आता है। अर्थात् भूतत्व केवल आकाशमें और मूर्तत्व केवल मनमें रहता
है; लेकिन पृथिवी, अप्, तेज और वायुमें भूतत्व और मूर्तत्व दोनों रहते हैं, इसलिए संकर दोष आनेसे भूतत्व
और मूर्तत्वमें भी सामान्य नहीं रहता। (४) अनवस्था दोष आनेसे सामान्य में भी सामान्य नहीं रहता ।
(५) विशेष में भी सामान्य नहीं है, क्योंकि विशेषमें सामान्य माननेसे विशेषके स्वरूपकी हानि होती है ।
(६) समवायमें भी सामान्य नहीं रहता, क्योंकि समवाय एक है, समवायमें समवायत्वका सम्बन्ध करनेवाला
दूसरा समवाय नहीं है ।)
अतएव सिद्ध है कि सत् पदार्थोंमें भी सबमें सत्ता नहीं रहती ।
(२) ज्ञान आत्मासे अत्यन्त भिन्न है । समास न करनेसे 'अत्यन्त' अर्थ प्राप्त होता है। 'ज्ञान के
आत्मासे सर्वथा भिन्न होनेपर, ज्ञान और आत्माका सम्बन्ध कैसे रहता है ?' जैनों की इस शंकाका परिहार
करनेके लिए 'औपाधिक' विशेषण-द्वारा हेतुका प्रतिपादन किया गया है। जो उपाधिसे प्राप्त होता है, वह औप-
धिक है। समवाय सम्बन्ध रूप उपाधि के कारण आत्मामें जो सम्बन्धको प्राप्त होता है वह औपाधिक है; अर्थात्
ज्ञान आत्मासे सर्वथा भिन्न होनेपर भी समवाय सम्बन्धसे आत्मासे सम्बद्ध है। ज्ञान आत्माका गुण नहीं है,
वह उससे सर्वथा भिन्न है । आत्मा स्वयं जड़ है, इसलिए ज्ञान आत्मामें समवाय सम्बन्धसे रहता है। यदि
आत्मा और ज्ञानको एक ही माना जाय, तो दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञानके नाश होनेपर आत्मा
के विशेषगुण बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार का उच्छेद होनेसे आत्माका भी
अभाव हो जाना चाहिए, क्योंकि जैनमतमें आत्मा इन गुणोंसे भिन्न नहीं है। अतएव आत्मा और ज्ञानका
भिन्न मानना ही युक्तियुक्त है।
(३) मोक्ष ज्ञान और आनन्द रूप नहीं है, क्योंकि आत्माके गुण बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष,
प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार-आत्माके इन नौ विशेष गुणोंका अत्यंत उच्छेद हो जाना ही मुक्ति है, ऐसा कहा
आकाशे भूतत्वस्यैव मनसि च मूर्तत्वस्यैव सद्भावेऽपि पृथिव्यादिचतुष्टय उभयोः सद्भावात् संकरप्रसंगः ।
(४) जातेरपि जात्यन्तरांगीकारेऽनवस्थाप्रसंगः । (५) अन्त्यविशेषता न जातिः । तदंगीकारे तत्स्वरूपव्या-
वृत्तिहानिः स्यात् । (६) समवायत्वं न जातिः । सम्बन्धाभावात् । इत्येते जातिबाधकाः ॥
१. तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानापाये रागद्वेषमोहाख्या दोषा अपयान्ति, दोषापाये वाङ्मनःकायव्यापाररूपायाः
शुभाशुभफलायाः प्रवृत्तेरपायः । प्रवृत्त्यपाये जन्मापायः । जन्मापाये एकविंशतिभेदस्य दुःखस्यापायः ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५३
गुणानामात्यन्तोच्छेदो मोक्ष इति वचनात् । चशब्दः पूर्वोक्ताभ्युपगमद्वयसमुच्चये । ज्ञानं हि
क्षणिकत्वादित्यं, सुखं च सप्रक्षयतया सातिशयत्या च न विशिष्यते संसारावस्थातः । इति
तदुच्छेदे आत्मस्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इति । प्रयोगश्चात्र-नवानामात्मविशेषगुणानां सन्तानः
अत्यन्तमुच्छिद्यते, सन्तानत्वात्, यो यः सन्तानः स सोऽत्यन्तमुच्छिद्यते, यथा प्रदीपसन्तानः ।
तथा चायम्, तस्मात्तदत्यन्तमुच्छिद्यते इति । तदुच्छेद एव महोदयः, न कृत्स्नकर्मक्षयलक्षण
इति । ‘“न हि वै सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसन्तं प्रियाप्रिये न
स्पृशतः’’१ । इत्यादयोऽपि वेदान्तास्तादृशीमेव मुक्तिमादिशन्ति । अत्र हि प्रियाप्रिये सुखदुःखे,
ते चाशरीरं मुक्तं न स्पृशतः । अपि च-
“यावदात्मगुणाः सर्वे नोच्छिन्ना वासनादयः ।
तावदात्यन्तिकी दुःखव्यावृत्तिर्न विकल्प्यते ॥ १ ॥
धर्माधर्मनिमित्तो हि सम्भवः सुखदुःखयोः ।
मूलभूतौ च तावेव स्तम्भौ संसारसद्मनः ॥ २ ॥
तदुच्छेदे च तत्कार्यशरीराद्यनुपप्लवात् ।
नात्मनः सुखदुःखे स्त इत्यसौ मुक्त उच्यते ॥ ३ ॥
इच्छाद्वेषप्रयत्नाद्दि भोगायतनबन्धनम् ।
उच्छिन्नभोगायतनो नात्मा तैरपि युज्यते ॥ ४ ॥
तदेवं धिषणादीनां नवानामपि मूलतः ।
गुणानामात्मनो ध्वंसः सोऽपवर्गः प्रतिष्ठितः ॥ ५ ॥
ननु तस्यामवस्थायां कीदृगात्मावशिष्यते ।
स्वरूपैकप्रतिष्ठानः परित्यक्तोऽखिलैर्गुणैः ॥ ६ ॥
है । ज्ञान क्षणिक है, इसलिये वह अनित्य है, और सुखमें हानि, वृद्धि होती रहती है, इसलिये सुख संसारकी
अवस्थासे भिन्न नहीं है । अतएव जिस समय अनित्य ज्ञान और अनित्य सुखका उच्छेद हो जाता है, उस
समय आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित होता है, वही मोक्ष है । अनुमान प्रयोगसे यह सिद्ध है—'मोक्षमें बुद्धि
आदि आत्माके नौ विशेष गुणोंका सर्वथा नाश हो जाता है, क्योंकि बुद्धि आदि सन्तान हैं । (अर्थात् आत्माके
नित्य स्वभाव नहीं हैं ) । जो जो सन्तान होते हैं, उनका सर्वथा नाश होता है, जैसे प्रदीपकी सन्तान । बुद्धि
आदि विशेष गुण भी सन्तान हैं, इसलिए उनका भी नाश होता है । बुद्धि आदि गुणोंका अत्यन्त नाश ही
मोक्ष है, सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय होना नहीं ।' वेदान्तियोंने भी इसी प्रकारका मोक्ष माना है । उनका कथन है—
“शरीरधारियोंके सुख-दुखका नाश नहीं होता, तथा अशरीरीको सुख-दुख स्पर्श नहीं करते ।” तथा—
“जब तक वासना आदि आत्माके सम्पूर्ण गुण नष्ट नहीं होते तब तक दुःखकी अत्यन्त व्यावृत्ति नहीं
होती ॥ १ ॥
सुख-दुःख धर्म और अधर्मसे ही सम्भव है, इसलिये धर्म-अधर्म ही संसारके मूल भूत स्तम्भ हैं ॥ २ ॥
धर्म और अधर्मके नाश हो जानेपर धर्म-अधर्मके कार्य शरीर आदिका नाश हो जाता है । उस समय
सुख-दुःख भी नष्ट हो जाते हैं । यही मुक्तावस्था है ॥ ३ ॥
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि शरीरके कारण हैं, अतएव शरीरके उच्छेद होनेपर आत्मा इच्छा, द्वेष,
प्रयत्न आदिसे भी सम्बद्ध नहीं होती ॥ ४ ॥
इसलिये बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार—आत्माके इन नौ गुणोंका
जड़मूलसे नष्ट हो जाना ही मोक्ष है ॥ ५ ॥
१. न हि वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ इति
छान्दोग्य० उ० ८-१२ ।
५४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ८
ऊर्मिषट्कातिगं रूपं तदस्याहुर्मनीषिणः
संसारबन्धनाधीनदुःखशोकाद्यदूषितम् ॥ ७॥
-कामक्रोधलोभगर्वदम्भहर्षाः ऊर्मिषट्कमिति ।”
तदेतदभ्युपगमत्रयमित्थं समर्थयद्भिः अत्वदीयैः-त्वदाज्ञाबहिर्भूतैः कणादमतानुगा-
मिभिः, सुसूत्रमासूत्रितम्-सम्यगागमः प्रपञ्चितः। अथवा सुसूत्रमिति क्रियाविशेषणम् ।
शोभनं सूत्रं वस्तुव्यवस्थाघटनाविज्ञानं यत्रैवमासूत्रितं-तत्तच्छास्त्रार्थोपनिबन्धः कृतः, इति
हृदयम् । “सूत्रं तु सूचनाकारि ग्रन्थे तन्तुन्यवस्थयोः२।” इत्यनेकार्थवचनात् । अत्र च सुसूत्र-
मिति विपरीतलक्षणयोपहासगर्भं प्रशंसावचनम् । यथा-“उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते सुजनता
प्रथिता भवता चिरम्३ ।” इत्यादि । उपहसनीयता च युक्तिरिक्तत्वात् तदङ्गीकरणम् । तथाहि ।
अविशेषेण सद्बुद्धिवेद्येष्वपि सर्वपदार्थेषु द्रव्यादिष्वेव त्रिषु सत्तासम्बन्धः स्वीक्रियते, न
सामान्यादित्रये इति महतीयं पश्यतोहरता४ । यतः परिभाव्यतां सत्ताशब्दार्थः । अस्तीति सन्
सतो भावः सत्ता अस्तित्वं तद्वस्तुस्वरूपं । तच्च निर्विशेषमशेषेष्वपि पदार्थेषु त्वयाप्युक्तम्५ ।
तत्किमिदमर्द्धजरतीयं६ यद् द्रव्यादित्रय एव सत्तायोगो, नेतरत्र त्रये इति ॥
अनुवृत्तिप्रत्ययाभावाद् न सामान्यादित्रये सत्तायोग इति चेत्, न । तत्राप्यनुवृत्ति-
प्रत्ययस्यानिवार्यत्वात् । पृथिवीत्वगोत्वघटत्वादिसामान्येषु सामान्यं सामान्यमिति; विशे-
षेष्वपि बहुत्वाद् अयमपि विशेषोऽयमपि विशेष इति; समवाये च प्रागुक्तयुक्त्या तत्तदवच्छे-
दकभेदाद् एकाकारप्रतीतेरनुभवात् ॥
मोक्षावस्था में आत्मा सम्पूर्ण गुणोंसे रहित होकर अपने ही स्वरूपमें अवस्थित रहता है ॥ ६ ॥
मुक्त जीव संसारके बन्धन दुःख, शोक आदिसे मुक्त होता हुआ काम, क्रोध, लोभ, गर्व, दम्भ और
हर्ष (अथवा क्षुधा, पिपासा, शोक, मूढ़ता, जरा और मृत्यु) इन छह ऊर्मियोंसे निर्लिप्त रहता है ॥ ७ ॥”
उत्तरपक्ष—(१) इस प्रकार आपकी आज्ञासे बाह्य कणाद मतानुयायी वैशेषिक लोग उपर्युक्त
सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करते हैं ('सुसूत्र' शब्द यहाँ पर कटाक्षसूचक है, जैसे “उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते
सुजनता प्रथिता भवता चिरम् । विदधदीदृशमेव सदा सखे सुखितमास्व ततः शरदां शतम् ॥” इस श्लोकमें
कटाक्ष किया गया है) । सब पदार्थोंके सत् बुद्धिसे ज्ञेय होने पर भी वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण और कर्ममें,
ही सत्ता-सम्बन्ध स्वीकार करते हैं, सामान्य, विशेष और समवायमें नहीं-यह उनका महान् साहस है । क्योंकि
सत् (अस्तित्व) के भावको सत्ता कहते हैं, यह अस्तित्व वस्तुका स्वरूप है । अस्तित्वको आप लोगोंने भी
सम्पूर्ण पदार्थोंमें स्वीकृत किया है, फिर आप लोग द्रव्य, गुण और कर्ममें ही सत्ता मानते हैं, और सामान्य
विशेष और समवायमें नहीं, इसका क्या कारण है? यह ऐसी ही बात है जैसे कोई स्त्री आधी वृद्धा हो
और आधी युवती ।
शंका—सामान्य आदिमें अनुवृत्तिप्रत्यय (सामान्य ज्ञान) नहीं होता, इसलिये इनमें सत्ता सम्बन्ध
नहीं है । समाधान—सामान्य, विशेष और समवायमें अनुवृत्तिप्रत्यय अवश्य होता है । क्योंकि पृथिवीत्व,
गोत्व, घटत्व आदि सामान्योंमें 'यह सामान्य है;' विशेषोंमें 'यह विशेष है,' 'वह विशेष है;' और समवायमें
१. जयन्तविरचितन्यायमञ्जर्यां पृ० ५०८। ऊर्मिषट्कं तत्र—
प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे लोभमोहौ च चेतसः ।
शीतातपौ शरीरस्य षडूर्मीरहितः शिवः ॥
२. हेमचन्द्रकृतेनेकार्थसंग्रहे २-४५८ ।
३. “विदधदीदृशमेव सदा सखे सुखितमास्व ततः शरदां शतम्” इत्युत्तरार्धम् ।
४ पश्यतोहरता चौर्यम् ।
५. ‘षण्णां पदार्थानां साधर्म्यमस्तित्वं ज्ञेयत्वमभिधेयत्वं च’ इति प्रशस्तकारवचनात् ।
६. अर्धा जरती अर्धा युवतिरितिवत् ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ८ ] स्याद्वादमञ्जरी ५५
स्वरूपसत्त्वसाधर्म्येण सत्ताध्यारोपात् सामान्यादिष्वपि सत्सदित्यनुगम इति चेत्,
तर्हि मिथ्याप्रत्ययोऽयमापद्यते । अथ भिन्नस्वभावेष्वेकानुगमो मिथ्यैवेति चेद् द्रव्यादिष्वपि
सत्ताध्यारोपकृत एवास्तु प्रत्ययानुगमः । असति मुख्येऽध्यारोपस्यासम्भवाद् द्रव्यादिषु
मुख्योऽयमनुगतः प्रत्ययः, सामान्यादिषु तु गौण इति चेत् । न । विपर्ययस्यापि शक्यकल्प-
नत्वात् ।।
सामान्यादिषु बाधकसंभवाद् न मुख्योऽनुगतः प्रत्ययः, द्रव्यादिषु तु तदभावाद् मुख्य
इति चेद्, ननु किमिदं बाधकम् । अथ सामान्येऽपि सत्ताऽभ्युपगमे अनवस्था, विशेषेषु पुनः
सामान्यसद्भावे स्वरूपहानिः, समवायेऽपि सत्ताकल्पने तद्वृत्त्यर्थं सम्बन्धान्तराभाव इति
बाधकानीति चेत्, न । सामान्येऽपि सत्ताकल्पने यद्यनवस्था, तर्हि कथं न सा द्रव्यादिषु ।
तेषामपि स्वरूपसत्तायाः प्रागेव विद्यमानत्वात् । विशेषेषु पुनः सत्ताभ्युपगमेऽपि न रूपहानिः,
स्वरूपस्य प्रत्युत्तेजनात् । निःसामा१न्यस्य विशेषस्य क्वचिदप्यनुपलम्भात् । समवायेऽपि
समवायत्वलक्षणायाः स्वरूपसत्तायाः स्वीकारे उपपद्यत एवाविष्षग्भावात्मकः सम्बन्धः,
अन्यथा तस्य स्वरूपाभावप्रसङ्गः । इति बाधकाभावात् तेष्वपि द्रव्यादिवद् मुख्य एव सत्ता-
सम्बन्ध इति व्यर्थं द्रव्यगुणकर्मस्वेव सत्ताकल्पनम् ॥
'यह घट समवाय है,' 'यह पट समवाय है' यह सामान्य ज्ञान होता ही है।
शंका—जिस प्रकार द्रव्य आदिमें स्वरूप सत्ताके साधर्म्यसे सत्ता रहती है, उसी प्रकार सामान्य
आदिमें भी उपचारसे सत्ता विद्यमान है, इसलिये सामान्य आदिमें 'यह सत् है' ऐसा ज्ञान होता है ।
समाधान—यदि सामान्य आदिमें सत्ताको उपचारसे स्वीकार करोगे, तो सामान्य आदिमें सत्का ज्ञान भी
मिथ्या मानना चाहिये । यदि कहो कि भिन्न स्वभाववाले पदार्थोंमें एकताकी प्रतीति मिथ्या ही है, तो इस
तरह द्रव्य, गुण और कर्ममें भी सत्ताको उपचारसे मानकर सत्का ज्ञान मिथ्या मानना चाहिये । यदि कहो
कि मुख्यका अभाव होने पर उपचारका सम्भव होनेसे 'यह सत् है', इस प्रकारका अनुवृत्तिज्ञान द्रव्य, गुण
और कर्ममें मुख्य रूपसे तथा सामान्य, विशेष और समवायमें गौण रूपसे होता है; अर्थात् द्रव्यादिमें मुख्य
सत्ता स्वीकार करके ही सामान्य आदिमें उपचार सत्ता मानी जा सकती है, क्योंकि मुख्य अर्थके न
होनेपर ही उपचार होता है, तो हमारा ( जैनोंका ) उत्तर है कि मुख्य और गौण सत्ताकी इससे उल्टी
कल्पना भी की जा सकती है, अर्थात् सामान्य आदिमें मुख्य और द्रव्यादिमें गौण सत्ता भी मान सकते हैं ।
शंका—द्रव्य आदिमें मुख्य सत्ता माननेसे कोई बाधा नहीं आती, लेकिन सामान्य आदिमें मुख्य सत्ता
स्वीकार करनेसे बाधा आती है। ऊपर कहा भी है कि सामान्यमें सामान्य माननेसे अनवस्था, विशेषमें
सामान्य माननेसे रूपहानि, और समवायमें सामान्य माननेसे समवायान्तरका असम्बन्ध—दोष आते हैं।
समाधान—यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि सामान्यमें सत्ता माननेसे अनवस्था दोष आता है, तो द्रव्य,
गुण, कर्ममें सत्ता माननेसे भी अनवस्था दोष क्यों नहीं आना चाहिए ? क्योंकि सामान्यमें स्वरूप सत्ताकी
तरह द्रव्य, गुण और कर्ममें भी पहलेसे ही स्वरूपसत्ता विद्यमान है। तथा, विशेषोंमें सत्ता अंगीकार करनेपर
स्वरूपकी हानि नहीं होती, बल्कि विशेषोंमें सामान्य माननेपर उल्टी विशेषोंकी सिद्धि होती है; क्योंकि
सामान्यरहित विशेष कहीं भी नहीं पाये जाते । इसी तरह समवायमें भी समवायरूप सत्ता स्वीकार करनेपर
तादात्म्य सम्बन्ध सिद्ध होता है; क्योंकि यदि समवाय समवायस्वरूप स्वरूप सत्ता न मानें, तो समवायके
स्वरूप का ही अभाव होगा। इसलिये सामान्य आदिमें भी द्रव्यादिकी तरह मुख्य सत्ता माननेसे कोई
बाधा नहीं आती, अतएव इनमें भी मुख्य सत्ता ही माननी चाहिये । अतएव द्रव्य, गुण, कर्ममें ही सत्ता है
और सामान्य, विशेष और समवायमें नहीं, यह कल्पना व्यर्थ है।
१. “निर्विशेषं हि सामान्यं भवेत्खरविषाणवत् । सामान्यरहितत्वे तु विशेषास्तद्वदेव हि” ।।