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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 458 में से

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पृष्ठ 94

४२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
तदेवमेवंविधदोषकलुषिते पुरुषविशेषे यस्तेषां सेवाहेवाकः स खलु केवलं बलवन्मोह-
विडम्बनापरिपाक इति । अत्र च यद्यपि मध्यवर्तिनो नकारस्य “घण्टालालान्यायेन” योज-
नादर्थान्तरमपि स्फुरति यथा इमाः कुहेवाकविडम्बनास्तेषां न स्युर्येषां त्वमनुशासक इति
तथापि सोऽर्थः सहृदयैर्न हृदये धारणीयः, अन्ययोगव्यवच्छेदस्याधिकृतत्वात् ॥ इति
काव्यार्थः ॥ ६ ॥
इस प्रकार अनेक दोषोंसे दूषित पुरुषविशेष ईश्वर को जगत्के कर्ता माननेका आग्रह केवल बलवान्
मोहकी विडम्बनाका ही फल है । 'इमाः कुहेवाकविडम्बनाः स्युस्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम्', यहाँ मध्यवर्ती
नकारका 'घण्टालालान्याय' से ( मध्यमणिन्याय अथवा देहलीदीपकन्याय या घण्टालालान्याय एक ही अर्थको
सूचित करते हैं । जैसे एक ही मणि, अथवा दीपक घरकी देहलीपर रखनेसे दोनों ओरकी वस्तुओंको प्रकाशित
करते हैं; अथवा एक ही घण्टा अपनी दोनों तरफ बजता है, उसी तरह यहाँ भी एक ही 'नकार' का दो तरह-
से अन्वय होता है ) श्लोकका दूसरा अर्थ भी निकलता है कि जिनके आप अनुशासक हैं, उनके कदाग्रहरूप
विडम्बनायें नहीं हैं । परन्तु यह अर्थ विद्वानोंको नहीं लेना चाहिये । क्योंकि यहाँ स्तुतिकारने अन्ययोग-
व्यवच्छेदका अवलम्बन लिया है ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥६॥
भावार्थ—इस श्लोकमें वैशेषिकोंके ईश्वरके स्वरूपका खण्डन किया गया है । वैशेषिकोंके अनुसार
ईश्वर ( १ ) जगत्का कर्ता है, ( २ ) एक है, ( ३ ) सर्वव्यापी है, ( ४ ) स्वतन्त्र है, और ( ५ ) नित्य है ।
( १ ) वैशेषिक—'पृथिवी, पर्वत आदि किसी बुद्धिमान् कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योंकि ये कार्य हैं;
जो-जो कार्य होता है, वह किसी बुद्धिमान् कर्ताका बनाया हुआ देखा जाता है, जैसे घर । पृथिवी, पर्वत आदि
भी कार्य हैं, इसलिये ये भी किसी कर्ताके बनाये हुए हैं; जो किसी कर्ताका बनाया हुआ नहीं होता, वह कार्य
भी नहीं होता, जैसे आकाश' । जैन—( क ) उक्त अनुमान प्रत्यक्षसे बाधित है, क्योंकि हमें पृथिवी, पर्वत
आदिका कोई कर्ता दृष्टिगोचर नहीं होता । ( ख ) घटका दृष्टान्त विषम है । क्योंकि घटादि कार्य सशरीर
कर्ताके ही बनाये हुए देखे जाते हैं, तथा ईश्वरको अशरीर कर्ता माना गया है । तथा ईश्वरको सशरीर
माननेमें इतरेतराश्रय आदि अनेक दोष आते हैं ।
( २ ) वैशेषिक—ईश्वर एक है, क्योंकि अनेक ईश्वर होनेसे जगत्में एकरूपता और क्रम नहीं रह
सकता । जैन—उक्त मान्यता एकान्तरूपसे सत्य नहीं है । क्योंकि शहदके छत्ते आदि पदार्थोंको अनेक
मधुमक्खियां तैयार करती हैं, फिर भी छत्तेमें क्रम और एकरूपता देखी जाती है ।
( ३ ) वैशेषिक—ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है । जैन—ईश्वर सर्वव्यापी नहीं हो सकता, क्योंकि
उसके सर्वव्यापी होनेसे प्रमेय पदार्थोंके लिये कोई स्थान न रहेगा । ईश्वरका सर्वज्ञत्व भी किसी प्रमाणसे सिद्ध
नहीं हो सकता । क्योंकि स्वयं सर्वज्ञत्व प्राप्त किये बिना हम प्रत्यक्षसे ईश्वरका साक्षात् ज्ञान नहीं कर सकते ।
अनुमानसे भी हम ईश्वरको नहीं जान सकते, क्योंकि वह बहुत दूर हैं, इसलिए सर्वज्ञत्वसे सम्बद्ध किसी हेतुसे
उसका ग्रहण नहीं हो सकता । 'सर्वज्ञत्वके बिना जगत्की विचित्र रचना नहीं हो सकती'—इस अर्थापत्ति
प्रमाणसे भी सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं होता । क्योंकि जगत्की विचित्रताकी व्याप्ति सर्वज्ञत्वके साथ नहीं है । आगम
प्रमाणसे भी हम सर्वज्ञको नहीं जान सकते, क्योंकि वेद आदि आगम पूर्वापरविरोध आदि दोषोंसे युक्त हैं,
इसलिए आगम विश्वसनीय नहीं है ।
( ४ ) वैशेषिक—ईश्वर स्वतन्त्र है । जैन—यदि ईश्वर स्वतन्त्र है, तो वह दुःखोँसे परिपूर्ण
विश्वकी क्यों रचना करता है ? अन्यथा ईश्वरको क्रूर और निर्दय मानना चाहिये । यदि कहा जाय कि
१. मध्यमणिन्यायः, देहलीदीपकन्यायस्तद्वदेवाय घण्टालालान्याय उपयुज्यते ।