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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 458 में से

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पृष्ठ 98

४६ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ६
तत्र त्वतलादिप्रत्ययाभिव्यङ्ग्यस्य सङ्गृहीतसकलावान्तरजातिलक्षणव्यक्तिभेदस्य सामान्य-
स्योद्गवात् । इह तु समवायस्यैकत्वेन व्यक्तिभेदाभावे जातेरनुद्भूतत्वाद् गौणोऽयं युष्मत्परि-
कल्पित इहेतिप्रत्ययसाध्यः समवायत्वाभिसम्बन्धः तत्साध्यश्च समवाय इति ॥
तदेतद् न विपश्चिच्चमत्कारकारणम् । यतोऽत्रापि जातिरुद्भवन्ती केन निरुध्यते । व्यक्ते-
रभेदेनेति' चेत् । न । तत्तदवच्छेदकवशात् तत्तद्भेदोपपत्तौ व्यक्तिभेदकल्पनाया दुर्वारत्वात् ।
अन्यो घटसमवायोऽन्यश्च पटसमवाय इति व्यक्त एव समवायस्यापि व्यक्तिभेद इति, तत्सिद्धौ
सिद्ध एव जात्युद्भवः । तस्मादन्यत्रापि मुख्य एव समवायः इहप्रत्ययस्योभयत्राप्यव्यभिचारात् ॥
तदेतत्सकलं सपूर्वपक्षं समाधानं मनसि निधाय सिद्धान्तवादी प्राह । न गौणभेद इति ।
गौण इति योऽयं भेदः स नास्ति । गौणलक्षणाभावात् । तल्लक्षणं चेत्थमाचक्षते—
“ अव्यभिचारी मुख्योऽविकलोऽसाधारणोऽन्तरङ्गश्च ।
विपरीतो गौणोऽर्थः सति मुख्ये धीः कथं गौणे ” ॥
तस्माद् धर्मधर्मिणोः सम्बन्धेन मुख्यः समवायः, समवाये च समवायत्वाभिसम्बन्धे गौण
इत्ययं भेदो नानात्वं नास्तीति भावार्थः ॥
किञ्च, योऽयमिह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययात् समवायसाधनमनोरथः स खल्वनुहरते
नपुंसकादपत्यप्रसवमनोरथम् । इह तन्तुषु पट इत्यादिर्व्यवहारस्यालौकिकत्वात् । पांशुलपादा-
होता है, और यह समवाय पृथिवी आदिकी सम्पूर्ण अवान्तर जातिरूप व्यक्तिभेदको सामान्यसे ग्रहण करता
है। परन्तु समवायत्वमें समवाय एक है, इसलिए उसमें व्यक्तियोंके भेदका अभाव है, अतएव वह सामान्यका
उत्पादक नहीं। अतएव आप लोगोंने जो कहा था कि 'इन समवायियोंमें समवाय रहते हैं, क्योंकि इन
समवायियोंमें समवाय हैं ऐसा ज्ञान होता है'—सो यह गौण समवाय है।
जैन—यह मान्यता ठीक नहीं। क्योंकि जिस प्रकार आप लोग पृथिवीमें मुख्य समवायसे रहनेवाले
पृथिवीत्वको सामान्य ( जाति ) का ग्राहक मानते हैं, उसी प्रकार समवायमें रहनेवाले समवायत्वको भी सामा-
न्यका ग्राहक क्यों नहीं मानते ? यदि आप लोग कहें कि यहाँ व्यक्तिका भेद नहीं है—अर्थात् समवाय एक ही है,
इस कारण समवायमें जातिका अभाव है—तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि यहाँ भी अमुक अवच्छेदकोंसे यह घट-
समवाय है, यह पट-समवाय है, इस प्रकार समवायके भी व्यक्तिभेद सिद्ध हैं। क्योंकि घटत्वावच्छेदकसे होने-
वाला घटसमवाय पटत्वावच्छेदकसे होनेवाले पटसमवायसे भिन्न है। इसलिए समवायमें भी व्यक्तिका भेद सिद्ध
होता है। अतएव जिस प्रकार पृथिवीमें पृथिवीत्व मुख्य-समवाय सम्बन्धसे रहता है, उसी तरह समवायमें
समवायत्व भी मुख्य-समवाय सम्बन्धसे मानना चाहिए, क्योंकि इहप्रत्ययकी दोनों जगह समानता है।
तथा, वैशेषिकोंद्वारा समवायमें गौणरूपसे स्वीकृत समवायत्व भी नहीं बन सकता। क्योंकि यहाँ गौण-
का लक्षण ही ठीक नहीं बैठता, कारण कि,
“व्यभिचारी, विकल, साधारण और वहिरंग अर्थको गौण कहते हैं। मुख्य अर्थके रहनेपर गौण बुद्धि
नहीं हो सकती।”
समवायमें समवायत्व माननेमें मुख्य अर्थ मौजूद है, इसलिए समवायका गौणरूप नहीं बन सकता।
अतएव धर्म और धर्मीका सम्बन्ध मुख्य-समवायसे होता है, तथा समवाय और समवायत्वका सम्बन्ध गौण-सम-
वाय है—समवायका यह मुख्य और गौण भेद मानना ठीक नहीं हैं।
तथा 'इन तन्तुओंमें पट हैं'—इस प्रत्ययसे समवायकी सिद्धि करना नपुंसकसे पुत्र उत्पन्न करनेकी इच्छा-
के समान है। क्योंकि 'इन तन्तुओंमें पट हैं' यह व्यवहार लोकसे बाधित है, कारण कि साधारणसे साधारण
१. व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं संकरोऽथानवस्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥—
इति किरणावल्यामुदयनाचार्यकृतायाम् ।