स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
बौद्ध परिशिष्ट (ख)
( श्लोक १६ से १९ तक )
बौद्ध दर्शन
"बौद्ध दर्शनको सुगत दर्शन भी कहते हैं। बौद्ध लोगोंने विपश्यी, शिखी, विश्वभू, क्रकुच्छन्द, काञ्चन,
काश्यप और शाक्यसिंह ये सात सुगत माने हैं।¹ सुगतको तीर्थंकर, बुद्ध अथवा धर्मधातु नामसे भी कहा जाता
है । बुद्धोंके कण्ठ तीन रेखाओंसे चिह्नित होते हैं। अन्तिम बुद्धने मगध देशमें कपिलवस्तु नामक ग्राममें जन्म
लिया था । इनकी माताका नाम मायादेवी और पिताका नाम शुद्धोदन था । बौद्ध लोग बुद्ध भगवान्को सर्वज्ञ
कहते हैं । बुद्धने दुःख, समुदाय ( दुःखका कारण ), मार्ग और निरोध ( मोक्ष ) इन चार आर्यसत्योंका
उपदेश दिया है । बौद्ध मतमें पांच इन्द्रियां और शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श ये पांच विषय, मन और धर्मा-
यतन ( शरीर ) ये सब मिलाकर बारह आयतन माने गये हैं । बौद्ध प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाणोंको
मानते हैं । बौद्ध लोग आत्माको न मानकरं ज्ञानको ही स्वीकार करते हैं । इनके मतमें क्षण-क्षणमें नाश
होनेवाली संतानको ही एक भवसे दूसरे भवमें जानेवाली मान गया है । बौद्ध साधु चमर रखते हैं, मुण्डन
कराते हैं, चमड़ेका आसन और कमण्डलु रखते हैं, तथा घुंटी तक गेरुआ रंगका वस्त्र पहिनते हैं । ये लोग
स्नान आदि शौच क्रिया विशेष करते हैं । बौद्ध साधु भिक्षा पात्रमें आये हुए मांसको भी शुद्ध समझकर भक्षण
कर लेते हैं । ये लोग जीवोंकी दया पालनेके लिये भूमिको बुहारकर चलते हैं, और ब्रह्मचर्य आदि
क्रियामें खूब दृढ़ होते हैं । बौद्ध मतमें धर्म, बुद्ध और संघ ये तीन रत्न, और सम्पूर्ण विघ्नोंको नाश करने-
वाली ताराको देवी स्वीकार किया गया है । वैभाषिक, सौत्रांतिक, योगाचार और माध्यमिक ये बौद्धोंके
चार भेद हैं ।²"
बौद्धोंके मुख्य सम्प्रदाय
बुद्धके निर्वाण जानेके बाद संघमें कलहका आरम्भ हुआ, और बुद्ध-निर्वाणके सौ वर्ष पश्चात् ईसवी
सन् पूर्व ४०० में वैशालीमें एक परिषद्की आयोजना की गई । इस परिषद्में महासंघिक मूल महा-
संघिक, एकव्यवहारिक, लोकोत्तरवादी, कुकुल्लिक, बहुश्रुतीय, प्रज्ञप्तिवादी, चैत्तिक, अपरशैल और उत्तरशैल
इन नौ शाखाओंमें विभक्त हो गये । इधर थेरवादी भी निम्न ग्यारह मुख्य शाखाओंमें बंट गये—हैमवत,
सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तिक, महीशासक, काश्यपीय, सोत्रांतिक, वात्सीपुत्रीय, धर्मोत्तरीय, भद्रयानीय, सम्मितीय,
और छन्नागरिक³ । थेरवादियों और महासंघिकोंके उक्त सम्प्रदायोंके सिद्धांतोंके विषयमें बहुत कम ज्ञातव्य
१. पाली ग्रन्थोंमें कहीं आठ, कहीं सोलह, और कहीं पच्चीस बुद्धोंके नाम आते हैं । देखिये राजवाड़े-
दीघनिकाय भाग २, मराठी भाषांतर, पृ० ४६ ।
२. देखिये गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय-टीका और राजशेखरका षड्दर्शनसमुच्चय ।
३. वसुमित्रने इन बीस भेदोंको हीनयान सम्प्रदायकी शाखा कहकर उल्लेख किया है । परन्तु आगे चलकर
ये महासंघिक और थेरवाद सम्प्रदाय क्रमसे हीनयान और महायान कहे जाने लगे । हीनयानी केवल
अपने ही निर्वाणके लिये प्रयत्न करते हैं और यहां अन्य मनुष्योंकी तरह बुद्धको भी मनुष्य ही माना
गया है । यहां 'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं, पंच स्कंधोंका क्षय हो जाना निर्वाण है,' इसके आगे सिद्धान्तों-
का दार्शनिक विकास दृष्टिगोचर नहीं होता । महायान सम्प्रदायके अनुयायी अनन्त काल तक प्राणियोंके
मोक्षके लिये प्रयत्नशील रहते हैं। निर्वाणके बाद भी बुद्धकी प्रवृत्ति संसारके निर्वाणके लिये बराबर
जारी रहती है । यहाँ गृहस्थमें रहकर भी बिना किसी वर्णभेदके प्राणीमात्रके लिये निर्वाणका द्वार सदा
३०४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
बातें मिलती हैं । वैदिक और जैन शास्त्रोंमें भी उक्त सम्प्रदायोंमें सर्वास्तिवादी, सौत्रांतिक और आर्यसमितीय
( वैभाषिक ) नामके बौद्ध सम्प्रदायोंको छोड़कर अन्य सम्प्रदायोंका उल्लेख नहीं मिलता ।
सौत्रान्तिक
ये लोग टीकाओंकी अपेक्षा बुद्धके सूत्रोंको अधिक महत्त्व देनेके कारण सौत्रांतिक कहे जाते हैं । सौत्रां-
तिक लोग सर्वास्तिवादियों ( वैभाषिकों ) की तरह बाह्य जगतके अस्तित्वको मानते हैं और समस्त पदार्थोंको
बाह्य और अन्तरके भेदसे दो विभागोंमें विभक्त करते हैं । बाह्य पदार्थ भौतिक रूप, और आन्तर पदार्थ
चित्त-चैत्त रूप होते हैं । "सौत्रांतिकोंके मतमें पांच स्कन्धोंको छोड़कर आत्मा कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है ।
पाँच स्कंध ही परलोक जाते हैं । अतीत, अनागत, सहेतुक विनाश, आकाश और पुद्गल ( नित्य और व्यापक
आत्मा ) ये पाँच संज्ञामात्र, प्रतिज्ञामात्र, संवृतिमात्र, और व्यवहारमात्र हैं । सौत्रान्तिकोंके मतमें पदार्थोंका
ज्ञान प्रत्यक्षसे न होकर ज्ञानके आकारकी अन्यथानुपपत्ति रूप अनुमानसे होता है । साकार ज्ञान प्रमाण होता
है । सम्पूर्ण संस्कार क्षणिक होते हैं । रूप, रस, गंध और स्पर्शके परमाणु तथा ज्ञान प्रत्येक क्षण नष्ट होते
हैं । अन्यापोह ( अन्य व्यावृत्ति ) ही शब्दका अर्थ है । तदुत्पत्ति और तदाकारतासे पदार्थोंका ज्ञान होता है ।
नैरात्म्य भावनासे जिस समय ज्ञान-सन्तानका उच्छेद हो जाता है, उस समय निर्वाण होता है ।"¹ वसुबंधुके
अभिधर्मकोशके² अनुसार सौत्रांतिक लोग वर्तमान, और जिनसे अभी फल उत्पन्न नहीं हुआ, ऐसी भूत वस्तुको
अस्ति रूप, तथा भविष्य और जिनसे फल उत्पन्न हो चुका है, ऐसी भूत वस्तुको नास्ति रूप मानते हैं । सौत्रां-
तिक लोगोंके इस सिद्धांतको माननेवाले धर्मत्राता, घोष, वसुमित्र और बुद्धदेव ये चार विद्वान मुख्य
समझे जाते हैं । ये लोग क्रमसे भावपरिणाम, लक्षणपरिणाम, अवस्थापरिणाम और अपेक्षापरिणामको
मानते हैं ।
धर्मत्राता (.१०० ई.)—भाव-परिणामवादी धर्मत्राताका मत है कि जिस प्रकार सुवर्णके
कटक, कुण्डल आदि गुणोंमें ही परिवर्तन होता है, स्वयं सुवर्ण द्रव्यमें कोई परिवर्तन नहीं होता, इसी तरह
वस्तुका धर्म भविष्य पर्यायको छोड़कर वर्तमान रूप होता है, और वर्तमान भावको छोड़कर अतीत रूप
होता है, परन्तु वास्तवमें स्वयं द्रव्यमें कोई परिवर्तन नहीं होता³ । धर्मत्राताको कनिष्ककी परिषद्के मुख्य
सदस्य वसुमित्रका मामा कहा जाता है । धर्मत्राताने बुद्ध भगवानके मुखसे कहे हुए एक हज़ार श्लोकोंका
खुला रहता है । इस सम्प्रदायके अनुयायी बुद्धको देवाधिदेव मानकर बुद्धकी भक्ति करते हैं । महायान
सम्प्रदायमें प्रत्येक पदार्थको निःस्वभाव और अनिर्वाच्य कहकर तत्त्वोंका दार्शनिक रीतिसे तलस्पर्शी
विचार किया गया है । सौत्रांतिक और वैभाषिक हीनयान, और विज्ञानवाद और शून्यवाद महायान
सम्प्रदायकी शाखायें हैं ।
जापानी विद्वान् यामाकामी सोगेन ( Yamakami Sogen ) के मतानुसार बुद्धके निर्वाणके
तीन सौ वरस बाद वैभाषिक, चार सौ वरस बाद सौत्रान्तिक, तथा पाँच सौ वरस बाद माध्यमिक और
ईसाकी तीसरी शताब्दिमें विज्ञानवाद सिद्धान्तोंकी स्थापना हुई । प्रो. ध्रुवका मत है, कि असंग और
वसुबंधुके पूर्व भी विज्ञानवादका सिद्धान्त मौजूद था, इसलिये मध्यमवादके पहले विज्ञानवादको मानकर
बादमें माध्यमिकवादकी उत्पत्ति मानना चाहिये । देखिये प्रोफेसर ध्रुव—स्याद्वादमञ्जरी पृ० ७०-२५ ।
१. गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय-टीका ।
२. इसका रशियन विद्वान प्रो. शर्बाट्सकी ( Stchertatsky ) ने अंग्रेजीमें अनुवाद किया है ।
३. धर्मस्याध्वसु वर्तमानस्य भावान्यथात्वमेव केवलं न तु द्रव्यस्येति । यथा सुवर्णद्रव्यस्य कटककेयूर-
कुण्डलाद्यभिधाननिमित्तस्य गुणस्यान्यथात्वं न सुवर्णस्य, तथा धर्मस्यानागतादिभावान्यथात्वम् ।
तत्त्वसंग्रहपंजिका पृ० ५०४ ।
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३०५
धम्मपदमैं तैंतीस अध्ययनोंमें संग्रह किया था । धम्मपदका चीनी अनुवाद मिलता है । धर्मत्राताको पंच-
वस्तुविभाषाशास्त्र संयुक्ताभिधर्महृदयशास्त्र, अवदानसूत्र और धर्मत्रातध्यानसूत्र इन ग्रंथोंका प्रणेता कहा
जाता है¹ ।
घोष ( १५० ई. )—लक्षण-परिणामवादी घोषका सिद्धांत है कि जिस प्रकार किसी एक स्त्रीमें
आसक्ति करनेवाला पुरुष दूसरी स्त्रियोंमें आसक्तिको नहीं छोड़ देता, उसी तरह भूत धर्म भूत धर्मसे संबद्ध
होता हुआ वर्तमान और भविष्य धर्मोंसे संबंध नहीं छोड़ता, तथा वर्तमान धर्म वर्तमान धर्मसे संबद्ध होता हुआ
भूत और भविष्य धर्मसे संबंध नहीं छोड़ता² । घोषने अभिधर्मामृतशास्त्रकी रचना की है । इस ग्रंथका चीनी
अनुवाद उपलब्ध है ।
बुद्धदेव ( २०० ई ) —अपेक्षा-परिणामवादी बुद्धदेवका कहना है कि जैसे एक ही स्त्री पुत्री,
माता आदि कही जाती है, उसी तरह एक ही धर्ममें नाना अपेक्षाओंसे भूत, भविष्य और वर्तमानका
व्यवहार होता है । जिसके केवल पूर्व पर्याय है, उसे भविष्य, जिसके केवल उत्तर पर्याय है, उसे भूत,
और जिसने पूर्व पर्यायको प्राप्त कर लिया है और जो उत्तर पर्यायको धारण करनेवाला है, उसे वर्तमान
कहते हैं³ ।
वसुमित्र ( १०० ई० ) —अवस्था-परिणामवादी वसुमित्रका कहना है कि धर्म भिन्न-भिन्न
अवस्थाओंकी अपेक्षा ही भूत, भविष्य और वर्तमान कहा जाता है । वास्तवमें द्रव्यमें परिवर्तन नहीं होता ।
इसलिये जिस समय किसी धर्ममें कार्य करनेकी शक्ति बन्द हो जाती हैं, उस समय उसे भूत, जिस समय
धर्ममें क्रिया होती रहती है, उस समय वर्तमान, और जिस समय धर्ममें क्रिया होनेवाली हो, उस समय
उसे भविष्य कहते हैं⁴ । वसुमित्र कनिष्ककी परिषद्में उपस्थित होनेवाले पाँचसौ अर्हतोंमेंसे थे । वसुमित्रने
अभिधर्मप्रकरणपाद, अभिधर्मधातुकायपाद, अष्टादशनिकायशास्त्र, तथा आर्यवसुमित्रबोधिसत्त्वसंगीतिशास्त्र
ग्रंथोंकी रचना की है ।
धर्मत्राता, घोष, बुद्धदेव और वसुमित्रके सिद्धांतोंका प्रतिपादन और खण्डन तत्त्वसंग्रहमें त्रैकाल्य-
परीक्षा नामक प्रकरणमें किया गया है । वसुबंधुने अभिधर्मकोश ( ५-२४-६ )⁵ में आदिके तीन विद्वानोंके
मतोंका खण्डन करके वसुमित्रके अवस्था-परिणामको स्वीकार किया है ।
वैभाषिक
वैभाषिक लोग अभिधर्मकी टीका विभाषाको सबसे अधिक महत्त्व देनेके कारण वैभाषिक कहे
जाते हैं । ये लोग भूत, भविष्य और वर्तमानको अस्तिरूपसे मानते हैं । इनके मतमें ज्ञान और ज्ञेय दोनों
वास्तविक हैं । वैभाषिक लोग प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व मानते हैं । "इनके मतमें प्रत्येक
१. तत्त्वसंग्रह, अंग्रेजी भूमिका, पृ० ५६ ।
२. धर्मोऽध्वसु वर्तमानोऽतीतोऽतीतलक्षणयुक्तोऽनागतप्रत्युत्पन्नाभ्यां लक्षणाभ्यां अवियुक्तः । यथा पुरुष एकास्यां
स्त्रियां रक्तः शेषास्वविरक्त एवमनागतप्रत्युत्पन्नास्वपि वाच्ये । तत्त्वसंग्रहपंजिका ।
३. धर्मोऽध्वसु वर्तमानः पूर्वापरमपेक्ष्यान्योन्य उच्यते इति । यथैका स्त्री माता चोच्यते दुहिता चेति ।
त० संग्रहपंजिका ।
४. धर्मोऽध्वसु वर्तमानोऽवस्थामवस्थां प्राप्यान्योऽन्यो निर्दिश्यतेऽवस्थान्तरतो, न द्रव्यतः, द्रव्यस्य त्रिष्वपि
कालेष्वभिन्नत्वात् । तत्त्वसंग्रहपंजिका ।
५. देखिये प्रोफेसर शेर्वाट्स्कोका The Central Conception of Buddhism, परिशिष्ट १,
पृ. ७६-९१ ।
३९
३०६ श्रीमदराजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
पदार्थ उत्पत्ति, स्थिति, जरा और मरण इन चार क्षणों तक अवस्थित रहता है । पुद्गल ( आत्मा ) में भी
ये गुण रहते हैं । ज्ञान निराकार होता है, और यह पदार्थके साथ एक हो सामग्रीसे उत्पन्न होता है ।
वैभाषिक आर्यसमितीय नामसे भी कहे जाते हैं ।'१"
वैभाषिक ( सर्वास्तिवादी ) लोंगोंका साहित्य आजकल चीनी भाषामें उपलब्ध है । मुख्य साहित्य
निम्न प्रकारसे है—१. कात्यायनीपुत्रका ज्ञानप्रस्थानशास्त्र । इसे महाविभाषा भी कहते हैं । २. सारीपुत्रका
धर्मस्कंध । ३. पूर्णका धातुकाय । ४. मौद्गलायनका प्रज्ञप्तिशास्त्र । ५. देवक्षेमका विज्ञानकाय । ६. सारी-
पुत्रका संगीतिपर्याय और वसुमित्रका प्रकरणपाद । इसके अतिरिक्त, ईसवी सन् ४२०-५०० में वसुबंधुने
अभिधर्मकोश ( वैभाषिककारिका ) ग्रंथ लिखा और इस ग्रंथपर स्वयं ही अभिधर्मकोशभाष्य रचा । इसमें
सौत्रांतिकोंके सिद्धांतोंका खण्डन किया गया है। आगे चलकर सौत्रांतिक विद्वान यशोमित्रने इस ग्रंथपर
अभिधर्मकोशव्याख्या नामकी टीका लिखी । इसके अलावा, वैभाषिक विद्वान संघभद्रने समयप्रदीप और
न्यायानुसार ( इनका चीनीमें भाषांतर है ) नामक ग्रन्थ लिखे । धर्मत्राता, घोष, वसुमित्र, आदिने भी
वैभाषिक सम्प्रदायके अनेक ग्रन्थ लिखे हैं । प्रसिद्ध तार्किक दिङ्नाग ने भी प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश, हेतु-
चक्रडमरु, प्रमाणसमुच्चयवृत्ति, आलम्बनपरीक्षा, त्रिकालपरीक्षा आदि न्याय ग्रंथोंकी रचना की है ।
सौत्रांतिक और वैभाषिक दोनों सम्प्रदायोंका परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है । इसीलिये वैदिक ग्रन्थ-
कार इन दोनों सम्प्रदायोंके भिन्न-भिन्न सिद्धान्तोंमें२ में कोई भेद न समझकर सौत्रांतिक और वैभाषिकोंका
सर्वास्तिवादीके नामसे उल्लेख करते हैं । परन्तु सौत्रांतिकोंने कभी अपने आपको सर्वास्तिवादी नहीं कहा
कारण कि सर्वास्तिवादी और सौत्रांतिक दोनोंके ग्रंथ अलग-अलग थे ३ । सौत्रान्तिक और वैभाषिक ( सर्वा-
स्तिवादी ) दोनों बाह्य पदार्थोंके अस्तित्वको मानते हैं । ये लोग अठारह धातुओंको स्वीकार करते हैं । इन
सम्प्रदायोंकी रुचि विशेष रूपसे क्षणिकवाद, प्रत्यक्ष और अनुमानकी परिभाषा, पदार्थोंका अर्थक्रियाकारित्व,
अपोहवाद, अवयववाद, विशेषवाद आदि विषयोंको प्रतिपादन करनेकी ओर अधिक रही है । ये न्याय-
वैशेषिक, सांख्य आदि वैदिक दर्शनकारोंके सिद्धांतोंका खण्डन करते थे । वसुबन्धु, यशोमित्र, धर्मकीर्ति
( लगभग ६३५ ई. ), विनीतदेव, शान्तभद्र, धर्मोत्तर ( ८४१ ई. ), रत्नकीर्ति, पण्डित अशोक, रत्नाकर
शान्ति आदि विद्वान इन सम्प्रदायोंके उल्लेखनीय विद्वान हैं ।
सौत्रान्तिक-वैभाषिकोंके सिद्धांत
१. प्रमाण और प्रमाणका फल भिन्न नहीं है—जिस समय किसी प्रमाणके द्वारा पदार्थका ज्ञान
होनेपर उस पदार्थ सम्बन्धी अज्ञानकी निवृत्ति होती है, उस समय उस पदार्थके प्रति हेय अथवा उपादेयकी
बुद्धि होती है । इसी बुद्धिका होना प्रमाणका फल ( प्रमिति ) कहा जाता है । नैयायिक, मीमांसक और
सांख्य लोगोंकी मान्यता है कि जिस प्रकार काटनेकी क्रियाके बिना कुठारको करण नहीं कहा जा सकता,
उसी तरह प्रमिति क्रियाके बिना प्रमाणको करण नहीं कह सकते । अतएव जिस प्रकार कुठारसे वृक्षको
काटनेपर वृक्षके दो टुकड़े हो जाना रूप फल कुठारसे भिन्न है, उसी तरह इन्द्रिय और पदार्थोंका ज्ञान
होनेसे जो पदार्थोंका ज्ञान होना रूप फल होता है, उसे भी प्रमाणसे सर्वथा भिन्न मानना चाहिये । प्रत्यक्ष,
१. देखिये गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय-टीका, पृ. ४६, ४७ । सर्वास्तिवादके सिद्धान्तोंके विशेष जाननेके
लिये यामाकामी सोगेनका Systems of Buddhistic Thought देखना चाहिये ।
२. सर्वदर्शनसंग्रहकार आदि विद्वानोंके अनुसार वैभाषिक पदार्थोंका ज्ञान प्रत्यक्षसे और सौत्रांतिक
पदार्थोंका ज्ञान अनुमानसे मानते हैं ।
३. देखिये यामाकामी सोगेन का Systems of Buddhistic Thought, अध्याय ३ ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३०७
अनुमान आदि प्रमाण साधकतम होनेसे करण हैं, और पदार्थोंका हेय-उपादेय रूप ज्ञान होना साध्य होनेसे
क्रियारूप है, अतएव प्रमाणका फल प्रमाणसे सर्वथा भिन्न है। बौद्ध इस सिद्धान्तका खण्डन करते हैं।
उनका कथन है कि प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणका स्वरूप पदार्थोंका जानना है, अतएव पदार्थोंको जाननेके
सिवाय प्रमाणका कोई दूसरा फल नहीं कहा जा सकता, इसलिये प्रमाण और प्रमाणके फलको सर्वथा अभिन्न
मानना चाहिये । जिस समय ज्ञान पदार्थोंको जानता है, उस समय ज्ञान पदार्थोंके आकारका होता है; यही
ज्ञानकी प्रमाणता है ! तथा ज्ञान पदार्थोंके आकारका होकर पदार्थोंको जानता है, यह ज्ञानका फल है।
अतएव एक ही ज्ञानको प्रमाण और प्रमाणका फल स्वीकार करना चाहिये । व्यवहारमें भी देखा जाता है
कि जो आत्मा प्रमाणसे पदार्थोंका ज्ञान करती है, उसे ही फल मिलता है। इसलिये प्रमाण और प्रमाणका
फल सर्वथा अभिन्न हैं।
२. क्षणिकवाद-बौद्ध लोग प्रत्येक पदार्थको क्षणिक स्वीकार करते हैं। उनका मत है कि संसार-
में कोई भी वस्तु नित्य नहीं है। प्रत्येक वस्तु अपने उत्पन्न होनेके दूसरे क्षणमें ही नष्ट हो जाती है, क्योंकि
नष्ट होना पदार्थोंका स्वभाव है। यदि पदार्थोंका स्वभाव नष्ट होना न माना जाय, तो घड़े और लाठीका
संघर्ष होनेपर भी घड़ेका नाश नहीं होना चाहिये । हमें पदार्थ नित्य दिखाई पड़ते हैं, परन्तु यह हमारा
भ्रम मात्र है। वास्तवमें प्रत्येक वस्तु प्रत्येक क्षणमें नाश हो रही है। जिस प्रकार दीपककी ज्योतिके प्रतिक्षण
बदलते रहनेपर भी समान आकारकी ज्ञान-परम्परासे 'यह वही दीपक है' इस प्रकारका ज्ञान होता है, उसी
प्रकार प्रत्येक वस्तुके क्षण-क्षणमें नष्ट होनेपर भी पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सदृशता होनेके कारण वस्तुका
प्रत्यभिज्ञान होता है। १ यदि वस्तुको नित्य माना जाय तो कूटस्थ नित्य वस्तुमें अर्थक्रिया नहीं हो सकती२,
और वस्तुमें अर्थक्रिया न होनेसे उसे सत् भी नहीं कहा जा सकता। दसवीं शताब्दिके बौद्ध विद्वान रत्न-
कीर्तिने क्षणिकवादकी सिद्धिके लिये 'क्षणभंगसिद्धि' नामक स्वतन्त्र ग्रंथ लिखा है। ३ इस ग्रंथमें रत्नकीर्तिने
शंकर, त्रिलोचन, न्यायभूषण, वाचस्पति आदि विद्वानोंके मतका खण्डन करते हुए अन्वयव्याप्ति और व्यति-
रेकव्याप्तिसे क्षणभंगवादकी सिद्धि की है। शान्तरक्षित आचार्यने तत्त्वसंग्रहमें स्थिरभावपरीक्षा नामक
प्रकरणमें भी नित्यवादकी मीमांसा करते हुए क्षणिकवादको सिद्ध किया है। इसके अतिरिक्त, जैन४ ओर
वैदिक५ ग्रंथोंमें भी क्षणिकवादका प्रतिपादन मिलता है ६ ।
३. अवयववाद- नैयायिक लोग अवयवीको अवयवोंसे भिन्न मानकर उन दोनोंका सम्बन्ध सम-
वायसे स्वीकार करते हैं। परन्तु बौद्धोंका कहना है कि अवयवोंको छोड़कर अवयवी कोई भिन्न वस्तु नहीं
है । भ्रमके कारण अवयव ही अवयवी रूप प्रतीत होते हैं। अवयव रूप परमाणु उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न
होते ही नष्ट हो जाते हैं, इसलिये अवयवोंको छोड़कर अवयवी पृथक् वस्तु नहीं है। जिस समय परस्पर मिश्रित
परमाणु ज्ञानसे जाने जाते हैं, उस समय ये परमाणु विस्तृत प्रदेशमें रहनेके कारण स्थूल कहे जाते हैं।७
१. जैन लोग भी पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा क्षणिकवाद स्वीकार करते हैं-स्याद्वादिनामपि हि प्रतिक्षणं
नवनवपर्यायपरंपरोत्पत्तिरभिमतैव । तथा च क्षणिकत्वम् । देखिये पीछे, पृ. १८८
२. देखिये पीछे पृ. २३४
३. पंडित हरप्रसाद शास्त्री द्वारा बिब्लिओथिका इन्डिका कलकत्तामें सम्पादित ।
४. देखिये षड्दर्शनसमुच्चय, गुणरत्नकी टीका, पृ. २९,३०,४०; चन्द्रप्रभसूरि, प्रमेयरत्नकोष पृ०. ३० ।
५. न्यायमंजरी; न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका आदि ।
६. बौद्धोंके क्षणिकवादकी तुलना फ्रांसके दार्शनिक वर्गासाँ ( Bergson ) के क्षणिकवादके साथ की
जा सकती है ।
७. परमाणव एव पररूपदेशपरिहारेणोत्पन्नाः परस्परसहिता अवभासमाना देशवितानवन्तो भासन्ते, वितत-
देशत्वञ्च स्थूलत्वम् । पंडित अशोक, अवयविनिराकरण, पृ. ७९ ।
३०८ श्रीमदराजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
इसलिये परमाणुओंका छोड़कर अवयवीको भिन्न नहीं मानना चाहिये । पंडित अशोकने अवयववादकी पुष्टिके
लिये 'अवयविनिराकरण' नामक ग्रंथ लिखा है ।
४. विशेषवाद—नैयायिक सामान्यको एक, नित्य और व्यापी मानते हैं। बौद्धोंका मत है
कि विशेषको छोड़कर सामान्य कोई भिन्न वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण क्षणिक पदार्थोंका ज्ञान उनके असाधारण रूपसे
ही होता है, इसलिये सम्पूर्ण पदार्थ स्वलक्षण हैं, अर्थात् पदार्थोंका सामान्य रूपसे ज्ञान नहीं होता । जिस समय
हम पांच उंगलियोंका ज्ञान करते हैं, उस समय पांच उंगलियोंरूप विशेषको छोड़कर अंगुलित्व कोई भिन्न
जाति नहीं मालूम होती ।१ इसी प्रकार गौको जानते समय गौके वर्ण, आकार आदि विशेष ज्ञानको छोड़कर
गोत्व सामान्यका भिन्न ज्ञान नहीं होता, अतएव विशेषको छोड़कर सामान्यको भिन्न वस्तु नहीं मानना
चाहिये । क्योंकि विशेषमें ही वस्तुका अर्थक्रियाकारित्व लक्षण ठीक-ठीक घटता है ।२ वेदान्तियोंके मतमें भी
जातिका प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे ज्ञान नहीं माना गया, अतएव सामान्य भिन्न पदार्थ नहीं है ।
५. अपोहवाद—जिससे दूसरेकी व्यावृत्ति की जाय, उसे अपोह कहते हैं ( अन्योऽपोह्यते व्यावर्त्यते
अनेन ) । बौद्ध लोग अत्यन्त व्यावृत परस्पर विलक्षण स्वलक्षणोंमें अनुवृत्ति प्रत्यय करनेवाले सामान्यको
नहीं मानते, यह कहा जा चुका है । बौद्धोंकी मान्यता है कि जिस समय हमें किसी शब्दका ज्ञान होता है, उस
समय उस शब्दसे पदार्थोंका अस्ति और नास्ति दोनों रूपसे ज्ञान होता है । उदाहरणके लिये, जिस समय
हमें गौ शब्दका ज्ञान होता है, उस समय एक साथ ही गौके अस्तित्व और गौके अतिरिक्त अन्य पदार्थोंके
नास्तित्व रूपका ज्ञान होता है । इसलिये बौद्धोंके मतमें अतद्व्यावृत्ति ( अपोह ) ही शब्दार्थ माना जाता है ।
पंडित अशोकने अपोहवादपर 'अपोहसिद्धि' नामक स्वतंत्र ग्रंथ लिखा है । मीमांसाश्लोकवार्त्तिकमें भी
अपोहवादपर एक अध्याय है ।
शून्यवाद
शून्यवादको माध्यमिकवाद अथवा नैरात्म्यवाद भी कहते हैं । माध्यमिक लोगोंका कथन है कि
पदार्थोंका न निरोध होता है, न उत्पाद होता है, न पदार्थोंका उच्छेद होता है, न पदार्थ नित्य हैं, न पदार्थोंमें
अनेकता है, न एकता है, और न पदार्थोंमें गमन होता है, और न आगमन होता है३ । अतएव सम्पूर्ण
धर्म मायाके समान होनेसे निस्स्वभाव हैं। जो जिसका स्वभाव होता है, वह उससे कभी पृथक् नहीं होता,
और वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता । परन्तु हम जितने पदार्थ देखते हैं, वे सब अपनी-अपनी
हेतुप्रत्यय-सामग्रीसे४ उत्पन्न होते हैं, और अपनी योग्य सामग्रीके अभावमें नहीं होते । इसलिये जो लोग
स्वभावसे पदार्थोंको भावरूप मानते हैं, वे लोग अहेतु-प्रत्ययसे पदार्थोंकी उत्पत्ति स्वीकार करना चाहते हैं ।
अतएव सम्पूर्ण पदार्थ परस्पर सापेक्ष हैं, कोई भी पदार्थ सर्वथा निरपेक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता । अतएव हम
१. प्रत्यक्षभासि धर्म्सु न पंचस्वंगुलीषु स्थितं
सामान्यं प्रतिभासते न च विकल्पाकारबुद्धौ तथा ।
ता एव स्फुटमूर्तयोऽत्र हि विभासन्ते न जातिस्ततः
सादृश्यभ्रमकारणो पुनरिमावेकोपलब्धध्वनी ॥
पंडित अशोक, सामान्यदूषणदिक्प्रसारिता, पृ. १०२ ।
२. देखिये पीछे, पृ. १२३-१२४ ।
३. अनिरुद्धमनुत्पादमनुच्छेदमशाश्वतं ।
अनेकार्थमनानार्थमनागममनिर्गमम् ॥ माध्यमिकवृत्ति प्रत्ययपरीक्षा ।
४. हेतुप्रत्ययं अपेक्ष्य वस्तुनः स्वभावता न इतरथा ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३०९
पदार्थोंका स्वभावकी अपेक्षा उत्पन्न होना नहीं मान सकते१। पदार्थ स्वभावसे भाव रूप नहीं हैं, इसलिये वे
परभावकी अपेक्षा भी उत्पन्न नहीं होते, अन्यथा सूर्यसे भी अन्धकारकी उत्पत्ति माननी चाहिये। पदार्थ
स्वभाव और परभावकी अपेक्षा उत्पन्न नहीं होते, इसलिये स्वभाव और परभाव दोनों ( उभय रूप ) से
भी उनकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। तथा भाव, अभाव और भावाभावसे पदार्थोंकी उत्पत्ति न होनेसे अनुभय
रूपसे भी पदार्थ उत्पन्न नहीं हो सकते।२ अतएव जिस प्रकार असत् मायागज सत् रूपसे प्रतीत होता है,
जिस प्रकार अपारमार्थिक माया परमार्थ रूपसे ज्ञात होती है, उसी तरह सम्पूर्ण अतात्त्विक धर्म अविद्याके
कारण तत्त्व रूपसे दृष्टिगोचर होते हैं। वास्तवमें न पदार्थ उत्पन्न होते हैं, न नष्ट होते हैं, न कहीं लाभ है, न
हानि है, न सत्कार है, न पराभव है, न सुख है, न दुख है, न प्रिय है, न अप्रिय है, न कहीं तृष्णा है, न कोई
जीवलोक है, न कोई मरनेवाला है, न कोई उत्पन्न होगा, न हुआ है, न कोई किसीका बन्धु है और न
कोई मित्र है।३ जो पदार्थ हमें भाव अथवा अभाव रूप प्रतीत होते हैं, वे केवल संवृति अथवा लोकसत्यकी
दृष्टिसे ही प्रतीत होते हैं। परमार्थ सत्यकी अपेक्षासे एक निर्वाण ही सत्य है, और बाकी सम्पूर्ण संस्कार
असत्य हैं। यह परमार्थ सत्य बुद्धिके अगोचर है, पूर्ण विकल्पोंसे रहित है, अनभिलाप्य है, अनक्षर है, और
अभिधेय-अभिधानसे रहित है। यद्यपि इस परमार्थ धर्मका उपदेश नहीं हो सकता, परन्तु जिस प्रकार
किसी म्लेच्छको कोई बात समझानेके लिए म्लेच्छकी ही भाषाका उपयोग करना पड़ता है, उसी प्रकार
संसारके प्राणियोंको निर्वाणका मार्ग प्रदर्शन करनेके लिये संवृति सत्यका उपयोग करना पड़ता है, क्योंकि
१. यः प्रत्ययैर्जायति स ह्यजातो
न तस्य उत्पादु स्वभावतोऽस्ति ।
यः प्रत्ययाधीनु स शून्य उक्तो ।
यः शून्यतां जानति सोऽप्रमत्तः ॥ बोधिचर्यावतार पंजिका पृ. ३५५ ।
जैन दर्शनमें वस्तुको स्वभावसे अशून्य और परभावसे शून्य माना गया है—सर्वस्य वस्तुनः स्वरूपादिना
अशून्यत्वात्पररूपादिना शून्यत्वात्। अमृतचन्द्र-पंचास्तिकाय १४ टीका। परन्तु पंचाध्यायीकारने
वस्तुको सर्वविकल्पातीत कहकर द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे स्वभावसे भी अस्तिरूप और परभावसे भी
नास्तिरूप नहीं माना है—
द्रव्यार्थिकनयपक्षादस्ति न तत्त्वं स्वरूपतोऽपि ततः ।
न च नास्ति परस्वरूपात् सर्वविकल्पातिगं यतो वस्तु ॥ पंचाध्यायी १-७५८ ।
सिद्धसेन दिवाकर भगवान्को शून्यवादी कहकर स्तुति करते हैं—
त्वमेव परमास्तिकः परमशून्यवादी भवान् ।
त्वमुज्जवलविनिर्णयोऽप्यवचनीयवादः पुनः ॥
परस्परविरुद्धतत्त्वसमयश्च सुश्लिष्टवाक् ।
त्वमेव भगवन्नकंप्यसु ( मु ) नयो यथा कस्तथा ॥ द्वा. द्वात्रिंशिका ३-२१ ।
२. न सन्नासन्न सदसन्न चाप्यनुभयात्मकं । बोधिचर्यावतार पंजिका, पृ. २५९ ।
३. एवं शून्येषु धर्मेषु किं लब्धं किं हृतं भवेत् ।
सत्कृतः परिभूतो वा केन कः संभविष्यति ।
कुतः सुखं वा दुःखं वा किं प्रियम् वा किमप्रियम् ।
का तृष्णा कुत्र सा तृष्णा मृग्यमाणा स्वभावतः ॥
विचारे जीवलोकः कः को नामात्र मरिष्यति ।
को भविष्यति को भूतः को बन्धुः कस्य कः सुहृत् ॥ बोधिचर्यावतार ९-१५२,३,४ ।
३१० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
संवृति सत्यका विना अवलम्बन लिये परमार्थका उपदेश नहीं किया जा सकता ।१ इसलिए सम्पूर्ण धर्मोंको
निस्स्वभाव—शून्य—ही मानना चाहिये । क्योंकि शून्यतासे ही पदार्थोंका होना संभव है ।२
शंका—यदि सम्पूर्ण पदार्थ शून्य हैं, और न किसी पदार्थका उत्पाद होता है और न निरोध होता
है,तो फिर चार आर्यसत्योंको, अच्छे और बुरे कर्मोंके फलको, बोधिसत्वकी प्रवृत्तिको और स्वयं बुद्धको भी
शून्य और मायाके समान मिथ्या मानना चाहिये । समाधान—बुद्धका उपदेश परमार्थ और संवृति इन
दो सत्योंके आधारसे हो होता है । जो इन दोनों सत्योंके भेदको नहीं समझता, वह बुद्धके उपदेशोंके ग्रहण
करनेका अधिकारी नहीं है। बौद्ध दर्शनमें बाह्य और आध्यात्मिक भावोंका प्रतिपादन, इन्हीं दो सत्योंके
आधारसे किया गया है ।३ साधारण लोग विपर्यासके कारण संवृति सत्यसे स्कंध, धातु, आयतन आदिको
तत्त्व रूपसे देखते हैं । परन्तु सम्यग्दर्शनके होनेपर तत्त्वज्ञ आर्य लोगोंको स्कंध आदि निस्स्वभाव प्रतीत होने
लगते हैं । इसलिये 'क्या अनन्त है, क्या अन्त-अनन्त ( उभय ) है, क्या अनुभय ( न अन्त और न अनन्त )
है, क्या अभिन्न है, क्या भिन्न है, क्या शाश्वत है, क्या अनित्य है, क्या नित्य-अनित्य है, और क्या अनुभय
( न नित्य और न अनित्य ) है'४, ये प्रश्न बुद्धिमानोंके मनमें नहीं उठते । स्वयं निर्वाण भी भाव रूप है,
या अभाव रूप, यह हम नहीं जान सकते । क्योंकि निर्वाण न उत्पन्न होता है, न निरुद्ध होता है, न वह
नित्य है, और न अनित्य है । निर्वाणमें न कुछ नष्ट होता है, और न कुछ उत्पन्न होता है५ । जो निर्वाण है,
वही संसार है और जो संसार है, वही निर्वाण है ।६ इसलिये भाव, अभाव, उभय, अनुभय इन चार कोटि-
योंसे रहित प्रपंचोपशमरूप निर्वाणको ही माध्यमिकोंने परमार्थ तत्त्व माना । है यद्यपि सर्व धर्मोंके निस्स्वभाव
होनेसे परमार्थ सत्य अनक्षर है, इसलिये तूष्णींभावको ही आर्योंने परमार्थ सत्य कहा७ है, परन्तु फिर भी
व्यवहार सत्य परमार्थ सत्यका उपायभूत है८ । जिस तरह संस्कृत धर्मोंसे असंस्कृत निर्वाणकी प्राप्ति होती है,
उसी तरह संवृति सत्यसे परमार्थ सत्यकी उपलब्धि होती है । वास्तवमें न प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंको प्रमाण
कहा जा सकता है, और न वास्तवमें पदार्थोंको क्षणिक ही कह सकते हैं । किन्तु जिस तरह कोई पुरुष
अपवित्र स्त्रीके शरीरमें पवित्र भावना रखता है, उसी तरह मूर्ख पुरुष मायारूप भावोंमें क्षणिक, अक्षणिक
१. तस्मात् सकलविकल्पाभिलापविकलत्वादनारोपितमसंवृतमनभिलाप्यं परमार्थतत्त्वं कथमिव प्रतिपादयितुं
शक्यते । तथापि भाजनश्रोतृजनानुग्रहार्थं ( परिकल्पमुपादाय ) संवृत्या निदर्शनोपदर्शनेन किंचिद-
भिधीयते । बोधिचयोवतार पंजिका, पृ. ३६३ ।
२. सर्वं च युज्यते तस्य शून्यता यस्य युज्यते ।
सर्वं न युज्यते तस्य शून्यता यस्य न युज्यते ॥ माध्यमिककारिका २४-१४ ।
३. द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।
लोकसंवृतिसत्यं च सत्यं च परमार्थतः ॥ माध्यमिककारिका २४-८ ।
४. माध्यमिककारिका, निर्वाणपरीक्षा ।
५. अप्रहीणमसांप्राप्तमनुच्छिन्नमशाश्वतं ।
अनिरुद्धमनुत्पन्नमेतन्निर्वाणमिष्यते ॥ माध्यमिककारिका निर्वाणपरीक्षा ।
६. निर्वाणस्य च या कोटिः कोटिः संसरणस्य च
न तयोरन्तरं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते ॥ माध्यमिककारिका, निर्वाणपरीक्षा ।
७. परमार्थो हि आर्याणां तूष्णींभावः । चन्द्रकीर्ति, माध्यमिकवृत्ति ।
८. उपायभूतं व्यवहारसत्यं उपेयभूतं परमार्थसत्यं ।
तयोर्विभागोऽवगतो न येन मिथ्याविकल्पः स कुमार्गजातः ॥
चन्द्रकीर्ति, मध्यमिकावतार ७-८० ।
आदि धर्मोंका प्रतिपादन करते हैं¹। और तो क्या परमार्थ सत्यसे बुद्ध और उसकी देशना भी मृगतृष्णाके
समान है। इसलिये धर्मोंके निस्स्वभाव होनेपर भी प्राणियोंकी प्रज्ञप्तिके लिये ही बुद्धने इनका उपदेश
किया है।²
शंका—शून्यवादियोंके मतमें सम्पूर्ण भाव शून्य हैं, इसलिये शून्यताको भी शून्य मानना चाहिये।
समाधान—वास्तवमें सम्पूर्ण पदार्थोंके निस्स्वभावत्वके साक्षात्कार करनेके लिये ही बुद्धने शून्यताका उपदेश
किया है। शून्यता भाव, अभाव, आदि चार कोटियोंसे रहित है, इसलिये शून्यताको अभाव (शून्य) रूप³,
नहीं कह सकते। हमारे मतमें भववासनाका नाश करनेके लिये ही शून्यताका उपदेश है, इसलिये शून्यतामें
भी शून्यता बुद्धि रखनेसे नैरात्म्यवादका साक्षात् अनुभव नहीं हो सकता। अतएव हमें भाव-अभिनिवेशकी
तरह शून्यतामें भी अभिनिवेश नहीं रखना चाहिये, अन्यथा भाव-अभिनिवेश और शून्यता-अभिनिवेश
दोनोंमें कोई अन्तर न रहेगा।⁴ जिस समय भाव, अभाव, शुद्धि, अशुद्धि रूप प्रपंचवृत्ति नहीं रहती उस
समय ईंधन रहित अग्निकी तरह सत् और असत्के आलम्बनसे रहित बुद्धि सम्पूर्ण विकल्पोंके उपशम होनेसे
शांत हो जाती है।
माध्यमिकवादके .प्रधान आचार्य नागार्जुन (१०० ई०) माने जाते हैं। नागार्जुनने शून्यवादके
स्थापन करनेके लिये चार सौ कारिकाओंमें माध्यमिककारिका नामक ग्रंथ लिखा है। इस ग्रंथके ऊपर नागा-
र्जुनने अकुतोभया नामकी टीका लिखी है। इसका अनुवाद तिब्बती भाषा में मिलता है। माध्यमिक-
कारिकापर बुद्धपालित और भावविवेकने भी टीकायें लिखी हैं, जो तिब्बती भाषामें हैं।
बुद्धपालित शून्यवादके अन्तर्गत प्रासंगिक सम्प्रदायके जन्मदाता कहे जाते हैं। बुद्धपालित शून्यवादके सिद्धांतों-
को स्थापित करके अन्य मतवालोंका खण्डनकर नागार्जुनके सिद्धांतोंकी रक्षा करना चाहते थे। भावविवेक
शून्यवादके दूसरे सम्प्रदाय स्वातंत्र्यिक मतके प्रतिष्ठाता हैं। ये आचार्य स्वतंत्र तर्कोंसे शून्यवादकी
सिद्धि करते थे। माध्यमिककारिकाके ऊपर चन्द्रकीर्तिने ( ५५० ई. ) प्रसन्नपदा नामकी संस्कृत टीका
लिखी है। यह टीका उपलब्ध है। नागार्जुनने सुहृल्लेख, युक्तिषष्टिका आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं। शून्य-
वादके दूसरे महान् आचार्य आर्यदेव हैं। ये नागार्जुनके शिष्य थे। इन्होंने चतुःशतक, चित्तविशुद्धि-
प्रकरण आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं।
१. अशुच्यादिषु शुच्यादिप्रसिद्धिरिव सा मृषा ॥
लोकावतारणार्थं च भावा नाथेन देशिताः ।
तत्त्वतः क्षणिका नैते संवृत्या चेद् विरुध्यते ॥ बोधिचर्यावतार ९-६, ७ ।
२. शून्यं इति न वक्तव्यं अशून्यं इति वा भवेत् ।
उभयं नोभयं चेति प्रज्ञप्त्यर्थं तु कथ्यते ॥
माध्यमिककारिका. २२-११ ।
३. शून्यवादियोंके ग्रन्थोंमें शून्यताका अन्तद्वयरहितत्व, मध्यमप्रतिपदा, परस्परअपेक्षिता, धर्मधातु आदि
शब्दोंसे उल्लेख किया गया है। रशियन विद्वान प्रोफेसर शेर्वाट्स्की ‘शून्यता’ का अनुवाद
'Relativity'—अपेक्षिता शब्दसे करते हैं। उक्त विद्वान् लेखकने यूरोपके हेगेल ( Hegel ),
ब्रैडले ( Bradley ) आदि महान् विचारकोंके सिद्धान्तोंके साथ 'शून्यवाद' की तुलना की है, और
सिद्ध किया है कि इस सिद्धान्तको Nihilism ( सर्वथा अभाव रूप ) नहीं कहा जा सकता। देखिये
लेखककी Conception of Buddhist Nirvana, पृ. ४९ से आगे।
४. सर्वसंकल्पहानाय शून्यतामृतदेशना ।
यस्य तस्यामपि ग्राह्यस्त्वसाववसादितः ॥ बोधिचर्यावतारपंजिका, पृ. ३५९ ।
३१२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
विज्ञानवाद
इसे योगाचार भी कहते हैं। विज्ञानवादी भी शून्यवादियोंकी तरह सब धर्मोंको निस्स्वभाव२
मानते हैं। विज्ञानवादियोंके मतमें विज्ञानको छोड़कर बाह्य पदार्थ कोई वस्तु नहीं हैं। जिस प्रकार जलता
हुआ काष्ठ ( अलातचक्र ) चक्र रूपसे घूमता हुआ मालूम होता है, अथवा जिस प्रकार तैमिरिक पुरुषको
केशमें मच्छरका ज्ञान होता है, उसी तरह कुदृष्टिसे युक्त लोगोंको अनादि वासनाके कारण पदार्थोंका एकत्व,
अन्यत्व, उभयत्व और अनुभयत्व रूप ज्ञान होता है, वास्तवमें समस्त भाव स्वप्न-ज्ञान, माया और गन्धर्व
नगरकी तरह असत् रूप३ हैं। इसलिये परमार्थ सत्यसे स्वयंप्रकाशक विज्ञान ही सत्य है। यह सब दृश्य-
मान जगत विज्ञानका ही परिणाम है, और यह संवृति सत्यसे ही दृष्टिगोचर होता है।४ विज्ञानवादियोंके मतमें
चित्त ही हमारी वासनाका मूल कारण है। इस चित्तमें सम्पूर्ण धर्म कार्यरूपसे उपनिवद्ध होते हैं, अथवा यह
चित्त सम्पूर्ण धर्मोंमें कारणरूपसे उपनिबद्ध होता है, इसलिये इसे आलयविज्ञान कहते हैं। यह आलयविज्ञान
सम्पूर्ण क्लेशोंका बीज हैं५। जिस प्रकार जलका प्रवाह तृण, लकड़ी आदिको बहाकर ले जाता है, उसी
तरह यह आलयविज्ञान स्पर्श, मनस्कार आदि धर्मोंको आकर्षित करके अपने प्रवाहसे संसारको उत्पन्न
करता हैं६। जिस प्रकार समुद्रमें कल्लोलें उठा करती हैं, वैसे ही दृश्य पदार्थोंको स्वचित्तसे भिन्न समझनेसे,
१. विज्ञानवादियोंके मतमें जो योगकी साधना करके बोधिसत्वकी दशभूमिको प्राप्त करते हैं, उन्हींको
बोधिकी प्राप्ति होती है, इसलिये इस सम्प्रदायको योगाचार नामसे कहा जाता हैं। विद्वानोंका कहना
है कि असंगके योगाचारभूमिशास्त्र नामक ग्रंथके ऊपरसे ब्राह्मणोंने विज्ञानवादको योगाचार संज्ञा
दी है।
२. त्रिविधस्य स्वभावस्य त्रिविधां निस्स्वभावतां ।
संधाय सर्वधर्माणां देशिता निस्स्वभावता ॥ वसुबंधु-त्रिंशिका २६ ।
- तात्विक दृष्टिसे विचार किया जाय तो विज्ञानवाद और शून्यवादमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों सम्पूर्ण
पदार्थोंको निस्स्वभाव कहते हैं। अनन्तर इतना ही है कि विज्ञानवादी बाह्य पदार्थोंको मानकर उन्हें केवल
विज्ञानका परिणाम कहते हैं, जब कि शून्यवादी बाह्य पदार्थोंको मायारूप मानकर निस्स्वभाव सिद्ध
करनेमें सम्पूर्ण शक्ति लगा देते हैं। परन्तु जब उनसे पूछा जाता है कि यदि आप लोगोंके मतमें बाह्य
पदार्थोंकी तरह माया स्वभावको ग्रहण करनेवाली कोई बुद्धि नहीं मानी गई, तो मायाकी उपलब्धि
किस प्रकार होती है? तो विज्ञानवादी उत्तर देता है कि ये सम्पूर्ण पदार्थ चित्तके विकार हैं, जो
अनादि वासनाके कारण उत्पन्न होते हैं। देखिये दासगुप्त, A History of Indian philosophy,
पृ. १६६,७, तथा बोधिचर्यावतारपंजिका ६-१५ से आगे।
३. चित्तं केशोण्डुकं माया स्वप्नगंधर्वमेव च ।
अलातं मृगतृष्णा च असन्तः ख्याति वै नृणाम् ॥
नित्यानित्यं तयैकत्वभुभयं नोभयं तथा ।
अनादिदोपसंबंधाः बालाः कल्पंति मोहिताः ॥ लंकावतार २-१५७,८ ।
४. द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।
बाह्योऽर्थः सांवृतं सत्यं चित्तमेकमसांवृतम् ॥
५. सर्वसांक्लेशिकधर्मबीजस्थानत्वात् आलयः । आलयः स्थानमिति पर्यायौ । अथवा लीयन्ते उपनिबध्यंतेऽ-
स्मिन् सर्वधर्माः कार्यभावेन । तद्वा लीयते उपनिबध्यते कारणभावेन सर्वधर्मेषु इत्यालयः । विजानाति
विज्ञानं । त्रिंशिका २, स्थिरमतिभाष्य पृ० १८ ।
६. यथा हि ओघः तृणकाष्ठगोमयादीनाकर्षयन् गच्छति एवं आलयविज्ञानमपि पुण्यापुण्यानेज्यकर्मवासना-
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३१३
अनादि कालकी वासनासे, पदार्थोंका दृष्टा और दृश्य रूप समझनेवाली विज्ञानप्रकृतिके स्वभावसे, तथा
पदार्थोंका विचित्र अनुभव करनेसे १ आलयविज्ञानमें प्रवृत्तिविज्ञानकी लहरें उठा करती हैं। यह आलय-
विज्ञान उत्पाद, स्थिति और लयसे रहित है २, परन्तु यह क्षणिक धारा है, कोई नित्य पदार्थ नहीं। जिस
समय अविद्याके नष्ट होनेसे वासनाका अंकुर नष्ट हो जाता है, उस समय क्षोभोत्पादक ग्राह्य-ग्राहक भाव
भी नहीं रहता। इस दशामें अहंकारसे रहित आलयविज्ञान भी व्यावृत्त हो जाता है और केवल एक
निर्मल चित्त अविशिष्ट रहता है। इसी अवस्थाको अर्हद्ववस्थाके नामसे कहा गया है; ३ और यहाँ योगी
लोगोंका चित्त अद्वयलक्षण विज्ञप्तिमात्रमें ही स्थित हो जाता है। इस दशाको विज्ञानवादियोंके शास्त्रोंमें
तथता, शून्यता, तथागतगर्भ आदि नामोंसे कह कर उसका नित्य, ध्रुव, शिव और शाश्वत रूपसे वर्णन
किया गया है। ४
शंका—यदि सम्पूर्ण धर्म केवल विज्ञप्तिमात्र हैं, तो चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रिय रूप आदिको वे कैसे
जानते हैं। समाधान—जब तक योगी लोग अद्वयलक्षण विज्ञप्तिमात्रताका साक्षात्कार नहीं करते, उस
समय तक पदार्थोंमें ग्राह्य-ग्राहक रूप प्रवृत्तिका नाश नहीं होता ५। इस कारण वासनाके कारण ही इन्द्रियोंसे
पदार्थोंका ग्राह्य-ग्राहक रूप ज्ञान होता है, वास्तवमें समस्त धर्म विज्ञानरूप ही हैं।
शंका—विज्ञानवादी लोग तथागतगर्भका नित्य, ध्रुव आदि विशेषणोंसे वर्णन करते हैं। इसी प्रकार
तैर्थिक लोग भी आत्माको नित्य, कर्ता, निर्गुण और विभु कहते हैं। फिर बुद्ध भगवानके नैरात्म्यवाद और
तैर्थिकोंके आत्मवादमें क्या अन्तर है ? ६ समाधान—तथागतगर्भका उपदेश तैर्थिकोंके आत्मवादके तुल्य
नहीं है। मूर्ख तैर्थिक लोगोंको नैरात्म्यवादके सुननेसे भय उत्पन्न होता है, इसलिये तथागतने सम्पूर्ण
नुगतं स्पर्शमनास्कारादीनामाकर्षयत् स्रोतसा संसारमभ्युपरतं प्रवर्त्तत इति । विशिका ४, स्थिरमति-
भाष्य, पृ. २२।
१. स्वचित्तदृश्यग्रहणानववोध, अनादिकालप्रपंचदौष्ठुल्यरूपवासनाभिनिवेश, विज्ञानप्रकृतिस्वभाव और विचि-
त्ररूपलक्षणकौतूहल ।
२. उत्पादस्थितिभंगवर्जम् ।
३. तस्यां हि अवस्थायां आलयविज्ञानाश्रितदौष्ठुल्यनिरवशेषप्रहाणादालयविज्ञानं व्यावृत्तं भवति । सैव
चार्हद्वस्था । त्रिंशिका ४ भाष्य ।
४. असंगने इसका वर्णन निम्न प्रकारसे किया है—
न सन्न चासन्न तथा न चान्यथा
न जायते व्येति न चावहीयते ।
न वर्धते नापि विशुद्धयते पुनः
विशुद्ध्यते तत्परमार्थलक्षणम् ।। महायानसूत्रालंकार ।
५. यावद् विज्ञप्तिमात्रत्वे विज्ञानं नावतिष्ठति ।
ग्राह्यद्वयस्यानुशयस्तावन्न विनिवर्तते ॥
यावद् अद्वयलक्षणे विज्ञप्तिमात्रे योगिनश्चित्तं न प्रतिष्ठितं भवति ।
तावद् ग्राह्यग्राहकानुशयो न विनिवर्तंते न प्रहीयत । त्रिंशिका २६ भाष्य ।
६. प्रो. शेर्वाट्स्की (Stcherbatsky) ने विज्ञानवादियोंके आलयविज्ञानके सिद्धांतको, विचारसंततिको छोड़
प्रच्छन्न रूपसे नित्य आत्मा माननेके सिद्धांतकी ओर आना बताया है—This represents a
४०
३१४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
धर्मोंको तथागतगर्भ कहकर तीर्थिकोंको आकर्षण करनेके लिये उपदेश दिया है । इसीलिये इसमें वोधिसत्त्वों-
को आत्मदृष्टि नहीं करनी चाहिये ।१
असंग, वसुबंधु, नन्द, दिङ्नाग, धर्मपाल, शीलभद्र ये विज्ञानवादके प्रधान आचार्य माने जाते हैं।
असंग ( ४८० ई. ), जिन्हें आर्यसंग भी कहा जाता है, और वसुबंधु दोनों सगे भाई थे। ये पेशावर
( पुरुषपुर ) के रहने वाले ब्राह्मण थे। जीवनके प्रारंभमें वसुबंधु सर्वास्तित्त्ववादका प्रतिपादन करते थे और
अपने जीवनके अंतिम वर्षोंमें अपने बड़े भाई असंगके प्रभावसे विज्ञानवादका प्रतिपादन करने लगे थे। पहले
असंगको विज्ञानवादका प्रतिष्ठाता समझा जाता था, परन्तु अव मैत्रेय ( मैत्रेयनाथ ) ऐतिहासिक व्यक्ति
समझने जाने लगे हैं। मैत्रेय असंगके गुरु थे, और इन्होंने ही योगाचारकी नींव रक्खी। मैत्रेयनाथने सूत्रा-
लंकार, मध्यान्तविभंग, धर्मधर्मताविभंग, महायानउत्तरतन्त्रशास्त्र, अभिसमयालंकारकारिका आदि ग्रंथोंका
निर्माण किया है। असंगने महायानसूत्रालंकार, योगाचारभूमिशास्त्र, महायानसूत्र, पंचभूमि, अभिधर्मसमु-
च्चय, महायानसंग्रह आदि शास्त्र लिखे हैं। वसुबंधुने अभिधर्मकोष, परमार्थसप्तति, विंशतिकाविज्ञप्तिमात्रता-
सिद्धि, त्रिंशिकाविज्ञप्तिमात्रता तथा सद्धर्मपुण्डरीक, प्रज्ञापारमिता आदि महायानसूत्रोंके ऊपर टीकायें लिखीं
disguised return from the theory of a stream of the thought to the doctrine
of substantial soul.
The conception of Buddhist Nirvana, पृ. ३२.
यामाकामी सोगेन ( Yamakami sogen ) ने आलयविज्ञान और आत्माकी तुलना करते
हुए लिखा है—
The Alayavijnana of the Buddhists has its counterpart in the
Atman of the orthodox Hindu system of philosophy, with this difference
that the Atman is immutable while the Alayavijnana is continuously chan-
ging........It might be said to be mutable while the Soul is immutable, but
it may be said to resemble soul in its continuity. Our consciousnesses
are dependent upon the Alayavijnana. They act or stop, but the Alaya-
vijnana is continuously a consciosness. It is universal only in .the sense
that it can go everywhere, while the Atman is said to be present every-
where. The Alayavijnana is said to attain its liberation and amala-
gamate with the ocean of the 'Great Atman' while the Alayavijnana is
the name given to consciousness in the stage of the common people and
of one who has just attained the seventh Bhumi or realm of Bodhisattva.
Systems of Buddhistic Thought
अध्याय. ६, पृ. २११, २३७ ।
१. भगवानाह । न हि महामते तीर्थकरात्मवादतुल्यो मम तथागतगर्भोपदेशः । किंतु महामते तथागताः
शून्यताभूतकोटिनिर्वाणानुत्पादानिमित्ताप्रणिहिताद्यानां महामते पदार्थानां तथागतगर्भोपदेशं कृत्वा
तथागता अर्हन्तः सम्यक्संबुद्धाः बालानां नैरात्म्यसंत्रासपदविवर्जितार्थं निर्विकल्पनिर्राभासगोचरं तथागत-
गर्भमुखोपदेशेन देशयन्ति । न चात्र महामते अनागतप्रत्युत्पन्नैः बोधिसत्त्वैर्महासत्त्वैरात्माभिनिवेशकर्तव्यः ।
........एवं हि महामते तथागतगर्भोपदेशमात्मवादाभिनिविष्टानां तीर्थकराणामाकर्षणार्थं तथागतगर्भो-
पदेशेन निदिशन्ति । लंकावतार पृ. ७७ ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३१५
हैं। महायान सम्प्रदायके प्ररूपण करनेवाले आचार्योंका नाम लेते समय अश्वघोषका स्थान बहुत महत्त्वका
है। अश्वघोष (८० ई०) तथतावाद नामके एक नूतन सिद्धांतके जन्मदाता थे। अश्वघोषने
लंकावतारसूत्रके आधारसे अपने महायान मार्गके तत्त्वदर्शनकी रचना की है। अश्वघोष अपने जीवनके
प्रारंभमें बड़े भारी विद्वान् थे। अश्वघोषका सिद्धांत केवल शून्यविज्ञानवादका सिद्धांत नहीं है, बल्कि उसमें
उपनिषदोंके शाश्वतवादकी छाया स्पष्ट मालूम देती है। अश्वघोषने श्रद्धोत्पादशास्त्र, बुद्धचरित, सौंदरानन्द,
सूत्रालंकार, वज्रसूचि आदि अनेक बौद्ध शास्त्रोंकी रचना की है।
बौद्धोंका अनात्मवाद
( १ ) उपनिषद्कारोंका मत है कि आत्मा नित्य, सुख और आनन्द रूप है, और यह दृश्यमान जगत
इस आत्माका ही रूप है। पति पत्नीको और पत्नी पतिको एक दूसरेके सुखके लिये प्यार नहीं करते, परन्तु
प्राणीमात्रको प्रवृत्ति अपनी-अपनी आत्माके सुखके लिये होती है, अतएव आत्मा सर्वप्रिय है। इसलिये
आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिये; क्योंकि आत्माके दर्शन, श्रवण, आदिसे
समस्त ब्रह्माण्डका ज्ञान होता है ।१ ( २ ) नैयायिक-वैशेषिकोंकी मान्यता है कि आत्मा नित्य और सर्वव्यापी
है । इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुख, और ज्ञान ये आत्माके जाननेके लिंग हैं। आत्मा शरीरसे भिन्न होकर
कर्मोंका कर्ता और भोक्ता है। आत्माको चेतनाके संबंधसे चेतन कहा जाता है। (३) मीमांसकोंके मतमें
आत्मा चैतन्यरूप है। आत्माके सुख, दुखके सम्बन्धसे आत्मामें परिवर्तन होना कहा जाता है, वास्तवमें नित्य
आत्मामें परिवर्तन नहीं होता। ( ४ ) सांख्य लोगोंका मत है कि आत्मा नित्य, व्यापक निर्गुण और स्वयं
चैतन्यरूप है । बुद्धि और चैतन्य परस्पर भिन्न हैं। अतएव बुद्धिके सम्बन्धसे आत्माको चेतन नहीं कह सकते ।
आत्मा निष्क्रिय है, इसलिये इसे कर्ता और भोक्ता भी नहीं कह सकते। प्रकृति ही करने और भोगनेवाली
है। प्रकृति और आत्माका सम्बन्ध होनेसे संसारका आरम्भ होता है। (५) जैन लोगोंका कथन है कि
यदि आत्माको सर्वव्यापी और सर्वथा अमूर्त मानकर निरवयव माना जाय तो निरंश परमाणुकी तरह
आत्माका मूर्त शरीरसे सम्बन्ध तथा आत्मामें ध्यान, ध्येय आदिका व्यवहार और आत्माको मोक्षकी प्राप्ति
नहीं हो सकती, इसलिये आत्मा व्यवहार नयकी अपेक्षा संकोच और विस्तारवाला होकर सावयव है, तथा
निश्चय नयसे अमूर्त होनेके कारण लोकव्यापी है।
बौद्ध लोग आत्मवादियोंकी उक्त सम्पूर्ण मान्यताओंका विरोध करते हैं।२ उन लोगोंका कथन है
कि आत्माको नित्य स्वतन्त्र द्रव्य माननेमें दर्शनशास्त्र ( Metaphysical ) और नीतिशास्त्र ( Ethical )
सम्बन्धी दोनों तरहकी कठिनाइयां आती हैं। यदि आत्माको सर्वथा नित्य स्वीकार किया जाय तो उसमें
बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था नहीं बन सकती है। "यदि आत्माको कूटस्थ नित्य मानें तो वह अनन्त काल
तक एक-रस रहनेवाला होगा। फिर सदाके लिये रहनेवाले आत्मापर अनुभवोंका ठप्पा कैसे पड़ सकता है ?
यदि पड़ सके तो ठप्पा पड़ते ही उसका रूप परिवर्तन हो जायगा। आत्मा कोई जड़ पदार्थ नहीं है जिससे
सिर्फ बाह्य अवयवपर ही लांछन हो। वह तो चेतनमय है, इसलिये ऐसी अवस्थामें इन्द्रियजनित ज्ञान
उसमें सर्वत्र प्रविष्ट हो जायगा। वह राग, द्वेष, मोह--इन नाना प्रकारोंमेंसे किसी एक रूपवाला हो जायगा।
१. स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति आत्मनस्तु कामाय पति प्रियो भवति । न वा
अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति आत्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।''''''''न वा अरे सर्वस्य
कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा
दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् । बृहदारण्यक उ. २-४-५
२. आत्मवादियोंके पूर्वपक्ष और उसके खंडनके लिये देखिये बोधिचर्यावतार परिच्छेद ९, पृ. ४५२ से आगे;
तत्त्वसंग्रह, पृ. ७९-१३० आत्मपरीक्षा नामका प्रकरण ।
३१६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
तब फिर वह वही आत्मा नहीं हो सकता, जो ठप्पा लगनेसे पहले था । अतएव वह एक-रस भी नहीं हो
सकता । फिर आत्मा नित्य कैसे हो सकता है ? यदि थोड़ी देरके लिये मान भी लें कि आत्मा में ठप्पा
लगता है तो वह अभौतिक संस्कार भी नित्य आत्मामें लगकर अविचल हो जायगा । तब फिर शुद्धि या
मुक्तिकी आशा कैसे की जा सकती है ?........'जो लोग पुनर्जन्म भी मानते हैं और साथ-साथ आत्माको नित्य
भी, उनकी ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। जब वह नित्य है तो कूटस्थ भी है, अर्थात् सदा एक-रस
रहेगा, फिर ऐसी एक-रस वस्तुको यदि परिशुद्ध मानते हैं तो वह जन्म-मरणके फेरमें कैसे पड़ सकता है ?
यदि अशुद्ध है तो स्वभावतः अशुद्ध होनेसे उसकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? नित्य कूटस्थ होनेपर संस्कारकी
छाप उसपर नहीं पड़ सकती, यह हम पहले कह चुके हैं । यदि छापके लिए मनको मानते हैं, तो आत्मा
माननेकी जरूरत ही क्या रह जाती है ?'१ नित्य आत्माको माननेमें यह दर्शनशास्त्र सम्बन्धी कठिनाई है ।
आत्माके माननेमें दूसरी कठिनाई यह आती है कि प्रिय वस्तुको लेकर ही सम्पूर्ण दुख उत्पन्न होते हैं, इसलिये
जिस समय मनुष्यको अपनी आत्मा सर्वप्रिय हो जाती है, उस समय मनुष्य अपनी आत्माकी सुखसाधन
सामग्रियां जुटानेके लिये अहंकारका अधिकाधिक पोषण करने लगता है, फलतः मनुष्यके दुखकी उत्तरोत्तर
वृद्धि होती है२ । अतएव बौद्धोंने आत्माको कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं मानकर रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और
संस्कार इन पांच स्कन्धोंके३ समूहसे उत्पन्न होनेवाली शक्तिको आत्मा अथवा विज्ञान नामसे कहा है । यह
विज्ञान प्रतिक्षण नदीके प्रवाहकी तरह (नदीसोतोविय)४ बदलता रहता है । जिस प्रकार दीपककी ज्योति
क्षण-क्षणमें बदलते रहने पर भी सदृश परिवर्तनके कारण एक अखण्ड रूपसे मालूम होती है, अथवा जिस
१. राहुल सांकृत्यायन-मज्झिमनिकाय भूमिका पृ. त ।
२. दुःखहेतुरहंकार आत्ममोहात्तु वर्धते ।
ततोऽपि न निवर्त्यश्चेत् वरं नैरात्म्यभावना ॥ बोधिचर्यावतार ६-७८ ।
साहंकारे मनसि न शमं याति जन्मप्रबंधो । नाहंकारश्चलति हृदयादात्मदृष्टौ च सत्याम् ।
अन्यः शास्ता जगति भवतो नास्ति नैरात्म्यवादी । नान्यस्तस्मादुपशमविधेस्त्वन्मतादस्तिमार्गः ॥
तत्त्वसंग्रहपंजिका, पृ. ९०५ ।
तुलनीय—जन्मयोनिर्यतस्तृष्णा ध्रुवा सा चात्मदर्शने । तदभावे च नेयं स्याद्बीजाभावे इवांकुरः ।
न ह्यपश्यन्नहमिति स्निह्यात्यात्मनिकश्चन । न चात्मनि विना प्रेम्णा सुखहेतुषु धावति ॥
यशोविजय, द्वा. द्वात्रिंशिका २५-४,५ ।
३. नात्मास्ति स्कंधमात्रं तु कर्मक्लेशाभिसंस्कृतम् ।
अन्तराभवसन्तत्या कुक्षिमेति प्रदीपवत् ॥
आत्मेति नित्यो ध्रुवः स्वरूपतोऽविपरिणामधर्मा कश्चित् पदार्थों नास्ति । कर्मभिः अविद्यादि-
क्लेशैश्च संस्कारमापन्नं पंचस्कंधमात्रमेव, अन्तराभवसन्तानक्रमेण गर्भं प्रविशति । क्षणे क्षणे उत्पद्यमानं
विनश्यमानमपि तत् स्कंधपंचकं स्वसन्तानद्वारा प्रदीपकलिकावत् एकत्वं बोधयति । अभिधर्मकोश
३-१८ टीका ।
४. अमेरिकाके मानसशास्त्रवेत्ता प्रो. विलियम जेम्स (William James) ने भी विज्ञान (Consci-
ousness) को विचारोंका प्रवाह मानते हुए नित्य आत्माके स्थानपर चित्तसन्तति (Stream of
Thought) को स्वीकार किया है—The unity, the identity, the individuality, and
the immateriality that appear in the psychic life are thus accounted for as
phenomenal and temporal facts exclusively, and with no need of reference
to any more simple or substantial agent than the present Thought or
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३१७
प्रकार नदीमें प्रत्येक क्षण नये नये जलके आते रहनेपर भी नदीके जल-प्रवाहका अविकल रूपसे ज्ञान होता
है, उसी तरह बाल, युवा और वृद्ध अवस्थामें विज्ञानमें प्रतिक्षण परिवर्तन होनेपर भी समान परिवर्तन
होनेके कारण विज्ञान ( आत्मा ) का एक रूप ज्ञान होता है। बौद्धोंका कहना है कि इस विज्ञानप्रवाह
( चित्तसंतति ) के माननेसे काम चल जाता है, अतएव आत्माको अलग स्वतंत्र पदार्थ माननेकी आवश्य-
कता नहीं।
भवसन्तति
बौद्ध आत्माको न मानकर भी भवकी परम्परा किस प्रकार स्वीकार करते हैं, यह मिलिन्दपण्हके
निम्न संवादसे भली भांति स्पष्ट होता है¹—
मिलिन्द—भन्ते नागसेन ! दूसरे भवमें क्या उत्पन्न होता है ?
नागसेन—महाराज ! दूसरे भवमें नाम और रूप उत्पन्न होता है ।
मिलिन्द—क्या दूसरे भवमें यही नाम और रूप उत्पन्न होता है ?
नागसेन—दूसरे भवमें यही नाम और रूप उत्पन्न नहीं होता। परन्तु लोग इस नाम और रूपसे
अच्छे, बुरे कर्म करते हैं, और इस कर्मसे दूसरे भवमें दूसरा नाम और रूप उत्पन्न होता है ।
मिलिन्द—यदि यही नाम-रूप दूसरे भवमें उत्पन्न नहीं होता, तो हमें अपने बुरे कर्मोका फल नहीं
भोगना चाहिये ?
नागसेन—यदि हमें दूसरे भवमें उत्पन्न न होना हो, तो हमें अपने बुरे कर्मोंका फल न भोगना पड़े,
परन्तु हमें दूसरे भवमें उत्पन्न होना है, अतएव हम बुरे कर्मों से निवृत्त नहीं हो सकते ।
मिलिन्द—कोई दृष्टांत देकर समझाइये ।
नागसेन—कल्पना करो कि कोई आदमी किसीके आम चुरा लेता है । आमों का मालिक चोरको
पकड़कर राजाके पास लाता है और राजासे उस चोरको दण्ड देनेकी प्रार्थना करता है । अब, यदि चोर
कहने लगे कि मैंने इस आदमीके आम नहीं चुराये, क्योंकि जो आम इन आमोंके मालिकने बागमें लगाये थे,
वे आम दूसरे थे, और जो आम मैंने चुराये हैं, वे दूसरे हैं, इसलिये मैं दण्डका पात्र नहीं हूं, तो क्या वह
चोर दण्डका भागी नहीं होगा ?
मिलिन्द—अवश्य ही आमों का चोर दंडका पात्र है ।
नागसेन—किस कारणसे ?
मिलिन्द—क्योंकि पिछले आम पूर्वके आमोंसे ही प्राप्त हुए हैं ।
नागसेन—ठीक इसी प्रकार इस नाम-रूपसे हम अच्छे, बुरे कर्मोंको करते हैं और इस कर्मसे दूसरे
भवमें दूसरा नाम और रूप उत्पन्न होता है। अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि 'यदि यही नाम दूसरे
भवमें उत्पन्न नहीं होता तो हमें अपने बुरे कर्मोंका फल नहीं भोगना चाहिए ।'
'section' of the stream........But the Thought is a perishing and not an
immortal or incorruptible thing. Its successors may continuously succeed
to it, resemble it, and appropriate it, but they are not it, whereas the soul
substance is supposed to be a fixed unchanging thing. The Principles of
Psychology, अध्याय. १०, पृ. ३४४, ३४५।
१. मिलिन्दपण्ह, अध्याय २, पृ. ४६ ।
३१८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
बौद्धोंका कथन है कि जिस प्रकार एक दीपक से दूसरे दीपकके जलाये जानेपर पहला दीपक दूसरे
दीपकके रूपमें नहीं बदल जाता, अथवा जिस प्रकार गुरुके शिष्यको विद्या दान करनेपर गुरुका सिखाया हुआ
श्लोक शिष्यके सीखे हुए श्लोकमें नहीं परिणत होता, उसी प्रकार बिना किसी नित्य पदार्थके माने विज्ञान-
सन्ततिके द्वारा भवपरम्परा चलती है । जिस समय जीवकी मृत्यु होती है, उस समय मरनेके समयमें
रहनेवाला विज्ञान संस्कारोंकी दृढ़तासे गर्भमें प्रविष्ट होकर फिरसे दूसरे नाम-रूपसे संबद्ध हो जाता है ।
अतएव एक विज्ञानका मरण और दूसरे विज्ञान का जन्म होता है । जिस प्रकार ध्वनि और प्रतिध्वनिमें,
मुहर और उसकी छापमें, पदार्थ और पदार्थ के प्रतिबिम्बमें कार्य-कारण संबंध है, उसी तरह एक विज्ञान
और दूसरे विज्ञानमें कार्य-कारण संबंध है । विज्ञान कोई नित्य वस्तु नहीं है । इस विज्ञानकी परम्परासे
दूसरे भवमें जो मनुष्य उत्पन्न होता है, उस मनुष्यको न पहला ही मनुष्य कह सकते हैं, और न उसे पहले
मनुष्यसे भिन्न ही कहा जा सकता है ।१ अतएव जिस प्रकार कपासके बीजको लाल रंगसे रंग देनेसे उस
बीजका फल भी लाल रंगका उत्पन्न होता है, उसी तरह तीव्र संस्कारोंकी छापके कारण अविच्छिन्न संतानसे
यह मनुष्य दूसरे भवमें भी अपने किये हुए कर्मोंके फलको भोगता है । इसलिये जिस प्रकार डाकुओंसे हत्या
किये जाते हुए मनुष्यके टेलीफोन द्वारा पुलिसके थानेमें खबर देनेसे मनुष्यके अंतिम वाक्योंसे मरनेके पश्चात्
भी मनुष्यकी क्रियायें जारी रहती हैं,२ उसी तरह संस्कारकी दृढ़ताके बलसे मरनेके अंतिम चित्त-क्षणका जन्म
लेनेके पूर्व-क्षणके साथ संबंध होता है । वास्तवमें आत्माका पुनर्जन्म नहीं होता, किन्तु जिस समय कर्म
( संस्कार ) अविद्या से संबद्ध होता है, उस समय कर्मका पुनर्जन्म कहा जाता३ है । इसीलिये बौद्ध दर्शनमें
कर्मको छोड़कर चेतना अलग वस्तु नहीं है ।४
बौद्ध साहित्यमें आत्मासंबंधी मान्यतायें
बौद्ध साहित्यमें आत्माके संबंधमें भिन्न-भिन्न मान्यतायें उपलब्ध होती हैं । संक्षेपमें इन मान्यताओंको
हम चार विभागोंमें विभक्त कर सकते हैं । ( १ ) मिलिन्दपण्ह आदि ग्रंथोंके अनुसार पांच स्कंधोंको छोड़-
कर आत्मा कोई पृथक् पदार्थ नहीं है । इसलिये पंच स्कंधोंके समूहको ही आत्मा कहना चाहिये । ( २ )
पांच स्कंधोंके अतिरिक्त नैयायिक आदि मतोंकी तरह आत्मा पृथक् पदार्थ है । ( ३ ) आत्माका अस्तित्व
१. मिलिन्दपण्ह अध्याय २, पृ. ४०-५० । स्पष्टीकरणके लिये देखिये बोधिचर्यावतार ९-७३ की पंजिका;
तत्त्वसंग्रह, कर्मफलसंबंधपरीक्षा तथा लोकायतपरीक्षा नामक प्रकरण ।
२. मिसेज राइस डेविड्स, Buddhist Psychology, पृ. २५ ।
३. देखिये वारेन ( Warren ) की Buddhism in Translation पुस्तकका Rebirth and not
Transmigration नामक अध्याय, पृ. २३४-२४१ ।
४. (क) चेतनाहं भिक्खवे कम्मंति वदामि । अंगुत्तरनिकाय ३-४५ ।
(ख) सत्वलोकमथ भाजनलोकं चित्तमेव रचयत्यतिचित्रं ।
कर्मजं हि जगदुक्तमशेषं कर्मचित्तमवधूय न चास्ति ।। बोधिचर्यावतारपंजिका, पृ. ४७२ ।
(ग) कम्मा विपाका वत्तन्ति विपाको कम्मसंभवो ।
कम्मा पुनब्भवा होंति एवं लोको पवत्तति ॥
कम्मस्स कारको नत्थि विपाकस्स च वेदको ।
सुद्धधम्मा पवत्तन्ति एवेतं सम्मदस्सनं ॥
विसुद्धिमग्ग, अध्याय १९ ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३१९
तो है परन्तु इसे 'अस्ति' और 'नास्ति' दोनों नहीं कह सकते। यह मत वात्सीपुत्रीय बौद्धों का है ।¹ ( ४ )
आत्मा है। या नहीं, यह कहना असंभव है। इन चारों मान्यताओंका स्पष्टीकरण :
( १ ) आत्मा पाच स्कंधोंसे भिन्न नहीं है :
मिलिन्द—भन्ते ! आपका क्या नाम है ?
नागसेन—महाराज ! नागसेन। परन्तु यह व्यवहारमात्र है, कारण कि पुद्गल² ( आत्मा ) की
उपलब्धि नहीं होती।
मिलिन्द—यदि आत्मा कोई वस्तु नहीं है तो आपको कौन पिंडपात ( भिक्षा ) देता है, कौन उस
भिक्षाका सेवन करता है, कौन शीलकी रक्षा करता है, ओर कौन भावनाओंका चिन्तन करनेवाला है ?
तथा फिर तो अच्छे, बुरे कर्मोंका कोई कर्ता और भोक्ता भी न मानना चाहिये, आदि ।
नागसेन—मैं यह नहीं कहता ।
मिलिन्द—क्या रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञानसे मिलकर नागसेन बने हैं ?
नागसेन—नहीं ।
मिलिन्द—क्यां पांच स्कंधोंके अतिरिक्त कोई नागसेन हैं ?
नागसेन—नहीं ।
मिलिन्द—तो फिर सामने दिखाई देनेवाले नागसेन क्या हैं ?
नागसेन—महाराज ! आप यहां रथसे आये हैं, या पैदल चलकर ?
मिलिन्द—रथ से ।
नागसेन—आप यहां रथसे आये हैं, तो मैं पूछता हूं कि रथ किसे कहते हैं ? क्या पहियोंको रथ
कहते हैं ? क्या धुरेको रथ कहते हैं ? क्या रथमें लगे हुए डण्डोंको रथ कहते हैं ?
( मिलिन्दने इनका उत्तर नकारमें दिया )
नागसेन—तो क्या पहिये, धुरे, डण्डे आदिके अलावा रथ अलग वस्तु है ?
( मिलिन्दने फिर नकार कहा )
नागसेन—तो फिर जिस रथ से आप आये हैं, वह क्या है ?
मिलिन्द—पहिये, धुरा, डण्डे आदि सबको मिलाकर व्यवहारसे रथ कहा जाता है। पहिये आदि-
को छोड़कर रथ कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं ।
नागसेन—जिस प्रकार पहिये, धुरे आदिके अतिरिक्त रथका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, उसी तरह रूप,
वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्कार इन पाँच स्कंधोंको छोड़कर नागसेन कोई अलग वस्तु नहीं है ।³
१. आत्मवादकी इन तीन मान्यताओंका उल्लेख धर्मपालाचार्यने अपनी विज्ञानमात्रशास्त्रकी संस्कृत टीकामें
किया है। यह टीका उपलब्ध नहीं है। जापानी विद्वान यामाकामी सोगेनने ने यह उल्लेख
अपनी Systems of Buddhist thought नामक पुस्तकके १७ वें पृष्ठपर उक्त ग्रंथके
हुएनत्सांग के चीनी अनुवादके आधारसे किया है।
२. पुग्गलो नुपलब्भति । मिलिन्दपण्हमें अत्ता ( आत्मा ) शब्दके स्थानपर जीव, पुग्गल और वेदगू शब्दोंका
व्यवहार किया है। देखिये मिसेज राइस डेविड्स Question of Milinda ।
३. नागसेनोति संखा समञ्ञा पञ्ञत्ति वोहारो नाममत्तं पवत्तति । परमत्यत्तो पन एत्थ पुग्गलो नुपलब्भति ।
भासितं पन एतं महाराज वजिराय भिक्खुनीया भगवतो सम्मुखा—
यथाहि अंग संभारा होति सद्दो रथो इति ।
एवं खन्धेसु सन्तेसु होंति सत्तोति सम्मुति ॥ मिलिन्दपण्ह, अध्याय २, पृ. २५-२८ ।
३२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
(२) आत्मा पांच स्कंधोंसे भिन्न पदार्थ है :
बौद्धोंको दूसरो मान्यता है कि आत्मा पंचस्कंधोंसे पृथक् पदार्थ है। यह मान्यता नैयायिक आदि
दार्शनिकों जैसी ही है। यहां पर आत्मा (पुद्गल) को पांच स्कंध रूप बोझको ढोनेवाला कहा हैं।१
(३) आत्मा पांच स्कंधोंसे न भिन्न है, न अभिन्न :
बौद्धोंके आत्मा संबंधी तीसरे सिद्धान्तको माननेवाले पुद्गलवादी वात्सीपुत्रीय बौद्ध हैं। ये लोग आत्मा-
के अस्तित्वको मानते हैं, परन्तु इनके अनुसार जिस तरह अग्निको न जलती हुई लकड़ीसे भिन्न कह सकते
हैं, और न अभिन्न, परन्तु फिर भी अग्नि भिन्न वस्तु है; उसी तरह यद्यपि पुद्गल भिन्न पदार्थ है, परन्तु यह
पुद्गल न पांच स्कंधोंसे सर्वथा भिन्न कहा जा सकता है और न अभिन्न । यह न नित्य है, और न अनित्य ।
यह पुद्गल अपने अच्छे, बुरे कर्मोंका कर्ता और भोक्ता है, इसलिये इसके अस्तित्वका निषेध नहीं कर सकते ।
(४) आत्मा अव्याकृत है :
इस मान्यताके अनुसार आत्मा क्या है, यह नहीं कहा जा सकता । (क) जिस समय
अनुराधने बुद्धसे प्रश्न किया कि क्या जीव रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञानसे बाह्य है
तो बुद्धने उत्तर दिया कि तुम इसी लोकमें जीव दिखानेमें समर्थ नहीं, फिर परलोककी बात तो दूर
रही; इसलिये मैं 'दुःख, और दुखका निरोध' इन दो तत्त्वोंका ही उपदेश करता हूँ । जिस प्रकार किसी
तीरसे आहत मनुष्यका 'यह तीर किसने मारा है'? कौनसे समयमें मारा है ? कौनसी दिशासे आया है ?'
आदि प्रश्न करना वृथा है, क्योंकि उस समय मनुष्यको इन सब प्रश्नोत्तरोंमें न पड़कर घावकी रक्षा की ही
बात सोचनी चाहिये; उसी प्रकार आत्मा क्या है ? परलोक क्या है ? मरनेके बाद तथागत पैदा होता है
या नहीं ? आदि प्रश्न अव्याकृत हैं२ । (ख) बहुतसी जगह आत्माके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर बुद्ध मौन
धारण करते हैं३ । इस मौनका कारण हैं कि यदि वे कहें कि आत्मा है तो लोग शाश्वतवादी हो जाते हैं और
यदि कहा जाये कि आत्मा नहीं है, तो लोग उच्छेदवादी हो जाते हैं। अतएव एक ओर शाश्वतवाद और
दूसरी ओर उच्छेदवादका निराकरण करनेके लिये मौन रहना ही ठीक समझा गया४ । (ग) अनेक बौद्ध
तथा—दुखमेव हि न कोचि दुःखितो ।
कारको न किरियाव विज्जति ।
अत्थि निवृत्ति न निवृत्तो पुमा ।
मग्गमत्थि गमको न विज्जति ॥ विसुद्धिमग्ग, अध्याय १६ ।
तथा देखिये कथावत्थु १-२; अभिधर्मकोश ३-१८ टीका; दीघनिकाय, पायासिझुत्त; संयुत्तनिकाय
५-१०-६ ।
१. “भारं वो भिक्षवो देशयिष्यामि भारादानं भारनिक्षेपं भारहारं च । तत्र भारः पंचोपादानस्कंधाः,
भारादानं तृप्तिः, भारनिक्षेपो मोक्षः, भारहारः पुद्गलाः......” तत्त्वसंग्रहपंजिका, आत्मवादपरीक्षा ३४६;
तथा धम्मपद, अत्तवग्गो ।
२. संयुत्तनिकाय, अनुराधसुत्त; तथा—‘स्कंधाः सत्त्वा एव ततो भिन्ना वा' इति प्रश्नः सत्त्वस्य विषये,
सत्त्वश्च नास्त्येव किमपि वस्तु । तेनायं प्रश्नः ‘वन्ध्यापुत्रः शुक्ल कृष्णो वा' इतिवत् स्थापनीय (अनु-
त्तरितं ) एव । अभिधर्मकोश ५-२२ टिप्पणी; बुद्धचर्या पृ. १८६ से आगे ।
३. किंनु खो गोतम अत्यत्ताति ।
एवं वुत्ते भगवा तुण्ही अहोसि ॥
किं पन भो गोतम नत्थत्ताति ॥
दुतियंपि खो भगवा तुण्ही अहोसि । संयुत्तनिकाय ४-१०० ।
४. अस्तीति शाश्वतग्राहो नास्तीत्युच्छेददर्शनं । तस्मादस्तित्वनास्तित्वे नाश्रीयेत विचक्षणः ॥
माध्यमिककारिका १८-१० ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३२१
सूत्रोंमें आत्माके विषयमें प्रश्न किये जानेपर आत्माका स्पष्ट विवेचन न करके बार बार यही कहा गया है कि
रूप आत्मा नहीं, वेदना आत्मा नहीं, संज्ञा आत्मा नहीं, संस्कार आत्मा नहीं, विज्ञान आत्मा नहीं १ तथा जो
लोग रूप, वेदना आदिको आत्मा समझते हैं, उनके सत्कायदृष्टि कही जाती है २ । महायान सम्प्रदायने इसी
अनत्तावाद ( नैरात्म्यवाद ) पर अपने विज्ञानवाद और शून्यवादकी स्थापना कर क्लेशावरण और ज्ञेयावरण
के नाश करनेके लिये नैरात्म्यवादके प्रतिपादनपूर्वक आत्मदृष्टिसे क्लेशोंकी उत्पत्ति बतायी है ३ । नागार्जुनने
कहा है, "बुद्धने यह भी कहा है कि आत्मा है, और यह भी कहा है कि आत्मा नहीं है । तथा बुद्धने
आत्मा और अनात्मा किसीका भी उपदेश नहीं दिया ४ ।"
१. मज्झिमनिकाय, महापुण्णमसुत्त १०९ ।
२. सत् कायः पंच उपादानस्कंधाः एव । तत्राहं मम दृष्टिः । अभिधर्मकोश ५-७ ।
३. सत्कायदृष्टिप्रभवानशेषान् क्लेशांश्च दोषांश्च धिया विपश्यन् ।
आत्मानमस्याविषयं च बुद्ध्वा । योगी करोत्यात्मनिषेधमेव ॥ माध्यमिककारिका १८-१८ ।
४. आत्मेत्यपि प्रज्ञपितमनात्मेत्यपि देशितः । बुद्धैर्नात्मा न चानात्मा कश्चिदित्यपि देशितं ॥
माध्यमिककारिका १८-६ ।
४१
न्याय-वैशेषिक परिशिष्ट ( ग )
( श्लोक ४ से १० तक )
न्याय-वैशेषिकदर्शन
( १ ) न्याय दर्शनके मूल प्रवर्तक अक्षपाद गौतम कहे जाते हैं। अक्षपादको महायोगी, अहल्यापति
आदि नामोंसे भी कहा गया है¹। पुराणोंके अनुसार स्वमतदूषक व्यास ऋषिका मुख देखनेके लिए गौतमके
पैरोंमें नेत्र थे, इसलिए इनका नाम अक्षपाद पड़ा²। प्राचीन मान्यताके अनुसार, गौतम ऋषिके आश्रममें
वृष्टिके न होनेपर भी वरुणके वरसे वृक्ष आदि वनस्पतियाँ सदा हरी भरी रहा करती थीं। नैयायिक
योग; और शैव नामसे भी कहे जाते हैं। नैयायिक दर्शनमें शिव भगवान जगतकी सृष्टि और संहार
करते हैं; वे व्यापक, नित्य, एक और सर्वज्ञ हैं, और इनकी बुद्धि शाश्वती रहती है। नैयायिक लोग प्रमाण,
प्रमेय संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति
और निग्रहस्थान इन सोलह तत्त्वोंके ज्ञानसे दुखका नाश होनेपर मुक्ति स्वीकार करते हैं। ये लोग प्रत्यक्ष,
अनुमान, उपमान, और आगम इन चार प्रमाणोंको मानते हैं।³ ( २ ) वैशेषिक दर्शनके आद्यप्रणेता
कणाद कहे जाते हैं। कणादको कणभक्ष अथवा औलूक्य नामसे भी कहा गया है। पौराणिक मान्यताके
अनुसार, कणाद ऋषि रास्तेमें पड़े हुए चावलोंके कणोंका आहार करके कपोती वृत्तिसे अपना निर्वाह करते
थे, अतएव इनका नाम कणाद अथवा कणभक्ष पड़ा⁴। कणादने काश्यपगोत्री उलूक ऋषिके घर जन्म
१. अक्षपादो महायोगी गौतमाख्योऽभवन्मुनिः ।
गोदावरीसमानेता अहल्यायाः पतिः प्रभुः ॥
स्कन्दपुराण, कुमारिकाखण्ड ।
२. पुराणोंमें सांख्य-योगकी तरह अक्षपाद और कणादप्रणीत शास्त्रोंको श्रुतिविरुद्ध कहा है—
अक्षपादप्रणीते च काणादे योगसांख्ययोः ।
त्याज्यः श्रुतिविरुद्धोऽर्थः । पद्मपुराण; न्यायकोश पृ. २ ।
३. न्याय ग्रन्थोंमें प्रमाणके लक्षण निम्न प्रकारसे मिलते हैं—
( क ) जिस प्रत्यक्ष आदिके द्वारा प्रमाता पदार्थोंको यथार्थ रूपसे जानता है, उसे प्रमाण कहते हैं--
प्रमाता येनार्थं प्रमिणोति तत् प्रमाणम् । वात्स्यायनभाष्य १-१-१ ।
( ख ) जो ज्ञानमें कारण हो, उसे प्रमाण कहते हैं--उपलब्धिहेतुः प्रमाणम् । उद्योतकर, न्यायवार्तिक ।
( ग ) अव्यभिचारी और असंदिग्ध रूपसे पदार्थोंके ज्ञान करनेवाली बोधाबोध स्वभाववाली सामग्रीको
प्रमाण कहते हैं--अव्यभिचारिणीमसंदिग्धार्योपलब्धिम् विदधति बोधाबोधस्वभावा सामग्री
प्रमाणम् । जयन्त, न्यायमंजरी पृ. १२ ।
( घ ) पदार्थोंके यथार्थ रूपसे जाननेको प्रमा और प्रमाके साधनको प्रमाण कहते हैं--यथार्थानुभवः
प्रमा । तत्साधनं च प्रमाणम् । उदयन, तात्पर्यपरिशुद्धि ।
( ङ ) प्रमासे नित्य संबंध रखनेवाले परमेश्वरको प्रमाण कहते हैं--साधनाश्रयव्यतिरिक्तत्वे सति
प्रमाव्याप्तं प्रमाणम् । सर्वदर्शनसंग्रह, अक्षपाददर्शन ।
४. मुनिविशेषस्य कापोतीं वृत्तिममुष्ठितवतो रथ्यानिपतितांस्तण्डुलकणानादाय कृताहारस्याहारनिमित्तात्
कणाद इति संज्ञाऽजनि । षड्दर्शनसमुच्चय, गुणरत्नटीका, पृ. १०७ ।