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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 458 में से

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पृष्ठ 369

स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३१७
प्रकार नदीमें प्रत्येक क्षण नये नये जलके आते रहनेपर भी नदीके जल-प्रवाहका अविकल रूपसे ज्ञान होता
है, उसी तरह बाल, युवा और वृद्ध अवस्थामें विज्ञानमें प्रतिक्षण परिवर्तन होनेपर भी समान परिवर्तन
होनेके कारण विज्ञान ( आत्मा ) का एक रूप ज्ञान होता है। बौद्धोंका कहना है कि इस विज्ञानप्रवाह
( चित्तसंतति ) के माननेसे काम चल जाता है, अतएव आत्माको अलग स्वतंत्र पदार्थ माननेकी आवश्य-
कता नहीं।
भवसन्तति
बौद्ध आत्माको न मानकर भी भवकी परम्परा किस प्रकार स्वीकार करते हैं, यह मिलिन्दपण्हके
निम्न संवादसे भली भांति स्पष्ट होता है¹—
मिलिन्द—भन्ते नागसेन ! दूसरे भवमें क्या उत्पन्न होता है ?
नागसेन—महाराज ! दूसरे भवमें नाम और रूप उत्पन्न होता है ।
मिलिन्द—क्या दूसरे भवमें यही नाम और रूप उत्पन्न होता है ?
नागसेन—दूसरे भवमें यही नाम और रूप उत्पन्न नहीं होता। परन्तु लोग इस नाम और रूपसे
अच्छे, बुरे कर्म करते हैं, और इस कर्मसे दूसरे भवमें दूसरा नाम और रूप उत्पन्न होता है ।
मिलिन्द—यदि यही नाम-रूप दूसरे भवमें उत्पन्न नहीं होता, तो हमें अपने बुरे कर्मोका फल नहीं
भोगना चाहिये ?
नागसेन—यदि हमें दूसरे भवमें उत्पन्न न होना हो, तो हमें अपने बुरे कर्मोंका फल न भोगना पड़े,
परन्तु हमें दूसरे भवमें उत्पन्न होना है, अतएव हम बुरे कर्मों से निवृत्त नहीं हो सकते ।
मिलिन्द—कोई दृष्टांत देकर समझाइये ।
नागसेन—कल्पना करो कि कोई आदमी किसीके आम चुरा लेता है । आमों का मालिक चोरको
पकड़कर राजाके पास लाता है और राजासे उस चोरको दण्ड देनेकी प्रार्थना करता है । अब, यदि चोर
कहने लगे कि मैंने इस आदमीके आम नहीं चुराये, क्योंकि जो आम इन आमोंके मालिकने बागमें लगाये थे,
वे आम दूसरे थे, और जो आम मैंने चुराये हैं, वे दूसरे हैं, इसलिये मैं दण्डका पात्र नहीं हूं, तो क्या वह
चोर दण्डका भागी नहीं होगा ?
मिलिन्द—अवश्य ही आमों का चोर दंडका पात्र है ।
नागसेन—किस कारणसे ?
मिलिन्द—क्योंकि पिछले आम पूर्वके आमोंसे ही प्राप्त हुए हैं ।
नागसेन—ठीक इसी प्रकार इस नाम-रूपसे हम अच्छे, बुरे कर्मोंको करते हैं और इस कर्मसे दूसरे
भवमें दूसरा नाम और रूप उत्पन्न होता है। अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि 'यदि यही नाम दूसरे
भवमें उत्पन्न नहीं होता तो हमें अपने बुरे कर्मोंका फल नहीं भोगना चाहिए ।'
'section' of the stream........But the Thought is a perishing and not an
immortal or incorruptible thing. Its successors may continuously succeed
to it, resemble it, and appropriate it, but they are not it, whereas the soul
substance is supposed to be a fixed unchanging thing. The Principles of
Psychology, अध्याय. १०, पृ. ३४४, ३४५।
१. मिलिन्दपण्ह, अध्याय २, पृ. ४६ ।