स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
पृष्ठ 355, कुल 458 में से
संदर्भ में पढ़ेंबौद्ध परिशिष्ट (ख)
( श्लोक १६ से १९ तक )
बौद्ध दर्शन
"बौद्ध दर्शनको सुगत दर्शन भी कहते हैं। बौद्ध लोगोंने विपश्यी, शिखी, विश्वभू, क्रकुच्छन्द, काञ्चन,
काश्यप और शाक्यसिंह ये सात सुगत माने हैं।¹ सुगतको तीर्थंकर, बुद्ध अथवा धर्मधातु नामसे भी कहा जाता
है । बुद्धोंके कण्ठ तीन रेखाओंसे चिह्नित होते हैं। अन्तिम बुद्धने मगध देशमें कपिलवस्तु नामक ग्राममें जन्म
लिया था । इनकी माताका नाम मायादेवी और पिताका नाम शुद्धोदन था । बौद्ध लोग बुद्ध भगवान्को सर्वज्ञ
कहते हैं । बुद्धने दुःख, समुदाय ( दुःखका कारण ), मार्ग और निरोध ( मोक्ष ) इन चार आर्यसत्योंका
उपदेश दिया है । बौद्ध मतमें पांच इन्द्रियां और शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श ये पांच विषय, मन और धर्मा-
यतन ( शरीर ) ये सब मिलाकर बारह आयतन माने गये हैं । बौद्ध प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाणोंको
मानते हैं । बौद्ध लोग आत्माको न मानकरं ज्ञानको ही स्वीकार करते हैं । इनके मतमें क्षण-क्षणमें नाश
होनेवाली संतानको ही एक भवसे दूसरे भवमें जानेवाली मान गया है । बौद्ध साधु चमर रखते हैं, मुण्डन
कराते हैं, चमड़ेका आसन और कमण्डलु रखते हैं, तथा घुंटी तक गेरुआ रंगका वस्त्र पहिनते हैं । ये लोग
स्नान आदि शौच क्रिया विशेष करते हैं । बौद्ध साधु भिक्षा पात्रमें आये हुए मांसको भी शुद्ध समझकर भक्षण
कर लेते हैं । ये लोग जीवोंकी दया पालनेके लिये भूमिको बुहारकर चलते हैं, और ब्रह्मचर्य आदि
क्रियामें खूब दृढ़ होते हैं । बौद्ध मतमें धर्म, बुद्ध और संघ ये तीन रत्न, और सम्पूर्ण विघ्नोंको नाश करने-
वाली ताराको देवी स्वीकार किया गया है । वैभाषिक, सौत्रांतिक, योगाचार और माध्यमिक ये बौद्धोंके
चार भेद हैं ।²"
बौद्धोंके मुख्य सम्प्रदाय
बुद्धके निर्वाण जानेके बाद संघमें कलहका आरम्भ हुआ, और बुद्ध-निर्वाणके सौ वर्ष पश्चात् ईसवी
सन् पूर्व ४०० में वैशालीमें एक परिषद्की आयोजना की गई । इस परिषद्में महासंघिक मूल महा-
संघिक, एकव्यवहारिक, लोकोत्तरवादी, कुकुल्लिक, बहुश्रुतीय, प्रज्ञप्तिवादी, चैत्तिक, अपरशैल और उत्तरशैल
इन नौ शाखाओंमें विभक्त हो गये । इधर थेरवादी भी निम्न ग्यारह मुख्य शाखाओंमें बंट गये—हैमवत,
सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तिक, महीशासक, काश्यपीय, सोत्रांतिक, वात्सीपुत्रीय, धर्मोत्तरीय, भद्रयानीय, सम्मितीय,
और छन्नागरिक³ । थेरवादियों और महासंघिकोंके उक्त सम्प्रदायोंके सिद्धांतोंके विषयमें बहुत कम ज्ञातव्य
१. पाली ग्रन्थोंमें कहीं आठ, कहीं सोलह, और कहीं पच्चीस बुद्धोंके नाम आते हैं । देखिये राजवाड़े-
दीघनिकाय भाग २, मराठी भाषांतर, पृ० ४६ ।
२. देखिये गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय-टीका और राजशेखरका षड्दर्शनसमुच्चय ।
३. वसुमित्रने इन बीस भेदोंको हीनयान सम्प्रदायकी शाखा कहकर उल्लेख किया है । परन्तु आगे चलकर
ये महासंघिक और थेरवाद सम्प्रदाय क्रमसे हीनयान और महायान कहे जाने लगे । हीनयानी केवल
अपने ही निर्वाणके लिये प्रयत्न करते हैं और यहां अन्य मनुष्योंकी तरह बुद्धको भी मनुष्य ही माना
गया है । यहां 'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं, पंच स्कंधोंका क्षय हो जाना निर्वाण है,' इसके आगे सिद्धान्तों-
का दार्शनिक विकास दृष्टिगोचर नहीं होता । महायान सम्प्रदायके अनुयायी अनन्त काल तक प्राणियोंके
मोक्षके लिये प्रयत्नशील रहते हैं। निर्वाणके बाद भी बुद्धकी प्रवृत्ति संसारके निर्वाणके लिये बराबर
जारी रहती है । यहाँ गृहस्थमें रहकर भी बिना किसी वर्णभेदके प्राणीमात्रके लिये निर्वाणका द्वार सदा