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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

त्रिप्रश्नाधिकार २६५
सूर्य की क्रान्ति नाप कर सायन भोगांश जानना-
स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा ।
दिग्भेदेऽपक्रमश्शेषः तस्य ज्या त्रिज्यया हता ।।१७।।
परमापक्रमज्याप्तच्चापं मेषादिगे रविः ।
कर्यादौ प्रोञ्झ्य चक्रार्धात्तुलादौ भार्धसंयुतात् ।।१८।।
मृगादौ प्रोञ्झ्य भगणात् मध्याह्नार्कस्फुटो भवेत् ।
तन्मान्दमसकृद्धामं फलं मध्यो दिवाकरः ।।१९।।
अनुवाद—(१७) अपने स्थान का अक्षांश और मध्यान्हकालिक सूर्य का
नतांश यदि एक ही दिशा के हों तो इनका अन्तर निकाले और भिन्न-भिन्न दिशा के
हों तो जोड़ दे । जो कुछ आवे वही सूर्य की मध्यान्हकालिक क्रान्ति है । इसकी ज्या
को त्रिज्या से गुणा करके (१८) सूर्य की परमक्रान्ति ज्या से भाग दे दे और लब्धि
का धनु बनावे । यदि सूर्य सायन मेषादि तीन राशियों में हो तो यही (धनु) मध्यान्ह-
कालिक सूर्य का स्फुट सायन भोगांश होगा । यदि सूर्य सायन कर्कादि तीन राशियों
में हो तो इस धनु को ६ राशि में घटाने से जो कुछ आवेगा वह मध्यान्हकालिक
सूर्य का स्फुट सायन भोगांश होगा । यदि सूर्य सायन तुलादि तीन राशियों में हो तो
इस धनु को ६ राशियों में जोड़ने से जो कुछ आवेगा वह मध्यान्हकालिक सूर्य का स्फुट
सायन भोगांश होगा । और यदि सूर्य सायन मकर आदि तीन राशियों में हो तो इस
धनु को १२ राशियों में घटाने जो पर कुछ आवेगा वह मध्यान्हकालिक सूर्य का सायन
भोगांश होगा । इस स्फुट सायन भोगांश में मंद फल का उल्टा संस्कार कई बार करने
से मध्यम सायन भोगांश निकलेगा ।
विज्ञान भाष्य — १४-१५ श्लोकों में सूर्य के मध्यान्हकालिक नतांश और
क्रान्ति को जोड़ या घटाकर अक्षांश जानने की रीति बतलायी गयी है । १७वें श्लोक
में अक्षांश और नतांश जान कर क्रान्ति निकालने की रीति है । इसलिए यह पहली
रीति का ही दूसरा रूप है और जैसे वहाँ जोड़ना घटाना पड़ता है वैसे ही यहाँ भी ।
इसका कारण भी चित्र ५६ के संबंध के तीन समीकरणों से समझ में आ सकता है ।
जोड़ने और घटाने का नियम इस समीकरण से सरलतापूर्वक समझ में आ
जायगा —
अ ± न = क
जिसमें अ, न और क क्रम से अक्षांश, नतांश और क्रान्ति सूचित करते हैं,
धन का चिह्न उस समय लिखा जायगा जब अक्षांश और नतांश की दिशाएँ भिन्न
होंगी अन्यथा ऋण का चिह्न प्रयोग होगा । यहाँ एक बात का ध्यान रखना आवश्यक
है । यह बात साधारणतः लोग समझते हैं और आजकल यही प्रथा भी है कि उत्तर

२६६ सूर्य-सिद्धान्त
गोल में अक्षांश की दिशा उत्तर समझी जाती है परन्तु इस नियम में इसकी दिशा
दक्षिण समझी गयी है क्योंकि उत्तर गोल में खस्वस्तिक से विषुवद्वृत्त की दिशा दक्षिण
होती है ।
क्रान्ति जब मालूम हो गयी तब सूर्य का भोगांश स्पष्टाधिकार के २८वें
श्लोक से ही जाना जा सकता है; क्योंकि वहाँ बतलाया गया है (देखो पृष्ठ १२२
चित्र २५) कि
ज्या ( व स ) × १३६७
———————————— = ज्या ( स प )
३४३८
ज्या ( स प ) × ३४३८
इसलिए ज्या (व स)= ————————————— (१)
१३६७
जहाँ व स सूर्य का सायन भोगांश, स प सूर्य की क्रान्ति, और १३६७ सूर्य की
परम क्रान्ति की ज्या है । यही १७वें श्लोक के अंतिम चरण और १८वें श्लोक के
पूर्वार्द्ध का रूप है ।
यदि आजकल की रीति से ज्या का मान दशमलव भिन्न में व्यवहार किया
जाय तो और भी सरल रूप यह होगा—
ज्या ( स प )
ज्या ( व स )= ———————— (२)
ज्या ( स व प )
अब यह अच्छी तरह सिद्ध हो गया कि सूर्य की परम क्रान्ति २४° नहीं है
वरन् इसका मध्य मान इस समय २३°२७' के लगभग है और प्रतिवर्ष आधा विकला
के लगभग घटती जा रही है । इसलिए यदि आजकल सूर्य की क्रांति से भोगांश जानना
हो तो ∠ स व प को २३° २७' के समान समझ कर गणना करनी चाहिए ।
उदाहरण—एक दिन मध्यान्ह काल में सूर्य की क्रान्ति १६°१७' दक्षिण
है और यह सायन मकरादि राशि में है तो इसका स्फुट सायन भोगांश बतलाओ ।
ज्या ( क्रान्ति )
ज्या ( भोगांश )= —————————
ज्या (परम क्रान्ति)
ज्या १६° १७'
= ————————
ज्या २३° २७'
.२८०४
= ————
.३६७६
= .७०४७
∴ भोगांश = ४४°, ४८'

त्रिप्रश्नाधिकार २६७
सूर्य सायन मकरादि में है इसलिए इस भोगांश को १२ राशि या ३६०° से
घटाने पर जो आवेगा वह सूर्य का स्पष्ट सायन भोगांश होगा । इसलिए इस दिन
सूर्य का सायन भोगांश
= ३६०° - ४४°४८'
= ३१५° १२'
पृष्ठ २०० के चित्र ३६ को देखने से तथा अनुभव से भी यह स्पष्ट है कि
सूर्य जितने समय में वसंत संपात से दक्षिणायन बिंदु तक जाता है अर्थात् सायन मेष
से तीन राशि तक जाता है उतने समय में इसकी उत्तर क्रान्ति शून्य से २३°२७'
तक बढ़ती है। जब सूर्य दक्षिणायन बिंदु से (सायन कर्क के आदि से) शरद सम्पात
तक जाता है तब इसकी उत्तर क्रान्ति २३°२७' से घटते-घटते शून्य हो जाती है ।
शरद सम्पात् अर्थात् सायन तुला से उत्तरायण बिंदु (सायन मकर के आरंभ तक)
सूर्य की दक्षिण क्रान्ति शून्य से २३°२७' बढ़ती रहती है और सायन मकर के
आरम्भ से वसन्त सम्पात तक घटते-घटते फिर शून्य हो जाती है ।
ऊपर भोगांश निकालने का जो नियम बतलाया गया है उससे केवल यह
जाना जाता है कि वसंत या शरद सम्पात से सूर्य कितनी दूर है। यदि सूर्य वसंत
संपात अर्थात् सायन मेष से तीन राशियों के बीच में है तो आया हुआ भोगांश वसंत
संपात से ही सूर्य की दूरी है, इसलिए यही सायन भोगांश हुआ । यदि सूर्य सायन
कर्क के आरम्भ से तीन राशियों के भीतर है तो आया हुआ भोगांश शरद सम्पात
से विलोम दिशा में सूर्य की दूरी है। परन्तु शरद सम्पात सायन मेष से ६ राशि
दूर है इसलिए ६ राशि में से आया हुआ भोगांश घटाना पड़ता है तब वसंत सम्पात
से सूर्य का सायन भोगांश निकलता है। यदि सूर्य सायन तुला से तीन राशियों के
बीच में है तो आया हुआ भोगांश शरद सम्पात से अनुलोम दिशा में सूर्य की दूरी है
इसलिए ६ राशि में यह जोड़ना पड़ता है तब सूर्य का वसंत सम्पात से सायन भोगांश
निकलता है। और यदि सूर्य सायन मकर से तीन राशियों के बीच में है तो आया
हुआ भोगांश वसंत संपात से विलोम दिशा में सूर्य की दूरी है। इसलिए १२ राशियों
में से इस भोगांश को घटाने पर वसंत संपात से अनुलोम दिशा में सूर्य की दूरी
(भोगांश) आती है।
ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य की परमक्रान्ति वर्ष में आधी विकला के
लगभग घटती जा रही है। यहाँ वह सूत्र दे देना अच्छा होगा जिससे किसी समय
परमक्रान्ति सहज ही जानी जा सकती है।

२६८ सूर्य-सिद्धान्त
१६८० विक्रमीय की मेष संक्रान्ति के दिन मध्यम परमक्रान्ति २३°
२६′५७″.३५ है। यह प्रति वर्ष ०″.४६८ विकला की दर से घटती है इसलिए
मध्यम परमक्रान्ति का सूत्र = २३°२६′५७″.३५ - ०″.४६८ (व-१६८०)
यहाँ 'व' किसी विक्रमीय संवत् की संख्या है।
अयनांश का विचार करते समय यह कहा गया था कि अक्ष विचलन
(Nutation) के कारण क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच के कोण अर्थात्
परमक्रान्ति पर भी प्रभाव पड़ता है। इसके कारण परमक्रान्ति का स्पष्ट मान इस
सूत्र के अनुसार होगा—
२३°२६′५७″.३५-०″.४६८ (व-१६८०)+६″.२१ कोज्या (सायन
राहु) + ०″.५५ कोज्या (२ सायन सूर्य)
वसंत संपात बिंदु से राहु के भोगांश को सायन राहु और सूर्य के भोगांश को
सायन सूर्य कहा गया है।
इस रीति से सूर्य का जो स्पष्ट सायन भोगांश निकलता है उससे अयनांश का
मान घटा देने पर निरयन भोगांश अर्थात् अश्विनी के आदि से सूर्य की दूरी आ
जाती है। यही सूर्य का स्पष्ट स्थान हुआ जिसको गणित से जानने की रीति स्पष्टा-
धिकार में बतलायी गयी है।
जैसे स्पष्टाधिकार में मंदफल का संस्कार करने पर मध्यम सूर्य से स्पष्ट सूर्य
निकलता है वैसे ही इस रीति से आये हुये स्पष्ट सूर्य में मंदफल का उलटा संस्कार
करने पर मध्यम सूर्य आता है। परन्तु स्पष्टाधिकार के विज्ञान भाष्य में बतलाया
गया है कि मध्यम सूर्य में केवल सिद्धान्तीय रीति से मंदफल का संस्कार देने से वेध
सिद्ध स्पष्ट सूर्य नहीं निकलता इसलिए यह सिद्ध है कि इस अध्याय के १७-१६
श्लोकों की रीति से जो स्पष्ट सूर्य निकलता है उसमें सिद्धान्तीय रीति के मंदफल का
उलटा संस्कार करने पर मध्यम सूर्य नहीं आ सकता। इसीलिये असकृत्कर्म करने को
कहा गया है अर्थात् एक बार मंदफल का उलटा संस्कार देने से जो मध्यम सूर्य आवे
उसको ही स्पष्ट सूर्य समझ कर फिर मंदफल का संस्कार करे। इससे जो मध्यम
सूर्य आवे उसमें फिर मंदफल का संस्कार करे। इस तरह कई बार करने पर मध्यम
सूर्य आ जावेगा।
मध्यान्हकाल की छाया और छायाकर्ण जानना (सूर्य की क्रान्ति और
अक्षांश से)—
स्वाक्षार्कपक्रमयुतिः दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा ।
शेषं नतांशास्सूर्यस्य तद्बाहुज्याऽथ कोटिजा ॥२०॥

सूर्य-सिद्धान्त २६६
शंकुमानांगुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् ।
कोटिज्यया विभज्याऽऽप्ते छायाकर्णावहर्दले ॥२१॥
अनुवाद—(२०) अपने स्थान का अक्षांश और मध्याह्नकाल के सूर्य की
क्रान्ति यदि एक ही दिशा में हो तो जोड़ दो और भिन्न दिशा में हों तो घटा दो । जो
कुछ आवेगा वही सूर्य का मध्यान्हकालिक नतांश होगा। इसकी भुजज्या और
कोटिज्या बनाओ । (२१) शंकु के अंगुलात्मक मान को अर्थात् १२ को भुज (नतांश
की भुजज्या) से गुणा करके कोटिज्या से भाग देने पर लब्धि मध्यान्ह की छाया तथा
शंकु को त्रिज्या से गुणा करके कोटिज्या से भाग देने पर मध्यान्ह का छायाकर्ण ज्ञात
होगा ।
विज्ञान भाष्य—यह १४वें श्लोक का विलोम है। इन दोनों श्लोकों का
सरल रूप यह है—
अ ± क = न (१)
छाया = ज्या (न) × १२ / कोज्या (न) (२)
छायाकर्ण = त्रिज्या × १२ / कोज्या (न) (३)
जहां अ अक्षांश, क सूर्य की मध्यान्हकालिक क्रान्ति और न सूर्य का मध्यान्ह-
कालिक नतांश है । समीकरण (१) में धन का चिह्न उस समय लिखना चाहिए जब
अक्षांश और क्रान्ति की दिशाएं एक ही हों और ऋण का चिह्न उस समय जब इनकी
दिशाएँ भिन्न हों । अक्षांश की दिशा उत्तर गोल में सदैव दखिन समझी गयी है
जिसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ।
१५वें श्लोक के भाष्य में बतलाया जा चुका है कि शंकु और छायाकर्ण के
बीच के कोण को नतांश कहते हैं । इसलिये
नतांश ज्या = छाया / छायाकर्ण वर्तमान प्रथानुसार (क)
नतांश कोटिज्या = शंकु / छायाकर्ण (ख)
∵ छाया = नतांशज्या × छायाकर्ण
= नतांश ज्या × शंकु / नतांश कोटिज्या
= ज्या (न) × १२ / कोज्या (न)

२७० सूर्य-सिद्धान्त
यदि स्पर्शरेखा की सारिणी से काम लिया जाय तो इसका सरल रूप यह
होगा—
छाया = १२ × स्परे (न) (४)
ऊपर के समीकरण (ख) से सिद्ध है कि
छायाकर्ण = शंकु / नतांश कोटिज्या वर्तमान प्रथानुसार
यदि नतांश कोटिज्या का मान भारतीय प्रथानुसार लिखा जाय तो
छायाकर्ण = शंकु × त्रिज्या / नतांश कोटिज्या
अथवा छायाकर्ण = १२ × त्रिज्या / कोज्या (न)
उदाहरण—किसी दिन सूर्य की उत्तर क्रान्ति १५°२५' और प्रयाग का
अक्षांश २५°२५' है तो प्रयाग में इस दिन मध्याह्नकाल में छाया और छायाकर्ण
क्या होंगे ? [देखो १४-१५ श्लोक का उदाहरण]
प्रयाग उत्तर गोल में है, इसलिए इसके अक्षांश की दिशा श्लोकों के नियम
के अनुसार दखिन है और क्रान्ति की दिशा उत्तर है इसलिए इन दोनों का अंतर ही
सूर्य का नतांश होगा ।
∵ न = २५°२५' - १५°२५' = १०°
(१) सिद्धान्त की रीति से :—
छाया = ज्या (न) × १२ / कोज्या (न)
= ज्या १०° × १२ / कोज्या १०°
= ५६७ × १२ / ३३८४
= २.१२ अंगुल
छायाकर्ण = १२ × त्रिज्या / नतांश कोटिज्या
= १२ × ३४३८ / ३३८४
= १२.१६ अंगुल

त्रिप्रश्नाधिकार २७१
(२) नवीन रीति से : —
छाया = १२ × स्परे १०°
= १२ × ·१७६३ अंगुल
= २·११५६
= २·१२ अंगुल
छायाकर्ण = १२ / कोज्या १०°
= १२ / .९८४८
= १२·१६ अंगुल
सूर्य की क्रान्ति और किसी इष्टकाल की छाया जानकर दिशा जानना—
क्रान्तिज्या विषुवत्कर्णहताऽऽप्ता शंकुजीवया ।
अर्कग्रा सेऽष्टकर्णघ्ना मध्यकर्णोद्धृता स्वका ॥२२॥
विषुवद्भायुताऽर्काग्रा याम्ये स्यादुत्तरो भुजः ।
विषुवद्भा विशोध्योदग्गोले स्याद्बाहुहत्तरः ॥२३॥
विपर्ययाद् भुजो याम्यो भवेत्पूर्वापरान्तरे ।
माध्याह्निके भुजो नित्यं छाया माध्याह्न्निकी मता ॥२४॥
अनुवाद—(२२) सूर्य की क्रान्ति की ज्या को विषुवत्कर्ण से गुणा करके शंकु
रूपी जीवा अर्थात् १२ से भाग देने पर सूर्य की उदयकालिक अग्रा आती है । इसको
इष्टकाल के छायाकर्ण से गुणा करके मध्यकर्ण अर्थात् त्रिज्या से भाग देने पर इष्ट-
काल की कर्णाग्रा अथवा कर्णवृत्ताग्रा आती है । (२३) यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो
अर्थात् यदि सूर्य की क्रान्ति दक्षिण हो तो कर्णाग्रा में पलभा जोड़ देने से और यदि
सूर्य उत्तर गोल में हो तो पलभा से कर्णाग्रा घटा देने पर उत्तर भुज आता है । (२४)
यदि सूर्य उत्तर गोल में हो और पलभा कर्णाग्रा से छोटी हो तो विपरीत क्रिया करने
से अर्थात् कर्णाग्रा से पलभा घटाने पर दक्षिण भुज आता है । मध्याह्न में जो छाया
होती है वही सदैव मध्याह्नकालिक भुज है ।
विज्ञान भाष्य—इसी अधिकार के ५वें और ७वें श्लोकों के विज्ञान भाष्य
में अग्रा और अग्राज्या की चर्चा हुई है । ७वें श्लोक में अग्रा की परिभाषा यह
बतलाई गई है, "इष्ट छाया की नोक से विषुवद्भाग्रा रेखा का जो अंतर होता है
वह अग्रा कहलाती है" । चित्र ४५, ४६, के वर्णन में छ अ अग्राज्या और छ भ भुज
बतलाये गये हैं । परंतु छ अ को अग्रा या अग्राज्या कहने से बहुत गड़बड़ हो जाने का
डर है इसलिए छ अ को जिसे ७वें श्लोक में अग्रा और विज्ञान भाष्य में मैंने

२७२ सूर्य-सिद्धान्त
अग्राज्या लिखा है इष्टकालिक कर्णाग्रा या जैसा भास्कराचार्य लिखते हैं कर्णवृत्ताग्रा
कहना अधिक उचित होगा । अग्रा से केवल वह कोण समझना चाहिए जो क्षितिज-
वृत्त पर पूर्व या पच्छिम विन्दु से सूर्य, ग्रह या तारे का अंतर होता है । चित्र ४३ में
उदयकालिक ग्रह का स्थान क्षितिज वृत्त के ग विन्दु पर है और पूर्व विन्दु प है इसलिए
ग्रह की उदयकालिक अग्रा ग पू धनु है । इसी प्रकार ग्रह की अस्तकालिक अग्रा गा प
धनु है क्योंकि प पच्छिम विन्दु और गा ग्रह का अस्तकाल के समय का स्थान है ।
यदि ग अथवा गा विन्दुओं से पूर्व पच्छिम रेखा पर लम्ब गिराया जाय तो इसी का
मान उदयकालिक अग्राज्या के नाम से व्यवहार किया जायगा । चित्र ४२ में प श
सीधी रेखा उदयकालिक ग्रह की अग्राज्या है । उदयकाल के सिवा किसी अन्यकाल
में सूर्य का ऊर्ध्ववृत्त क्षितिज के जिस विन्दु पर गिरेगा उस विन्दु से पूर्व या पच्छिम
विन्दु का अन्तर इष्टकालिक अग्रा कही जायगी ।
२२वें श्लोक में अक्रांग्रा उदयकालिक सूर्य की अग्राज्या के लिए, इष्टकर्ण इष्ट-
काल के छायाकर्ण के लिए और मध्यकर्ण त्रिज्या के लिए प्रयोग किये गये हैं इसलिए
इनको ध्यान में रखना चाहिए । किसी-किसी अनुवादक ने मध्यकर्ण को मध्याह्न
कालिक छायाकर्ण माना है परन्तु यह भ्रम है । मध्यकर्ण को रंगनाथ जी ने त्रिज्या
इस तरह सिद्ध किया है -- "कर्णस्य व्यासस्य मध्यमर्धमिति मध्यकर्णो व्यासार्ध-
त्रिज्यांतयेत्यर्थः ।" * व्यास के अर्थ में कर्ण का प्रयोग मध्यमाधिकार के ५६ वें श्लोक
मे भी हुआ है । इसी अधिकार के अगले २७ वें श्लोक में यही नियम दुहराया गया है
जिसमें मध्यकर्ण की जगह त्रिज्या का प्रयोग किया गया है । इसलिए मध्यकर्ण का
अर्थ त्रिज्या के सिवा और कुछ नहीं है । इस श्लोक का सार यह है :--
अग्राज्या = क्रान्तिज्या x विषुवत्कर्ण / १२ (१)
कर्ण वृत्ताग्रा = अग्राज्या x इष्ट छायाकर्ण / त्रिज्या
= क्रांतिज्या x विषुवत्कर्ण / १२ x इष्ट छायाकर्ण / त्रिज्या (२)
परंतु विषुवत्कर्ण / १२ = त्रिज्या / अक्षांश कोटिज्या [देखो १३वें श्लोक का भाष्य]
इसलिये अग्रा ज्या = क्रान्तिज्या x त्रिज्या / अक्षांश कोटिज्या (३)
*वेङ्कटेश्वर प्रेस का सूर्य सिद्धान्त, पृष्ठ ८० ।

त्रिप्रश्नाधिकार २७३
समीकरण (३) से अग्राज्या अर्थात् उदय या अस्तकालिक सूर्य की अग्रा की
ज्या का मान तथा अग्रा सुगमतापूर्वक निकल सकते हैं इसलिए यह अच्छा है ।
इस तरह
क्रान्तिज्या
कर्णवृत्ताग्रा = ————————— × इष्ट छायाकर्ण (४)
अक्षांश कोटिज्या
कर्ण वृत्ताग्रा में पलभा के किस समय जोड़ने या घटाने से छाया का भुज
ज्ञात होता है यह चित्र ४५, ४६ से स्पष्ट है । जब सूर्य दक्षिण गोल में होगा अर्थात्
जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होगी तब कर्ण वृत्ताग्रा में पलभा सदैव जोड़ी जायगी
और योगफल उत्तर भुज होगा क्योंकि ऐसी दशा में छाया की नोक सदैव
विषुवद्वृत्ताग्रा रेखा से उत्तर होती है (देखो चित्र ४५), यदि सूर्य उत्तर गोल में हुआ
अर्थात् क्रान्ति उत्तर हुई तो जब तक सूर्य सममंडल से उत्तर रहेगा तब तक छाया
पूर्व पच्छिम रेखा से दखिन रहेगी इसलिए कर्ण-वृत्ताग्रा पलभा से बड़ी होगी ।
ऐसी दशा में कर्ण वृत्ताग्रा से पलभा घटाने पर भुज ज्ञात होगा (देखो चित्र ४६) ।
परन्तु यदि सूर्य सममंडल से दखिन हुआ तो छाया पूर्व पच्छिम रेखा और
विषुवद्वाग्रा रेखा के बीच में रहेगी । ऐसी दशा में पलभा कर्ण वृत्ताग्रा से बड़ी
होगी और पहले से दूसरी को घटाना पड़ेगा । २३-२४ श्लोकों का सार यह है :-
कर्णवृत्ताग्रा ± पलभा = भुज (५)
इसमें धनात्मक चिह्न उस समय लिया जायगा जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण
होगी अर्थात् जब सूर्य सायन तुला आदि ६ राशियों में रहेगा और ऋणात्मक चिह्न
उस समय लिया जायगा जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होगी अर्थात् जब सूर्य सायन
मेषादि ६ राशियों में रहेगा । पिछली दशा में यदि छाया पूर्व पच्छिम रेखा से
दखिन होगी तो भुज दक्षिण में होगा और यदि छाया पूर्व पच्छिम रेखा से उत्तर
होगी तो भुज उत्तर और पलभा से कर्ण वृत्ताग्रा को घटाना पड़ेगा ।
आजकल गोलीय त्रिकोणमिति के नियमों के अनुसार समीकरण (५) इस
प्रकार निश्चय किया जाता है :-
त्रिभुज ध ख र एक गोलीय त्रिभुज है, इसलिए*
कोज्या (ध र) - कोज्या (ख र) × कोज्या (ध ख)
कोज्या ध ख र = ———————————————————————————— (क)
ज्या (ख र) × ज्या (ध ख)
कोज्या (ध्रुवांतर) - कोज्या (नतांश) × कोज्या लम्बांश
अथवा कोज्या (दिगंश) = ———————————————————————————————— (ख)
ज्या (नतांश) × ज्या (लम्बांश)
*देखो टाडहंटर और लेथेम की गोलीय त्रिकोणमिति पृष्ठ २१ ।
१८

२७४
सूर्य-सिद्धान्त

चित्र ५७

चित्र का परिचय
उ पू द = क्षितिज वृत्त पू क व = विषुवद्वृत्त
उ ध ख व द = याम्योत्तर वृत्त द पू उ = क्षितिज
पू = पूर्व विन्दु उ = उत्तर विन्दु, द = दक्षिण विन्दु
ख = खस्वस्तिक य = याम्योत्तर वृत्त और विषुवद्वृत्त का सामान्य विन्दु
अ र प = सूर्य का अहोरात्र वृत्त जब क्रांति उत्तर हो,
र, स, रा = सूर्य के तीन स्थान,
ख र आ, ख स पू और ख रा इ = सूर्य के तीन ऊर्ध्व वृत्त,
उ आ, उ पू और उ इ = सूर्य के दिगंश,
पू आ, पू ई = सूर्य की अग्रा,
अ = सूर्य का उदय विन्दु
∠ ख ध अ = सूर्य का उदयकालिक नतकाल
∠ ख ध र, ∠ ख ध स और ∠ ख ध रा = सूर्य के नतकाल जब वह क्रम से
र, स और रा बिन्दुओं पर रहता है
ध अ, ध र, ध स और ध रा = सूर्य के ध्रुवान्तर जो प्रायः समान हैं
र क, स का, रा की = सूर्य की क्रान्तियां जो प्रायः समान हैं
ख र, ख स और ख रा = सूर्य के नतांश
आ र, पू स और इ रा = सूर्य के उन्नतांश ।

त्रिप्रश्नाधिकार २७५
परन्तु दिगंश अग्रा का, ध्रुवांतर क्रान्ति का और लम्बांश अक्षांश का पूरक है,
इसलिए
ज्या (अग्रा) = $\frac{ज्या (क्रान्ति) - कोज्या (नतांश) \times ज्या (अक्षांश)}{ज्या नतांश \times कोज्या अक्षांश}$ (ग)
= $\frac{ज्या (क्रान्ति)}{ज्या (नतांश) \times कोज्या (अक्षांश)} - कोटि स्पर्शरेखा (नतांश) \times$
स्पर्श रेखा (अक्षांश) (घ)
परन्तु स्पर्शरेखा (अक्षांश) = $\frac{पलभा}{१२}$
कोटि स्पर्शरेखा (नतांश) = $\frac{१२}{छाया}$
ज्या (नतांश) = $\frac{छाया}{छायाकर्ण}$
$\therefore$ ज्या (अग्रा) = $\frac{ज्या (क्रान्ति)}{कोज्या (अक्षांश)} \times \frac{छायाकर्ण}{छाया} - \frac{१२}{छाया} \times \frac{पलभा}{१२}$
= $\frac{१}{छाया} \frac{क्रान्ति ज्या \times छायाकर्ण}{अक्षांश कोटिज्या} - पलभा \right}$ (६)
$\therefore$ छाया $\times$ इष्टकालिक अग्रा ज्या = कर्ण वृत्ताग्रा - पलभा
[देखो समीकरण (४)]
परन्तु छाया $\times$ इष्टकालिक अग्रा ज्या = इष्टकालिक छाया का भुज, क्योंकि
चित्र ४६ में $\angle$ स श पू या $\angle$ छ श भ इष्टकालिक अग्रा है जिसकी ज्या = $\frac{छ भ}{छ श}$
इसलिए छाया $\times$ इष्टकालिक अग्राज्या = श छ $\times \frac{छ भ}{छ श}$
$\therefore$ भुज = कर्ण वृत्ताग्रा - पलभा
इस चित्र में सूर्य सममंडल से उत्तर है इसलिए भुज दक्षिण होगा । यदि
सूर्य सममंडल के दक्षिण जैसे रा पर हो तो गोलीय त्रिभुज ध ख रा में
कोज्या $\angle$ ध ख रा = $\frac{कोज्या (ध रा) - कोज्या (ख रा) \times कोज्या (ध ख)}{ज्या (ख रा) \times ज्या (ध ख)}$

२७६ सूर्य-सिद्धान्त
अथवा कोज्या (६०° + पू ख रा)
= कोज्या (ध्रुवांतर) - कोज्या (नतांश) × कोज्या (लम्बांश)

ज्या (नतांश) × ज्या (लम्बांश)
ज्या (क्रान्ति)
= ------------------------------ - को स्परे (नतांश) × स्परे (अक्षांश)
ज्या (नतांश) × कोज्या (अक्षांश)
परन्तु कोज्या (६० + ∠ पू ख रा) = - ज्या ∠ पू ख रा = - ज्या (अग्रा)
∴ पहले की तरह

  • ज्या (अग्रा) = १ / छाया { कर्ण वृत्ताग्रा - पलभा }
    अथवा, - छाया × ज्या (अग्रा) = कर्णवृत्ताग्रा - पलभा
    या, - भुज = कर्णवृत्ताग्रा - पलभा
    यहां कर्णवृत्ताग्रा से पलभा घटाने पर ऋणात्मक होता है जिससे प्रकट है कि
    पलभा कर्णवृत्ताग्रा से बड़ी है। सूर्य सममंडल के दक्खिन है इसलिए कर्णवृत्ताग्रा
    पूर्व पच्छिम रेखा और विषुवद्वृत्ताग्रगा रेखाओं के बीच में होगी और पहला भारतवर्ष
    में सदैव उत्तर रहता है इसलिए भुज उत्तर होगा ।
    इन दोनों उदाहरणों में सूर्य उत्तर गोल में है अर्थात् इसकी क्रान्ति उत्तर है ।
    यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो तो चित्र ५८ की तरह स्थिति होगी । गोलीय त्रिभुज
    ध ख र में
    कोज्या ∠ ध ख र = कोज्या (ध र) - कोज्या (ख र) × कौज्या (ध ख)

ज्या (ख र) × ज्या (ध ख)
∴ कोज्या (६०° + अग्रा) = कोज्या (६०° + क्रान्ति) - कोज्या (नतांश)

ज्या (नतांश) × ज्या (लम्बांश)

  • ज्या (क्रान्ति)
    ∴ - ज्या (अग्रा) = ------------------------------ × कोज्या (लम्बांश)
    ज्या (नतांश) × कोज्या (अक्षांश)
  • को स्परे (नतांश) × स्परे (अक्षांश)
    ∴ पहले की तरह
  • ज्या (अग्रा) = १ / छाया { - क्रान्ति ज्या × छायाकर्ण / अक्षांश कोटिज्या - पलभा }
    = १ / छाया { - कर्णवृत्ताग्रा - पलभा }
    अथवा - ज्या (अग्रा) × छाया = - कर्णवृत्ताग्रा - पलभा
    या, - भुज = - कर्णवृत्ताग्रा - पलभा

त्रिप्रश्नाधिकार ३७७
∵ भुज = कर्णवृत्ताग्रा + पलभा
यहाँ कर्णवृत्ताग्रा में पलभा जोड़ने से भुज आता है ।
∵ जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है तब कर्णवृत्ताग्रा में पलभा सदैव
जोड़ना पड़ता है ।
चित्र ५८
चित्र परिचय
उ ध ख व प द = यामोत्तर वृत्त उ = उत्तर विन्दु
ध = उत्तरी आकाशीय ध्रुव ख = खस्वस्तिक
द = दक्षिण विन्दु पू = पूर्व विन्दु
ख पू = सम मंडल व पू = विषुवद्वृत्त
अ प = सूर्य का अहोरात्र वृत्त जब क्रान्ति दक्षिण हो
अ = उदय विन्दु र = सूर्य का इष्ट स्थान
ख र आ = सूर्य का ऊर्ध्व वृत्त उ अ = सूर्य का उदयकालिक दिगंश
उ आ = सूर्य का इष्टकालिक दिगंश अ पू = उदयकालिक अग्रा
आ पू = इष्टकालिक अग्रा ख ध अ = सूर्य का उदयकालिक नत काल
∠ ख ध र = सूर्य का इष्टकालिक नत काल
ख र = सूर्य का नतांश; आ र = सूर्य का उन्नतांश

२७६ सूर्य-सिद्धान्त
यदि सूर्य सममंडल में हो तो छायाकर्ण जानने की पहली रीति
लम्बाक्षजीवे विषुवच्छाया द्वादशसङ्गुणे ।
क्रान्तिज्याप्ते तु तौ कर्णौ सममण्डलगे रवौ ॥२५॥
अनुवाद—(२५) यदि सूर्य सममण्डल में हो तो लम्बज्या को पलभा से
अथवा अक्षज्या को १२ से गुणा करके प्रत्येक को क्रान्तिज्या से भाग देने पर छाया-
कर्ण आ जाता है ।
विज्ञान भाष्य—इस श्लोक का सार यह है :—
जब सूर्य सममंडल में हो तो,
लम्बज्या × पलभा
छायाकर्ण = ———————————
क्रान्तिज्या
अक्षज्या × १२
= ———————————
क्रान्तिज्या
जिस समय सूर्य सममण्डल में होता है उस समय शंकु की छाया ठीक पूर्व-
पश्चिम रेखा पर रहती है, चित्र ५७ में सूर्य इस स्थिति में अहोरात्र वृत्त प अ और
सममंडल ख पू के सम्पात विन्दु 'स' पर रहेगा । ऐसी दशा में कोण ध ख स ६०°
के समान होगा और इष्टकालिक अग्रा शून्य होगी । इसलिए पिछले श्लोक के
समीकरण (६) के बायें पक्ष का मान्य शून्य होगा; इसलिए इस समीकरण के दाहिने
पक्ष का भी मान्य शून्य होगा । इसलिए
क्रान्तिज्या × छायाकर्ण
—————————————— – पलभा = ०
अक्षांश कोटिज्या
∵ क्रान्ति ज्या × छायाकर्ण
—————————————— = पलभा
अक्षांश कोटिज्या
पलभा × अक्षांश कोटिज्या
या छायाकर्ण = ————————————————
क्रान्तिज्या
परन्तु अक्षांश कोटिज्या = लम्बज्या,
पलभा × लम्ब ज्या
∵ छाया कर्ण = —————————— (७)
क्रान्तिज्या
१३वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है कि
शंकु
लम्बज्या = ———————
विषुवत्कर्ण

त्रिप्रश्नाधिकार २७६
अक्षज्या = पलभा / विषुवत्कर्ण
∵ विषुवत्कर्ण = शंकु / लम्बज्या = पलभा / अक्षज्या
∴ पलभा x लम्बज्या = शंकु x अक्षज्या
समीकरण (७) में पलभा x लम्बज्या की जगह शंकु x अक्षज्या रख देने से
इसका रूप यह होगा—
छायाकर्ण = शंकु x अक्षज्या / क्रान्तिज्या
यह बात नेपियर के दूसरे नियम से भी सिद्ध हो सकती है क्योंकि जिस
समय सूर्य सममंडल में होगा उस समय दिगंश ९०° और अग्रा शून्य होगी इसलिए
चित्र ५७ का ∠ ध ख स समकोण होगा । इसलिए त्रिभुज ध ख स समकोण गोलीय
त्रिभुज होगा जिसके भुजों और कोणों का सम्बन्ध नेपियर के दूसरे नियम के अनुसार
यह होगा :—
कोटिज्या (ध स) = कोटिज्या (ध ख) x कोटिज्या (ख स)
यहाँ धनु ध स, स सूर्य का ध्रुवांतर, ख स सूर्य का नतांश और ध ख
लम्बांश है । इसलिए
कोटिज्या (ध्रुवांतर) = कोटिज्या (नतांश) x कोटिज्या (लम्बांश)
परन्तु ध्रुवांतर क्रांति का पूरक होता है, इसलिए
ज्या क्रांति = कोटिज्या (नतांश) x ज्या (अक्षांश)
परन्तु नतांश कोटिज्या = १२ / छाया कर्ण x [देखो श्लोक २१ का समीकरण (ख)]
∴ ज्या क्रान्ति = १२ / छायाकर्ण x ज्या (अक्षांश)
अर्थात् छायाकर्ण = १२ x अक्षांशज्या / क्रान्तिज्या
इससे दूसरा रूप भी पहले की तरह जाना जा सकता है ।
सममंडल में सूर्य हो तो छायाकर्ण जानने की रीति
सौम्याक्षोना यदाक्रान्तिः स्यातदाङ्गु दलश्रवः ।
विषुवच्छायाभ्यस्तः कर्णोमध्द्याग्रयोद्धतः ॥२६॥

२८० सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—यदि उत्तर अक्षांश से उत्तर क्रान्ति कम हो तो मध्याह्नकालिक
छायाकर्ण को पलभा से गुणा करके मध्याह्नकालिक कर्णाग्रा से भाग देने पर इष्ट-
कालिक छायाकर्ण निकल आता है ।
विज्ञान भाष्य-- इस श्लोक का सार यह है :—
जब सूर्य सममंडल में हो तब,
मध्याह्न छायाकर्ण x पलभा
छाया कर्ण = ————————————— (१)
मध्याह्न कर्णाग्रा
उपपत्ति—२२वें श्लोक के अनुसार,
उदयकालिक अग्राज्या x मध्याह्न छायाकर्ण
मध्याह्न कर्णाग्रा = —————————————————————
त्रिज्या
∴ समीकरण (१) में मध्याह्न कर्णाग्रा का यह मान उत्थापन करने से
मध्याह्न छायाकर्ण x पलभा x त्रिज्या
छायाकर्ण = ——————————————————————
उदयकालिक अग्राज्या x मध्यान्ह छायाकर्ण
पलभा x त्रिज्या
= ————————— (२)
उदयकालिक अग्राज्या
समीकरण (२) में उदयकालिक अग्राज्या का मान २२वें श्लोक के प्रथम
पंक्ति या वहाँ के समीकरण (१) के अनुसार उत्थापन करने से,
पलभा x त्रिज्या
छायाकर्ण = ——————————
क्रान्ति ज्या x विषुवत्कर्ण
———————————
१२
पलभा x १२ x त्रिज्या
= —————————————
क्रान्ति ज्या x विषुवत्कर्ण
१२ x त्रिज्या
परंतु १३वें श्लोक के अनुसार ——————— = लम्बज्या
विषुवत्कर्ण
पलभा x लम्बज्या
∴ छायाकर्ण = ——————————
क्रान्तिज्या
जो २५वें श्लोक के नियम का ही एक रूप है । इसलिए यह सिद्ध हुआ कि
जब सूर्य सममंडल में हो तब
मध्याह्न छायाकर्ण x पलभा
छायाकर्ण = —————————————
मध्याह्न कर्णाग्रा
कर्णाग्रा जानने की दूसरी रीति—
स्वक्रान्तिज्या त्रिजीवाघ्ना लम्बज्याप्ताऽग्रमौर्विका ॥
सेष्टकर्णहता भक्ता त्रिज्ययाऽग्राऽङ्गुलात्मिका ।।२७।।

त्रिपश्नाधिकार २८१
अनुवाद-(२७) इष्टकाल के सूर्य की क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके
लम्बज्या से भाग देने पर उदयकालिक अग्रज्या आती है जिसको इष्टकाल के छाया
कर्ण से गुणा करके त्रिज्या से भाग देने पर इष्टकाल की कर्णाग्रा आती है ।
विज्ञान भाष्य - २२वें श्लोक में कर्णाग्रा जानने की रीति बतलायी गयी है
वही यह भी है अंतर केवल इतना है कि वहाँ क्रान्तिज्या को विषुवत्कर्ण से गुणा करके
१२ से भाग दिया गया है और यहाँ क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके लम्बज्या से
भाग दिया गया है जो एक ही है (देखो श्लोक १३ तथा २२) ।
जब सूर्य ईशान, अग्नि आदि चार कोणों में हो तब उन्नतांश या
नतांश जानने की रीति-
त्रिज्यावर्गार्धतोऽग्रज्यावर्गोनाद् द्वादशाहतात् ।
पुनर्द्वादशनिघ्नाच्च लभ्यते यत्फलं बुधैः ॥२८॥
शङ्कुवर्गार्धसंयुक्त विषुवद्वर्गभाजितात् ।
लब्धं तु करणी नाम तां पृथक्स्थापयेत्ततः ॥२९॥
विषुवच्छायाऽर्क वधादग्रज्यासङ्गुणात्तथा ।
भक्तात्फलाख्यं तद्वर्गसंयुक्तकरणीपदम् ॥३०॥
फलेन हीनं संयुक्तं दक्षिणोत्तरगोलयोः ।
याम्योर्याविदिशोश्शङ्कुरेवं यामोत्तरे रवौ ॥३१॥
परिभ्रमति शङ्कोश्च शङ्कुरुत्तरयोश्च सः ।
तत्तिज्यावर्ग विश्लेषान्मूलं दृग्ज्याऽभिधीयते ॥३२॥
अनुवाद-(२८) त्रिज्या के वर्ग का आधा करके उसमें से उदयकालिक
अग्रज्या के वर्ग को घटाकर शेष को १२ से गुणा करके गुणनफल को फिर १२ से
गुणा करने पर जो फल विद्वानों को मिलता है (२९) उसको शंकु के वर्गार्ध और
पलभा के वर्ग के योगफल से भाग देते हैं, जो लब्धि आती है उसे करणी कहते हैं ।
इसको विद्वान् अलग रखते हैं। (३०) १२ को पलभा से गुणा करके गुणनफल को
उदयकालिक अग्रज्या से भी गुणा करके जो आता है उसको भी शंकु के वर्गार्ध और
पलभा के वर्ग के योगफल से भाग देते हैं और लब्धि को फल कहते हैं। फल के वर्ग
को करणी में जोड़कर योगफल का वर्गमूल निकालते हैं, (३१) यदि सूर्य दक्षिण
गोल में हो अर्थात् यदि सूर्य क्रान्ति दक्षिण हो तो वर्गमूल से फल को घटा दे और
यदि सूर्य उत्तर गोल में हो तो वर्गमूल में फल को जोड़ दे । ऐसा करने से जो कुछ

२८२ सूर्य-सिद्धान्त
आता है वही आग्नेयादि कोणों का शंकु अर्थात् कोण शंकु कहलाता है। (३२) जब
सूर्य दक्षिण में होता है तब कोण शंकु मध्याह्न के पहले अग्निकोण में और मध्याह्न के
पीछे नैऋत्य कोण में होता है। परन्तु जब सूर्य उत्तर में होता है तब कोण शंकु
मध्याह्न के पहले ईशान कोण में और मध्याह्न के पीछे वायव्य कोण में होता है।
कोणशंकु और त्रिज्या के वर्गों के अंतर का वर्गमूल निकालने से दृग्ज्या होती है।
विज्ञान भाष्य — इन ५ श्लोकों का सार यह है :—
⎛ त्रिज्या² ⎞
⎜ ────── — अग्रज्या² ⎟ × १४४
⎝ २ ⎠
करणी = ───────────────────────────
१२²
─── + पलभा
२
१२ × पलभा × अग्रज्या
फल = ───────────────────────────
१२²
─── + पलभा²
२
कोण शंकु = √करणी + फल² ± फल
दृग्ज्या = √ त्रिज्या² — कोण शंकु²
जिस समय सूर्य ईशान, अग्नि, नैऋत्य या वायव्य कोणों में रहता है उस
समय इसका जो उन्नतांश (Altitude) होता है उसकी ज्या को कोण शंकु और जो
नतांश होता है उसकी ज्या को दृग्ज्या कहते हैं; किसी अन्य समय के नतांश ज्या को
भी दृग्ज्या तथा उन्नतांश ज्या को शंकु कहते हैं। इसलिए इस शंकु और १२ अंगुल
वाले शंकु के भेद को अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिए। इसलिए जब सूर्य का
दिगंश (Azimuth) ४५° होता है तब यह क्षितिज से जितने अंश ऊपर रहता है
उस अंश की ज्या कोण शंकु हुई और खस्वस्तिक से जितना नीचे रहता है उस अंश
की ज्या दृग्ज्या हुई। इसलिए चित्र ५७ के समीकरण (क), (ख), या (ग) की
सहायता से कोण शंकु या दृग्ज्या का मान सहज ही निकल सकता है। समीकरण
(ग) इस प्रकार है—
ज्या (क्रान्ति) — कोज्या (नतांश) × ज्या (अक्षांश)
ज्या (अग्रा) = ──────────────────────────────────────────
ज्या (नतांश) × कोज्या (अक्षांश)
जब सूर्य ईशान, अग्नि, नैऋत्य या वायव्य कोण में होता है तब अग्रा ४५
अंश के समान होती है, इसलिए ऐसी दशा में
ज्या (अग्रा) = ज्या ४५° = १/√२

त्रिप्रश्नाधिकार २८३
ज्या (अक्षांश) = $\frac{पलभा}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक १३]
ज्या (क्रान्ति) = $\frac{१२\timesअग्रज्या}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक २२]
कोज्या (अक्षांश) = $\frac{१२}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक १३]
समीकरण (ग) से सिद्ध है कि
ज्या (अग्रा) $\times$ ज्या (नतांश) $\times$ कोज्या अक्षांश
$=$ ज्या (क्रान्ति) $-$ कोज्या (नतांश) $\times$ ज्या अक्षांश
इसमें ज्या (अग्रा), ज्या (अक्षांश) इत्यादि के मान उत्थापन करने से
$\frac{१}{\sqrt{२}}\timesज्या(नतांश)\times\frac{१२}{विषुवतकर्ण}$
$=\frac{१२\timesअग्र ज्या}{विषुवतकर्ण}-कोज्या (नतांश)\times\frac{पलभा}{विषुवतकर्ण}$
इसी समीकरण के दूसरे पक्ष में जो अग्र ज्या है वह सूर्य की उदयकालिक
अग्रा की ज्या है। इस समीकरण के प्रत्येक पद के हर में विषुवतकर्ण है इसलिए इस
सामान्य संख्या को हटा देने में कोई अंतर नहीं पड़ेगा। यदि पलभा, नतांश और
अग्र ज्या को क्रम से प, न और अ अक्षरों से सूचित किया जाय और विषुवतकर्ण
हटा दिया जाय तो
$\frac{१}{\sqrt{२}}\timesज्या (न)\times१२=१२\timesअ-कोज्या (न)\timesप$
दोनों पक्षों का वर्ग करने से,
३ $\times$ ज्या$^२$ (न) $\times$ १२$^२$ $=$ १२$^२$ $\times$ अ$^२$ $\times$ प$^२$ $\times$ को ज्या$^२$(न)
$-$ २ $\times$ १२ $\times$ अ $\times$ प $\times$ कोज्या (न)
परंतु १६वें श्लोक के आधार पर
ज्या$^२$ (न) $=$ त्रिज्या$^२$ $-$ कोज्या$^२$ (न)
इसलिए उपयुक्त समीकरण का रूप यह होगा
३ $\times$ १२$^२$ $\times$ [त्रिज्या$^२$ $-$ कोज्या$^२$ (न)]
$=$ १२$^२$ अ$^२$ + प$^२$ $\times$ कोज्या$^२$ (न) $-$ २ $\times$ १२ $\times$ अ $\times$ प $\times$ कोज्या (न)

२८४ सूर्य-सिद्धान्त
अथवा सरल करने पर
१२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ]
= कोज्या२ (न) [ १२२/२ + प२ ] - २ x १२ x अ x प x कोज्या (न)
प्रत्येक पक्ष को १२२/२ + प२ से भाग देने पर और आवश्यक पदों को एक पक्ष
से दूसरे पक्ष में ले जाने पर
कोज्या२ (न) - २ x १२ x अ x प / (१२२/२ + प२) कोज्या (न)

  • १२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ] / (१२२/२ + प२) = ०
    तीसरे पद की जगह करणी और दूसरे पद के १२ x अ x प / (१२२/२ + प२)
    की जगह फल लिखने से इसका रूप होगा
    कोज्या२ (न) - २ x फल x कोज्या (न) - करणी = ०
    या कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) = करणी
    पहले पक्ष को पूर्ण वर्ग बनाने के लिए प्रत्येक पद में (फल)२ जोड़ने से
    कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) + फल२
    = करणी + फल२
    इस समीकरण का पहला पक्ष = [कोज्या (न) - फल]२
    ∴ कोज्या (न) - फल = √करणी + फल२
    अथवा कोज्या (न) = फल + √करणी + फल२
    परंतु कोज्या (न) = कोज्या (नतांश) = ज्या (उन्नतांश) = कोण शंकु
    ∴ कोण शंकु = √करणी + फल२ + फल
    इसलिए यह सिद्ध हुआ कि जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है तब फल के
    वर्ग को करणी में जोड़कर और योगफल का वर्गमूल निकालकर फल में जोड़ देने से
    कोण शंकु आ जाता है। यदि सूर्य की क्रान्ति दक्षिण हो तो चित्र ५८ के अनुसार