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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 292

सूर्य-सिद्धान्त २६६
शंकुमानांगुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् ।
कोटिज्यया विभज्याऽऽप्ते छायाकर्णावहर्दले ॥२१॥
अनुवाद—(२०) अपने स्थान का अक्षांश और मध्याह्नकाल के सूर्य की
क्रान्ति यदि एक ही दिशा में हो तो जोड़ दो और भिन्न दिशा में हों तो घटा दो । जो
कुछ आवेगा वही सूर्य का मध्यान्हकालिक नतांश होगा। इसकी भुजज्या और
कोटिज्या बनाओ । (२१) शंकु के अंगुलात्मक मान को अर्थात् १२ को भुज (नतांश
की भुजज्या) से गुणा करके कोटिज्या से भाग देने पर लब्धि मध्यान्ह की छाया तथा
शंकु को त्रिज्या से गुणा करके कोटिज्या से भाग देने पर मध्यान्ह का छायाकर्ण ज्ञात
होगा ।
विज्ञान भाष्य—यह १४वें श्लोक का विलोम है। इन दोनों श्लोकों का
सरल रूप यह है—
अ ± क = न (१)
छाया = ज्या (न) × १२ / कोज्या (न) (२)
छायाकर्ण = त्रिज्या × १२ / कोज्या (न) (३)
जहां अ अक्षांश, क सूर्य की मध्यान्हकालिक क्रान्ति और न सूर्य का मध्यान्ह-
कालिक नतांश है । समीकरण (१) में धन का चिह्न उस समय लिखना चाहिए जब
अक्षांश और क्रान्ति की दिशाएं एक ही हों और ऋण का चिह्न उस समय जब इनकी
दिशाएँ भिन्न हों । अक्षांश की दिशा उत्तर गोल में सदैव दखिन समझी गयी है
जिसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ।
१५वें श्लोक के भाष्य में बतलाया जा चुका है कि शंकु और छायाकर्ण के
बीच के कोण को नतांश कहते हैं । इसलिये
नतांश ज्या = छाया / छायाकर्ण वर्तमान प्रथानुसार (क)
नतांश कोटिज्या = शंकु / छायाकर्ण (ख)
∵ छाया = नतांशज्या × छायाकर्ण
= नतांश ज्या × शंकु / नतांश कोटिज्या
= ज्या (न) × १२ / कोज्या (न)