सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २७१
(२) नवीन रीति से : —
छाया = १२ × स्परे १०°
= १२ × ·१७६३ अंगुल
= २·११५६
= २·१२ अंगुल
छायाकर्ण = १२ / कोज्या १०°
= १२ / .९८४८
= १२·१६ अंगुल
सूर्य की क्रान्ति और किसी इष्टकाल की छाया जानकर दिशा जानना—
क्रान्तिज्या विषुवत्कर्णहताऽऽप्ता शंकुजीवया ।
अर्कग्रा सेऽष्टकर्णघ्ना मध्यकर्णोद्धृता स्वका ॥२२॥
विषुवद्भायुताऽर्काग्रा याम्ये स्यादुत्तरो भुजः ।
विषुवद्भा विशोध्योदग्गोले स्याद्बाहुहत्तरः ॥२३॥
विपर्ययाद् भुजो याम्यो भवेत्पूर्वापरान्तरे ।
माध्याह्निके भुजो नित्यं छाया माध्याह्न्निकी मता ॥२४॥
अनुवाद—(२२) सूर्य की क्रान्ति की ज्या को विषुवत्कर्ण से गुणा करके शंकु
रूपी जीवा अर्थात् १२ से भाग देने पर सूर्य की उदयकालिक अग्रा आती है । इसको
इष्टकाल के छायाकर्ण से गुणा करके मध्यकर्ण अर्थात् त्रिज्या से भाग देने पर इष्ट-
काल की कर्णाग्रा अथवा कर्णवृत्ताग्रा आती है । (२३) यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो
अर्थात् यदि सूर्य की क्रान्ति दक्षिण हो तो कर्णाग्रा में पलभा जोड़ देने से और यदि
सूर्य उत्तर गोल में हो तो पलभा से कर्णाग्रा घटा देने पर उत्तर भुज आता है । (२४)
यदि सूर्य उत्तर गोल में हो और पलभा कर्णाग्रा से छोटी हो तो विपरीत क्रिया करने
से अर्थात् कर्णाग्रा से पलभा घटाने पर दक्षिण भुज आता है । मध्याह्न में जो छाया
होती है वही सदैव मध्याह्नकालिक भुज है ।
विज्ञान भाष्य—इसी अधिकार के ५वें और ७वें श्लोकों के विज्ञान भाष्य
में अग्रा और अग्राज्या की चर्चा हुई है । ७वें श्लोक में अग्रा की परिभाषा यह
बतलाई गई है, "इष्ट छाया की नोक से विषुवद्भाग्रा रेखा का जो अंतर होता है
वह अग्रा कहलाती है" । चित्र ४५, ४६, के वर्णन में छ अ अग्राज्या और छ भ भुज
बतलाये गये हैं । परंतु छ अ को अग्रा या अग्राज्या कहने से बहुत गड़बड़ हो जाने का
डर है इसलिए छ अ को जिसे ७वें श्लोक में अग्रा और विज्ञान भाष्य में मैंने