सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
स्पष्टाधिकार १७१
$\frac{ता^३}{ताम^३}(ज्या^४म)=$
$\frac{ता^३}{ताम^३}{\frac{१}{२^३(-१)^२}$
$\times (कोज्या४म-४कोज्या२म+\frac{२\times ३}{\lfloor २}\times १}$
$=\frac{१}{८}(४^३ज्या४म-४\times २^३ज्या२म)$
$=४(२ज्या४म-ज्या२म)$
$\frac{ता^४}{ताम^४}(ज्या^५५)=\frac{ता^४}{ताम^४}{\frac{१}{२^४(-१)^२}$
$\times (ज्या५म-५ज्या३म+\frac{५\times ४}{\lfloor २}ज्याम)}$
$=\frac{१}{२^४}(५^४ज्याम५म-५\times ३^४ज्या३म+१०ज्याम)$
$\frac{ता^५}{ताम^५}(ज्या^६५)=\frac{ता^५}{ताम^५}{\frac{१}{२^५(-१)^२}(कोज्या ६ म$
$-६ कोज्या ४म+\frac{६\times ५}{\lfloor २}कोज्या २ म-\frac{६\times ५\times ४}{\lfloor ३}\times \frac{१}{२})}$
$=\frac{१}{२^५}(६^५ ज्या ६म-६\times ४^५ ज्या ४ म+१५\times २^५ ज्या २ म)$
$\therefore उ=म+चज्याम +\frac{च^२}{२}ज्या २ म+\frac{च^३}{\lfloor ३}\times \frac{३}{४}(३ ज्या३म-ज्याम$
$+\frac{च^४}{\lfloor ४}\times ४(२ ज्या ४ म-ज्या २ म)+\frac{च^५}{\lfloor ५}\times \frac{१}{२^४}$
$\times (५^४ ज्या ५ म-५\times ३^४ ज्या ३ म+१० ज्या म)$
$+\frac{च^६}{\lfloor ६}\times \frac{१}{२^५}(६^५ ज्या ६ म-६\times ४^५ ज्या ४ म+$
$१५\times २^५ ज्या २ म)+\dots\dots\dots$
यदि ज्या म, ज्या २ म इत्यादि अलग करके एकत्र कर दिये जायें तो
$उ=म+(च-\frac{१}{८}च^३+\frac{१}{१६२}च^५)ज्या म +(\frac{च^२}{२}-\frac{च^४}{६}+\frac{च^६}{४५})$
$ज्या २म+(\frac{३च^३}{८}-\frac{२७च^५}{१२८})ज्या ३ म$
१७२ सूर्य-सिद्धान्त
- (च⁴/३ - ४च⁶/१५) ज्या ४ म + १२५च⁵/३८४ ज्या ५ म + ......
इस समीकरण में ज्या ६ म तथा इसके आगे की ज्याओं के गुणक और वे
पद जिनमें च के छठवें घात के आगे की संख्या वर्तमान है छोड़ दिये गये क्योंकि इनके
मान नहीं के समान हैं।
समीकरण (१) को इस प्रकार भी लिख सकते हैं :—
च ज्या उ = उ - म
तब ज्या उ = (उ - म)/च
जिसका यह अर्थ हुआ कि यदि उ के विस्तार में से म घटाया जाय और शेष
को च से भाग दे दिया जाय तो ज्या उ का विस्तार हो जायगा । इसलिए
ज्या उ = ( १ - १/८ च² + १/१९२ च⁴ ) ज्या म - ( च/२ - च³/६ + च⁵/४८ ) ज्या २ म
- ( ३/८ च² - २७/१२८ च⁴ ) ज्या ३ म
- ( च³/३ - ४/१५ च⁵ ) ज्या ४ म + १२५/३८४ च⁴ ज्या ५ म + ...
यदि फि (उ) = ज्या २ उ तो फि (म) = ज्या२म और फि'(म) =
२ कोज्या २ म,
इसलिए लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार
ज्या २ उ = ज्या २ म + च ज्या म × २ कोज्या १ म - (च² ता)/(|२ ताम) (ज्या² म × २ कोज्या२म)
- (च³ ता²)/(|३ ताम²) (ज्या³ म × २ कोज्या २ म)
- (च⁴ ता³)/(|४ ताम³) (ज्या⁴ म × २ कोज्या २ म)
- (च⁵ ता⁴)/(|५ ताम⁴) (ज्या⁵ म × २ कोज्या २ म) + ...
जिसमें ज्या म × २ कोज्या २ म = ज्या ३ म - ज्या म,
स्पष्टाधिकार १७३
ता/ताम (ज्या² म × २ कोज्या २ म)
= ता/ताम ( (१ - कोज्या २ म)/२ × २ कोज्या २ म )
= ता/ताम (कोज्या २ म - कोज्या² २ म)
= ता/ताम (कोज्या २ म - (१ + कोज्या ४ म)/२ )
= २ ज्या ४ म - २ ज्या २ म,
ता²/ताम² (ज्या³ म × २ कोज्या २ म)
= ता²/ताम² ( (३ ज्या म - ज्या ३ म)/४ × २ कोज्या २म )
= ता²/ताम² ( (३ ज्या म कोज्या २ म - ज्या३म कोज्या २म)/२ )
= ता²/ताम² { ३/८ (ज्या ३ म - ज्या म) - १/८ (ज्या ५ म + ज्या म) }
= ता²/ताम² { १/८ (३ ज्या ३ म - ४ ज्या म - ज्या ५ म) }
= १/८ ( - ३² ज्या ३ म + ४ ज्या म + ५² ज्या ५ म),
ता³/ताम³ (ज्या⁴ म × २ कोज्या २ म)
= ता³/ताम³ { १/८ (कोज्या ४ म - ४ कोज्या २ म + ३) २ कोज्या २ म }
= ता³/ताम³ { १/८ (२ कोज्या ४ म कोज्या २ म - ४.२ कोज्या² २ म
- ६ कोज्या २ म) }
= ता³/ताम³ { १/८ (कोज्या ६ म + कोज्या २ म) -
४/८ (१ + कोज्या ४ म) + ६/८ कोज्या २ म }
= ता³/ताम³ { १/८ (कोज्या ६ म - ४ कोज्या ४ म + ७ कोज्या २ म - ४) }
१७४ सूर्य सिद्धान्त
$=\frac{१}{८} (६^३ ज्या ६ म - ४^४ ज्या ४ म + ७ \times २^३ ज्या २म)$
$\because ज्या २ उ = ज्या २म + च (ज्या३म - ज्याम)$
$+\frac{च^२}{२} (२ ज्या ४ म - २ ज्या २ म)$
$+\frac{च^३}{\underline{\vert ३}} \times \frac{१}{४} (२५ ज्या ५ म - २७ ज्या ३म + ४ ज्याम)$
$+\frac{च^४}{\underline{\vert ४}} \times \frac{१}{८} (२१६ ज्या ६ म - २५६ ज्या ४ म$
$+ ५६ ज्या २ म) + \dots\dots\dots\dots$
$= \left( -च + \frac{च^३}{६} \right) ज्या म + \left( १ - च^२ + \frac{७च^४}{२४} \right) ज्या२ म$
$+ \left( च - \frac{६च^३}{८} \right) ज्या ३ म + \left( च^२ - \frac{४च^४}{३} \right) ज्या ४ म$
$+ \frac{२५ च^३}{२४} ज्या ५ म + \dots\dots\dots$
यदि फि $(उ) = ज्या३ उ$ तो फि $(म) = ज्या ३ म$ और फि$'(म) = ३$
कोज्या ३ म, इसलिए लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार,
ज्या ३ उ $=$ ज्या ३ म $+$ च ज्या म $\times$ ३ कोज्या ३ म
$+\frac{च^२}{\underline{\vert २}} \frac{ता}{ताम} {ज्या^२ म \times ३ कोज्या ३ म}$
$+\frac{च^३}{\underline{\vert ३}} \frac{ता^२}{ताम^२} {ज्या^३ म \times ३ कोज्या ३ म} + \dots\dots$
$= ज्या ३ म + \frac{३}{२} च (ज्या ४ म - ज्या २ म) + \frac{च^२}{२} \times \frac{३}{४}$
$(५ ज्या ५ म - ६ ज्या ३ म + ज्या म)$
$+\frac{च^३}{६} \times \frac{३}{८} (३६ ज्या ६ म - ४८ ज्या ४ म + १२ ज्या २ म) + \dots$
$= \frac{३च^२}{८} ज्या म - \left( \frac{३च}{२} - \frac{३च^३}{४} \right) ज्या २ म$
$+ \left( १ - \frac{६च^२}{४} \right) ज्या ३ म$
स्पष्टाधिकार १७५
$+ \left( \frac{३ च}{२} - ३ च^३ \right) ज्या ४ म + \frac{१५ च^२}{८} ज्या ५ म$
$+ \frac{६च^३}{४} ज्या ६ म + \dots\dots$
इसी तरह, ज्या ४ उ $=$ ज्या ४ म $+$ च ज्या म $\times$ ४ कोज्या ४ म
$+ \frac{च^२}{२} \frac{ता}{ताम} ज्या^२ म \times ४ कोज्या ४ म \right}$
$=$ ज्या ४ म $+$ २ च (ज्या ५ म $-$ ज्या ३ म)
$+ \frac{च^२}{२}$ (६ ज्या ६ म $-$ ८ ज्या ४ म $+$ २ ज्या २ म)
$=च^२ ज्या २ म - २ च ज्या ३ म$
$+ (१ - ४च^२) ज्या ४ म + २ च ज्या ५ म + \dots\dots$
और ज्या ५ उ $=$ ज्या ५ म $+ \frac{५}{२} च ( ज्या ६ म - ज्या ४ म) + \dots\dots$
$= - \frac{५च}{२} ज्या ४ म + ज्या ५म + \frac{५च}{२} ज्या ६ म + \dots$
इस प्रकार समीकरण (च) के उ, ज्या उ, ज्या २ उ इत्यादि के मान तो आ
गये परन्तु इसके प, प$^२$, प$^३$ इत्यादि के मान जानना रह गये। यहाँ प
$\frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}$ के लिए रखा गया है।
इसके किसी घात का विस्तार लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार जाना
जा सकता है। परन्तु पांच छः घात तक के विस्तार जिनमें च$^७$ से अधिक अंक लाने
की आवश्यकता नहीं है द्वियुपद सिद्धान्त (Binomial Theorem) से भी जाने जा
सकते हैं जो यहाँ दिखलाये जाते हैं :—
प $= \frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}$
$= \frac{१ - \sqrt{१-च^२}}{च}$
$= \frac{१}{च} (१ - \sqrt{१-च^२})$
$= \frac{१}{च} १ - (१-च^२)^\frac{१}{२} \right}$
१७६ सूर्य-सिद्धान्त
$=\frac{१}{च} (\frac{च^२}{२}+\frac{च^४}{८}+\frac{च^३}{१६}+......)$
$=\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६}+......$
$प^२ =(\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६})^२$
$=\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५च^६}{६४}+......$
$प^३ =(\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६})(\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५च^६}{६४})$
$=\frac{च^३}{८}+\frac{३च^५}{३२}+\frac{\overline{\xi}च^७}{१२८}+......$
$प^४ =(\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५}{६४}च^६)^२$
$=\frac{च^४}{१६}+\frac{च^६}{१६}+......$
$=प^५ (\frac{च^४}{१६}+\frac{च^६}{१६})(\frac{च}{२}+\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६})$
$=\frac{च^५}{३२}+.........$
अब समीकरण (च) में प, $प^२$, $प^३$ इत्यादि तथा उ, ज्या उ, ज्या २ उ
इत्यादि के विस्तृत मान उत्थापन किये जायं तो इसका रूप यह होगा :—
स$=म+(च-\frac{च^३}{८}+\frac{च^५}{१६२}) ज्याम +(\frac{च^२}{२}-\frac{च^५}{६}+\frac{च^६}{४८}) ज्या २ म$
$+(\frac{३च^३}{८}-\frac{२७च^५}{१२८}) ज्या ३ म$
$+(\frac{च^४}{३}-\frac{४च^६}{१५}) ज्या ४ म +\frac{१२५च^५}{३८४} ज्या ५ म +$
$+२ { (\frac{च}{२}+\frac{च^५}{१६}) [(१-\frac{च^२}{८}+\frac{च^४}{१६२}) ज्या म$
$+(\frac{च}{२}-\frac{च^२}{६}+\frac{च^५}{४८}) ज्या २ म$
स्पष्टाधिकार १७७
$+\left(\frac{३ च^२}{८}-\frac{२७ च^४}{११\tau}\right) ज्या ३ म+\left(\frac{च^३}{३}-\frac{४ च^५}{१५}\right)\times ज्या ४ म$
$+\frac{१२५ च^५}{३८४} ज्या ५ म+\cdots\cdots]$
$+\frac{३}{२}\left(\frac{च^२}{४}+\frac{च^४}{८}+\frac{५ च^६}{६४}\right)\left[\left(-च+\frac{च^३}{६}\right)ज्या म$
$+\left(१-च^२+\frac{७ च^४}{२४}\right)ज्या २ म$
$+\left(च-\frac{६च^३}{८}\right)ज्या ३ म+\left(च^२-\frac{४च^४}{३}\right)\timesज्या ४ म$
$\left.+\frac{२५च^३}{२४} ज्या ५ म+\cdots\cdots\right]$
$+\frac{३}{२}\left(\frac{च^३}{८}+\frac{३च^५}{३२}\right)\left[\frac{३च^२}{८}ज्या म-\left(\frac{३च}{२}-\frac{३च^३}{४}\right)\timesज्या २ म$
$+\left(१-\frac{६च^२}{४}\right)ज्या ३ म+\left(\frac{३च}{२}-३च^३\right)\timesज्या ४ म$
$\left.+\frac{१५च^२}{८}ज्या ५म+\frac{६च^३}{४} ज्या ६ म+\cdots\cdots\right]$
$+\frac{१}{६}\left(\frac{च^४}{१६}+\frac{च^६}{१६}\right)\left[च^२ ज्या २ म-२ च ज्या ३ म$
$+\left(१-४च^२\right)ज्या ४ म+२ च ज्या ५ म ]$
$\left.+\frac{१}{२}\times\frac{च^५}{३२}\left[-\frac{५च}{२} ज्या ४ म+ज्या ५ म+\frac{५च}{२} ज्या ६ म\right]\right}$
स के इस मान में ज्या ६ म के आगे के पद तथा वह सब पद जिनके गुणक
च६ या उससे अधिक हैं छोड़ दिये गये हैं क्योंकि इससे कोई विशेष अशुद्धि नहीं हो
सकती। इस मान को सरल करने पर ऐसे पद भी मिलेंगे जिनके गुणक च६ से
अधिक हैं। इनको भी छोड़ देने तथा ज्या म, ज्या २ म इत्यादि के गुणक एकत्र
करने पर
स $=$ म $+\left(२च-\frac{१}{४}च^३+\frac{५}{६६}च^५\right)ज्या म$
$+\left(\frac{५}{४}च^२-\frac{११}{२४}च^४+\frac{१७}{१६२}च^६\right)ज्या २ म$
१२
१७८ सूर्य-सिद्धान्त
- (१३/१२ च³ - ४३/६४ च⁵) ज्या ३ म
- (१०३/९६ च⁴ - ४५१/४८० च⁶) ज्या ४ म + १०६७/९६० च⁵ ज्या ५म (छ)
मध्यम और स्पष्ट ग्रह का सम्बन्ध प्रकट करने के लिए यही प्रधान समीकरण
है। इससे यह जाना जाता हैं कि यदि द्रष्टा सूर्य के मध्यम में हो तो किसी ग्रह के
मध्यम और स्पष्ट स्थान अपने अपने कक्षावृत्त में किस समय क्या होते हैं । जिस ग्रह
की केन्द्र च्युति च के स्थान में रखी जायगी उसी ग्रह के मध्यम और स्पष्ट स्थानों
का सम्बन्ध समीकरण (छ) से जाना जा सकता है। व्यवहार में सुविधा के लिए
ज्या म, ज्या २म इत्यादि के गुणकों को च का यथार्थ मान रखकर सरल करके एक
संख्या में प्रकट किया जा सकता है। जैसे गुरु की केन्द्र च्युति* ०.०४८२५४ है,
इसलिए
च = ०.०४८२५४
च² = ०.००२३२८४
च³ = ०.०००११२४
च⁴ = ०.०००००५४
च⁵, च⁶ के मान जानने की आवश्यकता नहीं क्योंकि दशमलव के छठे
स्थान में यदि ५ का अंक हों और वह छोड़ दिया जाय तो १ विकला की अशुद्धि हो
सकती है। इसलिए,
स = म + (.०६६५०८ - .००००२८१) ज्या म - (.००२६१०६ - .०००००२५) ज्या २म
- .०००१२१८ ज्या ३म + .०००००५८ ज्या४म
अथवा स = म + .०६६४७६६ ज्या म + .००२६०८१ ज्या २म - .०००१२१८ ज्या ३म + .०००००५८ ज्या ४म (ज)
यह समीकरण सूर्य केन्द्रगत गुरु का स्पष्ट स्थान जानने के लिए पर्याप्त हैं।
यदि म, २ म, ३ म इत्यादि की ज्याएँ भारतीय रीति से कला या विकला में प्रयोग
की जायें तो समीकरण (ज) के दाहिने पक्ष में म के अतिरिक्त जो कुछ आवेगा वह
*केन्द्र च्युति कई कारणों से स्थिर नहीं रहती वरन् अत्यंत मंदगति से बदलती
रहती है, इसलिए भिन्न-भिन्न काल में इसका मान कुछ भिन्न होता है। यह केन्द्र
च्युति संवत् १६५६ वि० के अंत की है।
स्पष्टाधिकार १७६
कला या विकला में होगा और सूर्य के मध्य से यही गृह का मंदफल होगा। यदि
ज्याओं को आजकल की रीति से भिन्न में प्रकट किया जाय तो सरल करने पर म
के अतिरिक्त जो संख्या दशमलव भिन्न में आवेगी वह रेडियन में होगी जिसकी कला
या विकला बनाने के लिए ३४३७.७५ या २०६२६५ से गुणा करना होगा। दोनों
रीतियों से फल एक ही होगा।
गृह के लिए जिस तरह समीकरण (ज) प्राप्त किया गया है उसी तरह प्रत्येक
ग्रह के लिए उसकी केन्द्र च्युति को समीकरण (छ) में उत्थापन करने से एक सरल
सूत्र प्राप्त हो सकता है। प्रत्येक ग्रह की केन्द्र च्युति तथा अन्य आवश्यक बातें आगे
एक सारणी में दे दी जायेंगी।
सूर्य के मध्य से ग्रह की दूरी किस समय क्या होती है यह जानने के लिए एक
समीकरण है जो समीकरण (२) अर्थात् कर्ण = त (१ - च कोज्या उ) से लैग्रेंज
सिद्धान्त के अनुसार १ - च कोज्या उ का मान जान लेने से आ जाता है। लैग्रेंज
सिद्धान्त के अनुसार,
१ - च कोज्या उ = (१ - च कोज्या म) + च ज्या म ता/ताम
(१ - च कोज्या म) + च²/|२ · ता/ताम { ज्या² म × च ज्या म }
- च³/|३ · ता²/ताम² { ज्या³ म × च ज्या म }
= १ - च कोज्या म + च²/२ - च²/२ कोज्या २ म - ३/८ च³ कोज्या म - ३/८ च³ कोज्या ३ म - च⁴/३ × कोज्या ४ म
- च⁴/३ कोज्या २ म + ............
= (१ + च²/२) - च (१ - ३/८ च²) कोज्या म - च²/२
(१ - २/३ च²) कोज्या २ म
- ३/८ च³ कोज्या ३ म + .........
१८० सूर्य-सिद्धान्त
∴ कर्ण = त { ( १ + च²/२ ) - च ( १ - ३/८ च² ) कोज्या म
- च²/२ ( १ - २/३ च² ) कोज्या २ म - ३/८ च³ कोज्या ३ म } (झ)
गुरु के कर्ण के लिए समीकरण (झ) का रूप होगा,
५२०२.८ { (१ + .००११६४२) - (.०४८२५४ - .००००४२१)
कोज्या म - (.००११६४२ - .०००००१८) कोज्या २ म - .००००४२१ कोज्या ३ म }
अथवा ५२०२.८ (१.००११६४२ - .०४८२११८ कोज्या म - .००११६२४ कोज्या २ म - .००००४२१ कोज्या ३ म)
अथवा ५२०८.८६ - २४१.०६ कोज्या म - ६.०५
कोज्या २ म - .२२ कोज्या ३ म
५२०२.८ सूर्य से गुरु का मध्यम कर्ण है जब कि पृथ्वी का मध्यम कर्ण
१००० समझा जाय । इसी तरह अन्य ग्रहों के कर्ण जानने का सूत्र सरल हो
सकता है ।
समीकरण (छ) से ग्रह का जो स्पष्ट केन्द्र आता है वह उसके नीच
(Perihelion) से कक्षावृत्त में ग्रह की दूरी होता है। यदि ग्रह का कक्षावृत्त पृथ्वी
के कक्षावृत्त अर्थात् क्रान्तिवृत्त के ही धरातल में होता तो यही क्रान्तिवृत्त में भी
ग्रह की दूरी होता । परन्तु प्रत्येक ग्रह के कक्षावृत्त का धरातल क्रान्तिवृत्त के धरा-
तल से कुछ कोण बनाता है जिसे ग्रह का परम शर कहते हैं और जिसकी चर्चा पहले
अध्याय में अंतिम तीन चार श्लोकों में की गयी है इसलिए कक्षावृत्तीय स्पष्ट
केन्द्र में कुछ संस्कार करने से क्रान्तिवृत्तीय स्पष्ट केन्द्र आता है।
मान लो प ग ग्रह का कक्षावृत्त और प गा क्रान्तिवृत्त है, प ग्रह का उत्तर-
पात है, र सूर्य का मध्य है तथा न ग्रह का नीच (Perihelion) हैं। ग ग्रह का स्पष्ट
चित्र ३३
स्पष्टाधिकार १८१
स्थान और ग गा क्रान्तिवृत्त पर लम्ब है अर्थात् गा ग वृत्त क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव पर
जाता है । तब < न र ग कक्षावृत्तीय स्पष्ट केन्द्र तथा र ग की दूरी ग्रह का स्पष्ट
कर्ण है जो (छ) और (झ) समीकरणों के अनुसार जाने जाते हैं । न से न ना लम्ब
भी क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव पर जाता है । क्रान्तिवृत्त में ना और गा विन्दुओं के बीच की
जो दूरी है वही ग का क्रान्तिवृत्तीय स्पष्ट केन्द्र कहलाती है। नेपियर के नियमों के
अनुसार प ना और प गा दूरियों को सहज ही जान सकते हैं। फिर दोनों का अन्तर
जान लेने से ना गा दूरी (क्रान्तिवृत्तीय स्पष्ट केन्द्र) जानी जा सकती है। परन्तु
व्यवहार में सरलता उस समय होती है जिस समय केवल यह जानना रहता है कि
प न या प ग में क्या घटाया बढ़ाया जाय कि प ना और प गा का मान निकल
आवे । जितना घटाने या बढ़ाने से, पात से ग्रह की क्रान्तिवृत्तीय दूरी निकलती है
उसको परिणति कहते हैं। इसलिए यह जानना चाहिये कि परिणति कैसे निकालते
हैं। परिभाषा के अनुसार
नीच परिणति = प न – प ना
ग्रह परिणति = प ग – प गा
ग गा को ग्रह का इष्टकालिक शर, < ग प गा को ग्रहका परम शर, प ग
को पात से ग्रह की दूरी या विपात ग्रह कहते हैं । < ग गा प समकोण है इसलिए
ग प गा गोलीय समकोण त्रिभुज है और नेपियर के नियमों के अनुसार,
(१) ज्या (६०° - प ग) = कोज्या (ग गा) × कोज्या प गा
(२) ज्या (ग गा) = कोज्या (६०° - ग प गा) × कोज्या (६०° - पग)
(३) स्परे (ग गा) = ज्या (प गा) × स्परे (ग प गा)
(४) स्परे (प गा) = कोज्या (ग प गा) स्परे (प ग)
ज्या (प ग - प गा) = ज्या (प ग) कोज्या (प गा)
- कोज्या (प ग) ज्या (प गा) (ट)
पहले चार सूत्रों से कोज्या (प गा) और ज्या (प गा) के मान परम शर,
इष्टकालिक शर और विपात ग्रह में स्थापित करना चाहिए । सूत्र (३) से
ज्या (प गा) = स्परे (ग गा) / स्परे (ग प गा)
सूत्र (४) से, ज्या (प गा) / कोज्या (प गा) = कोज्या (ग पगा) स्परे (प ग)
∴ कोज्या (प गा) = ज्या (प गा) / [कोज्या (ग प गा) × स्परे (प ग)]
१८२ सूर्य-सिद्धान्त
$=\frac{स्परे (ग गा)}{स्परे (ग प गा)} \times \frac{१\timesकोज्या (प ग)}{कोज्या (ग प गा)\timesज्या (प ग)}$
$=\frac{स्परे (ग गा)}{ज्या (ग प गा)} \times \frac{कोज्या (प ग)}{ज्या (प ग)}$
ज्या (प ग) और कोज्या (प ग) के मानों को समीकरण (ट) में उत्थापन
करने से,
ज्या (प ग $-$ प गा) $=$ ज्या (प ग) $\times \frac{स्परे (ग गा)}{ज्या (ग प गा)} \times \frac{कोज्या (प ग)}{ज्या (प ग)}$
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad-कोज्या (प ग) \times \frac{स्परे (ग गा)}{स्परे (ग प गा)}$
$=\frac{स्परे (ग गा)\timesकोज्या (प ग)}{ज्या (ग प गा)} - \frac{कोज्या (प ग)\timesस्परे (ग गा)}{स्परे (ग प गा)}$
$=\frac{स्परे (ग गा) कोज्या (प ग)}{ज्या (ग प गा)} १-कोज्या (ग प गा ) \right}$
$=\frac{ज्या (ग गा)}{कोज्या (ग गा)} \times \frac{कोज्या (प ग)}{ज्या (ग प गा)} \times उत्क्रम ज्या (ग प गा)$
परन्तु सूत्र (२) से, $\frac{ज्या (ग गा)}{ज्या (ग प गा)} = ज्या (प ग)$
$\because$ ज्या (प ग $-$ प गा) $=\frac{ज्या (प ग) कोज्या (प ग)}{कोज्या (ग गा)} \times उत्क्रम ज्या (ग प गा)$
बुध को छोड़ कर सब ग्रहों का परम शर ३°.४ से अधिक नहीं है इसलिए
इनका इष्टकालिक शर और भी छोटा होगा; जिससे यह मान लेने में कोई अशुद्धि
नहीं है कि कोज्या (ग गा) एक के समान है । ऐसी दशा में,
ज्या (प ग $-$ प गा) $=$ ज्या (प ग) कोज्या (प ग) $\times$ उत्क्रम ज्या (ग प गा)
$=\frac{१}{२}$ ज्या २ (प ग) उत्क्रम ज्या (ग प गा)
अर्थात् ज्या (परिणति) $=\frac{१}{२}$ परम शरोत्क्रम ज्या $\times$ ज्या २ (विपातग्रह) (ठ)
इस समीकरण से ग्रह और उसके नीच दोनों की परिणित जानकर क्रान्ति-
वृत्तीय स्पष्ट केन्द्र जाना जा सकता है ।
अब यह जानना रह गया कि पृथ्वी के मध्य से ग्रह किस दिशा में और
कितनी दूर देख पड़ता है। यह तो स्वयंसिद्ध है कि पृथ्वी से किसी ग्रह की दिशा
और दूरी जानने के लिए यह जानना आवश्यक है कि पृथ्वी स्वयं कहाँ है ।
स्पष्टाधिकार १८३
चित्र ३४
यह समीकरण (छ) से ही जाना जाता है क्योंकि इसी की कक्षा के धरातल
में तो अन्य ग्रहों की परिणति करनी पड़ती है । जब पृथ्वी का स्थान निश्चित
हो गया तब सूर्यं का स्थान सहज ही जाना जा सकता है; क्योंकि सूर्य से पृथ्वी जिस
दिशा में देख पड़ती है उससे १८०° पर पृथ्वी से सूर्य दीखेगा । इसलिए पृथ्वी
के स्पष्ट केन्द्र में १८०° जोड़ने या घटाने से सूर्यं का स्थान निकल आता है ।
ग्रह के क्रान्तिवृत्तीय स्पष्ट केन्द्र से सूर्य का स्थान घटा देने पर शीघ्र-केन्द्र जाना जा
सकता है। चित्र ३४ में र प और गु क्रम से सूर्य पृथ्वी और वृहस्पति के स्थान हैं । र
वह बिन्दु है जहाँ सूर्य पृथ्वी के मध्य से देख पड़ता है; इसलिए रा र गु कोण वृहस्पति
का शीघ्र केन्द्र हुआ । प र गु कोण १८०°— रा र गु कोण के समान है । इसलिए
प र गु त्रिभुज के दो भुज प र और गु र ज्ञात हैं, क्योंकि यह सूर्य से पृथ्वी और
गुरु की दूरी अर्थात् पृथ्वी और गुरु के स्पष्ट कर्ण हैं और इनके बीच का कोण प र गु
भी ज्ञात है । इसलिए प गु, <र प गु और <प गु र भी जाने जा सकते हैं, क्योंकि
लौनी की त्रिकोणमिति भाग १ पृष्ठ १०४ अथवा हाल और नाइट की त्रिकोणमिति
पृष्ठ १७१ से स्पष्ट है कि
स्परे (र प गु - र गु प) / २ = [(र गु - र प) / (र गु + र प)] स्परे (र प गु + र गु प) / २
१८४ सूर्य-सिद्धान्त
परन्तु < र प गु + < र गु प = < रा र गु = शीघ्र केन्द्र
∵ स्परे (र प गु - र गु प) / २ = (र गु - र प) / (र गु + र प) स्परे (शीघ्र केन्द्र) / २
जिससे र प गु - र गु प ज्ञात हो सकता है । और < र गु प + < र प गु
ज्ञात ही है; इसलिए इन दोनों को जोड़कर आधा कर देने से र प गु कोण जाना जा
सकता है । यही कोण वृहस्पति और सूर्य के बीच का कोण है जो पृथ्वी से देख पड़ता
है । इसी को इनान्तर कहते हैं क्योंकि इन सूर्य का पर्याय है ।
पृथ्वी से गुरु की दूरी गु प जिसे शीघ्र कर्ण कहते हैं त्रिकोणमिति के अनुसार
इस प्रकार जान सकते हैं :-
गु प / ज्या < प र गु = गु र / ज्या < र प गु
परन्तु ज्या प र गु = ज्या रा र गु = ज्या शीघ्र केन्द्र
∵ शीघ्र कर्ण = ज्या शीघ्र केन्द्र × ग्रह का मंद कर्ण × १ / ज्या इनान्तर (३)
यह इनान्तर और शीघ्र कर्ण क्रान्तिवृत्तीय धरातल के हैं अर्थात् उस दशा के
हैं यदि ग्रह क्रान्तिवृत्त में देख पड़ता परन्तु यथार्थ में ग्रह कुछ उत्तर या दक्षिण
रहता है । इसलिए शीघ्र कर्ण को यदि ग्रह के इष्टकालिक शर की कोटिज्या से भाग
दे दिया जाय तो यथार्थ शीघ्र कर्ण ज्ञात हो जायगा । इसी प्रकार क्रान्तिवृत्तीय
इनान्तर में भी संस्कार करने से यथार्थ इनान्तर जाना जाता है । चित्र ३५ से जो
गाडफ्रे की 'एस्ट्रोनोमी' पृष्ठ २७४ के अनुसार है यह सब बातें एकसाथ ही स्पष्ट
होती हैं—
क ख क्रान्तिवृत्तीय धरातल है, जिसमें पृथ्वी की कक्षा अर्थात् क्रान्तिवृत्त
प च छ है । कक्षावृत्त पा ग पी है, जो क्रांतिवृत्तीय धरातल को पा पी बिन्दुओं पर
काटता है । पा उत्तर पात और पी दक्षिण पात हैं । र, प और ग क्रम से सूर्य, पृथ्वी
और ग्रह के यथार्थ स्थान हैं; ग से ग गा क्रान्तिवृत्तीय धरातल पर लम्ब गिराया गया
है; व वसंत संपात विन्दु है; < ग र गा और व र गा ग्रह के सूर्य केन्द्रीय शर और
भोगांश (Longitude) हैं । < ग प गा और < वा प गा ग्रह के भूकेन्द्रीय शर और
भोगांश हैं । प वा र व समानान्तर हैं । < व र प सूर्यकेन्द्रीय पृथ्वी का भोगांश है;
इसलिए < व र प + १८० भूकेन्द्रीय सूर्य का भोगांश है । र प गा त्रिभुज चित्र ३४ के
त्रिभुज र प गु से मिलता है । प गा ग्रह का क्रान्तिवृत्तीय शीघ्र कर्ण और < र प गा
क्रान्तिवृत्तीय इनान्तर है; प ग यथार्थ शीघ्रकर्ण और < र प ग यथार्थ इनान्तर है ।
स्पष्टाधिकार १८५
प गा
प ग = --------------------
कोज्या ∠ ग प गा
आधुनिक ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने की जो रीति
बतलायी गयी है वह दिग्दर्शन मात्र है । इस क्रिया से जो स्पष्ट स्थान जाना जाता है
उसमें और प्रत्यक्ष बेध द्वारा जाने गये स्थानों में कुछ सूक्ष्म अंतर देख पड़ता है ।
इसका कारण यह है कि किसी ग्रह पर केवल सूर्य का ही आकर्षण नहीं होता वरन्
अन्य ग्रह और उपग्रहों का भी होता है जिनके कारण वह उस स्थान से कुछ विचलित
१८६ सूर्य्य-सिद्धान्त
देख पड़ता है जो उपर्युक्त रीति से जाना जाता है । इसलिए सूक्ष्मतापूर्वक शुद्ध स्थान
जानना हो तो अन्य ग्रहों के आकर्षण के कारण जो परिवर्तन होता है उसका संस्कार
भी करना चाहिये । परन्तु यह विषय बहुत गंभीर है। इसकी पूरी जानकारी के लिए
भौतिक ज्योतिर्विज्ञान (Physical astronomy), गति विज्ञान (Dynamics),
चलन कलन, चलराशिकलन इत्यादि उच्च गणित की जानकारी भी आवश्यक है ।
इसलिए विस्तार भय से उसका विचार यहाँ नहीं किया जायगा ।
ऊपर बतलाई गयी रीति से यदि चन्द्रमा का स्पष्ट स्थान निकाला जाय तो
देखा जाता है कि बेध द्वारा जाना गया स्थान उससे कभी-कभी तीन-तीन अंश आगे
पीछे होता है । इसका कारण यह है कि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमते हुए इसके
साथ सूर्य की परिक्रमा भी एक वर्ष में कर लेता है; इसलिए चंद्रमा पर पृथ्वी के
आकर्षण के साथ-साथ सूर्य के आकर्षण का प्रभाव भी बहुत पड़ता है जिससे चंद्रमा
का विचलन बहुत बड़ा रूप धारण कर लेता है । इसलिए चंद्रमा के सम्बन्ध में कुछ
मुख्य संस्कार करने की आवश्यकता पड़ती है जिनकी चर्चा संक्षेप में की जाती है ।
सबसे पहले केपलर के नियम के अनुसार जो मंद फल संस्कार करना चाहिए
उसका सरल रूप बतला देना आवश्यक है । चंद्रमा की केन्द्रच्युति* १८५४ ई० के
आरंभ में ०.०५४८४५२ थी ।
इसलिए च = ०.०५४८४५२
च² = .००३००७६
च³ = .०००१६४६६
च⁴ = .०००००६०५
च⁵ या इसके आगे की संख्याओं के मान जानने की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि वह अत्यन्त छोटे हैं । च के घातों के इन मानों का समीकरण (छ) में
उत्थापन करने से चन्द्रमा के मंदफल संस्कार का रूप यह होगा :-
स = म + ( .१०६६८८४ - .००००४१२४ ) ज्या म
- ( .००३७५६६ - .०००००४१५ ) ज्या म
- .०००१७८७ ज्या ३ म
- .०००००६१ ज्या ४ म
= म + .१०६६४७१६ ज्या म + .००३७५५७५ ज्या २ म - .०००१७८७ ज्या ३ म + .०००००६७ ज्या ४ म
यदि म, २ म, ३ म की ज्याओं को आधुनिक रीति से दशमलव भिन्न में
लिखा जाय तो ज्या म, ज्या २ म के गुणकों को जो रेडियन में हैं, कलाओं या
*देखो Loomi's Practical Astronomy, पृष्ठ ४६२ ।
स्पष्टाधिकार १८७
विकलाओं में लिखने के लिए ३४३७.७५ या २०६२६५ से गुणा कर देने से और
भी सरलता होगी क्योंकि एक रेडियन ३४३७.७५ कला या २०६२६५ विकला के
लगभग होती है। ऐसा करने से इसका रूप यह होगा :—
स = म + ३७६' ५६" .४ ज्या म + १२' ५४" .७ ज्या २ म
- ३६" .६ ज्या ३ म + २" .० ज्या ४ म
यहाँ यह याद रखना चाहिये कि म मन्द केन्द्र आजकल की रीत्यानुसार
नीच (perigee) से समझ गया है। यदि मन्द केन्द्र पुरानी परिपाटी के अनुसार
उच्च से समझा जाय तो
स = म - ३७६' ५६" .४ ज्या म + १२' ५४" .७ ज्या २ म
- ३६" .६ ज्या ३ म + २" .० ज्या ४ म
इसी प्रकार अन्य ग्रहों के प्रधान समीकरण के ज्या म, ज्या २ म, इत्यादि के
गुणकों को कलाओं या विकलाओं में लिखा जा सकता है।
इस समीकरण के दाहिने पक्ष में म मन्द केन्द्र अर्थात् उच्च से मध्यम चंद्र का
भोगांश है, शेष मन्द फल है जिसका संस्कार मन्द केन्द्र में करने से स्पष्ट चंद्र सिद्ध
होता है। यह स्पष्ट है कि इस मन्द फल में पहला पद अर्थात् ३७६' ५६" .४ ज्या म
बहुत बड़ा है, इसके पीछे दूसरा पद १२' ५४" .७ ज्या २ म है। परन्तु जिस समय
म का मान ६०° होता है उस समय ज्या म का मान १ और ज्या २ म का मान
शून्य होता है इसलिए परम मन्द फल का मान पहले ही पद पर अवलंबित रहता है
और प्रायः ३७७' अर्थात् ६°१७' के समान होता है। परन्तु हमारे ज्योतिषियों ने
चंद्रमा के परम मन्द फल का मान ५° के लगभग माना है इसलिए यह प्रश्न उपस्थित
होता है कि इतना अन्तर क्यों है ?
जब परम मंद फल का मान ३७६' ५६" .४ ज्या म समझ कर चंद्रमा का स्पष्ट
स्थान निकाला जाता है तब इसको वेध करके मिलाने पर देख पड़ता है कि प्रत्यक्ष स्थान
और गणित-सिद्ध स्थानों में कभी-कभी अधिक से अधिक अंतर १° २०' का होता है।
कई वर्ष तक निरन्तर वेध करने पर यह बात प्रत्यक्ष हो जाती है कि अमावस या
पूर्णिमा के दिन जब चंद्रमा मन्दोच्च से ६०° के लगभग दूर रहता है तब मंदफद संस्कृत
स्पष्ट चन्द्र से वेध-सिद्ध चंद्रमा १°२०' आगे रहता है और जब चंद्रमा मंदोच्च
२७०° अथवा नीच से ६०° आगे रहता है तब मंदफल-संस्कृत-स्पष्ट-चंद्र से वेध-सिद्ध
चंद्रमा १°२०' पीछे रहता है। पहली दशा में मंदफल का संस्कार - ३७६' ५६" .४
अथवा - ६°१६' ५६" .४ होता है अर्थात् मध्यम ग्रह में ६°१६' ५६" .४ घटाने से
मंदफल संस्कृत स्पष्ट ग्रह आता है। परन्तु इससे वेध-सिद्ध ग्रह १°२०' आगे रहता
१८८ सूर्य-सिद्धान्त
है इसलिए मंदफल संस्कृत स्पष्ट ग्रह में १°२०′ जोड़ना चाहिए। इसलिए यदि
६°१६′५६′′.४ ही घटाने और १°२०′ जोड़ने की जगह इन दोनों का अंतर अर्थात्
४°५६′५६′′.४ ही घटाया जाय तो भी वही फल होगा । इसलिए यदि परम मंदफल
६°१६′५६′′.४ की जगह ४°५६′५६′′.४ मान लिया जाय तो कोई हानि नहीं
समझ पड़ती । दूसरी दशा में ६°१६′५६′′.४ जोड़ना पड़ता है और १°२०′ घटाना
पड़ता है जिसकी जगह यदि इन दोनों का अंतर अर्थात् वही ४°५६′५६′′.४ जोड़ा
जाय तो कोई फेर नहीं पड़ेगा। जब पूर्णिमा के दिन चंद्रमा उच्च पर भी रहता है
तब तो मंदकेन्द्र शून्य होने से मंदफल संस्कार शून्य होता है। उस समय मध्यम और
स्पष्ट चंद्रमा के स्थानों में कोई अंतर ही नहीं रहता। इससे सिद्ध होता है कि पूर्ण-
मासी या अमावस के दिन बेध करके परम मंदफल का मान जानने में ५° के लगभग
ही आवेगा जो हमारे प्राचीन ग्रन्थों में दिया हुआ है। इसलिए यह कहा जा सकता
है कि परम मंदफल का मान ५° ही ठीक है ६°१६ नहीं। परन्तु बेध से यह भी
जाना गया है कि प्रत्येक पक्ष की अष्टमी के लगभग जब चंद्रमा मंदोच्च से ६०° पर
रहता है तब ५° का मंदफल का संस्कार देने पर भी चंद्रमा कोई ३° पीछे रहता
है अर्थात् बेध-सिद्ध चंद्रमा मध्यम चंद्रमा से कोई ८° पीछे रहता है। और यदि
अष्टमी के दिन चंद्रमा नीच से ६०° पर रहता है तब मध्यम चंद्र से बेध-सिद्ध-चंद्रमा
५° नहीं वरन् ८° के लगभग आगे रहता है। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि परम
मंदफल ५° मान लेने से पूर्णिमा या अमावस्या के दिन तो कोई हानि नहीं होती
परन्तु अष्टमी के लगभग ३° का अन्तर देख पड़ता है। हमारे प्राचीन ज्योतिषियों
को इस बात का पता इसलिए नहीं लगा कि वे, मेरी समझ में, ग्रहण-काल से मध्यम
और स्पष्ट चंद्रमा का अन्तर निकाल कर मंदफल निकालते थे जैसा कि केशवाचार्य
के उद्धरण से प्रकट होता है जो इसी अध्याय के १४वें श्लोक के भाष्य में दिया
गया है। इस उद्धरण से यह भी पता लगता है कि केशवाचार्य को सूर्य-सिद्धान्त
के अनुसार स्पष्ट किये हुए चन्द्रमा से वेध द्वारा देखा गया चंद्रमा ५′ कम देख पड़ा
जैसा कि पहले दिखाया गया है कि पूर्णिमा या अमावस्या को मंदफल और च्युति
संस्कार मिलकर ४°५७′ होते हैं। इसलिए केशवाचार्य का वेध बहुत सूक्ष्म सिद्ध
होता है।
इसलिए यह आवश्यक है कि इस भेद का कारण किसी और जगह देखा
जाय। यह तो स्पष्ट है कि यह भेद चंद्रमा के उच्च से विशेष सम्बन्ध रखता है और
यह भी देखा गया है कि यह सदैव इतना ही नहीं रहता वरन् घटते-घटते कभी शून्य
हो कर ऋणात्मक हो जाता है और कभी धनात्मक हो जाता है इसलिए यह नियत-
स्पष्टाधिकार १८६
कालिक (periodical) भी है। इसे यूनानी ज्योतिषी टालमी ने विक्रम की दूसरी
शताब्दी में ही निश्चय कर लिया था, परन्तु इसके कारण का पता न्यूटन के
पहले किसी ने नहीं लगा पाया था। न्यूटन ने आकर्षण सिद्धान्त से सिद्ध किया कि
चंद्रमा पर पृथ्वी का ही आकर्षण नहीं होता वरन् अन्य ग्रहों का भी पड़ रहा है और
उपर्युक्त महान् अंतर का कारण सूर्य का आकर्षण है। भौतिक ज्योतिर्विज्ञान ने गणित
से सिद्ध कर दिया है कि यह अंतर सूर्य के आकर्षण से पड़ता है और इस संस्कार का
मुख्य रूप जब मंद केन्द्र की गणना नीच से की जाय तो यह है + १° २०' २६.''५ ✕
ज्या [२ (चन्द्रमा - सूर्य) - चन्द्र मन्द केन्द्र] । इसके आगे के पद जो बहुत सूक्ष्म हैं
छोड़ दिये गये हैं।
टालमी ने इस संस्कार का नाम इवेक्शन् (evection) रखा था जो अब तक
प्रचलित है । स्वर्गीय बेंकटेश बापू जी केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित में इसको च्युति
संस्कार कहा है। इस पद में चंद्रमा - सूर्य का अर्थ है सूर्य से चंद्रमा का अंतर जो
हमारे यहाँ तिथि के नाम से प्रकट किया जाता है। जिस समय अमावस या पूर्णिमा
होती है उस समय चंद - सूर्य का मान शून्य या १८०° होता है इसलिए इस पद का
रूप १° २०' २६''.५ ज्या (- चन्द्र मंद केन्द्र) या - १° २०' २६''.५ ज्या म
होता है जो मंदफल संस्कार के रूप में है और जब मंदफल जोड़ा जाता है तब यह
घटाया जाता है और जब मंदफल घटाया जाता है तब यह जोड़ा जाता है जिसका
परिणाम यह होता है कि यदि मंदफल को इन दोनों के अन्तर के समान समझ लिया
जाय तो कोई हानि नहीं होती ।
चूंकि मंदफल च्युति के मान पर आश्रित होता है इसलिए मंदफल के घटने
से यह सूचित होता है कि चंद्रकक्षा की च्युति घट गयी है और बढ़ने से च्युति के
बढ़ने की सूचना मिलती है। अर्थात् इस घट बढ़ से यह अनुमान दृढ़ होता है कि
चंद्रकक्षा का आकार सदैव एक सा नहीं रहता । यह बात आकर्षण सिद्धान्त से भी
पूरी तरह मेल खाती है जैसा कि आगे दिखाया जायगा ।
परन्तु जब चंद्र - सूर्य ६०° या २७०° होता है अर्थात अष्टमी होती है तब
इसका रूप १° २०' २६.५'' ज्या [२ X ६०° - चन्द्र मन्द केन्द्र] अथवा १° २०'
२६''.५ ज्या म होता है जो है तो मन्द फल संस्कार के ही रूप का परन्तु यदि मन्द
फल धनात्मक होता है तो यह भी धनात्मक होता है और मंद फल ऋणात्मक
होता है तो यह भी ऋणात्मक होता है । इसलिए मंदफल ५° मानने से कभी
३° आगे पीछे का अंतर पड़ जाता है। इसी कारण सप्तमी, अष्टमी और नवमी
के जो समय भारतीय रीति से बनाये गये पंचांगों में लिखे रहते हैं वह आधुनिक
१६० सूर्य-सिद्धान्त
रीति से जाने गये कालों से कभी-कभी १४, १५ घड़ी आगे पीछे रहते हैं । यह बात
बापूदेव शास्त्री के पंचांग और काशी के मकरंद सारिणी से बनाये गये पंचांगों से
भी प्रकट हो सकती है ।
न्यूटन ने इसका कारण जिस तरह समझाया है वह संक्षेप में* यह है :—
चंद्रमा और पृथिवी की कक्षाओं के बीच का कोण केवल ५° के लगभग है इसलिए
दोनों को एक ही धरातल में मान लेने से विशेष हानि नहीं होगी परन्तु सरलता
आ जायगी ।
मान लो र सूरज, प पृथ्वी और च१ च२ च३ च४ चंद्रमा की कक्षा हैं ।
यहाँ यह न भूल जाना चाहिये कि प र, अर्थात् सूर्य से पृथिवी का अंतर प च, अर्थात्
पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी का कोई ४०० गुना है । यह भी समझे रहना आवश्यक है
कि चंद्रमा का विचलन इसलिए होता है कि सूर्य पृथिवी और चंद्रमा दोनों को असमान
रूप से आकर्षित कर रहा है इसलिए इन दोनों के आकर्षण के अंतर के कारण यह
विचलन हो रहा है । यदि यह अंतर न होता अर्थात् सूर्य का आकर्षण चंद्रमा और
पृथ्वी पर समान होता तो विचलन कदापि न होता क्योंकि तब तो दोनों साथ ही
साथ आगे पीछे होते और चंद्रमा की सापेक्ष गति में भिन्नता न पड़ती ।
चित्र ३६ से यह स्पष्ट है कि जब तक चंद्रमा च४ से च१ होता हुआ च२
तक चलता है तब तक यह पृथिवी की अपेक्षा सूर्य के निकट रहता है अर्थात् कृष्ण-पक्ष
की अष्टमी से लेकर शुक्ल पक्ष की अष्टमी तक चंद्रमा पृथिवी की अपेक्षा सूर्य के निकट
रहता है और शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक चंद्रमा पृथ्वी की
अपेक्षा सूर्य से दूर रहता है । इसलिए आकर्षण सिद्धान्त के अनुसार पहली दशा में
सूर्य का आकर्षण चंद्रमा पर अधिक होता है अर्थात् सूर्य की ओर अधिक खिंचने के
कारण चंद्रमा पृथ्वी से कुछ दूर हो जाया करता है जिससे जान पड़ता है कि विचालक
शक्ति (perturbing force) चंद्रमा को पृथ्वी से दूर खींचे जा रही है । चूंकि र
बहुत दूर है इसलिए यह शक्ति प र के प्रायः समानान्तर दिशा में र की ओर काम
कर रही है । दूसरी दशा में पृथ्वी अधिक खिंचती है, इसलिए चंद्रमा पीछे रह जाता
है जिससे जान पड़ता है कि विचालक शक्ति सूर्य से विरुद्ध दिशा में चंद्रमा को धक्का
देकर पृथ्वी से दूर कर रही है । यह पहले ही कहा गया है कि सूर्य बहुत दूर है
इसलिए विचालक शक्ति चंद्रमा को प र के समानान्तर दिशा में र से दूर ढकेले जा
रही है । इसलिए यह सिद्ध है कि यह शक्ति चंद्रमा और पृथ्वी को सदैव परस्पर
दूर कर रही है, प र के प्रायः समानान्तर काम कर रही है, और इसका प्रभाव उस
- Heroes of Science : Astronomers के आधार पर