सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

१७२ सूर्य-सिद्धान्त

  • (च⁴/३ - ४च⁶/१५) ज्या ४ म + १२५च⁵/३८४ ज्या ५ म + ......
    इस समीकरण में ज्या ६ म तथा इसके आगे की ज्याओं के गुणक और वे
    पद जिनमें च के छठवें घात के आगे की संख्या वर्तमान है छोड़ दिये गये क्योंकि इनके
    मान नहीं के समान हैं।
    समीकरण (१) को इस प्रकार भी लिख सकते हैं :—
    च ज्या उ = उ - म
    तब ज्या उ = (उ - म)/च
    जिसका यह अर्थ हुआ कि यदि उ के विस्तार में से म घटाया जाय और शेष
    को च से भाग दे दिया जाय तो ज्या उ का विस्तार हो जायगा । इसलिए
    ज्या उ = ( १ - १/८ च² + १/१९२ च⁴ ) ज्या म
  • ( च/२ - च³/६ + च⁵/४८ ) ज्या २ म
  • ( ३/८ च² - २७/१२८ च⁴ ) ज्या ३ म
  • ( च³/३ - ४/१५ च⁵ ) ज्या ४ म + १२५/३८४ च⁴ ज्या ५ म + ...
    यदि फि (उ) = ज्या २ उ तो फि (म) = ज्या२म और फि'(म) =
    २ कोज्या २ म,
    इसलिए लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार
    ज्या २ उ = ज्या २ म + च ज्या म × २ कोज्या १ म
  • (च² ता)/(|२ ताम) (ज्या² म × २ कोज्या२म)
  • (च³ ता²)/(|३ ताम²) (ज्या³ म × २ कोज्या २ म)
  • (च⁴ ता³)/(|४ ताम³) (ज्या⁴ म × २ कोज्या २ म)
  • (च⁵ ता⁴)/(|५ ताम⁴) (ज्या⁵ म × २ कोज्या २ म) + ...
    जिसमें ज्या म × २ कोज्या २ म = ज्या ३ म - ज्या म,