सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
रिस मैं अतिहीँ उपजाई, जानि जननि अभिलाष ।
सूर स्याम भुज गहे जसोदा, अब बाँधौँ कहि माष ॥६२॥
अर्थ—(गोपी द्वारा कृष्ण की शिकायत करने पर यशोदा आवेश मे आकर
कहती हैं) यदि मैं ऐसे क्रोध मे (कृष्ण को) पकड़ पाऊँ तो पकड़ने पर उनका क्या
हाल करूँगी यह तुम्हें प्रत्यक्ष दिखाती हूँ । हाथ मे छड़ी लिए नन्दरानी का शरीर
क्रोध से काँप रहा है । (बोली) आज यदि कृष्ण को बिना मारे छोड़ँ तो मुझे बाप
की सौगन्ध है । इसी बीच (संयोग से) एक अन्य ग्वालिन बांह पकड़ कर कृष्ण को ले
आई (और व्यंग्य के साथ बोली) “हे महरि, तुमने बहुत सीधा पुत्र पैदा किया है जो
चोली और हार की ओर संकेत करता है ।” इस कथन से (यशोदा को) क्रोध मे और
भी अत्यन्त क्रोध उत्पन्न हो गया और कृष्ण ने भी माता के क्रोध के आवेश को
समझा । सूरदास कहते हैं कि (तब) यशोदा ने (स्वयं) कृष्ण के हाथ पकड़ लिये और
क्रोध से बोली कि अब तुझे बाँधूँगी ॥६२॥
बाँधौँ आजु कौन तोहिँ छोरे ।
बहुत लँगरई कीन्हौ मोसौँ, भुज गहि रजु ऊखल सौँ जोरे ।
जननी अति रिस जानि बँधायौ, निरखि बदन, लोचन जल ढोरै ।
यह सुनि ब्रज-जुवतीँ सब धाईँ कहतिँ कान्ह अब क्यों नहिँ छोरै ।
ऊखल सौँ गहि बाँधि जसोदा, मारन कौँ साँटी कर तोरै ।
साँटी देखि ग्वालि पछितानी, विकल भई जहँ-तहँ मुख मोरै ।
सुनहु महरि ऐसी न बूझिए सुत बाँधति माखन दधि थोरै ।
सूर स्याम कौँ बहुत सतायौ, चूक परी हम तैँ यह भोरैँ ॥६३॥
अर्थ - (यशोदा कृष्ण से कहती हैं) आज मै तुमको बांध दूंगी देखे (तुम्हे)
कौन छुड़ाता है । तुमने मुझसे बहुत शरारत की (ऐसा कहकर) कृष्ण की भुजा को
पकड़कर रस्सी को ओखली से बांध देती है । माता को अत्यधिक क्रुद्ध जानकर (कृष्ण
ने स्वयं को) बँधा लिया । कृष्ण (जननी के) मुख को देखकर नयनो से जल ढुलकाने
लगे । यह सब सुनकर ब्रज युवतियां दौड़ी हुई आईं और (यशोदा से) कहने लगी कि
कृष्ण को अब क्यो नही छोड़ देती हो । ओखली से मजबूती से बांधकर यशोदा मारने
के लिए छड़ी तोडती हैं । छडी को देखकर गोपियां पछताने लगी और जहाँ-तहाँ मुख
दूसरी ओर करने लगी (और बोली) हे महरि, ऐसा करना ठीक नही कि पुत्र को
थोडे से मक्खन और दही के लिए बांध दिया है । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां सोचती
हैं) कि हमने कृष्ण को बहुत सताया । आज हमसे भूल से यह गलती हो गयी ॥६३॥
कहा भयौ जौ घर कैँ लरिका चोरी माखन खायौ ।
अहो जसोदा कत त्रासति हौ यहै कोखि को जायौ ।
बालक अजौँ अजान न जानै केतिक दह्यौ लुटायौ ।
तेरो कहा गयौ ? गोरस कौ गोकुल अत न पायौ ।
७६ सूरसागर सार सटीक
हा हा लकुट त्रास दिखरावति आँगन पास बँधायौ ।
रुदन करत दोउ नैन रचे हैं, मनहुँ कमल-कन छायौ ।
पौढि रह धरनी पर तिरछैं बिलखि वदन मुरझायौ ।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, हँसि करि कंठ लगायौ ॥६४॥
अर्थ—(गोपियां यशोदा को सम्बोधित करते हुए कहती है) घर के बालक के
चोरी से मक्खन खाने से क्या हुआ । इस कोख से उत्पन्न सुत को क्यो भयभीत कर
रही हो ! यह बालक अभी अनजान है और नही जानता कि कितना दही लुढका
दिया ? तेरा इतने से क्या हुआ । (इसने तो गोकुल के वासियो के प्रभूत दधि को
खाया तथा लुटाया है जिसके परिणाम का निश्चय आसानी से नही किया जा सकता) ।
उसकी तुलना में तुम्हारे दधि की क्या मात्रा हो सकती है। दुख है कि तुम कृष्ण को
आंगन के पास बांधकर लाठी से भयभीत कर रही हो । रोदन करते हुए इसके नेत्रों
पर आंसू कमल-कण की तरह छाये हुए है । धरती पर तिरछे होकर लेटे हुए है और
बिलखने के कारण (इनका) मुख मुरझा गया है । सूरदास कहते हैं कि रसिक-शिरो-
मणि कृष्ण को (यशोदा ने) हंसकर कण्ठ से लगा लिया ॥६४॥
हलधर सौं कहि ग्वालि सुनायौ ।
प्रातहिं तैं तुम्हरौ लघु भैया, जसुमति ऊखल बाँधि लगायौ ।
काहू के लरिकहिं हरि मार्यौ भोरहि आनि तिनहिं गुहरायौ ।
तबहीं ते बाँधे हरि बैठे, सो हम तुमकौं आनि जनायौ ।
हम बरजी, बरज्यौ नहिं मानति, सुनतहिं बल आतुर ह्वै धायौ ।
सूर स्याम बैठे ऊखल लगि, माता उर् तनु अतिहि त्रसायौ । ६५।।
अर्थ— हलधर (बलभद्र) से एक गोपी ने बताया कि प्रातःकाल से तुम्हारे छोटे
भाई कृष्ण को यशोदा ने ओखली से बांध दिया है । किसी के पुत्र को कृष्ण ने मार
दिया था । उसने प्रातः ही (यशोदा को) रक्षा के लिए पुकारा। तब से हरि बँधे हुए बैठे
है। इसलिए मैंने तुमको आकर बता दिया । मैंने यशोदा को रोका लेकिन वह मानती
नही है। (इसे) सुनते ही बलदाऊ आतुर होकर दौड पडे । सूरदास कहते है कि माता
के द्वारा तन और मन से भयभीत किये गये श्याम ओखली के पास बैठे हैं ॥६५॥
यह सुनि कै हलधर तहँ धाए ।
देखि स्याम ऊखल सौं बाँधे, तबही दोउ लोचन भरि आए ।
मैं° बरज्यौ कै बार कन्हैया, भली करी दोउ हाथ बँधाए ।
अजहुँ छाँड़ौगे लँगराई, दोउ कर जोर जननि पै आए ।
स्यामहिं छोरि मोहिं बाँधै वरु, निकसत सगुन भले नहिं पाए ।
मेरे प्रान-जिवन-धन कान्हा, तिनके भुज मोहिं बँधे दिखाए ।
माता सौं कह करौं ढिठाई, सो सरूप कहि नाम सुनाए ।
सूरदास तब कहति जसोदा दोउ भैया तुम इक मत पाए ॥६६॥
गोकुल लीला ७७
अर्थ—यह (कृष्ण को ऊखल से बँधा हुआ) सुनकर हलधर दौड़कर वहाँ गये।
कृष्ण को ऊखल से बँधा देखकर उनके दोनों नयन (आँसू से) भर आये। हे कन्हैया,
मैंने तुम्हें कितनी वार रोका। अच्छा किया तुमने दोनो हाथ बँधा लिये। क्या अब
भी ढीठपन नही छोड़ोगे। [ऐसा कहकर] दोनों हाथ जोड़कर माता के पास आये।
[बलराम माता से वोले] कृष्ण को छोड़कर चाहे मुझे बाँध दो। घर से निकलते समय
शकुन अच्छे नही मिले। कृष्ण मेरे प्राण और जीवन धन हैं। तूने उनकी बंधी हुई
भुजाओं को हमे दिखाया है। (यह भक्त सूर का प्रत्यक्ष कथन भी है)। बलभद्र, कृष्ण के
वास्तविक स्वरूप का ध्यान दिलाते हुए कहते हैं कि तुम माता से इतनी शरारत क्यों
करते हो। तब यशोदा कहती है कि तुम दोनो भाई एक समान बुद्धि वाले हो ॥६६॥
तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई।
जुवती गईं घरनि सब अपने, गृह कारज जननी अटकाई।
आपु गए जमलार्जुन-तरु-तरु, परसत पात उठे झहराई।
दिए गिराइ धरनि दोऊ तरु, सुत कुवेर के प्रगटे आई।
दोउ करजोरि करत दोउ अस्तुति, चारि भुजा तिन्ह प्रगट दिखाई।
सूर धन्य ब्रज जनम लियौ हरि, धरती की आपदा नसाई ॥६७॥
अर्थ—जब सभी ब्रज युवतियाँ अपने घर चली गयीं और माता गृह कार्य मे
लग गयी तब कृष्ण ने एक सूझ पैदा की। स्वयं जमलार्जुन वृक्ष के नीचे चले गये।
उनके स्पर्श मात्र से पत्ते घहरा उठे। उन कृष्ण ने दोनों वृक्षों को पृथ्वी पर गिरा
दिया। तब कुवेर के पुत्र प्रकट हुए। दोनो हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए उन दोनो
को अपनी चारों भुजाओ को प्रत्यक्ष दिखाया। सूरदास कहते है कि कृष्ण ने ब्रज मे जन्म
लिया इसलिए ब्रज धन्य है। [उन्होने] पृथ्वी की आपत्ति को नष्ट कर दिया ॥६७॥
अब घर काहूँ कैं जनि जाहु।
तुम्हरैं आजु कमी काहे की, कत तुम अनतहिं खाहु।
बरै जेंवरी जिहिं तुम बाँधे, परै हाथ भहराइ।
नंद मोहिं आतही त्रासत हैं, बाँधें कुँवर कन्हाइ।
रोग जाउ मेरे हलधर के, छोरत हो तब स्याम।
सूरदास प्रभु खात फिरौ जनि, माखन-दधि तुव धाम ॥६८॥
अर्थ—[यशोदा कृष्ण को वर्जित करती हुई कहती है] अब किसी के घर मत
जाना। तुम्हे किस चीज की कमी है जो कि तुम अन्यत्र खाने जाते हो। वह रस्सी
जल जाय जिससे बाँधने पर तुम्हारे हाथ मे गडारी पड़ गई है वे हाथ गिर कर टूट पड़े
(जो तुम्हे बाँधते थे)। कुँवर कन्हैया को बाँधने पर नन्द भी हमे अत्यधिक भयभीत
करते हैं। मेरे बलराम के सभी रोग नष्ट हो जायें, जो मेरे बाँधने पर उस समय
उनका बन्धन छोड़ देते थे। सूरदास कहते हैं कि हे कृष्ण तुम घर-घर मत घूमो तुम्हारे
घर मे ही मक्खन-दधि बहुत है ॥६८॥
७८ सूरसागर सार सटीक
भूखौ भयौ आजु मेरौँ बारी ।
भोरहिँ ग्वारि उरहनौ ल्याई, उहिँ यह कियौ पसारी ।
पहिलेहिँ रोहिनि सौँ कहि राख्यौ, तुरत करहु जेवनार ।
ग्वाल-बाल सब बोलि लिए, मिलि बैठे नन्द-कुमार ।
भोजन वेगि ल्याउ कछु मैया भूख लगी मोहि भारी ।
आजु सबारैँ कछु नहिँ खायौ, सुनत हँसी महतारी ।
रोहिनि चितै रही जसुमति-तन सिर धुनि-धुनि पछितानी ।
परसहु वेगि, वेर कत लावति, भूखे साँरगपानी ।
बहु व्यंजन बहु भाँति रसोई षटरस के परकार ।
सूर स्याम हलधर दोउ भैया, और सखा सब ग्वार ॥६६॥
अर्थ—यशोदा कहती हैं कि आज मेरा बालक बहुत भूखा हो गया है। आज
प्रातःकाल एक ग्वालिनी उलाहना दे गई थी, उसी ने यह सब पसारा किया है।
यशोदा ने पहले ही रोहिणी से कह रक्खा था कि जेवनार (भोजन) का प्रबन्ध करो।
सभी ग्वाल-बालो को बुलाकर नन्द कुमार कृष्ण उन सब के साथ बैठ गये। (कृष्ण ने
माता यशोदा से कहा) हे माता मुझे बड़ी भूख लगी है इसलिए कुछ खाने के लिए
लाओ। मैने आज सुबह कुछ नही खाया था। इसे सुनकर माता (यशोदा) हँसने
लगी। रोहिणी, यशोदा की ओर देखकर सिर धुन-धुनकर पछताने लगी। फिर उसने
कहा कि शीघ्र ही भोजन परसो क्योकि सारङ्गपाणि (कृष्ण) बहुत भूखे हैं। अनेक प्रकार
के षटरस युक्त व्यंजन (भोजन) कृष्ण, बलभद्र तथा ग्वाल सखाओ को परोसो ॥६६॥
मोहिँ कहतिँ जुवती सब चोर ।
खेलत कहूँ रहौँ मैं बाहिर, चितै रहतिँ सब मेरी ओर ।
बोलि लेतिँ भीतर घर अपनैँ, मुख चूमतिँ, भरि लेतिँ अँकोर ।
माखन हेरि देतिँ अपनैँ कर कछु कहि बिधि सौँ करतिँ निहोर ।
जहाँ मोहिँ, देखतिँ, तहँ टेरतिँ, मैं नहिँ जात दुहाई तोर ।
सूर स्याम हँसि कठ लगायौ, वै तरुनी कहँ बालक मोर ॥७०॥
अर्थ—(कृष्ण माता यशोदा से • दुहाई देते हुए कहते है) मुझे सभी युवतियाँ
चोर कहती हैं किन्तु कही बाहर खेलते हुए मेरी ओर ये सब ताकती रहती हैं। (मुझे)
अपने घर के भीतर बुलाकर मेरा मुख चूमती है और गोद मे बिठा लेती हैं। ये अपने
ही हाथ से मुझे देखकर मक्खन देती हैं और कुछ कहकर ब्रह्मा से निहोरा करती हैं।
मुझे जहाँ देखती है वही पुकारने लगती हैं। मैं तुम्हारी दुहाई लेकर कहता हूँ कि मैं
(स्वेच्छया) नही जाता हूँ। सूरदास कहते है कि (यशोदा ने) हँसकर कृष्ण को गले
से लगा लिया और (कहा कि) कहाँ वे तरुणी स्त्रियां कहाँ यह मेरा बालक ॥७०॥
गोकुल लीला ७६
जसुमति कहति कान्ह मेरे प्यारे, अपनैं ही आँगन तुम खेलौ ।
बोलि लेहु सब सखा संग के, मेरी कह्यौ कबहुँ जिनि पेलौ ।
ब्रज-बनिता सब चोर कहतिँ तोहिँ, लाजनि सकुचि जात मुख मेरौ ।
आजु मोहिँ बलराम कहत हे, झूठहिँ नाम धरति हैं तेरौ ।
जब मोहिँ रिस लागति तब त्रासति, बाँधति, मारति, जैसेँ चेरौ ।
सूर हँसित ग्वालिन दे तारी, चोर नाम कैसैहुँ सुत फेरौ ॥७१॥
अर्थ - यशोदा कहती हैं कि हे मेरे प्यारे कृष्ण तुम अपने ही आँगन में खेलो ।
सभी ग्वाल सखाओ को यही बुला लो । तुम मेरी आज्ञा का उल्लंघन कभी मत करो ।
ब्रज-युवतियाँ तुम्हें चोर कहती हैं और लज्जा से मेरा मुंह सकुचा जाता है । आज
मुझसे बलराम बता रहा था कि वे सब तुम्हे झूठे ही बदनाम करती हैं । जब मुझे
क्रोध आता है तो (तुम्हे) दास की तरह डरवाती, बांधती तथा मारती हूँ । सूरदास
कहते हैं तब गोपियाँ तालियाँ बजाकर हँसती है, अतः हे पुत्र, चोर नाम को कैसे भी
वापस करो (बदल डालो) ॥७१॥
वृन्दावन लीला
वृन्दावन प्रस्थान
महर-महरि कैँ मन यह आई ।
गोकुल होत उपद्रव दिन प्रति, बसिऐ वृन्दावन मैं जाई ।
सब गोपनि मिलि सकट साले, सबहिनि के मन मैं यह भाई ।
सूर जमुन-तट डेरा दीन्हे, पाँच बरष के कुँवर कन्हाई ॥११॥
अर्थ-महर महरि (नन्द और यशोदा) के मन मे यह (भावना) कि गोकुल
मे प्रतिदिन बडा उपद्रव होता है, इसलिए वृन्दावन चलकर बसना चाहिये । यह वात
सब के मन को रुचिकर प्रतीत हुई और सब ग्वालो ने मिलकर गाड़ियां सजायी ।
सूरदास कहते हैं सब लोगो ने यमुना के तट पर डेरा डाल दिया । इस समय बालक
कृष्ण पाँच वर्ष के थे ॥११॥
गोदोहन
मै दुहिहौँ मोहि दुहन सिखावहु ।
कैसे गहत दोहनी घुटुवनि, कैसे बछरा थन लै लावहु ।
कैसे लै नोई पग बाँधत, कैसे लै गैया अटकावहु ।
कैसे धार दूध की बाजति, सोइ-सोइ विधि तुम मोहि बतावहु ।
निपट भई अब साँझ कन्हैया, गैयनि पै कहूँ चोट लगावहु ।
सूर स्याम सौँ कहत ग्वाल सब, धेनु दुहन प्रातहि उठि आवहु ॥२॥
अर्थ-[कृष्ण कहते हैं] मैं दुहूँगा, मुझे दुहना 'सिखा दो । दोहनी को घुटनो से
कैसे पकड़ते है और बछड़े को थन से कैसे लगाते है रस्सी लेकर कैसे गाय के पैर को
बाँधकर अटकाते हैं । दूध की धार कैसे बजती है । इन सभी बातों को मुझे बताओ ।
[ग्वाल उत्तर देता है] कृष्ण अब बिलकुल सन्ध्या हो गयी है, गायो से कही चोट लगा
लोगे । सूरदास कहते है कि कृष्ण से सभी ग्वाल कहते हैं कि गाय दुहने के लिए
प्रातःकाल उठकर आओ ॥२॥
गो चारण
आजु मैं गाइ चरावन जैहौँ ।
वृन्दावन के भाँति भाँति फल अपने कर मैं खैहौँ ।
ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखौ अपनी भाँति ।
तनक तनेक पग चलिहौ कैसे, आवत ह्वै है अति राति ।
वृन्दावन लीला ८१
प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं साँझ ।
तुम्हरौ कमल बदन कुम्हिलैहै, रेँगति घामहिँ माँझ ।
तेरी सौँ, मोहिँ घाम न लागत, भूख नहीं कछु नेक ।
सूरदास प्रभु कह्यौ न मानत, पर्यौ अपनी टेक ॥३॥
अर्थ—(कृष्ण यशोदा से कहते है) आज मैं गाय चराने जाऊँगा । वृन्दावन के
भिन्न-भिन्न प्रकार के फलों को अपने हाथ से खाऊँगा । (यशोदा उत्तर देती हैं) हे
बालक, ऐसी बात मत कहो, अपनी भव-वृत्ति तो देखो । तुम छोटे-छोटे पैरों से कैसे
चलोगे, आते-आते रात हो जायेगी । प्रातःकाल (ग्वाल) गायों को चराने ले जाते हैं
और सायंकाल घर आते हैं । धूप में घूमते-घूमते तुम्हारा कमल की तरह मुख कुम्हला
जायेगा । (कृष्ण कहते हैं) तुम्हारी सौगन्ध मुझे धूप नही लगती और न तनिक भी
भूख लगती है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण (यशोदा का) कहना नही मान रहे है और
अपनी ही टेक पर अडे हैं ॥३॥
बृन्दावन देख्यौ नँद-नंदन, अतिहिँ परम सुख पायौ ।
जहँ-जहँ गाइ चरतिं ग्वालनि सँग, तहँ-तहँ आपुन धायौ ।
बलदाऊ मोकौँ जनि छोड़ौ संग तुम्हारैँ ऐहौँ ।
कैसेहुँ आजु जसोदा छाँड्यौ, काल्हि न आवन पैहौँ ।
सोवत मोकौँ टेरि लेहुगे, बाबा नंद-दुहाई ।
सूर स्याम बिनती करि बल सोँ, सखनि समेत सुनाई ॥४॥
अर्थ—वृन्दावन को देखकर कृष्ण बहुत सुखी हुए । जहाँ-जहाँ ग्वालो के साथ
गाये चरती है, वहाँ-वहाँ स्वयं दौड़कर जाते थे । (बलदाऊ से कृष्ण निवेदन करते है)
मुझे कही मत छोड़ो क्योंकि मैं (नित्यप्रति) तुम्हारे साथ आऊँगा । (बलदाऊ ने कहा)
यशोदा ने आज तुम्हे किसी तरह आने दिया कल नही आने पाओगे । (कृष्ण ने कहा)
तुम्हें बाबा नन्द की सौगन्ध है कि (कल) सोते हुए मुझको बुला लेना । सूरदास कहते
हैं कि कृष्ण अन्य मित्रो को सुनाते हुए बलदाऊ से विनती कर रहे है ॥४॥
बिहारी लाल, आवहु, आई छाक ।
भई अबार, गाइ बहुरावहु, उलटावहु दै हाक ।
अर्जुन, भोज अरु सुबल, सुदामा, मधुमंगल इक ताक ।
मिलि बैठे सब जेँवन लागे, बहुत बने कहि पाक ।
अपनी पत्रावलि सब देखत, जहँ-तहँ फेनि पिराक ।
सूरदास प्रभु खात ग्वाल सँग, ब्रह्मलोक यह धाक ॥५॥
अर्थ—(ग्वाल कृष्ण को पुकारते हुए कहते है) हे बिहारी लाल आओ, दोपहर
का भोजन आ गया है । देर हो रही है । गायो को हँकवाकर वापस लाओ । अर्जुन,
भोज, सुबल, सुदामा, मधुमंगल आदि ग्वाल एक ओर एक साथ बैठकर भोजन करने
लगे और कहते जाते थे कि पकवान बहुत अच्छे बने हैं । वे सब अपनी पत्तले देखते
६
८२ सूरसागर सार सटीक
जाते थे जिन पर जहाँ-तहाँ फेनी और गुजिये रक्खी थी । सूरदास कहते हैं कि प्रभु
कृष्ण ग्वालों के साथ भोजन कर रहे है इससे ब्रह्मलोक मे एक प्रकार से आतंक हो
गया ॥५॥
ब्रज मैँ को उपज्यौ यह भैया ।
संग सखा सब कहत परस्पर, इनके गुन अगमैया ।
जब तैँ ब्रज अवतार धर्यौ इन, कोउ नहिं घात करैया ।
तृनावर्त पूतना पछारी, तब अति रहे नन्हैया ।
कितिक बात यह बका विदार्यौ, धनि जसुमति जिन जैया ।
सूरदास प्रभु की यह लीला, हम कत जिय पछितैया ॥६॥
अर्थ-(ग्वाल बाल परस्पर बात-चीत करते हुए कहते हैं) भाई ब्रज मे यह
किसने जन्म ले लिया है। इनके गुण अगम हैं। जब से इन्होंने ब्रज मे अवतार धारण
किया है तब से ब्रज का कोई अनिष्ट करने वाला नही है। तृणावर्त तथा पूतना को
विनष्ट करते समय ये बहुत छोटे थे । इन्होंने बकासुर को विदीर्ण कर दिया । ऐसे पुत्र
को जन्म देने वाली माता यशोदा धन्य है । सूरदास कहते है कि यह प्रभु की लीला है
इसमे हमे (ग्वाल बालो को) विशेष पछताने की क्या आवश्यकता है ॥६॥
आजु जसोदा जाइ कन्हैया महा दुष्ट इक मार्यौ ।
पन्नग-रूप गिले सिसु गो-सुत इहिँ सब साथ उवार्यौ ।
गिरि-कंदरा समान भयानक जब अघ बदन पसार्यौ ।
निडर गोपाल पैठि मुख भीतर, खंड-खड करि डार्यौ ।
याकै बल हम बदत न काहुहिं सकल भूमि तृन चार्यौ ।
जीते सबै असुर हम आगैँ, हरि कबहुँ नहिं हार्यौ ।
हरषि गए सब कहनि महरि सौँ अबहिं अघासुर मार्यौ ।
सूरदास प्रभु की यह लीला ब्रज कौ काज सँवार्यौ ॥७॥
अर्थ-(ग्वाल यशोदा से कहते है) आज कृष्ण ने एक महा दुष्ट को मार
डाला । सर्प रूप में उसने ग्वाल बाल और गाय बछडे सब निगल लिए थे, कृष्ण ने
उनका उद्धार किया । पर्वत की कंदरा के समान जब उसने अपने भयंकर पापी मुख को
फैलाया तब निर्भय होकर गोपाल ने उसके मुख मे पैठकर उसे खण्ड-खण्ड कर डाला ।
इनके बल के कारण हम लोग किसी को कुछ समझते नही। सभी जगह की घास चरा
डालते है । सभी असुरो को इन्होने हमारे सामने ही हरा दिया किन्तु हरि स्वयं कभी
नही हारते । सब लोग प्रसन्न होकर यशोदा से बताने गये कि अभी (कृष्ण ने) अघासुर
को मारा । सूरदास कहते है कि प्रभु की इस लीला ने ब्रज के समस्त कारणो को सिद्ध
कर दिया ॥७॥
ब्रह्मा वालक-बच्छ हरे ।
आदि अंत प्रभु अंतरजामी, मनसा तैँ जु करे ।
वृन्दावन लीला ८३
सोइ रूप वै बालक गौ-सुत, गोकुल जाइ भरे ।
एक बरष निसि बासर रहि सँग, काहु न जानि परे ।
त्रास भयौ अपराध आपु लखि, अस्तुति करत खरे ।
सूरदास स्वामी मनमोहन, तामैं मन न धरे ॥८॥
अर्थ—ब्रह्मा ने बालक और बछडों को हर लिया । आदि से लेकर अन्त तक
प्रभु अन्तरयामी है इसलिए मन से सब को जान लेते हैं । उसी तरह के बालक और
बछड़े बना कर उन्होने गोकुल में छोड़ दिए । एक साल तक वे दिन रात उनके साथ रहे
पर उन्हे कोई नही पहचान सका । फिर अपना अपराध समझ कर ब्रह्मा को डर लगा
और वे खड़े होकर स्तुति करने लगे । सूरदास कहते है कि मनमोहन कृष्ण ने उनके
अपराध पर ध्यान नही दिया ॥८॥
आजु कन्हैया बहुत बच्यौ री ।
खेलत हौ घोष कैं बाहर, कोउ आयौ सिसु रूप रच्यौ री ।
मिलि गयौ आइ सखा की नाईं; लै चढ़ाइ हरि कंध सच्यौ री ।
गगन उड़ाइ गयौ लै स्यामहिं, आनि धरनि पर आप दच्यौ री ।
धर्म सहाइ होत है जहँ-तहँ, श्रम करि पूरव पुन्य पच्यौ री ।
सूर स्याम अब कैं बचि आए, ब्रज-घर-घर सुख-सिंधु मच्यौ री ॥६॥
अर्थ--कृष्ण आज विशेष रूप से बच गये । जब गाँव के बाहर खेल रहे थे तब
बालक का रूप धारण करके कोई (व्यक्ति) आया । वह मित्र की तरह (बाल सखाओ)
मे मिल गया और फिर कृष्ण को कंधे पर बिठाकर चलने लगा । कृष्ण को वह आकाश
में उड़ा ले गया । पर अपने आप पृथ्वी पर आकर दब गया । धर्म हर स्थल पर सहा-
यक होता है और परिश्रम से किया गया पिछले जन्म का पुण्य काम आया । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण के इस बार बच जाने पर ब्रज के घर-घर मे सुख का सागर फैल
गया (सब बहुत सुखी हुए) ॥६॥
अब कैं राखि लेहु गोपाल ।
दसहूँ दिसा दुसह दावागिनि, उपजी है इहिं काल ।
पटकत बाँस, काँस कुस चटकत, लटकत ताल तमाल ।
उचटत अति अगार, फुटत पर झपटत लपट कराल ।
धूम धूँधि बाढ़ी घर अम्बर, चमकत बिच-बिच ज्वाल ।
हरिन, बराह, मोर, चातक, पिक, जरत जीव बेहाल ।
जनि जिय डरहु, नैन मूँदहु सब, हँसि बोले नंदलाल ।
सूर अगिनि सब वदन समानी, अभय दिये ब्रज-बाल ॥१०॥
अर्थ - (ब्रजवासी कृष्ण से निवेदन करते है) हे गोपाल, अब हम लोगों की रक्षां
करो क्योकि इस समय दशों दिशाओं मे असह्य दावाग्नि उमड़ आयी है। बांस (जलकर)
गिर रहे हैं, कांस और कुश चटक रहे हैं। ताल और तमाल के वृक्ष (जलकर) लटकते
८४ सूरसागर सार सटीक
जा रहे हैं। अंगारे अत्यन्त छिटक रहे हैं। फल फूटते जा रहे हैं। भयंकर लपट-झपटती
है। तथा बीच-बीच मे ज्वाला चमक रही है। पृथ्वी तथा आकाश के बीच धुएँ की धुंध
बढ गई है। हिरन, शूकर, मोर, चातक, कोयल जल रहे हैं तथा (समस्त) जीव
व्याकुल हो रहे हैं। नन्दलाल ने हँसकर कहा कि तुम लोग मन मे मत डरो केवल सब
लोग आंखे बन्द कर लो। सूरदास कहते हैं कि समस्त अग्नि (कृष्णजी के) मुख मे
समा गई। इस तरह ब्रज के बालको को भय रहित कर दिया ॥११०॥
वन तैं आवत धेनु चराए।
संध्या समय साँवरे मुख पर, गो-पद-रज लपटाए ।
बरह मुकुट कैं निकट लसति लट,मधुप मनौ रुचि पाए ।
बिलसत सुधा जलज-आनन पर, उड़त न जात उड़ाए ।
विधि बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए ।
एक वरन बपु नहिं बड़ छोटे, ग्वाल बने इक धाए ।
सूरदास बलि लीला प्रभु की जीवत जन जस गाए ॥१११॥
अर्थ—वन से गाय चराकर कृष्ण आ रहे हैं। संध्या के समय उनके श्यामल मुख
पर गायो के पैर की (उडायी गयी) धूल लगी है। मोर-मुकुट के निकट (बालो की)
लट ऐसी सुशोभित हो रही है मानो भौरे रुचिकर समझ कर एकत्रित हो गये हैं। कमल
पर अमृत लिपटा हुआ हो और इसीलिए भौरे उड़ते नही हैं। ब्रह्मा की सवारी (हंस) के
चुगने की वस्तु (मोती) की माला वक्षस्थल पर सुशोभित हो रही है। सभी ग्वाल एक
वर्ण तथा एक ही आयु के हैं कोई बड़ा छोटा नही है। सूरदास प्रभु की लीला पर
न्योछावर होते हैं और कहते हैं कि भक्तजन यश को गाते हुए जीते हैं ॥१११॥
मैया बहुत बुरो बलदाऊ ।
कहन लग्यौ बन बड़ी तमासौ, सब मौड़ा मिलि आंऊ ।
मोहूँ कौं चुचकारि गयो लै, जहाँ सघन वन झाऊ ।
भागि चलौ कहि गयो उहाँ तैं, काटि खाइ रे हाऊ ।
हौँ डरपौँ कापौं अरु रोवौँ कोउ नहिँ धीर धराऊ ।
थरसि गयौँ नहिँ भागि सकौँ, वै भागे जात अगाऊ ।
मोसौँ कहत मोल कौ लीनो, आपु कहावत साऊ ।
सूरदास गल बड़ी चबाई, तैसेहिं मिले सखाऊ ॥११२॥
अर्थ—(कृष्ण माता यशोदा से शिकायत करते हुए कहते हैं) हे माता बलभद्र
बड़ा दुष्ट है। वह वन में कहने लगा कि बड़ा सुन्दर तमाशा है, सब लोग मिलकर
आओ। मुझे भी पुचकार कर वही ले गया जहाँ झाऊ का सघन वन था। फिर वहाँ से
यह कह कर भाग गया कि 'हउआ' काट खायेगा। मै डर से कांप रहा था और रो रहा
था लेकिन कोई भी धीरज नही बंधाता था। मैं डर से स्तम्भित हो गया इसलिये भाग
वृन्दावन लीला ८५
भी नहीं सका। वे आगे-आगे भागते चले जा रहे थे। मुझसे कहते हैं कि तू मोल का
लिया हुआ है और अपने को साहु कहते हैं। बलदाऊ तो दुष्ट है ही, वैसे ही उसे मित्र
भी मिल गये हैं ॥१२॥
मैया हौं न चरैहौँ गाइ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौँ, मेरे पाइ पिराइ।
जौ न पत्याहि पूछि बलदाउहिँ, अपनी सौंह दिवाइ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ।
मैं पठवति अपने लरिका कौ, आवै मन बहराइ।
सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिगाइ ॥१३॥
अर्थ—(कृष्ण यशोदा से कहते हैं) माता मैं गाय नही चराऊँगा। सब लोग
मुझसे गाय इकट्ठा करवाते है जिससे मेरे पैर दर्द करने लगते हैं। यदि तुम्हे विश्वास
न हो तो बलदाऊ को अपनी सौगध दिलाकर पूँछ लो। यह सुनकर यशोदा ग्वाल
वालो पर क्रोधित होती हैं और उन्हे गाली देती है। मैं अपने पुत्र को मन बहलाने के
लिए भेजती हूँ, लेकिन मेरे अति छोटे बालक को ये घुमा-घुमाकर मारे डालते हैं
(परेशान कर देते हैं) ॥१३॥
धनि यह वृन्दावन की रेनु।
नंद-किसोर चरावत गैयाँ, मुखहिं बजावत बेनु।
मन-मोहन को ध्यान धरैं जिय, अति सुख पावत चैनु।
चलत कहाँ मन और पुरी तन, जहाँ कछु लैन न दैनु।
इहाँ रहहु जहाँ जूठनि पावहु, व्रजवासिनि कै ऐनु।
सूरदास ह्यॉ की सरवरि नहि, कल्पवृच्छ सुर-धैनु ॥१४॥
अर्थ—वृन्दावन की धूलि धन्य है जहाँ कृष्ण गऊ चराते हैं और वंशी बजाते
हैं, जो मन को मोहित करने वाले कृष्ण का ध्यान धरता है वह अत्यन्त सुख तथा चैन
प्राप्त करता है। यह मन अन्य पुरी की ओर कहां जा सकता हैं जहां न कुछ लेना है न
देना। यही रहो, जहां कृष्ण की जूठन (प्रसाद) प्राप्त होगी, क्योकि यही ब्रजवासियों
का घर है। सूरदास कहते हैं कि यहाँ की समता कल्पवृक्ष तथा कामधेनु नही प्राप्त
कर सकते ॥१४॥
सोवत नींद आइ गई स्यामहिँ।
महरि उठो पौढ़ाइ दुहुँनि कौँ, आपु लगी गृह कामहिँ।
बरजति है घर के लोगनि कौँ, हरुऐं लै-लै नामहिँ।
गाढ़ै बोलि न पावत कोऊ, डर मोहन बलरामहिँ।
सिव सनकादि अंत नहिँ पावत ध्यावत अह-निस जामहिँ।
सूरदास-प्रभु ब्रह्म सनातन, सो सोवत नंद धामहिँ ॥१५॥
८६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—लेटे हुए कृष्ण को नीद आ गई। महरि यशोदा (कृष्ण बलराम) दोनों
को सुलाकर अपने घर के कामो मे लग गईं। धीमे से घर के लोगो के नाम ले-लेकर
वर्जित करती हैं। मोहन और बलराम के डर से कोई जोर से बोलने नही पाता।
शिव, सनकादि जिसे दिन रात सब समय ध्यान करते हुए पार नही पाते वे ही सूर
के प्रभु सनातन ब्रह्म नन्द के घर मे सो रहे है ॥१५॥
देखत नंद कान्ह अति सोवत ।
भूखे भये आजु बन-भीतर, यह कहि कहि मुख जोवत ।
कह्यौ नहीं मानत काहू कौ, आपु हठी दोऊ बीर ।
बार-बार तनु पोंछत कर सौं, अतिहिं प्रेम की पीर ।
सेज मँगाइ लई तहँ अपनी, जहाँ स्याम-बलराम ।
सूरदास प्रभु कैं ढिग सोए, सँग पौढ़ी नँद-बाम ॥१६॥
अर्थ—नन्द अत्यधिक सोते हुए कृष्ण को देखते हैं। आज बन के भीतर (कृष्ण
को) भूख लगी थी, यह कहकर मुंह देखते है। (नंद कहते है) दोनो (बहुत) हठी हैं
और किसी का कहना नही मानते हैं। अत्यधिक प्रेम की पीडा से (नंद) हाथ से (कृष्ण
के) शरीर को बार-बार पोंछते है ! उन्होने अपनी चारपाई वहीं मँगा ली जहाँ कृष्ण
और बलराम (सो रहे) थे। सूरदास कहते हैं कि (नंद) प्रभु कृष्ण के पास सोये और
वही नन्दरानी सोयी ॥१६॥
जागि उठे तब कुँवर कन्हाई ।
मैया कहाँ गई मो ढिग तैं, सँग सोवति बल भाई ।
जागे नंद, जसोदा जागी, बोलि लिए हरि पास ।
सोवत झझकि उठे काहे तैं, दीपक कियौ प्रकास ।
सपनैं कूदि पर्यो जमुना दह, काहू दियो गिराइ ।
सूर स्याम सौं कहति जसोदा, जनि हो लाल डराइ ॥१७॥
अर्थ—तब कुँवर कृष्ण जाग उठे (और कहने लगे) मेरे पास से माता कहाँ
चली गयी और (मेरे) साथ भाई बलभद्र सो रहे हैं। (इतने मे) नन्द और यशोदा
जाग गये और कृष्ण को अपने पास बुला लिया। सोते हुए झझककर क्यो उठ गये
(इसे जानने के लिए) दीपक से प्रकाश किया। (कृष्ण कहते हैं) स्वप्न में यमुना के दह
मे कूद गया या किसी ने गिरा दिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा कृष्ण से कहती हैं,
हे मेरे लाल डरो मत ॥१७॥
मैं बरज्यौ जमुना-तट जात ।
सुधि रहि गई न्हात की तेरैं, जनि डरपौ मेरे तात ।
नंद उठाइ लियौ कोरा करि, अपने संग पौढ़ाइ ।
वृन्दावन मैं फिरत जहाँ तहँ, किहिं कारन तू जाइ ।
अब जनि जैहौ गाइ चरावन, कहँ को रहित बलाइ ।
सूर स्याम दम्पति बिच सोए, नीँद गई तब आइ ॥१९८॥
अर्थ—(नंद कहते है) मैंने तुम्हे यमुना के तट पर जाते हुए रोका था । तुम मे
नहाते समय की याद (शेष) रह गई है (इसलिए) हे मेरे तात डरो मत । नंद ने
(कृष्ण को) अपनी गोद में उठाकर अपने साथ सुला लिया । (तुम) वृन्दावन में जहां-
तहां घूमते रहते हो । वहां किसलिए जाते हो ? अब गाय चराने मत जाना, (तुम्हे)
कहां की बला पड़ी रहती है । सूरदास कहते है कि कृष्ण (जब) दम्पति के बीच मे सोये
तब उन्हें नींद आ गयी ॥१९८॥
काली दमन
नारद ऋषि नृप सौं यौँ भाषत ।
वे हैं काल तुम्हारे प्रगटे, काहैँ उनकौँ राखत ।
काली उरग रहै जमुना मैं, तहँ तैँ कमल मँगावहु ।
दूत पठाइ देहु ब्रज ऊपर, नंदहिं अति डरपावहु ।
यह सुनि कै ब्रज लोग डरैँगै, वै सुनिहैं यह बात ।
पुहुप लैन जैहैं नंद-ढोटा, उरग करै तहँ घात ।
यह सुनि कंस बहुत सुख पायौ, भली कही यह मोहि ।
सूरदास प्रभु कौँ मुनि जानत, ध्यान धरत मन जोहि ॥१९६॥
अर्थ—ऋषि नारद राजा (कंस) से इस प्रकार कहते हैं कि वे (कृष्ण) तुम्हारे
काल (मृत्यु के कारण) के रूप मे प्रकट हुए है उन्हे तुम जीवित क्यो रहने देते हो ।
काली नाम का सांप यमुना में रहता है वही से कमल मंगाओ । ब्रज मे दूत भेजकर
नंद को भयभीत कराओ । यह सुनकर ब्रज के लोग डर जायेगे । यह बात जब वे
(कृष्ण) सुनेगे तो नंद के पुत्र (कृष्ण) फूल लेने (यमुना) जायेगे और वहां सांप चोट
करेगा । यह सुनकर कस को बहुत सुख मिला (उन्होने कहा) आपने मुझे अच्छी बात
बतायी । सूरदास कहते है कि प्रभु कृष्ण को मुनि जानते हैं और मन से देखकर ध्यान
धरते है ॥१९६॥
कंस बुलाइ दूत इक लीन्हौ ।
कालीदह के फूल मँगाए, पत्र लिखाइ ताहि कर दीन्हौ ।
यह कहियो ब्रज जाइ नंद सौं, कंस राज अति काज मँग़ायो ।
तुरत पठाइ दिएँ ही बनिहै भली-भाँति कहि-कहि समुझायौ ।
यहि अंतरजामी जानी जिय, आपु रहे, बन ग्वालं पठाए ।
सूर स्याम, ब्रज-जन-सुखदायक, कंस-काल, जिय हरष बढ़ाए ॥२००॥
अर्थ – कंस ने एक दूत को बुला लिया । उसे एक पत्र लिखा कर दिया और
कालीदह के फूलो को मँगाया । (कंस ने दूत से कहा) ब्रज.जाकर नद से यह कहना कि
कंस ने राज्य के जरूरी काम के लिए (फूल) मँगा भेजा है । (फूल को) तुरंत भेजवा देने
८८ सूरसागर सार सटीक
से ही कल्याण होगा । इस प्रकार भलीभांति कहकर समझाना । इसे हृदय की बात जानने
वाले कृष्ण जान गये । (वे) स्वयं (ब्रज मे) रुके रहे और ग्वालो को वन मे भेज दिया ।
सूरदास कहते हैं ब्रज को सुख देने वाले, कंस के काल कृष्ण अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥२०॥
पाती वाँचत नंद डराने ।
कालीदह के फूल पठावहु, सुनि सबही घवराने ।
जो मोकौं नहिं फूल पठावहु, तौ ब्रज देहुँ उजारि ।
महर, गोप, उपनंद न राखौं, सबहिनि डारौँ मारि ।
पुहुप देहु तौ बनै तुम्हारी, ना तरु गए विलाइ ।
सूर स्याम बलरामु तिहारे, मांगीं उनहिं धराइ ॥२१॥
अर्थ—पत्र पढते ही नन्द डर गये । 'कालीदह के फूल को भेजो' इसे सुनकर
सब लोग घबडा उठे । यदि मुझे फूल नही भेजते हो तो ब्रज को उजाड़ दूँगा । महर
(नंद) गोप, उपनंद (नंद के छोटे भाई) किसी को नही रहने दूँगा और सबको मार
डालूंगा । यदि फूल दो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है नही तो नष्ट हो जाओगे ।
तुम्हारे कृष्ण तथा बलराम (दो पुत्र) है उन्ही से मंगा लो ॥२१॥
पूछौ जाइ तात सौं बात ।
मैं बलि जाउँ मुखारविंद की, तुमहीं काज कंस अकुलात ।
आए स्याम नंद पै धाए, जान्यौ मातु-पिता बिलखात ।
अबहीं दूर करौँ दुख इनको, कंसहिं पठै देउँ जलजात ।
मोसौँ कहो बात बाबा यह, वहुत करत तुम सोच विचार ।
कहा कहौं तुमसौँ मैं प्यारे, कंस करत तुमसौँ कछु झार ।
जब तैं जनम भयौ है तुम्हरी, कैते करबर टरे कन्हाइ ।
सूर स्याम कुलदेवनि तुमकौं जहाँ तहाँ करि लियौ सहाइ ॥२२॥
अर्थ-यशोदा कृष्ण से कह रही हैं कि पिता जी के पास जाकर इस बात को
पूछो तुम्हारे कमल मुख पर वलिहारी जाती हूँ, तथा (हे पुत्र) तुम्हारे लिए (तुम्हारे
कारण) कंस व्याकुल है । श्याम नंद के पासे दौडे हुए आए और माता-पिता को बिल-
खते हुए देखा । (कृष्ण ने सोचा) अभी कंस के पास कमल भेजकर इनके दुख को दूर कर
दूँगा । (फिर उन्होंने नंद से कहा) हे बाबा मुझसे (उस) बात को कहो जिसके लिए तुम
बहुत सोच विचार कर रहे हो । (नंद ने कहा) हे प्यारे तुमसे क्या कहूँ, कंस तुमसे कुछ वैर
करता है । जब से तुम्हारा जन्म हुआ तब से (तुम्हारा अनिष्ट करने के लिए किये गये)
कितने यत्न टल गये । कुल के देवताओ ने जहाँ तहाँ तुम्हारी सहायता कर दी ॥२२॥
खेलत स्याम, सखा लिए सग ।
इक मारत, इक रोवत गेंदहिं, इक भागत करि नाना रंग ।
मार परसपर करत आपु मैं, अति आनंद भए मन माहिं ।
खेलत ही मैं स्याम सबनि कौं, जमुना तट कौं लीन्हें जाहिं ।
वृन्दावन लीला ८६
मारि भजत जो जाहि ताहि सो, मारत लेत आपनौ दाउ ।
सूर स्याम के गुन को जानै कहत और कछु और उपाउ ॥२३॥
अर्थ—मित्रों को साथ लेकर कृष्ण खेलते हैं । एक गेंद को मारता है, एक
रोकता है, एक अनेक प्रकार के खेल करके भागता है । आपस मे मार करते हुए वे
सब बहुत सुखी है । खेलते-खेलते ही कृष्ण सबको यमुना तट पर ले गये । मारकर जो
भागता था उसे मारकर (कृष्ण) अपना दांव लेते थे, । सूरदास कहते है कि कृष्ण के
गुणों को कौन जानता है, वे कुछ कहते हैं और कुछ अन्य उपाय करते हैं ॥२३॥
स्याम सखा कौं गेंद चलाई ।
श्रीदामा मुरि अंग बचायौ, गेंद परी कालीदह जाई ।
धाइ गही तब फेंट स्याम की, देहु न मेरी गेंद मँगाई ।
और सखा जनि मोकौ जानौ, मोसौँ तुम जनि करौ ढिठाई ।
जानि-बूझि तुम गेंद गिराई, अब दीन्हैं ही बनै कन्हाई ।
सूर सखा सब हँसत परस्पर, भली करी हरि गेंद गँवाई ॥२४॥
अर्थ—कृष्ण ने मित्र के ऊपर गेंद फेंका (चलाया) । श्रीदामा ने मुड़कर अङ्ग
बचाया जिससे गेंद जाकर कालीदह मे गिर गयी । तब (श्रीदामा) ने दौड़कर कृष्ण
की फेंट पकड़ ली (और कहा) मेरी गेंद (यदि) नहीं मँगा देते हो (तो ठीक न होगा)
मुझे अन्य सखाओं के समान मत समझो । तुम मुझसे ढीठपन मत करो । तुमने जान-
बूझकर गेंद को गिरा दिया अब हे कृष्ण गेंद देने से ही काम बनेगा । सूरदास कहते हैं
कि सब मित्र परस्पर हँसते हैं (और कहते हैं) अच्छा किया कृष्ण ने गेंद को गायब
कर दिया ॥२४॥
फेंट छांड़ि मेरी देहु श्रीदामा ।
काहै कौं तुम रारि बढ़ावत, तनक बात कैँ कामा ।
मेरी गेंद लेहु ता बदलैं, बाँह गहत हौ धाइ ।
छोटौ बड़ी न जानत काहूँ, करत बराबरी आइ ।
हम काहे कौँ तुमहिं बराबर, बड़े नंद के पूत ।
सूर स्याम दीन्है ही बनिहैं, बहुत कहावत धूत ॥२५॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) हे श्रीदामा मेरी फेंट छोड़ दो । तुम छोटी-सी बात
के लिए क्यों झगड़ा बढ़ाते हो । अपनी गेंद के बदले मेरी गेंद ले लो । तुम दौड़कर
बांह (क्यो) पकड़ते हो । किसी को छोटा बड़ा नही समझते हो । (बस) आकर
बराबरी करने लगते हो । (श्रीदामा कहते हैं) हम तुम्हारे बराबर कैसे हो सकते हैं
(क्योकि तुम) बड़े नंद के पुत्र हो । हे कृष्ण गेंद देने से ही बनेगा (भले ही) तुम बहुत
धूर्त कहे जाते हो ॥२५॥
रिस करि लीन्ही फेंट छुड़ाइ ।
सखा सबै देखत हैं ठाढ़े, आपुन चढ़े कदम पर धाइ ।
८० सूरसागर सार सटीक
तारी दै-दै हँसत सबै मिलि, स्याम गए तुम भाजि डराइ ।
रोवत चले श्रीदामा घर कौं, जसुमति आगैं कहिहौं जाइ ।
सखा सखा कहि स्याम पुकारयौ, गेंद आपनौ लेहु न आइ ।
सूर स्याम पीताम्बर काछे, कूद परे दह में भहराइ ॥२६॥
अर्थ-कृष्ण ने क्रोध मे आकर अपने कमर बन्द को छुड़ा लिया। सभी मित्र
खड़े होकर देखते रहे और वे स्वयं कदम्ब पर दौड़कर चढ गये । ताली दे-देकर सभी
हँसते हैं कि कृष्ण तुम डर कर भाग गये । (तब) श्रीदामा रोते हुए घर की तरफ चले
(यह कहते हुए) यशोदा जी के आगे जाकर कहूँगा । कृष्ण ने उन्हे 'सखा-सखा' कहकर
पुकारा (और कहा) कि आकर अपनी गेंद लेते क्यो नही । सूरदास कहते है कि कृष्ण
पीताम्बर को कसकर दह मे झोके के साथ कूद पडे ॥२६॥
चौंकि परी तन की सुध आई ।
आजु कहा ब्रज सोर मचायौ, तब जान्यौ दह गिर्यौ कन्हाई ।
पुत्र-पुत्र कहिकै उठि दौरी, व्याकुल जमुना-तीरहिं धाई ।
ब्रज-वनिता सब संगहिं लागीं आइ गए बल, अग्रज भाई ।
जननी व्याकुल देखि प्रबोधत धीरज करि नीकें जदुराई ।
सूर स्याम कौं नैंकुं नहीं डर, जनि तू रोवै जसुमति माई ॥२७॥
अर्थ-(यशोदा) कृष्ण के शरीर की याद करके चौक उठी । आज ब्रज मे
शोर क्यो मचा हुआ है । तब उन्हे पता चला कि कृष्ण दह मे गिर गये है (तब
यशोदा) पुत्र-पुत्र कहती हुई व्याकुल होकर यमुना के तट को उठकर दौड़ी । ब्रज की
सभी स्त्रियां साथ मे लग गयीं और (कृष्ण के) बडे भाई बलराम भी आ गये । माता
को व्याकुल देखकर (बलराम) समझाते है कि धीरज धरो, कृष्ण अच्छे सकुशल हैं ।
सूरदास कहते हैं, कृष्ण को कोई डर नही है, हे यशोदा मां तुम मत रोओ ॥२७॥
जसुमति टेरति कुँवर कन्हैया ।
आगैं देखि कहत बलरामहिं, कहाँ रह्यौ तुव भैया ।
मेरौ भैया आवत अबहीँ तोहिं दिखाऊँ मैया ।
धीरज करहु, नैंकु तुम देखहु, यह सुनि लेत बलैया ।
पुनि यह कहति मोहिं परमोधत, धरनि गिरी मुरझैया ।
सूर बिना सुत भइ अति व्याकुल, मेरौ बाल कन्हैया ॥२८॥
अर्थ-यशोदा कृष्ण को पुकारती हैं । बलराम को आगे देखकर कहती हैं कि
तुम्हारा भाई कहां है । (बलराम कहते है) मेरा भाई अभी आता है, और मां तुम्हे
(अभी) दिखाता हूँ । तुम धीरज धरो और थोडी देर देखो । यह सुनकर (यशोदा)
बलैया लेती हैं । फिर यह कहती हुई कि (तुम) मुझे (मात्र) समझा रहे हो धरती पर
मुरझाकर गिर गयी । सूरदास कहते हैं कि (यह सोचती हुई) मेरा कृष्ण बालक है,
बिना पुत्र के यशोदा अत्यधिक व्याकुल हो गयी ॥२८॥
वृन्दावन लीला
अति कोमल तनु धरचौ कन्हाई।
गए तहाँ जहँ काली सोवत, उरग-नारि देखत अकुलाई ।
कह्यौ कौन कौ बालक है तू, बार-बार कहि, भागि न जाई ।
छनकहि मैं जरि भस्म होइगौ, जब देखे उठि जाग जम्हाई ।
उरग-नारि की बानी सुनि कैं आपु हँसे मन मैं मुसुकाई ।
मोकौं कंस पठायौ देखन, तू याकौं अब देहि जगाई ।
कहा कंस दिखरावत इनकौ, एकहि फूँकहिं मैं जरि जाई ।
पुनि-पुनि कहत सूर के प्रभु कौ, तू अब काहे न जाइ पराई ॥२६॥
अर्थ--अत्यधिक कोमल शरीर धारण करके कृष्ण वहाँ गये जहाँ काली सो
रहा था। (कृष्ण को) देखते ही साँप की पत्नी आकुल हो गयी। (उसने) कहा कि
तुम किसके बालक हो । वार-वार कहती हूँ तुम भाग क्यो नही जाते। जब जागकर
(काली) जम्हाई लेगा तुम क्षण भर मे जलकर राख हो जाओगे । साँप की पत्नी की
वाणी सुनकर कृष्ण मन मे मुस्कराकर हँसे । (कृष्ण ने कहा) मुझे कंस ने देखने भेजा
है इसलिए तुम अब इसे जगा दो। कंस इनको कैसे दिखलाता है (क्योकि) एक ही
फूंक मे तो तुम (जीव) जल जाओगे। (नाग-पत्नी) वार-बार कहती है तू अब क्यों
नही भाग जाता ॥२६॥
झिरकि कै नारि, दै गारि गिरिधारि तब, पूँछ पर लात दै अहि जगायौ ।
उठ्यौ अकुलाइ, डर पाइ खग-राज कौं, देखि बालक गरब अति बढ़ायौ ।
पूँछ लीन्ही झटकि, धरनि सौं गहि पटकि फुंकरयौ लटकि करि क्रोध फूले ।
पूँछ राखी चाँपि, रिसनि काली काँपि, देखि सब साँपि-अवसान भूले ।
करत फन घात, विष जात उतराति अति, नीर जरि जात, नहिं गात परसै ।
सूर के स्याम प्रभु लोक अभिराम, बिनु ज्ञान अहिराज विष ज्वाल बरसै ॥३०॥
अर्थ-(कृष्ण ने) नाग की पत्नी को झिड़ककर, गाली देकर पूँछ पर पैर रख
कर नाग को जगा दिया। वह व्याकुल होकर गरुड के भय से डर कर उठा । (किन्तु)
बालक को देखकर अत्यधिक गर्व (काली ने) पूँछ को झटक लिया और (पूँछ-
को) पृथ्वी पर पटक कर, क्रोध से फूँककर, तिरछा होकर फुंकार किया। (कृष्ण ने)
पूँछ को दबाये रखा । क्रोध से काली नाग कांप उठा । (उसे) देखकर सभी सांपिनिओं
की सुध-बुध भूल गयी । फण से चोट करने पर विष उतरा जाता है जिससे पानी जल
जाता है (लेकिन) (कृष्ण के) शरीर को छू (तक) नही जाता । सूरदास कहते हैं कि
लोक को सुन्दर लगने वाले (कृष्ण को बिना जाने नागों का राजा काली) विष की
ज्वाला बरसाता है ॥३०॥
उरग लियौ हरि कौ लपटाइ ।
गर्व-वचन कहि-कहि रुख भाषत, मोकौं नहिं जानत अहिराइ ।
लियौ लपेटि चरन तैं सिख लौं, अति इहिं मोसौ करत ढिठाइ ।
६२ सूरसागर सार सटीक
चाँपी पूँछ लुकावत अपनी, जुवतिनि कौं नहिं सकत दिखाइ ।
प्रभु अंतरजामी सब जानत, अब डारों इहिं सकुचि मिटाइ ।
सूरदास प्रभु तन बिस्तारचौ, काली बिकल भयौ तब जाइ ॥३१॥
अर्थ—नाग ने कृष्ण को लपेट किया । मुंह से गर्व की बातें करते हो (कृष्ण
कहते है) हे सर्पराज, तुम मुझे नही जानते हो । चरण से शिखा तक लपेट लिया है
इससे मुझसे अत्यधिक धृष्टता करते हो । दबी हुई अपनी पूँछ को छिपाते हो (क्योकि)
उसे तुम युवतियो को दिख। नही सकते । हृदय की बात जानने वाले प्रभु सब कुछ
जानते है (इसलिए) उन्होंने कहा अब इसके संकोच को मिटा डालूं । सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण ने (जब) शरीर का विस्तार किया तब काली विफल हो गया ॥३१॥
जबहिं स्याम तन, अति बिस्तारचौ ।
पटपटात टूटत अंग जान्यौ, सरन-सरन सु पुकारचौ ।
यह बानी सुनतहिं करुनामय, तुरत गए सकुचाइ ।
यहै बचन सुनि द्रुपद-सुता दीन्हौ बसन बढ़ाइ ।
यहै बचन गजराज सुनायौ, गरुड़ छोड़ि तहँ धाए ।
यहै बचन सुनि लाखा गृह मैं, पांडव जरत बचाए ।
यह बानी सहि जात न प्रभु सौं, ऐसे परम कृपाल ।
सूरदास प्रभु अंग सकोरचौ ब्याकुल देख्यौ ब्याल ॥३२॥
अर्थ—जब कृष्ण ने शरीर का अत्यधिक विस्तार कर लिया (तब) पटपटा
कर टूटते हुए शरीर को जानकर (काली ने) शरण-शरण (कहकर) पुकारा । यह
वाणी सुनते ही करुणा से भरे हुए कृष्ण तुरन्त सकुचा गये । द्रौपदी के मुख से यही
वचन सुनकर वस्त्र (चीर) बढ़ा दिया था । यही वचन (जब) हाथी ने सुनाया (तब)
गरुड़ को छोड़कर वहीं दौडे थे । यही वचन सुन कर लाख से बने घर (लाक्षागृह)
मे पांडवो को जलने से बचाया था । (शरणागत की दीन) वाणी प्रभु से सही नही
जाती । वे ऐसे परम कृपालु हैं । सूरदास कहते हैं सांप को व्याकुल देखकर कृष्ण
ने अपना अङ्ग सिकोड़ लिया ॥३२॥
नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ ।
पग सौं चाँपि धींच बल तीरचौ, नाक फौरि गरि लीन्हौ ।
कूदि चढ़े ताके माथे पर काली करत बिचार ।
स्रवननि सुनी रही यह बानी, ब्रज ह्वै है अवतार ।
तेइ अवतरे आइ गोकुल मैं, मैं जानी यह बात ।
अस्तुति करन लग्यौ सहसौ मुख, धन्य-धन्य जग-तात ।
बार-बार कहि सरन पुकारचौ, राखि-राखि गोपाल ।
सूरदास प्रभु प्रगट भए जब, देख्यौ ब्याल बिहाल ॥३३॥
वृन्दावन लीला ६३
अर्थ—(कृष्ण ने) नाग को नाथते देर नही की। पैर से दबाकर, गरदन के
बल तोड़कर, नाक को फोड़कर पकड़ लिया। (फिर) कूदकर उसके मस्तक पर (कृष्ण)
चढ़ गये। (तब) काली विचार करता है कि कानों में यह वाणी सुनी थी कि ब्रज मे
अवतार होगा। उन्ही (भगवान् ने) गोकुल में आकर अवतार लिया है। मैं यह बात
जान गया। अपने हज़ार मुख से विनती करने लगा कि हे जग के पिता तुम धन्य हो।
बार-बार शरण, कहकर पुकार की कि हे गोपाल रक्षा करो। सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण ने जब नाग को व्याकुल देखा तो वे (विष्णु रूप में) प्रकट हुए ॥३३॥
आवत उरग नाथे स्याम।
नंद जसुदा गोपी, कहत हैं बलराम।
मोर-मुकुट, विसाल लोचन, स्रवन कुंडल लोल।
कोटि पितांबर, बेष नटवर, नृतत फन प्रति डोल।
देव दिवि दुंदुभि बजावत, सुमन गन बरषाइ।
सूर स्याम बिलोकि ब्रज-जन, मातु-पितु सुख पाइ ॥३४॥
अर्थ—नंद, यशोदा, गोप गोपी तथा बलराम सभी कह रहे हैं कि नाग को
नाथ कर कृष्ण आ रहे हैं। (उनके सिर पर) मोर का मुकुट है। (उनके) नेत्र विशाल
हैं। कानों मे चंचल कुंडल, कटि (कमर) मे पीताम्बर, नटवर का वेष धरे (कृष्ण
काली के) प्रति फण पर घूम-घूम कर नाच रहे है। देव आकाश में दुन्दुभी बजा रहे हैं
तथा अत्यधिक फूल बरसा रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को देखकर ब्रजवासी तथा
माता-पिता सुखी हो गये ॥३४॥
गोपाल राइ निरतत फन-प्रति ऐसे।
गिरि पर आए बादर देखत, मोर अनंदित जैसे।
डोलत मुकुट सीस पर हरि के, कुडल-मडित-गड।
पीत बसन, दामिन मनु घन पर, तापर सुर-कोदंड।
उरग-नारि आगैं, सब ठाढ़ी, मुख मुख अस्तुति गावैं।
सूर स्याम अपराध छमहु अब, हम मागैं पति पावैं ॥३५॥
अर्थ —गोपालराज प्रति फण पर ऐसे नाच रहे हैं जैसे पर्वत पर आये हुए
बादल को देखते ही मोर आनंदित होकर (नाचने लगता है)। कृष्ण के सिर पर मुकुट
डोल रहा है। कनपटी कुंडल से सुशोभित है। पीताम्बर (ऐसा लग रहा है) मानो
बादलो के ऊपर बिजली और उस पर इन्द्रधनुष हो। नाग की सभी पत्नियां आगे
खडी होकर (अपने-अपने) मुख से स्तुति (गा) कर रही है। सूरदास कहते हैं कि (वे
कहती हैं) हे कृष्ण अब अपराध को क्षमा कर दीजिए। हम लोग यह मांगते हैं कि
हमारे पति फिर मिल जावे ॥३५॥
गरुड़-त्रास तैं जौ ह्वां आयीं।
तौ प्रभु चरन-कमल फन-फन प्रति, अपनें सीस धरायीं।
६२ सूरसागर सार सटीक
------------। ऋषि साप दियौ खगपति कौं, ह्याँ तब रह्यौ छपाइ ।
प्रभु वाहन-डर भाजि बच्यौ, नातरु लेतौ खाइ ।
यह सुनि कृपा करी नंद-नंदन, चरन चिह्न प्रगटाए ।
सूरदास प्रभु अभय ताहि करि, उरग-द्वीप पहुँचाए ॥३६॥
अर्थ-(काली नाग कहता है) गरुड के भय से जो यहां आ गया तभी प्रभु के
चरण-कमल को प्रत्येक फन से अपने सिर पर धारण कराया । वे ऋषि धन्य हैं जिन्होने
पक्षियो के स्वामी (गरुड) को शाप दिया था (कि गरुड़ कालीदह में नही आ सकता)
तभी (मै) यहाँ छिपा रहा । प्रभु की सवारी (गरुड) के डर से भाग कर बच गया
नही तो (वह मुझे) खा लेता । यह सुनकर नन्द के नन्दन (पुत्र) कृष्ण ने कृपा करके
(उसके मस्तक पर) चरण के चिह्न को प्रकट किया । सूरदास कहते है कि कृष्ण ने
उसे भयरहित करके नागो के द्वीप मे भेज दिया ॥३६॥
सहस सकट भरि कमल चलाए ।
अपनी समसरि और गोप जे, तिनकौं साथ पठाए ।
और बहुत काँवरि दधि-माखन, अहिरनि काँधैं जोरि ।
नृप कैं हाथ पत्र यह दीजौ, विनती कीजो मोरि ।
मेरो नाम नृपति सौं लीजौ, स्याम कमल लै आए ।
कोटि कमल आपुन नृप-मांगे, तीनि कोटि हैं पाए ।
नृपति हमहिं अपनौं करि जानी, तुम लायक हम नाहिं ।
सूरदास कहियौ नृप आगैं, तुमहिं छाँड़ि कहँ जाहिं ! ॥३७॥
अर्थ-हजारो गाड़ियो को कमल से भरकर चला दिया । अपनी समानता वाले
जो और गोप थे उनको साथ भेज दिया और अहीरो के कन्धे से जोडकर दही और
मक्खन से भरी बहँगियो को (भेजा) । (किसी गोप के हाथ मे पत्र देकर नन्द कहते
है) राजा (कस) के हाथ मे यह पत्र देकर मेरी (ओर से) विनती करना । नृपति से
मेरा नाम लेकर (कहना) कृष्ण कमल ले आये । हे राजा आपने एक करोड कमल
मांगे थे, तीन करोड पा गये है । राजा हम लोगो को अपना ही करके जानिए ।
(यद्यपि) आपके लायक हम नही है । सूरदास कहते हैं कि (नन्द ने कहा) कि राजा
के आगे कहना कि तुम्हे छोड़कर (हम लोग) कहां जायें ॥३७॥
मुरली
जब हरि मुरली अधर धरत ।
थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं, जमुनाजल न बहत ।
खग मोहैं, मृग-जूथ भुलाहीँ, निरखि मदन-छवि छरत ।
पसु मोहैं सुरभी विथकित, तृन दंतनि टेकि रहत ।
सुक सनकादि सकल मुनि मोहैं, ध्यान न तनक गहत ।
सूरदास भाग हैं तिनके, जे या सुखहिं लहत ॥३८॥