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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

७८ सूरसागर सार सटीक
भूखौ भयौ आजु मेरौँ बारी ।
भोरहिँ ग्वारि उरहनौ ल्‍याई, उहिँ यह कियौ पसारी ।
पहिलेहिँ रोहिनि सौँ कहि राख्‍यौ, तुरत करहु जेवनार ।
ग्‍वाल-बाल सब बोलि लिए, मिलि बैठे नन्द-कुमार ।
भोजन वेगि ल्‍याउ कछु मैया भूख लगी मोहि भारी ।
आजु सबारैँ कछु नहिँ खायौ, सुनत हँसी महतारी ।
रोहिनि चितै रही जसुमति-तन सिर धुनि-धुनि पछितानी ।
परसहु वेगि, वेर कत लावति, भूखे साँरगपानी ।
बहु व्यंजन बहु भाँति रसोई षटरस के परकार ।
सूर स्याम हलधर दोउ भैया, और सखा सब ग्वार ॥६६॥
अर्थ—यशोदा कहती हैं कि आज मेरा बालक बहुत भूखा हो गया है। आज
प्रातःकाल एक ग्वालिनी उलाहना दे गई थी, उसी ने यह सब पसारा किया है।
यशोदा ने पहले ही रोहिणी से कह रक्खा था कि जेवनार (भोजन) का प्रबन्ध करो।
सभी ग्वाल-बालो को बुलाकर नन्द कुमार कृष्ण उन सब के साथ बैठ गये। (कृष्ण ने
माता यशोदा से कहा) हे माता मुझे बड़ी भूख लगी है इसलिए कुछ खाने के लिए
लाओ। मैने आज सुबह कुछ नही खाया था। इसे सुनकर माता (यशोदा) हँसने
लगी। रोहिणी, यशोदा की ओर देखकर सिर धुन-धुनकर पछताने लगी। फिर उसने
कहा कि शीघ्र ही भोजन परसो क्योकि सारङ्गपाणि (कृष्ण) बहुत भूखे हैं। अनेक प्रकार
के षटरस युक्त व्यंजन (भोजन) कृष्ण, बलभद्र तथा ग्वाल सखाओ को परोसो ॥६६॥
मोहिँ कहतिँ जुवती सब चोर ।
खेलत कहूँ रहौँ मैं बाहिर, चितै रहतिँ सब मेरी ओर ।
बोलि लेतिँ भीतर घर अपनैँ, मुख चूमतिँ, भरि लेतिँ अँकोर ।
माखन हेरि देतिँ अपनैँ कर कछु कहि बिधि सौँ करतिँ निहोर ।
जहाँ मोहिँ, देखतिँ, तहँ टेरतिँ, मैं नहिँ जात दुहाई तोर ।
सूर स्याम हँसि कठ लगायौ, वै तरुनी कहँ बालक मोर ॥७०॥
अर्थ—(कृष्ण माता यशोदा से • दुहाई देते हुए कहते है) मुझे सभी युवतियाँ
चोर कहती हैं किन्तु कही बाहर खेलते हुए मेरी ओर ये सब ताकती रहती हैं। (मुझे)
अपने घर के भीतर बुलाकर मेरा मुख चूमती है और गोद मे बिठा लेती हैं। ये अपने
ही हाथ से मुझे देखकर मक्खन देती हैं और कुछ कहकर ब्रह्मा से निहोरा करती हैं।
मुझे जहाँ देखती है वही पुकारने लगती हैं। मैं तुम्हारी दुहाई लेकर कहता हूँ कि मैं
(स्वेच्छया) नही जाता हूँ। सूरदास कहते है कि (यशोदा ने) हँसकर कृष्ण को गले
से लगा लिया और (कहा कि) कहाँ वे तरुणी स्त्रियां कहाँ यह मेरा बालक ॥७०॥