सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
१७४ सूरसागर सार सटीक
मुझे गुप्त करके रखा और मैंने आपकी आज्ञा मान ली। मैं शरीर तथा घर का ख्याल
भुलाये रहती हूँ। तुमसे भिन्न (मेरा) और दूसरा कोई हितैषी नही है। अब मुझे चरणो
के नीचे रखो। (इसके बाद) कृष्ण ने हँसकर (राधा के) अंग को छुआ। सूरदास
कहते है कि कृष्ण ने सुन्दर मुख से कहा, प्यारी तुम्ही पर मेरे प्राण बसते हैं ॥७२॥
मातु-पिता अति त्रास दिखावति ।
भ्राता मोहिं मारन कौं घिरवै, देखैं मोहिं न भावति ।
जननी कहति बड़े की बेटी, तोकौं लाज न आवति ।
पिता कहैं कैसी कुल उपजी, मनहीं मन रिस पावति ।
भगिनी देख देति मोहिं गारी, काहैं कुलहिं लजावति ।
सूरदास-प्रभु सौं यह कहि-कहि, अपनी विपत्ति जनावति ॥७३॥
अर्थ--माता-पिता अत्यधिक भय दिखाते हैं। भाई मुझे मारने की धमकी देते
हैं, यह देखकर मुझे (कुछ) भाता नही। माता कहती हैं बड़े की बेटी होकर तुम्हे
लाज नही आती। पिता कहते हैं कि कैसी (लड़की) कुल में पैदा हो गयी। इससे
मन-ही-मन क्रोध आता है। बहन देखकर मुझे गाली देती है कि क्यों कुल को
लजावती हो। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण से यह कह-कहकर (राधा) अपनी विपत्ति
प्रकट करती है ॥७३॥
सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन ।
विमुख जननि की संगति कौं दुख, कब धौं करिहौ मोचन ।
भवन मोहिं भट्ठी सौं लागत, मरति सोचहीँ सोचन ।
ऐसी गति मेरी तुम आगेँ, करत कहा जिय दोचन ।
धिक वे मातु-पिता, धिक भ्राता, देत रहत मोहिं खोचन ।
सूर स्याम मन तुम्हहिँ लगान्यौ, हृदय-चून-रंग-रोचन ॥७४॥
अर्थ-कमल के दल के समान आँख वाले सुन्दर कृष्ण विमुख माताओ की
संगति के दुःख से मुझे कब छुड़ाओगे । घर मुझे भट्ठा के समान लगता है, (मैं) सोच-
सोचकर ही मरती हूँ। तुम्हारे आगे मेरा ऐसा हाल है, (तुम) जी मे दुविधा क्यो
करते हो। उन माता-पिता को धिक्कार है तथा (उस) भाई को धिक्कार है जो
(सदैव) हमे कोसते रहते हैं। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) हे कृष्ण हमारा
तुम्हीं से मन लग गया है, (हम तुम्हारे रंग मे) हल्दी और चूने के (रंग की तरह
रंग गये है) मिल जाने से रोचना (लाल) के रंग में रंजित हो गये हैं ॥७४॥
कुल की कानि कहाँ लगि करिहौँ ।
तुम आगैँ मैं कहौँ जु साँची, अब काहू नहिँ डरिहौँ ।
लोग कुटुंब जग के जे कहियत, पेला सबहिँ निदरिहौँ ।
अब यह दुख सहि जात न मोपैँ, विमुख बचन सुनि मरिहौँ ।
आपु सुखी तौ सब नीके हैं, उनके सुख कह सरिहौँ ।
सूरदास प्रभु चतुरसिरोमनि, अबकें हौं कछु लरिहौँ ॥७५॥
राधाकृष्ण १७५
अर्थ-कुल की मर्यादा (का ध्यान) कहां तक करूंगी। तुम्हारे आगे सच्ची
वात कहती हूँ कि अब किसी को नही डरूँगी। घर, संसार के लोग जो (कुछ) कहते
हैं उन्हे बलाव (हठपूर्वक) निरादर कर दूंगी। अब यह दुःख मुझसे नही सहा जाता ।
विमुख बचन सुन-सुनकर मर जाऊँगी। अगर आप सुखी है तो सब ठीक (ही) है।
उनके सुख को पूरा कर डालूंगी। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि अबकी बार
मैं (भी) कुछ लडूंगो ॥७५॥
प्राननाथ हो मेरी सुरति किन करौ ।
मैं जु दुख पावति हौं, दीनदयाल, कृपा करौ, मेरी कामदंद-दुख
औ बिरह हरौ ।
तुम बहु रमनी रमन सो जानति हौं, याही के जु धौखैँ
हौ मौसों काहैँ लरी ।
सूरदास-स्वामी तुम हौ अंतरजामी सुनो मनसा बाचा मैंँ
ध्यान तुम्हरौई धरौ ॥७६॥
अर्थ-हे प्राणनाथ मेरी याद क्यो नही करते जो मैं दुःख पाती हूँ । दीनदयाल
(मुझपर) कृपा करो, मेरी काम-पीडा दुःख तथा विरह को हरो । यह समझ कर कि
मै जानती हूँ कि तुम अनेक रमणियो के साथ रमण करने 'वाले हो, मुझसे झगड़ा क्या
करते हो। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कृष्ण तुम अन्तर्यामी हो। (ऐसा मैने)
सुना है। (इसलिए) मन और वाणी से मै तुम्हारा ही ध्यान करती हूँ ॥७६॥
हौँ या माया ही लाँगी तुम कत तोरत ।
मेरी तौ जिय तिहारे चरननि ही मैं लाग्यौ, धीरज क्यों रहै रावरे
मुख मोरत ।
कोऊ लै बनाइ बातैं, मिलवति तुम आगैं, सोई किन आइ
मोसौँ अब है जोरत ।
सूरदास-पिय, मेरे तौ तुमहिँ हो जु जिय, तुम बिनु देखैँ मेरौ
हिय ककोरत ॥७७॥
अर्थ-मैं तो आपकी इस माया (प्रेम) में ही लग गई (पग गई) हूँ, उसे आप
क्यो तोडते है (नष्ट करते है) । मेरा तो हृदय तुम्हारे चरणो में ही लग गया है ।
तुम्हारे मुख मोड़ लेने पर मुझे धीरज किस प्रकार रहे। कोई वाते बनाकर तुम्हारे
आगे (इधर-उधर) जोड़कर कहती है वही (लोग) आकर अब हमसे जोड़ती है।
सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि मेरे तो प्राण तुम ही हो तुम्हें बिना देखे मेरा
हृदय कुरेदता है ॥७७॥
बिहँसि राधा कृष्न अंक लीन्ही ।
अधर सौं अधर जुरि, नैन सौं नैन मिलि, हृदय सौं हृदय
लगि, हरष कीन्ही ।
१७६ सूरसागर सार सटीक
कंठ भुज-भुज जोरि, उछंग लीन्ही नारि, भुवन-दुख टारि,
सुख दियौ भारी।
हरषि बोले स्याम, कुन्ज-बन धन-धाम, तहाँ हम तुम सग
मिलैं प्यारी।
जाहु गृह परम धन, हमहुँ जैहैं सदन, आइ कहूँ पास मोहिं
सैन दैहौ।
सूर यह भाव दै, तुरतहीँ गवन करि, कुज-गृह सदन तुम जाइ रैहौ ॥७८॥
अर्थ--हँस कर कृष्ण ने राधा को गोद मे ले लिया। ओंठ से ओठ आंख से
आंख मिलाकर, हृदय से हृदय लगाकर हर्षित किया। कंठ से भुजा जोडकर नागरि
(राधा) को गोद मे ले लिया। घर के दुखो को टालकर बहुत सुख दिया। खुश
होकर कृष्ण बोले कि घने कुज वन के कुटीर मे हम तुम प्यारी साथ मिले। हे परमधन
(राधा) घर जाओ, हम भी घर जायेगे, पास मे आकर मुझे कोई इशारा दे देना।
सूरदास कहते है कि यह भाव देकर उन्होने तुरन्त ही गमन किया और कहा कि तुम
कुज-गृह रूपी घर मे आकर रहना ॥७८॥
व्याज मिलन
सुनि री मैया काल्हिही, मोतिसरी गंवाई।
सखिनि मिलै जमुना गई, धौं उनहिं चुराई।
कीधौं जलही मैं गई, यह सुधि नहिं मेरैं।
तब तैं मैं पछिताति हौं, कहति न डर तेरैं।
पलक नहीं निसि कहूँ लगी, मोहिं सपथ तिहारी।
इहि डर तैं मैं आजुहीँ, अति उठी सवारी।
महरि सुनत चकित भई, मुख ज्वाब न आवै।
सूर राधिका गुन भरी, कोउ पार न पावै ॥७६॥
अर्थ—सुनो री माता ! कल मैंने मोतियो की माला गंवा दी। मैं सखियो से
मिलने के लिए यमुना गयी थी, शायद उन्होने ही चुरा लिया। न जाने जल ही मे
डूब गयी, मुझे याद नही है। तभी से मैं पछताती हूँ, तुम्हारे डर से तुमसे कहती नही
हूँ। रात मे तनिक भी पलक नही लगी, मुझे तुम्हारी कसम है। इसी डर से आज मैं
सबेरे ही उठ पडी। महरि यह सुनकर चकित हो गयी। उनके मुख से उत्तर नही
निकला। सूरदास कहते है कि राधा गुण से भरी है, (इसका) कोई पार नही
पाता ॥७६॥
सुनि राधा अब तोहिँ न पत्यैहौँ।
ओर हार चौकी हमेल अब, तेरैं कंठ न नैहौँ।
लाख टकटकी हानि करी तैं, सो जब तोसौँ लैहौँ।
हार बिन्ना ल्याएँ लड़बौरी, घर नहिं पैठन दैहौँ।
राधाकृष्ण १७७
जब देखौँगी वहै मोतिसरि, तबहीं तौ सचु पैहौँ।
नातरु सूर जन्म भरि तेरो, नाउँ नहीं मुख लैहौँ ॥८०॥
अर्थ—सुनो राधा अब तुम पर विश्वास नही करूंगी। हार, चौकी, हमेल
(कुछ भी) तेरे गले मे नही डालूंगी। तुमने लाख टका को हानि की है, वह जब तुमसे
लूंगी (तभी और आभूषण पहनने को दूंगी)। हे अनाड़ी, हार बिना लाए (तुम्हे) घर
में नही बैठने दूंगी। जब वही मोती का हार देखूंगी तभी सत्य मानूंगी। सूरदास कहते
हैं कि (माता कहती है) नही तो जन्म भर तुमसे मुँह से नही बोलूंगी ॥८०॥
जैहै कहाँ मोतिसरि मोरी।
अब सुधि भई लई वाही नैं, हँसति चली बृषभानु-किसोरी।
अबहीं मैं लीन्हे आवति हौं, मेरैं सँग आवै जानि को री।
देखौँ धौँ कहा करिहौँ वाकौ, बड़े लोग सीखत हैं चोरी।
मौकौँ आजु अवेर लागि है, ढूढौँगी घर-घर ब्रज खोरी।
सूर चली निधरक ह्वै सब सौं, चतुर राधिका बातनि भोरी ॥८१॥
अर्थ—मेरी मोती की माला कहाँ जायेगी। अब ख्याल हो गया, उसी ने ले
लिया है। (यह कहकर) हंसती हुई राधा चली। अभी मैं लिये आती हूँ; मेरे साथ
कोई मत आये। देखो (पकड़ने पर) उसका क्या करूँगी, बडे लोग (भी) चोरी सीखते
हैं। आज मुझे देर लगेगी, (क्योकि) ब्रज की गलियो मे घर-घर (उसे) ढूंढूंगी। सूर-
दास कहते हैं चतुर राधिका बातों से भुलाकर सबसे निधड़क होकर चली ॥८१॥
नंद-महर घर कें पिछवारैं राधा आइ बतानी।
मनौ अंब-दल-मौर देखि कें, कुहुकी कोकिल बानी।
झूठेहिं नाम लेति ललिता कौँ, काहैं जाहु परानी।
वृन्दावन-मग जाति अकेली, सिर लै दही-मथानी।
मैं बैठी परखति ह्वाँ रैहौँ, स्याम तबहिं तिहिं जानी।
कोक-कला-गुन आगरि नागरि, सूर चतुरई ठानी ॥८२॥
अर्थ—नंद महर के घर के पीछे राधा ने आकर बाते की, मानो आम के
कोमल पत्ते और बौर को देखकर कोयल कुहकी हो। झूठे ही ललिता का नाम लेती है
कि क्यो भागी जा रही हो। वृन्दावन के मार्ग पर सिर पर दही और मथानी लिये
अकेली चली जा रही है। मैं बैठकर यहां परखती रहूँगी। कृष्ण तभी उसे जान गये।
सूरदास कहते हैं कि काम-कला के गुणों मे श्रेष्ठ राधा ने चतुराई ठानी ॥८२॥
सैन दै नागरी गई बन कौँ।
तबहिं कर-कौर दियौ डारि, नहिं रहि सकै, ग्वाल जेँवत तजे,
मोह्यौ उनकौँ।
१२
५७८ सूरसागर सार सटीक
चले अकुलाइ बन धाइ, ब्याई गाइ देखिहौँ जाइ, मन हरष
कीन्हौ।
प्रिया निरखति पंथ, मिलैँ कब हरि कंत, गए इहिँ अंत, हँसि
अंक लीन्हो।
अतिहिँ सुख पाइ, अतुराइ मिले धाइ, दोउ मनी अति रंक, नव-
निधहिँ पाई।
सूर प्रभु की प्रिया, राधिका अति नवल, नवल नँदलाल के, मनहिँ
भाई ॥८३॥
अर्थ—इशारा देकर नागरि राधा वन को गयी। तभी उसने (कृष्ण ने)
हाथ का कौर रख दिया। अब उनके लिये रुकना सम्भव नही था। कृष्ण ने ग्वालों
को भी मोह लिया और उन्हें भोजन करते छोड़ दिया। मन मे हर्ष करके, आकुल
होकर वन को दौड़े कि ब्याई गाय देखूँगा। प्रिया रास्ता निहारती थी कि कंत कृष्ण
(कब) मिलेंगे, इसी बीच वे पहुँचे और उन्होंने हँसकर उसे गोद मे ले लिया। अत्यधिक
सुख पाकर दोनो आतुर होकर दौड़कर मिले जैसे दरिद्र को खजाना मिल गया हो।
सूरदास कहते है कि कृष्ण की प्रिया राधा अत्यधिक सुन्दर है और सुन्दर कृष्ण के मन
भा गयी है ॥८३॥
दीजै कान्ह काँधे कौ कंवर।
नान्हीं नान्हीँ बूँदनि वरषन लाग्यौ, भीजत कुसुंभी अंबर।
वार-वार अकुलाइ राधिका, देखि मेघ-आडंवर।
हँसि हँसि रीझि बैठि रहे दोऊ, ओढ़ि सुभग पीतांबर।
सिव सनकादिक नारद-सारद, अत न पावै तुंवर।
सूर स्याम-गति लखि न परति कछु, खात ग्याल संग संवर ॥८४॥
अर्थ—हे कृष्ण कन्धे का कम्बल दीजिए। नन्ही-नन्ही बूंदे वरसने लगी, जिससे
कुसुमी रंग का वस्त्र भीगता है। बादलों की उमड़-घुमड़ देखकर राधा बार-बार
आकुल हो गयी। हँस-हँस कर तथा रीझकर दोनों (एक साथ) पीतांबर ओढ़कर बैठ
गये। शिव, सनकादि, नारद, शारद, और तुंवर (कृष्ण का) अंत नही पाते। सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण की गति कुछ भी दिखाई नही देती जो कि ग्वालो के साथ रास्ते
का भोजन खा रहे हैं ॥८४॥
कान्ह कह्यौ वन रैनि न कीजै, सुनहु राधिका प्यारी।
अति हित सौं उर लाइ कह्यौ, अब भवन अपनैं जा री।
मातु-पिता जिय जानै न कोऊ, गुप्त-प्रीति रस भारी।
कर तैं कौर डारि मैं आयौ, देखत दोउ महतारी।
तुम जैसी मोहिं प्यारी लागति, चंद चकोर कहा री।
सूरदास स्वामी इन बातनि, नागरि रिझई भारी ॥८५॥
राधाकृष्ण १७६
अर्थ—अत्यन्त प्रेम से हृदय से लगाकर कृष्ण ने कहा कि (हे) राधिका प्यारी
सुनो वन मे रात मत करो । अब अपने घर चली जाओ । गुप्त प्रीति के बड़े रस को
माता-पिता कोई मन मे जानने न पावे । दोनों माताओ को देखते मैं हाथ से कौर
डालकर चल दिया । तुम जैसे मुझे प्रिय लगती हो (उसके आगे) चकोर, और चन्द्रमा
क्या है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने इन बातो से राधा को बहुत रिझा लिया ॥८५॥
मैँ बलि जाउँ कन्हैया की ।
करतैँ कौर डारि उठि धायी, बात सुनी बन गैया की ।
धौरी गाय अपनी जानी, उपजी प्रीति लवैया की ।
तातैँ जल समोइ पग धोवति, स्याम देखि हित मैया की ।
जो अनुराग जसोदा कैँ उर, मुख की कहनि कन्हैया की ।
यह सुख सूर और कहुँ नाहीँ, सौँह करत बल भैया की ॥८६॥
अर्थ—मैं कृष्ण पर निछावर जाती हूँ । (जब उन्होने) वन मे गाय (के व्याने)
की बात सुनी तो वे हाथ से कौर डालकर उठकर दौड़े । अपनी धौरी गाय जानकर
लाने वाले के प्रति प्रीति पैदा हुई । उसी से गर्म और ठंडा पानी मिलाकर पैर धोती
है। कृष्ण माता के हित को देखकर अपने मुख से यह कहते हैं कि जो प्रेम यशोदा के
हृदय मे हैं वह सुख और कही नही है । (यह मैं) बलभद्र की सौगंध करके कहता
हूँ ॥८६॥
राधा अतिहिँ चतुर प्रवीन ।
कृष्ण कौँ सुख दै चली हँसि, हँस-गति कटि छीन ।
हार कैँ मिस इहाँ आई, स्याम मनि-कैँ काज ।
भयौ सब पूरन मनोरथ, मिले श्रीब्रजराज ।
गाँठि-आँचर छोरि कै, मोतिसरी लीन्ही हाथ ।
सखी अवति देखि राधा, लई ताकौँ साथ ।
जुवति बूझति कहाँ नागरि, निसि गई इक जाम ।
सूर ब्यौरौ कहि सुनायौ, मैँ गई तिहिँ काम ॥८७॥
अर्थ —राधा अत्यधिक चतुर तथा प्रवीण है । कृष्ण को सुख देकर क्षीण कमर
वाली (राधा) हँसकर, हंस की चाल से चली । श्याम रूपी मणि के लिए हार का
बहाना करके यहाँ आई थी । कृष्ण के मिलने पर उसकी सब मनोकामना पूरी हो
गयी । आंचल की गांठ छोड़कर मोतियों की माला हाथ मे ले ली । सखी को आती
हुई देखकर उसको साथ मे ले लिया । युवतियाँ पूँछती है कि एक पहर रात गये कहाँ
गयी थी ? सूरदास कहते हैं कि राधा ने सब ब्योरा कह सुनाया (और कहा कि) मैं
उसी काम से गई थी ॥८७॥
१८४ सूरसागर सार सटीक
करति अवसेर वृषभानु-नारी ।
प्रात तैं गई, वासर गयौ बीति सब, जाम निसि गई, धी कहँ
वारी ।
हार कैं त्रास मैं कुँवरि त्रासी बहुत, तिहिं डरनि अजहूँ नहिं
सदन आई ।
कहाँ मैं जाउँ, कह धौं रही रूसि कैं, सखिनि सौं कहति कहूँ
मिलि माई ।
हार बहि जाइ, अति गइ अकुलाइ कैं, सुता कैं नाउँ इक वहै
मेरैं ।
सूर यह बात जौ सुनैं अवहीँ महर, कहैं मोहिं ये ढंग तेरे ॥८८॥
अर्थ - वृषभानु की स्त्री चिन्ता करती हैं । राधा प्रात:काल से गयी है । दिन
बीत गया, एक पहर रात भी बीत गयी, बेटी पता नही कहां है । हार के खोने के भय
से मैंने बेटी को बहुत डराया, उसी के डर से अब तक घर नही आयी । मैं कहां जाऊं,
पता नही कहाँ रूठकर चली गयी । सखियो से पूछती हैं कि वह कही मिली थी ? हार
बह जाय । वह अत्यधिक आकुल होकर गयी है । लड़की के नाम पर मेरे वही अकेली
(ही तो) है । सूरदास कहते हैं कि (राधा की मां कहती हैं) यह बात अभी महर
सुनेगे तो कहेगे कि तेरा यही ढंग है ॥८८॥
राधा डर डराति घर आई ।
देखति हीं कीरति महतारी, हरषि कुँवरि उर लाई ।
धीरज भयौ सुता-माता जिय, दूरि गयौ तनु-सोच ।
मेरी कौं मैं काहैं त्रासी, कहा कियौ यह पोच ।
लै री मैया हार मोतिसरी, जा कारन मोहिं त्रासी ।
सूर राधिका के गुन ऐसे, मिलि आई अविनासी ॥८६॥
अर्थ - राधा डरती-डरती घर आई । देखते ही कीर्ति मां ने खुशी होकर राधा
को हृदय से लगा लिया । बेटी और माता के (दोनो के) जी मे धीरज हुआ । मैंने
(अपनी) लडकी को क्यो डराया और इसने क्या बुरा कार्य किया ? (राधा कहती है)
मैया यह मोतियो का हार लो जिसके कारण तुमने मुझे डराया था । सूरदास कहते हैं
कि राधा के गुण ऐसे है (जो कि) अविनाशी (कृष्ण) से मिलकर चली आयी ॥८६॥
परम चतुर वृषभानु-दुलारी ।
यह मति रची कृष्न मिलिबे की, परम पुनीत महा री ।
उत्त सुख दियौ नंद-नंदन कौं, इतहिं हरष महतारी ।
हार इतौ उपकार करायौ, कबहुँ न उर तैं टारी ।
जे सिव-सनक-सनातन दुर्लभ, ते बस किये कुमारी ।
सूरदास-प्रभु-कृपा अगोचर, निगमनि हू तैं न्यारी ॥६०॥
राधाकृष्ण १८१
अर्थ—वृषभानु की दुलारी (राधा) परम चतुर है। कृष्ण से मिलने के लिए
उसने यह परम पवित्र युक्ति (चाल) रची। उधर कृष्ण को सुख दिया, इधर माता
को हर्ष दिया। हार ने इतना उपकार किया, इसलिए उसे कभी वक्षस्थल से नही
टालती। जो शिव, सनक तथा सनातन को दुर्लभ हैं उन्हे राधा ने वश में कर लिया
है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु की कृपा अगोचर है तथा वेदो से भी न्यारी है ॥६०॥
प्रीति के बस्य ये हैं मुरारी।
प्रीति के बस्य नटवर सुभेषहिँ धरचौ, प्रीति बस करज गिरिराज
धारी।
प्रीति के बस्य ब्रज भए माखन चोर, प्रीति बस्य दाँवरि बँधाई।
प्रीति के बस्य गोपी-रमन नाम प्रिय, प्रीति बस्य जमल तरु
मोच्छदाई।
प्रीति-बस नंद-बंधन बरुन-गृह गए, प्रीति के वस्य वन-धाम कामी।
प्रीति के बस्य प्रभु सूर त्रिभुवन विदित, प्रीति बस सदा
राधिका स्वामी ॥६१॥
अर्थ—कृष्ण प्रेम के वश मे हैं। उन्होंने प्रेम के वश मे होकर नटवर वेष धारण
किया, प्रेम के वश होकर गोवर्द्धन पर्वत को धारण किया है। प्रेम के वश मे होकर
ब्रज मे माखन चोर हुए। प्रेम के वश होकर अपने को रस्सी में बँधाया। प्रेम के वश
मे होने के कारण गोपी-रमण नाम प्रिय हो गया है। प्रेम के वश मे होकर यमलार्जुन
को मोक्ष दिया। प्रीति के वश में होकर नन्द के बन्धन तथा वरुण के घर गये। प्रीति
वश वन ओर घर मे कामी बने। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण प्रेम के वश में हैं, यह तीन
लोक मे प्रसिद्ध है। राधिका के स्वामी सदा प्रेम के वश मे हैं ॥६१॥
भ्रम
आजु सखी अरुनोदय मेरे, नैननि कौं धोख भयौ।
की हरि आजु पंथ गहिं गवने, स्याम जलद की उनयौ।
की वग पाँति भाँति, उर पर की, मुकुत-माल बहु मोल।
कीधौँ मोर मुदित ह्वै नाचत, की बरह-मुकुट की डोल।
की घनघोर गम्भीर प्रात उठि, की ग्वालनि की टेरनि।
की दामिनी कौंधति चहुँ दिसि, की सुभग पीत पट फेरनि।
की बनमाल लाल-उर राजति, की, सुरपति-धनु चारु।
सूरदास-प्रभु-रस भरि उमंगी, राधा कहति बिचारु ॥६२॥
अर्थ—सखी आज सूर्य निकलने के समय मेरी आंखो को धोखा हो गया। मेरे
इस रास्ते से कृष्ण गुजरे कि श्याम बादल झुक गये। बगूले की पंक्ति की तरह कि वक्ष
पर बहुमूल्य मोती की माला है। पता नही प्रसन्न होकर मोर नाचते हैं कि मोर मुकुट
डोल रहा है। न जाने प्रातः घनघोर बादल की गरज उठती है कि ग्वालो की पुकार
१८२ सूरसागर सार सटीक
है। चारों ओर विजली कौंधती है कि सुन्दर पीताम्बर फहर रहा है। हृदय पर सुन्दर
वनमाला विराज रही है कि सुन्दर इन्द्र धनुष हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के रस से
उमँगकर राधा विचार कर कहती है ॥६२॥
राधिका हृदय तै धोख टारौ।
नंद के लाल देखे प्रात-काल तैं, मेघ नहिं स्याम तनु-छवि बिचारी।
इंद्र-धनु नहीं बन दाम बहु सुमन के, नहीं बग पाँति बर मोति माला।
सिखी वह नहीं सिर मुकुट सीखंड पछ, तड़ित नहिं पीत पट-छवि
रसाला।
मंद गरजन नहीं चरन नूपुर-सबद, भोरही आजु हरि गबन कीन्हौ।
सूर-प्रभु भामिनी भवन करि गवन, मन रवन दुख के दवन जानि
लीन्हौ ॥६३॥
अर्थ—राधा हृदय से धोखा मिटा दो। तुमने प्रातःकाल कृष्ण को देखा था,
मेघ को नही। कृष्ण के शरीर की शोभा के विषय मे विचार तो करो। इन्द्र का
धनुष नही है बहुत से फूलो वाली वनमाला है। बगुलों की पंक्ति नही है बल्कि श्रेष्ठ
मोती की माला है। वह मोर नही बल्कि सिर पर मोर के पंखों का मुकुट है। बिजली
नही पीताम्बर की सुन्दर छवि है। मन्द गरजन नही चरण के नूपुरो का शब्द है।
आज प्रातः ही कृष्ण ने गमन किया। सूरदास कहते है कि भामिनी अपने घर जाओ,
तुमने मन को आकर्षित करने वाले, दुःख को दमन करने वाले कृष्ण को जान लिया
है ॥६३॥
एक निष्ठा
धन्य धन्य वृषभानु-कुमारी।
धनि माता, धनि पिता तिहारे, तोसी जाई बारी।
धन्य दिवस, धनि निसा तबहिं की, धन्य घरी, धनि जाम।
धन्य कान्ह तेरैं बस जे हैं, धनि कीन्हे बस स्याम।
धनि मति, धनि रति, धनि तेरी हित, धन्य भक्ति, धनि भाउ।
सूर स्याम पति धन्य नारि तू, धनि-धनि एक सुभाउ ॥६४॥
अर्थ—वृषभानु की बेटी (राधा) धन्य-धन्य है। तुम्हारे माता और पिता धन्य
है जिन्होने तुम्हारी जैसी बेटी पैदा की। वह दिन धन्य है, तब की रात धन्य है, घड़ी
पहर (सब) धन्य है (जब तेरा जन्म हुआ)। कृष्ण धन्य हैं जो तुम्हारे वश मे हैं। तुम
धन्य हो जिसने कि कृष्ण को वश मे किया है। तेरी बुद्धि, रति, हित, भक्ति भाव सब
धन्य हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण पति तू नारी (दोनो) धन्य हो। एक स्वभाव
वाले (तुम दोनों) धन्य हो ॥६४॥
तोहिं स्याम हम कहाँ दिखावैं।
तुमतैं न्यारे रहत कहूँ न वै, नैकुं नहीं बिसरावैं।
राधाकृष्ण १८३
एक जीव देही द्वै राची, यह कहि कहि जु सुनावैं ।
उनकी पटतर तुमकौं दीजैं, तुम पटतर वै पावैं ।
अमृत कहा अमृत-गुन प्रगटै, सो हम कहा बतावैं ।
सूरदास गूंगे कौ गुर ज्यौं, बूझति कहा बुझावैं ॥६५॥
अर्थ—हम तुमको कृष्ण कहां दिखावें । वे कहीं भी तुमसे अलग नही रहते और
(तुम्हें) तनिक भी नही भुलाते । एक जीव तथा दो शरीर की रचना की है, यह कह-
कह कर सुनाते है । उनकी उपमा तुमको दी जाय तथा तुम्हारी उपमा उनको प्राप्त
हो । अमृत कैसे अमृत गुण प्रकट करता है, उसे हम कैसे बताये । सूरदास कहते हैं कि
गूंगे के गुड़ के समान पूछने पर कैसे समझाया जाय ॥६५॥
सुनि राधा यह कहा बिचारै ।
वै तेरैं तू उनकैं रंग, अपनो मुख क्यौं न निहारै ।
जो देखौ तौ छांह आपनी, स्याम-ह्रदै ह्याँ छाया ।
ऐसी दशा नंद-नंदन की, तुम दोउ निर्मल काया ।
नीलांबर स्यामल तनु की छबि, तुम छवि पीत सुबास ।
घन-भीतर दामिनी प्रकाशित, दामिनि घन-चहुँ पास ।
सुन री सखी बिलख कहौं तोसौँ, चाहति हरि कौ रूप ।
सूर सुनहु तुम दोउ सम जोरी, एक स्वरूप अनूप ॥६६॥
अर्थ —सुनो राधा यह विचार क्यों करती हो । वह तुम्हारे रंग मे तुम उनके
रंग में (रंग गयी हो), अपने मुख को क्यों नही निहारती हो । जो देखो तो अपनी
छाया (देखो), कृष्ण का हृदय यहाँ छाया है। ऐसी दशा श्रीकृष्ण की है। तुम दोनों
निर्मल शरीर (वाले) हो । नीले आकाश के समान श्यामल कृष्ण का शरीर है और
तुम्हारी पीली सुगन्धित छवि है । बादल के भीतर (जैसे) बिजली प्रकाशित हो या
बिजली वादल के चारों तरफ ( छायी ) हो । सुनो री सखी ताड़ करके तुमसे बात
कहती हूँ (तुम) कृष्ण के रूप को चाहती हो । सूरदास कहते है कि (सखी कहती है)
तुम दोनों समान जोड़ी तथा एक अनुपम स्वरूप वाले हो ॥६६॥
पिय तेरैं बस यौं री माई ।
ज्यौँ संगहिं संग छाँह देह-वस, प्रेम कह्यौ नहिँ जाई ।
ज्यौँ चकोर बस सरद चंद्र कैं, चक्रवात बस-भान ।
जैसेँ मधुकर कोमल कोस-बस, त्यौँ बस स्याम सुजान ।
ज्यौँ चातक बस स्वाँति बूँद कैँ, तन कैँ बस ज्यौँ जीय ।
सूरदास-प्रभु अति बस तेरैँ, समुझ देखि धौँ हीय ॥६७॥
अर्थ—सखी ! प्रिय कृष्ण यों तुम्हारे वश मे हैं जैसे साथ-ही-साथ रहने वाली
छाया शरीर के वश में रहती है । ( तुम दोनों का ) प्रेम कहा नही जा सकता ।
(अकथनीय है) । जैसे चकोर शरद ऋतु के चन्द्रमा के वश मे रहता है, चक्रवाक सूर्य
के वश में है और भ्रमर कमल के फूलों (बंधी हुई कली) के वश में रहता है वैसे ही
कृष्ण (तुम्हारे) वश मे हैं। जैसे चातक स्वांती नक्षत्र के (बादलो के) बूंद के वश मे
रहता है तथा शरीर के वश मे प्राण है। सूरदास कहते हैं कि (वैसे) कृष्ण तुम्हारे
अत्यधिक वश मे है, निश्चय ही यह हृदय को देखकर समझ लो ॥६७॥
लघुमान लीला
मैँ अपनैँ जिय गर्व कियौ।
वै अंतरजामी सब जानत, देखत ही उन चरचि लियौ।
कासौँ कहाँ मिलावै को अब, नैँकु न धीरज धरत जियौ।
वै तौ निठुर भये या बुधि सौँ, अहंकार फल यहै दियौ।
तब आपुन कौँ निठुर कराबति, प्रीति सुमिरि भरि लेति हियौ।
सूर स्याम प्रभु वै बहु नायक, मो सौँ उनकैँ कोटि तियौ ॥६८॥
अर्थ—मैने अपने मन मे गर्व किया। वे अन्तर्यामी सब जानते हैं, देखते ही
उन्होंने अनुमान कर लिया। किससे कहूँ अब कौन मिलाये, हृदय तनिक भी धैर्य नही
धरता। वे तो इस बुद्धि से निष्ठुर हो गये और अहंकार का यही फल दिया। तब
अपने को निष्ठुर कहती हूँ, जब उनका प्रेम से स्मरण करके हृदय भर आता है।
सूरदास कहते है (राधा कहती है) वे बहुत सी स्त्रियो के नायक हैं हमारे समान
उनकी हजारो स्त्रियां हैं ॥६८॥
महा बिरह-वन माँझ परी।
चकित भई ज्यौँ चित्र-पूतरी, हरि मारग बिसरी।
सँग बटपार गर्व जब देख्यौ, साथी छोड़ि पराने।
स्याम-सहर-अँग-अंग-माधुरी, तहँ वै जाइ लुकाने।
यह बन माँझ अकेली व्याकुल, सम्पति गर्व छँड़ायौ।
सूर स्याम-सुधि टरति न उर तैँ, यह मनु जीव बचायौ ॥६६॥
अर्थ—(मैं) महान विरह वन के बीच पड गयी। चित्र की पुतली के समान (मैं)
चकित हो गयी और कृष्ण रूपी मार्ग भूल गयी। संग मे वटपार रूपी गर्व को देखकर
साथी छोडकर भाग गये। श्याम रूपी शहर की अग-अंग की मधुरिमा मे वे जाकर छिप
गये। इस वन मे अकेली व्याकुल हूँ। गर्व ने सम्पत्ति को छीन लिया। सूरदास कहते है
कि (राधा कहती है) हृदय से स्मृति टलती नही, मानो इसी ने जीव बचा दिया ॥६६॥
राधा-भवन सखी मिलि आईँ।
अति ब्याकुल सुधि-बुधि कछु नाहीँ, देह दसा बिसराईँ।
बाँह गही तिहिँ बूझन लागीँ, कहा भयौ री माई।
ऐसी बिबस भई तू काहैँ, कहौ न हमहिँ सुनाई।
कालिहिँ और बरन तोहिँ देखी, आजु गई मुरझाई।
सूर स्याम देखे की बहुरौ, उनहिँ ठगौरी लायौ ॥१००॥
राधाकृष्ण १८५
अर्थ-राधा के घर सखियां मिलने आईं । (राधा) अत्यन्त व्याकुल है तथा
उसके होश-हवास कुछ नहीं है, (यहाँ तक कि) अपने शरीर की दशा (भी) भूल गयी
है । (सखियां) बांह पकड़ कर पूछने लगी—सखी तुम्हें क्या हुआ ? ऐसी विवश तुम
क्यों हो गयी हो ? मुझे सुनाकर कहो ! कल तेरा और ही रंग देखा था, आज (क्यो)
मुरझा गयी हो ? सूरदास कहते हैं कि (सखियां कहती है) क्या कृष्ण को देखा है, कि
फिर उन्होने जादू कर दिया ॥१००॥
अब मैं तोसों कहा दुराऊँ ।
अपनी कथा, स्याम की करनी, तो आगैं कहि प्रगट सुनाऊँ ।
मैं बैठी ही भवन आपनैं, आपुन द्वार दियौ दरसाऊँ ।
जानि लई मेरे जिय की उन, गर्व-प्रहारन उनकौँ नाऊँ ।
तबहीं तैं व्याकुल भई डोलति, चित्त न रहै कितनौ समुझाऊँ ।
सुनहु सूर ग्रह वन भयो मोकौँ, अब कैसे हरि दरसन पाऊँ ।.१०१॥
अर्थ - अब मैं तुमसे क्या छिपाऊँ । अपनी कथा और कृष्ण की करतूत तुम्हारे
आगे प्रत्यक्ष सुनाती हूँ। मैं अपने घर बैठी थी, वे स्वयं द्वार पर दिखाई दिये। उन्होने
मेरे मन की बात जान ली । 'गर्व के प्रहारक' उनका नाम (ही) है। तभी से व्याकुल
होकर फिरती हूँ, कितना ही मन को समझाती हूँ वह नही मानता (चैन नही मिलता) ।
सूरदास कहते हैं कि (राधा सखियो से कहती है) घर मेरे लिए वन हो गया है अब
कैसे कृष्ण का दर्शन प्राप्त करूँ ॥१०१॥
हमरी सुरति बिसारी बनवारी, हम सरबस दै हारी ।
पै न भए अपने सनेह बस, सपनेहूँ गिरधारी ।
वै मोहन मधुकर समान सखि, अनबन बेली-चारी ।
व्याकुल विरह व्यापी दिन-दिन हम, नीर जु नैननि ढारी ।
हम तन मन दै हाथ बिकानी, वै अति निठुर मुरारी ।
सूर स्याम बहु रवनि रमन, हम इक ब्रत, मदन-प्रजारी ॥१०२॥
अर्थ-हमारी स्मृति कृष्ण ने भुला दी । मैं सर्वस्व देकर हार गयी । तब भी
कृष्ण स्वप्न में भी अपने स्नेह के वश नहीं हुए । सखी वह मोहन भ्रमर के समान हैं
जो असंख्य लताओं पर विचरण करने वाले हैं। व्याकुल हो मैं दिन-प्रति-दिन विरह
से व्याप्त हो रही हूँ और आंखो से आँसू ढुलकाती हूँ। मैं तन-मन (उनके) हाथ देकर
बिक गयी । वे कृष्ण अत्यधिक निष्ठुर हैं। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि वह
बहुत-सी स्त्रियो के साथ रमण करने वाले हैं, मैं एकव्रता काम की अग्नि से जली हुई
हूँ ॥१०२॥
मैं अपनी सी बहुत करी री ।
मोसों कहा कहति तू माई, मन कैं सँग मैं बहुत लरी री ।
राखौं हटकि, उतहिं कौ धावत, बाकी ऐसियै परनि परी री ।
मोसौँ वैर करै रति उनसौँ, मोकौँ राख्यो द्वार खरी री ।
अजहूँ मान करौं, मन पाऊँ, यह कहि इत-उत चितै डरी री।
सुनहु सूर पाँचनि मत एकै, मैं री मोही रही परी री ॥१०३॥
अर्थ—मैंने अपना सा बहुत (कुछ) किया। सखी मुझसे तू क्या कहती है, मन
के साथ मैंने बहुत लड़ाई लड़ी। हठ करके उसे रोकती हूँ, वह उधर ही दौड़ता है फिर
उसकी ऐसी आदत पड़ गयी है। मुझसे शत्रुता करता है उनसे प्रेम करता है, मुझे द्वार
पर खड़ी रखता है। अब भी मान करूँ यदि मन को पा जाऊँ। यह कहकर इधर-
उधर देखकर भयभीत हुई। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) (सखियों) सुनो ये पाँचों
इन्द्रियाँ एक ही विचार रखती हैं। मैं ही मोह मे पड़ कर खड़ी रह गयी अथवा मोह
से आविर्भूत होकर पड़ी रहती हूँ ॥१०३॥
भूलि नहीं अब मान करौँ री।
जातैं होइ अकाज आपनौ, कहैं वृथा मरौँ री।
ऐसे तन मैं गर्व न राखौँ, चिंतामनि बिसरौँ री।
ऐसी बात कहै जो कोऊ, ताकै संग लरौँ री।
आरजपंथ चलैं कह सरिहै, स्यामहिं संग फिरौँ री।
सूर स्याम जउ आपु, स्वारथी, दरसन नैन भरौँ री ॥१०४॥
अर्थ—अब भूल कर भी मान नहीं करूँगी। जिससे अपना अनिष्ट होता है,
क्यो व्यर्थ मरूँ। ऐसे शरीर मे गर्व नही रखूँगी, (न तो) चिंतामणि को भूलूँगी। ऐसी
बात जो कोई करेगा उसके साथ लड़ूँगी। आर्य पथ (श्रेष्ठ मार्ग) पर चलने से क्या
कल्याण होगा ? (इससे) कृष्ण के साथ घूमूँगी। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि
कृष्ण भले ही स्वयं स्वार्थी हों किन्तु उनका दर्शन करके नेत्रो को (रस से) भर
लूंगी ॥१०४॥
माई मेरौ मन पिय सौं यौँ लाग्यौ, ज्यौँ संग लागी छाँहि।
मेरौ मन पिय जीव वसत हैं, पिय जिय मो मैं नाहि।
ज्यौँ चकोर चंदा कौं निरखत, इत-उत दृष्टि न जाइ।
सूर स्याम बिनु छिन-छिन जुग सम, क्योँ करि रैन विहाइ ॥१०५॥
अर्थ—सखी, मेरा मन प्रिय (कृष्ण) से ऐसा लगा है जैसे साथ में छाया लगी
रहती है। मेरा मन प्रिय के प्राण में बसता है, लेकिन प्रियतम का जीव मुझमे नही
(बसता है)। जैसे चकोर चन्द्रमा को देखता है, उसकी इधर-उधर दृष्टि नही जाती।
सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कृष्ण के बिना क्षण-क्षण युग के समान लगता
है फिर (वियोग) की रात कैसे बीते ॥१०५॥
अद्भुत एक अनूपम बाग।
जुगल कमल पर गज बर क्रीड़त, तापर सिंह करत अनुराग।
हरि पर सरवर, सर पर गिरिवर, गिर पर फूले कंज-पराग।
रुचिर कपोत बसत ता ऊपर, ता ऊपर अमृत फल लाग।
राधाकृष्ण १८७
फल पर पुहुप, पुहुप पर पल्लव, ता पर सुक, पिक, मृद मद काग ।
खंजन, धनुष, चंद्रमा ऊपर, ता ऊपर एक मनिधर नाग ।
अंग-अंग प्रति और-और छवि, उपमा ताकौँ करत न त्याग ।
सूरदास प्रभु पियौ सुधा-रस, मानौ अधरनिं के बड़ भाग ॥१७६॥
अर्थ - एक अद्भुत तथा अनुपम बाग है । दो कमलो (चरणों) के ऊपर श्रेष्ठ-
हाथी (जांघ) खेलते हैं। उस पर सिंह (कमर) अनुराग करता है। सिंह पर सरोवर
(नाभि प्रदेश) है, सरोवर के ऊपर पहाड (पयोधर) हैं, उस पर पराग युक्त कमल
(कंचुकी के बेल-बूटे) फूले हैं। उसके ऊपर रुचिकर कबूतर (गला) बसता है, उसमे
अमृत का फल (ठुड्डी) लगा है। फल के ऊपर फूल (तिल) है, फूल के ऊपर पल्लव
(अधर) हैं। उस पर तोता (नाक), कोयल (वाणी), मृग (कस्तूरी वेदी), कौआ
(वालो के पट्टे) (शोभित) है। खंजन (नेत्र), धनुष (भौंह), चन्द्रमा (मस्तक) उसके
ऊपर एक मणिधर सर्प (मणि जटित आभूषण सहित वेणी) है। प्रति अंग में अधिक-
से-अधिक शोभा है, उपमा उनका त्याग नही करती । सूरदास कहते है कि हे कृष्ण,
अमृत रस पान करो, मानो (तुम्हारे) ओठो का बड़ा सौभाग्य है ॥१७६॥
भुज भरि लई हिरदय लाइ ।
बिरह व्याकुल देखि बाला, नैन दोउ भरि आइ ।
रैनि बासर बीच मैँ, दोऊ गए मुरझाइ ।
मनौ वृच्छ तमाल बेली, कनक सुधा सिंचाइ ।
हरष डहडह मुसुक फूलै, प्रेम फलनि लगाइ ।
काम मुरझनि बेली तरु की, तुरत ही बिसराइ ।
देखि ललिता मिलन वह, आनंद उर न समाइ ।
सूर के प्रभु स्याम स्यामा, त्रिबिध ताप नसाइ ॥१७७॥
अर्थ-भुजा से भरकर हृदय से लगा लिया। विरह से व्याकुल स्त्री को देख-
कर दोनो नेत्र (आंसू से) भर आये। रात-दिन के बीच मे ही दोनो मुरझा गये।
मानों तमाल के वृक्ष की स्वर्ण लता अमृत से सिंचकर, हर्ष से हरी भरी होकर, मुस्करा
कर फूल गयी और उसमें प्रेम के फल लग गये। काम-पीड़ा से मुरझाई हुई तरु-लता
ने तुरन्त अपनी आकुलता (मुरझनि) को भुला दिया। उस मिलन को देखकर ललिता
के हृदय मे आनन्द नही समाता। सूरदास कहते हैं कृष्ण ने प्रिया के विविध ताप को
नष्ट कर दिया ॥१७७॥
ललित प्रेम-बिबस भई भारी ।
वह चितवनि, वह मिलनि परस्पर, अति सोभा वर नारी ।
इकटक अंग-अंग अवलोकति, उत बस भए बिहारी ।
वह आतुर छबि लेत देत वै, इक तैँ इक अधिकारी ।
१८८ सूरसागर सार सटीक
ललिता संग सखिनि सोँ भाषति, देखी छवि पिय-प्यारी ।
सुनहु सूर ज्यौँ होम अगिनि घृत, ताहूँ तैं यह न्यारी ॥१०८॥
अर्थ - ललिता अत्यधिक प्रेम से विवश हो गयी । वह दृष्टिपात, वह परस्पर
का मिलन, (वह) श्रेष्ठ नारी की अत्यधिक शोभा (सब सराहनीय है) । एक निगाह
से (कृष्ण के) अग-अंग को देखती है, उधर कृष्ण वश मे हो गये हैं । वे आतुर होकर
शोभा का आदान-प्रदान करते है। वे एक-से-एक बढकर हैं । ललिता सखियो के साथ
बातचीत करती है कि प्रिय और प्यारी की शोभा देखो । सूरदास कहते हैं कि
(ललिता कहती है) ज्यो होम की अग्नि मे घी हो, उससे भी यह निराली है ॥१०८॥
राधहिं मिलेहुँ प्रतीति न आवति ।
जदपि नाथ विधु वदन विलोकत, दरसन को सुख पावति ।
भरि-भरि लोचन रूप-परम-निधि, उरमैं आनि दुरावति ।
विरह-विकल मति दृष्टि दुहूँ दिसि, सँचि सरघा ज्यों धावति ।
चितवत चकित रहत चित अंतर, नैन निमेष न लावति ।
सपनौ आहि कि सत्य ईस यह, बुद्धि वितर्क बनावति ।
कबहूँक करति विचार कौन हौं, को हरि कैं हिय भावति ।
सूर प्रेम की बात अटपटी, मन तरंग उपजावति ॥१०६॥
अर्थ-राधा को (कृष्ण से) मिलने पर भी विश्वास नही आता है। यद्यपि
वह कृष्ण के चन्द्र वदन को देखकर दर्शन का सुख पाती है। आंखो से रूप की परम
निधि भरकर हृदय मे ले आकर छिपाती है। विरह से व्याकुल बुद्धि (वाली राधा)
की दृष्टि दोनों दिशाओ मे है, जैसे मधु इकट्ठा करके मधुमक्खी दौड़ती है। चकित
दृष्टि से चित्त के अन्तर मे देखती रहती है क्षण भर भी आंख नही लगाती । बुद्धि मे
तर्क-वितर्क करती है कि हे ईश्वर यह सत्य है या स्वप्न है। कभी विचार करती है
कि मैं कौन हूँ, और कौन कृष्ण के हृदय को भाती है। सूरदास कहते हैं कि प्रेम की
अटपटी बात मन मे तरंग उत्पन्न करती है ॥१०६॥
स्याम भए. राधा वस ऐसेँ ।
चातक स्वाँति, चकोर चंद ज्यौँ, चक्रवाक रवि जैसेँ ।
नाद कुरंग, मीन जल की गति, ज्यौँ तनु कैं वस छाया ।
इकटक नैन अंग-छवि मोहेँ, थकित भए पति जाया ।
उठैँ उठत बैठैँ बैठत हैं, चलैँ चलत सुधि नाहीँ ।
सूरदास बड़भागिनि राधा, समुझि मनहिं मुसुकाही ॥११०॥
अर्थ-कृष्ण ऐसे राधा के वश मे हो गये है जैसे चातक स्वांति (के बूंद) के
चकोर चन्द्रमा के, चक्रवाक सूर्य के वश मे रहता है । जैसे शब्द के वश में मृग, जल
की गति के वश मे मछली और शरीर के वश मे छाया रहती है। एकटक नेत्र अंग
की छवि पर मोहित हो गये हैं, वे पति (के नेत्र) पत्नी (की छवि) देखते-देखते थकित
हो गये । (राधा के) उठने पर उठते हैं, बैठने पर बैठते हैं, चलने पर चलते हैं, (उन्हें)
कुछ स्मरण नहीं रहता । सूरदास कहते हैं कि राधा बड़ी भाग्यवाली है, (यह) समझ
कर मन ही (मन) मुस्कराती है ॥११०॥
निरखि पिय-रूप तिय चकित भारी ।
किधौं वै पुरुष मैं नारि, की वै नारि मैं ही हौं तन सुधि
बिसारी ।
आपु तन चितै सिर मुकुट कुंडल स्त्रवन, अधर मुरली,
मालवन बिराजै ।
उतहिं पिय-रूप सिर माँग बेनी सुभग, भाल बेंदी-बिंदु
महा छाजै ।
नागरी हठ तजौ, कृपा मरि मोहिं भजौ; परी कह चूक सो
कहौ प्यारी ।
सूर नागरी प्रभु-बिरह-रस मगन भई, देखि छवि हँसत
गिरिराजधारी ॥१११॥
अर्थ-प्रिय के रूप को देखकर स्त्री (राधा) चकित हो गयी । (वह सोचती
है) वह पुरुष हैं, मैं नारी हूँ कि वे नारी हैं, मैं (पुरुष) हूँ; मैं अपने शरीर की स्मृति
भूल चुकी हूँ । अपने शरीर को देखकर उसे लगता है, उसके सिर पर मुकुट, कानो
में कुंडल, ओठ से मुरली, (उर पर) वनमाल विराजती है । उधर प्रिय इस रूप मे
दिखाई देते हैं—सिर पर मांग, सुन्दर वेणी, मस्तक पर बेंदी का बिन्दु बहुत सुशो-
भित है । (राधा कहती है) नागरी हठ छोड़ो, कृपा करके मुझको भजो, कहो प्यारी
किस चूक में पड गयी हो । सूरदास कहते हैं कि (राधा) प्रभु के विरह रस मे मग्न
हो गयी, (इस) छवि को देखकर कृष्ण हँसते है ॥१११॥
कृष्ण गोपिका
नंद-नंदन तिय-छवि तनु काछे ।
मनु गोरी साँवरी नारि दोउ, जाति सहज मै आछे ।
स्याम अंग कुसुमी नई सारी, फल गुंजा की भाँति ।
इत नागरि नीलांबर पहिरे, जनु दामिनी घन काँति ।
आतुर चले जात बन धामहिं, मन अति हरष बढ़ाए ।
सूर स्याम वा छवि कौं नागरि, निरखति नैन चुराए ॥११२॥
अर्थ-कृष्ण अपने शरीर पर स्त्री का रूप संवारे हैं । मानो गोरी और सांवली
दोनो स्त्रियां अच्छी तरह से सहजता से चली जा रही है । गुंजा फल की तरह कृष्ण
के शरीर पर कुसुमी रंग की साड़ी है । इधर राधा नीलाम्बर पहने है, जैसे बादलो
में बिजली की काँति हो । मन मे अत्यन्त हर्ष बढ़ाकर, आतुर होकर वन के कुंज-गृह
१८० सूरसागर सार सटीक
में चले जा रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि उस छवि को नागरि (राधा) नैन चुराकर
देखती जाती है ॥११२॥
स्याम स्यामा कुंज वन आवत ।
भुज भुज कण्ठ परस्पर दीन्हें, यह छवि उनहीं पावत ।
इततैं चन्द्रावली जाति ब्रज, उततैं ये दोउ आए ।
दूरिहिं तैं चितवति उनहीं तन, इक टक नैन लगाए ।
एक राधिका दूसरि को है, याकौं नहिं पहिचानौं ।
ब्रज-वृषभानु-पुरा-जुवतिनि कौं, इक-इक करि मैं जानौं ।
यह आई कहूँ और गाँव तैं, छवि साँवरी सलोनी ।
सूर आजु यह नई बतानी, एकौ अँग न विलोनी ॥११३॥
अर्थ-राधा ओर कृष्ण कुंज वन मे आते हैं। परस्पर भुजा एक दूसरे के कंठ
से लगाये हुए हैं। यह शोभा वे ही पाते हैं (अन्यत्र उपमा नही है)। इधर से चन्द्रावली
ब्रज को जा रही थी, उधर से ये दोनो आ गये। दूर ही से उन्ही की ओर एकटक
लगाकर नैनों से निहारती है। एक तो राधिका है दूसरी कौन है, इसे पहचानती नही
हूँ। (क्योकि) मैं तो ब्रज और वृषभानु नगर की एक-एक युवती को जानती हूँ। यह
सांवरी सलोनी छवि वाली किसी ओर गांव से आई है (क्या) ? सूरदास कहते हैं
(चन्द्रावली कहती है) यह नई (स्त्री) दिखलाई दी जिसका एक भी अंग लावण्यविहीन
नही है ॥११३॥
यह वृषभानु-सुता वह को है।
याकी सरि जुवती कोउ नाहीं, यह त्रिभुवन-मन मोहै ।
अति आतुर देखन कौं आवति, निकट जाइ पहिचानौं ।
ब्रज मैं रहति किधौं कहूँ औरै, बूझे तैं तब जानौं ।
यह मोहिनी कहाँ तैं आईं, परम सलोनी नारी ।
सूर स्याम देखत मुसुक्यानी, करी चतुरई भारी ॥११४॥
अर्थ - यह वृषभानु की बेटी (राधा) है, परन्तु वह कौन है। इसके समान
और कोई स्त्री नही है, यह तीनो लोक के मन को मोहने वाली है (त्रिभुवन मोहनी
है)। अत्यन्त आतुर होकर इसे देखने के लिए आ रही हूँ, निकट जाकर पहचानूं।
ब्रज में रहती है कि कही और पूछने पर जानूंगी। यह परम सलोनी मोहनी स्त्री
कहां से आ गई। सूरदास कहते हैं कि (राधा) कृष्ण को देखकर मुसकरायी ओर
(कहा) कि भारी चतुरता की है ॥११४॥
कहि राधा ये को है री।
अति सुंदरी साँवरी सलोनी, त्रिभुवन-जन-मन-मोहै री ।
ओर नारि इनकी सरि नाहीं, कहीं न हम-तन जोहै री ।
काकी सुता, वधू है काकी, जुवती धौं है री ।
राधाकृष्ण १८१
जैसी तुम तैसी है येऊ, भली बनी तुमसी री ।
सुनहु सूर अति चतुर राधिका, येइ चतुरनि की गौ है री ॥११५॥
अर्थ—कहो राधा यह कौन है। (यह) अत्यधिक सुन्दर, सांवली, सलोनी तीनों
लोक के मन को मोहती है और कोई स्त्री इसके समान नही है। इससे कह दो हमारी
ओर न देखे, (यह) किसकी पुत्री है, किसी की स्त्री है अथवा यह नवयुवती है। जैसी
तुम हो वैसे ही यह भी है। तुम्हारे समान अच्छी बनी हुई है। सूरदास कहते हैं कि
(सखी कहती है) राधिका अत्यधिक चतुर है, यही चतुरो की चाल है ॥११५॥
मथुरा तैं ये आई है।
कछु सम्बन्ध हमारौ इनसौँ, तातैं इनहिँ बुलाई है।
ललिता सग गई दधि वेँचन, उनहीँ इनहिँ चिन्हाई है।
उहै सनेह जानि री सजनी, आजु मिलन हम आई है।
तब ही की पहिचानि हमारी, ऐसी सहज सुभाई है।
सूरदास मोहिँ आवत देखी, आपु संग उठि धाई है ॥११६॥
अर्थ—(यह) मथुरा से आई है। हमारा इसका कुछ सम्बन्ध है, इसी से इसे
बुलाया है। ललिता के साथ दही बेचने गयी थी, उसने ही इसे पहचनवा दिया। उसी
स्नेह को जानकर सखी; यह हमसे मिलने आई है। तभी की हमारी इसकी पहचान
है। यह ऐसे ही सहज स्वभाव वाली है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) मुझे
देखकर स्वयं उठकर साथ दौड़ी चली आई ॥११६॥
इनकोँ ब्रजहीँ क्यौँ न बुलावहु ।
की वृषभानु पुरा, की गोकुल, निकटहिँ आनि बसावहु ।
येऊ नवल नवल तुमहूँ हौ, मोहन कौँ दोउ भावहु ।
मोकौँ देखि कियौ अति घूँघट, काहैं न लाज छुड़ावहु ।
यह अचरज देख्यौ नहिँ कबहुँ, जुवतिहिँ जुहुति दुरावहू ।
सूर सखी राधा सौँ पुनि पुनि, कहति जु हमहिँ मिलावहु ॥११७॥
अर्थ—इनको ब्रज मे क्यों नही बुला लेती हो। वृषभानुपूर या गोकुल (कही)
निकट लाकर बसा लो। यह भी नवल है और तुम भी, दोनो मोहन (कृष्ण) को अच्छी
लगोगी। मुझे देखकर इसने अत्यधिक घूंघट कर लिया, इसकी लाज क्यो नही दूर करती
हो। यह आश्चर्य कभी नही देखा कि युवती ही युवती को छिपाये। सूरदास कहते हैं
कि सखी राधा से बार-बार कहती है कि हमे (इससे) मिलाओ ॥११७॥
मथुरा मैँ वस वास तुम्हारौ ?
राधा तैं उपकार भयौ यह, दुर्लभ दरसन भयौ तुम्हारौ ।
वार-वार कर गहि निरखति, घूँघट-ओट करौ किन न्यारौ ।
कवहूँक पर परसति कपोल छुइ, चुटकि लेति ह्या हमहिँ निहारी ।
१८६ सूरसागर सार सटीक
कछु मैं हूँ पहिचानति तुमकौं, तुमहिं मिलाऊँ नंद-दुलारी।
काहे कौं तुम सकुचति हौ जू, कहौ काह है नाम तुम्हारी।
ऐसो सखी मिली तोहिं राधा, तौ हमकौं काहै न बिसारी।
सूरदास दम्पति मन जान्यौ, यातैं कैसें होत उबारी ॥११८॥
अर्थ- बस मथुरा मे ही तुम्हारा निवास है। राधा के द्वारा यह उपकार हुआ
कि तुम्हारा दुर्लभ दर्शन हो गया। वार-वार हाथ पकड कर देखती है (ओर कहती
है) घूंघट की ओट को दूर क्यो नही करती हों। कभी कपोल (गाल) छूकर हाथ छूती
है फिर चुटकी लेती है कि मेरी तरफ देखो। मैं तुमको कुछ पहचान रही हूँ, तुम्हे
कृष्ण से मिला दूँगी। तुम क्यो संकोच करती हो, कहो तुम्हारा क्या नाम है ? राधा
तुम ऐसी सखी पाकर हम जैसी सखियो को क्यो न भूल जाओ। सूरदास कहते है कि
कृष्ण और राधा दोनों मन मे जान गये कि अब इससे कैसे उवार हो ॥११८॥
ऐसी कुंवरि कहाँ तुम पाई।
राधा हूँ तें नख-सिख सुंदरि, अब लौं कहाँ दुराई।
काकी नारि, कौन की बेटी, कौन गाउँ तैं आई।
देखी सुनी न ब्रज, वृन्दावन, सुधि-बुधि हरति पराई।
धन्य सुहाग भाग याकौ, यह जुवतिनि की मनभाई।
सूरदास-प्रभु हरषि मिले हँसि, लै उर कठ लगाई ॥११९॥
अर्थ-अर्थतुम ऐसी कुमारी (कुंवरि) कहाँ पा गई। राधा से भी इसके नख-
शिख सुन्दर है, (ऐसे अंगो को) अब तक कहाँ छिपाये थी। किसकी स्त्री है, किसकी
बेटी है और किस गाँव से आई है। ब्रज और वृन्दावन मे (तुम्हे) न तो देखा है न
सुना है। (तुम) दूसरे की स्मृति और बुद्धि दोनों हरती हो। इसका सुहाग और भाग्य
दोनो धन्य है जो कि इन युवतियो के मन को भा गयी। सूरदास कहते है कि कृष्ण
हँसकर गले से लगाकर मिल गये ॥११९॥
नँद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, हरषि चंद्रावलि कंठ लाई।
बाम भुज रवनि, दच्छिन भुज सखी पर, चले बन धाम सुख
कहि न जाई।
मनौ बिबि दामिनि, बीच नव घन सुभग, देखि छवि काम रति-
सहित लाजै।
किधौं कंचन-लता, बीच सुतमाल तरु, भामिनिनि बीच
गिरिधर विराजै।
गए गृहकुंज, अलिगुंज, सुमननि पुंज, देखि आनंद भरे सूर स्वामी।
राधिका-रवन, जुवती-रवन, मन-रँवन निरखि छवि होत मन-
काम कामी ॥१२०॥
राधाकृष्ण . १८३
अर्थ - कृष्ण नागरि के मुख को देखकर हंसे और हर्षित होकर उन्होंने चंद्रावली
को गले से लगा लिया । बायी भुजा राधा पर और दाहिनी सखी पर रखकर वन की
ओर चले । (यह) शोभा कही नही जा सकती (अकथनीय है) । कृष्ण मानो दो
बिजलियों के बीच सुन्दर नवीन बादल हों । इस छवि को देखकर रति सहित काम
लज्जित होते हैं । मानो कंचन की लताओं के बीच सुन्दर तमाल का'वृक्ष हो, ऐसे ही
(दोनो) स्त्रियों के बीच कृष्ण शोभित हैं । वे कुंज-गृह मे गये और भ्रमर के गुंजार
तथा पुष्पों के पुंज को देखकर आनन्द से भर गये । सूरदास कहते हैं कि राधिका-
रमण, युवती-रमण, मनरमण (कृष्ण) की छवि को देखकर काम के मन में भी
कामेच्छा उत्पन्न हो गयी ॥१२०॥
मान लीला
मोहिं छुवौ जनि दूर रहौ जू ।
जाकौं हृदय लगाइ लयौ है, ताकीँ बाँह गहौ जू ।
तुम सर्वज्ञ और सब मूरख, सो रानी अरु दासी ।
मैंँ देखत हिरदय वह बैठी, हम तुमकौँ भइ हाँसी ।
बाँह गहत कछु सरम न आवति, सुख पावति मन माहींँ ।
सुनहु सूर मो तन यह इकटक, चितवति, डरपति नाहीँ ॥१२१॥
अर्थ - मुझे छुओ मत दूर रहो । जिसको हृदय से लगाया हो उसी की बांह
पकड़ो । तुम सर्वज्ञ हो और सब मूर्ख हैं ? वह रानी है और सब दासी हैं ? मैं देखती
हूँ कि वह हृदय में बैठी है, मैं तुम्हारे लिए हँसी की पात्री हूँ । बाँह पकड़ते कुछ लाज
नही आती, (ऊपर से) मन में सुख पाती है । सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है)
यह मेरी ओर एकटक देखती है और डरती नही ॥१२१॥
कहा भई धनि बाबरी, कहि तुमहिं सुनाऊँ ।
तुम तैं को है भावती, जिहिं हृदय बसाऊँ ।
तुमहिं स्रवन, तुम नैन हौ, तुम प्रान-अधारा ।
वृथा क्रोध तिय क्यों करौ, कहि बारम्बारा ।
भुज गहि ताहि बतावहु, जेहि हृदय बतावति ।
सूरज प्रभु कहै नागरी, तुम तैं को भावति ॥१२२॥
अर्थ - प्रिया तुम क्या पागल हो गयी हो, तुम्हे कैसे कहकर सुनाऊँ । तुमसे
अधिक प्रिय लगने वाली और कौन है जिसे (अपने) हृदय मे बसा लूं । तुम ही श्रवण
हो, तुम ही नेत्र हो और तुम ही प्राण की आधार हो । बार-बार कहकर, हे स्त्री,
क्रोध क्यो करती हो । भुजा पकड़कर उसे बताओ जिसे हृदय मे बताती हो । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण नागरि (राधा) से कहते है कि तुमसे अधिक कौन मुझे अच्छी
लगती है ॥१२२॥
पियहिं निरखि प्यारी हँसि दीन्हौ ।
रीझे स्याम अंग-अंग निरखत, हँसि नागरि उर लीन्हौ ।
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