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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

षष्ठः सर्गः ५३
निःसत्वो वीतशौटीर्यः परपाणिस्थजीवनः ।
सोऽभूत् क्षणादगस्त्येन गृहीत इव सागरः ॥२३॥
उस समय भोज बलहीन, अभिमानहीन और दूसरे के हाथ में स्थित निज जीवन वाला बन
कर अगस्त्य मुनि द्वारा आक्रान्त समुद्र के समान लगा जिसके जलचर शान्त हो गये थे, जिसका
वेग समाप्त हो गया था और जिसका सारा पानी अगस्त्य की चुल्लू में था ॥२३॥
शीर्णदंष्ट्रो यथा सिंहः प्रलीनास्त्रपरिच्छदः ।
परवान् पञ्जरावासं सेहे भोजः कथञ्चन ॥२४॥
जिसके अस्त्रशस्त्र रूपी आभूषण छीन लिये गये थे ऐसे भोज ने विवश होकर किसी प्रकार
कारावास भोगा जैसे सिंह, जिसकी दाढ़ें तोड़ दी गई हों, विवश होकर किसी प्रकार पिंजरे में
रहता है ॥२४॥
तं नियन्त्रितमारोप्य नियन्ता निजदन्तिनि ।
ययौ विजयनिर्घोषैः साकं शाकम्भरीपुरम् ॥२५॥
नियंत्रित भोज को अपने हाथी पर बैठा कर राजा वल्लभ विजय ध्वनि के साथ शाकंभरी
नगरी की ओर रवाना हुये ॥२५॥
कृतप्रायोपवेशं तमन्वकम्पत वल्लभः ।
कृपैव कृपणे शत्रौ शोभते जयशोभिनाम् ॥२६॥
अनशन लेकर बैठे हुये भोज पर वल्लभ ने दया की । शत्रु के नम्र होने पर जयशील राजाओं
को कृपा ही शोभा देती है ॥२६॥
विमोच्य वैरिणं बन्धादथाऽवन्ध्यपराक्रमः ।
सत्कारैः सान्त्वयामास सौम्यः सापत्रपं नृपः ॥२७॥
जिनका पराक्रम कभी व्यर्थ नहीं गया ऐसे सौम्यमूर्ति वल्लभ ने शत्रु राजा भोज को बन्धन
से छुड़ा कर और उसका सत्कार कर लज्जित भोज को सान्त्वना दी ॥२७॥
किरीटेन शिरः शत्रोः स राजा समयोजयत् ।
उच्चैःशिरस्त्वमेतस्य बभूवाधिकमद्भुतम् ॥२८॥
राजा वल्लभ ने शत्रु के सिर पर किरीट रक्खा, किन्तु इससे उन्हीं का सिर ऊँचा हुआ ॥२८॥
परं संभावयामास सुवर्णाभरणैः प्रभुः ।
अभूवन्नस्य यशसा सुवर्णाभरणा दिशः ॥२९॥
वल्लभ ने शत्रु को सोने के आभूषणों से सज्जित किया, किन्तु इससे दिशाओं ने उन्हीं के
यशरूपी आभूषण धारण किये ॥२९॥
कृत्वा महार्हसंभारैमंहेन्द्रोचितमर्हणम् ।
तं प्रतिविशदै वाक्यै विससर्ज विशां पतिः ॥३०॥
राजा वल्लभ ने बहुमूल्य उपहारों से भोज का इन्द्रोचित सत्कार किया और प्रेम से सुन्दर
वचनों से आश्वासन देकर उन्हें अपनी राजधानी भेज दिया ॥३०॥

५४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
व्रजतः पथि भोजस्य यः श्रुतो दुन्दुभिध्वनिः ।
स एव वल्लभस्यासीज्जगत्यां जयघोषणा ॥३१॥
जाने वाले भोज के मार्ग में जो उनके नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देती थी वही संसार में वल्लभ
के विजय की घोषणा थी ॥३१॥
नीत्या नितान्तमित्येवं कृतकृत्यत्वमीयिवान् ।
अनामयमनाः सम्यक् शशास वसुधां सुधीः ॥३२॥
नीतिवान्, बुद्धिमान् और स्वस्थचित्त वल्लभ ने कृतकृत्य होकर पृथ्वी पर सुन्दर शासन
किया ॥३२॥
ततस्तस्मिन् यशःशेषे शेषोपमयशोभरे ।
अभवत् पृथिवीनाथो रामनाथस्तदात्मजः ॥३३॥
शेष के समान शुभ्र यश वाले वल्लभ के यशःशेष (स्वर्गवासी) हो जाने पर उनके पुत्र
रामनाथ राजा हुये ॥३३॥
रामोऽस्य नाथ इत्येतच्चरितैरन्वमीयत ।
भजन्ते स्वामिशीलं हि भृत्यास्तदनुवर्तिनः ॥३४॥
अनुचर भृत्य स्वामी के शील का अनुकरण करते हैं अतः राजा रामनाथ के गुण और शील
के कारण यह अनुमान हुआ कि राम ही इनके नाथ हैं ॥३४॥
सुतोऽभूत् तस्य चामुण्डश्चण्डदोर्दण्डमण्डनः ।
खण्डितारिचमूमुण्डैश्चामुण्डागणतोषकृत् ॥३५॥
रामनाथ के चामुण्ड नामक पुत्र हुये जो प्रबल भुजयुग से शोभित थे और जिन्होंने शत्रु-
सैनिकों के मुण्ड काट काट कर देवी चामुण्डा के गणों को संतुष्ट किया ॥३५॥
सितातपत्रं पुत्राय प्रतिपाद्य ततः पिता ।
आस्पदं मुनिभिर्मृग्यमारुरोह मरुत्वतः ॥३६॥
पिता रामनाथ ने अपने पुत्र चामुण्ड को श्वेत छत्र सौंप कर, मुनियों द्वारा इच्छित इन्द्र-
पद प्राप्त किया ॥३६॥
चारुणा चरितेनाथ चामुण्डो मण्डयञ्जनान् ।
वृषाङ्कवरिवस्यायां वशी चित्तं न्यवेशयत् ॥३७॥
अपने सुन्दर चरितों से प्रजा को प्रसन्न रखने वाले चामुण्ड ने जितेन्द्रिय होकर भगवान्
शिव की सेवा में मन लगाया ॥३७॥
आरोप्य मेदिनीभारं मन्त्रिवृद्धेष्वगृध्नुषु ।
विततान त्रिनेत्रस्य प्रसादोपयिकीः क्रियाः ॥३८॥
विश्वस्त और वृद्ध मंत्रियों को, जिनको लोभ छू भी नहीं गया था, राज्य-भार सौंप कर
चामुण्ड ने शिव को प्रसन्न करने के लिये प्रयत्न प्रारंभ किया ॥३८॥

षष्ठः सर्गः ५५
त्रिसन्ध्यं त्रिविधाः पूजास्त्र्यम्बकस्य विशेषयन् ।
तप्यते स्म तपस्तीव्रं शैवव्रतपरायणः ॥३९॥
शैवव्रत में परायण चामुण्ड, प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय शिव की तीनों प्रकार
की विशिष्ट पूजा करके तीव्र तप करने लगे ॥३९॥
तप्ताङ्गारकरालायां सरण्यां सञ्चचार सः।
भक्तेरनन्यगामिन्या विशुद्धिमिव दर्शयन् ॥४०॥
मानों अनन्य भक्ति की विशुद्धि दिखाते हुये वे जलते हुये अंगारों के भीषण मार्ग पर भी चले
जाते थे ॥४०॥
एवंविधैरथान्यैश्च तपोभिरतिदुष्करैः ।
प्रादात् प्रीतमनास्तस्मै प्रार्थितं प्रमथाधिपः ॥४१॥
इस प्रकार के तथा अन्य अत्यन्त कठिन तपों से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें प्रार्थित
वरदान दिया ॥४१॥
स जित्वा जित्वरः सङ्ख्ये यवनानीकनायकान् ।
शकानामधिपं शक्त्या कारातिथिमकारयत् ॥४२॥
जिसके कारण विजयी चामुण्ड ने अपनी शक्ति से यवन सेना के नायकों को युद्ध में जीता
और शकों के स्वामी को रण में जीत कर कैद कर लिया ॥४२॥
सुतं दुर्लभराजाख्यं कृत्वा राजानमार्यधीः ।
चामुण्डश्चन्द्रचूडस्य लोकं लोकोत्तरं ययौ ॥४३॥
श्रेष्ठबुद्धि वाले चामुण्ड, अपने दुर्लभराज नामक पुत्र को राजा बना कर, भगवान् शिव के
लोक कैलास में चले गये ॥४३॥
सुतो दुलसदेवोऽथ जातो दुर्लभराजतः ।
कुशलो वीरचर्यायां चिरं वसुमतीमशात् ॥४४॥
इन दुर्लभराज के दुलसदेव नामक पुत्र हुये जो वीरों की चर्या में कुशल थे और जिन्होंने बहुत
समय तक पृथ्वी पर शासन किया ॥४४॥
तस्माद् विशालयशसो वीशलाख्यः सुतोऽजनि ।
विषयान् वशयामास विश्वोद्गीतगुणेन यः ॥४५॥
उन विशाल यश वाले दुलसदेव के बीसलदेव नामक पुत्र हुये जिन्होंने विश्व में गाये जाने
वाले गुणों द्वारा प्रजा को और विषयों को अपने वश में कर लिया ॥४५॥
जगद्विजयिवीर्येण वज्रपाणिसमत्विषा ।
शक्तित्रयसनाथेन तेन षाड्गुण्यशोभिना ॥४६॥
आकर्णकृष्टचापेन सङ्गरे कर्णविक्रमम् ।
कर्णं संयम्य ककुभां कर्णपूरीकृतं यशः ॥४७॥
बीसलदेव ने, जिनका पराक्रम जगत् को विजय करने वाला था, जिनका तेज इन्द्र के समान

५६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
था, जो तीनों शक्तियों (प्रभुशक्ति, मंत्रशक्ति और उत्साहशक्ति) से युक्त थे और छहों
गुणों (सन्धि, विग्रह, यान आदि) से शोभित थे, युद्ध में कान तक धनुष खींच कर कर्ण के समान
पराक्रमी अवन्तिनरेश कर्ण को विजय करके अपने शुभ्र यश को दिशाओं का कर्णफूल बना
दिया ॥४६-४७॥
निबध्याऽवन्ध्यनिर्वन्धः समरे कर्णभूपतिम् ।
आददेऽवन्तिनगरीं जयश्रियमिवापराम् ॥४८॥
अमोघ पराक्रम वाले बीसलदेव ने युद्ध में कर्ण राजा को मार कर अवन्ति नगरी (उज्जैन)
को दूसरी विजय-लक्ष्मी के समान ग्रहण किया ॥४८॥
यस्यामुत्पन्नया नित्यं विशालवसुसम्पदा ।
यथार्थनामधेयत्वं लभते स्म वसुन्धरा ॥४९॥
जिस अवन्ति नगरी में नित्य उत्पन्न होने वाली विशाल वसु (धन-धान्य आदि) सम्पत्ति
के कारण पृथ्वी का 'वसुन्धरा' नाम सार्थक होता था ॥४९॥
सौधोत्सङ्गपरिष्वङ्गनिर्वृते यत्र नीरदे ।
स्थिरसौदामिनीशोभामभजत् कामिनीजनः ॥५०॥
जहाँ के ऊँचे महलों के शिखरों का आलिंगन करके आनन्द से बैठे हुये बादलों में, शिखरा-
रूढ़ कामिनियाँ स्थिर बिजलियों की शोभा प्राप्त करती थीं ॥५०॥
महाकालकिरीटस्था कला यत्र कलाभृतः ।
मालवीमुखपद्मानां द्युतिद्वैगुण्यमादधे ॥५१॥
जहाँ भगवान् महाकालेश्वर के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की कला मालव देश की स्त्रियों
के मुख-कमलों की कान्ति को द्विगुणित बना रही थी (वैसे चन्द्रोदय के, समय कमल मुकुलित
रहते हैं) ॥५१॥
रिङ्गद्गङ्गोत्तमाङ्गोऽपि यत्राऽनङ्गविमर्दनः ।
शिप्रारसाभिषेकाय साभिलाषः सदाऽभवत् ॥५२॥
जहाँ कामदेव को भस्म करने वाले भगवान् शिव, मस्तक पर गंगाजी के लहराते हुये भी,
शिप्रा नदी के जलाभिषेक की सदा इच्छा रखते थे ॥५२॥
मध्यं दिनेऽपि देवस्य चूडाचन्द्रांशुचुम्बितम् ।
धारायन्त्रायते यत्र चन्द्रकान्तकृतं गृहम् ॥५३॥
जहाँ मध्याह्न में भी, चन्द्रकान्त मणियों से बना हुआ गृह भगवान् शिव के मस्तक पर स्थित
चन्द्रमा की किरणों से चूमा जाकर धारायन्त्र (फौव्वारा) बन रहा था (चन्द्रकिरणों के स्पर्श
से चन्द्रकान्त मणियों में से पानी निकलता है) ॥५३॥

८ षष्ठः सर्गः ५७
यत्रासन्नमहादेवदृष्टिपातभयादिव ।
मालवीलोचनोपान्ते विलीनो मीनकेतनः ॥५४॥
जहाँ समीपस्थित भगवान् शिव के दृष्टिपात के भय से (भस्म हो जाने के भय से) मानों
कामदेव मालव-रमणियोँ के नेत्रों के कोनों में छिप रहा था ॥५४॥
वाणीपाणिलसद्वीणाक्वणितैर्मिलितस्वराः ।
यस्यां सोमं जगुः सोमशेखरं नगरस्त्रियः ॥५५॥
जहाँ सरस्वती के हाथ में शोभित वीणा के स्वरों से स्वर मिला कर नगर की स्त्रियाँ पार्वती-
सहित भगवान् चन्द्रचूड़ साम्बशिव की स्तुतियाँ गाती थीं ॥५५॥
सदा हरशिरश्चन्द्रकरालम्बनलालिताः ।
शिप्राशीकरसम्भिन्नसमीरमृदुलीकृताः ॥५६॥
मानिनीसमुदायस्य यस्यां मानसवृत्तयः ।
आययुर्न कठोरत्वं वल्लीनामपि पल्लवाः ॥५७॥
जहाँ सदा शिव के मस्तक पर स्थित चन्द्र की किरणों द्वारा लालित, और शिप

५८ | सुर्जनचरितमहाकाव्यम्

सारमाकृष्य कैलासात् किंवा ब्रह्माण्डभाण्डतः ।
निर्मिता नु वृषाङ्केन निजावासाय या स्वयम् ॥६२॥
क्या इस अवन्ति नगरी को स्वयं भगवान् शिव ने अपने रहने के लिये कैलास या ब्रह्माण्ड
के सार से निर्मित किया था ? ॥६२॥
शिप्रासरिति स स्नात्वा विप्राणां विहिताऽर्हणः ।
अथ प्रमथनाथस्य प्रासादं प्राविशद् वशी ॥६३॥
शिप्रा नदी में स्नान करके और ब्राह्मणों की पूजा करके जितेन्द्रिय नृपति बीसलदेव महाकाल
के मन्दिर में गये ॥६३॥
अर्चयित्वाऽवनीपालः पुष्पधूपादिसाधनैः ।
प्रभुं प्रभूतया भक्त्या तुष्टावाऽष्टतनूभृतम् ॥६४॥
राजा ने पुष्प धूप आदि साधनों से भगवान् शिव की पूजा करके अष्टमूर्ति महेश्वर को अपनी
प्रगाढ भक्ति से प्रसन्न किया ॥६४॥
जयकर्पूरगौराङ्ग गिरां साम्नामगोचर ।
गरीयःकरुणागार गौरीरूढार्धविग्रह ॥६५॥
हे कपूर के समान् शुभ्र शरीर वाले, सामवेद की ऋचाओं द्वारा भी अगोचर, महान् करुणा
के आगार, अर्द्धनारीश्वर भगवान् शंकर ! आपकी जय हो ॥६५॥
बालचन्द्रलसद्भाल जय व्यालविभूषण ।
जय देव महाकाल जहि कालमहाभयम् ॥६६॥
हे बाल चन्द्र से शोभित मस्तक वाले, सर्प के आभूषण वाले, महाकाल ! आपकी जय हो ।
देव ! हमारे कालरूपी महाभय को नष्ट कीजिये ॥६६॥
कृपापालितदिक्पाल कपालप्रोल्लसत्कर ।
वेतालपूतनापाल कालकण्ठ नमोऽस्तु ते ॥६७॥
हे अपनी कृपा से दिक्पालों का पालन करने वाले, हाथ में कपाल धारण करने वाले, वेतालों
की सेना का पालन करने वाले, नीलकण्ठ भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥६७॥
त्रिलोकीशरण त्र्यक्ष त्र्यम्बक त्रिपुरापते ।
निस्त्रैगुण्य त्रयीसार तारयास्माद् भवार्णवात् ॥६८॥
हे तीनों लोकों के शरण, तीन अक्षमाला धारण करने वाले, त्रिनेत्र वाले, त्रिपुरा देवी के
पति, निस्त्रैगुण्य, तीनों वेदों के सार ! इस भवसागर से हमें तार दीजिये ॥६८॥
स्मृतिमात्रेण जन्तूनां शमयन्तं तमः प्रभो ।
ये त्वां तमोमयं प्राहुस्त एव तमसा हताः ॥६९॥
प्रभो ! आप स्मरणमात्र से प्राणियों के तम को नष्ट कर देते हैं। जो आपको तमोमय कहते
हैं वे ही तम रूपी अज्ञान से मारे गये हैं ॥६९॥

षष्ठः सर्गः ५९
ज्वलनं जलवेणिञ्च विधुं विषधरं तथा।
अस्थिमालाञ्च बालाञ्च बिभर्षि सममीश्वर ॥७०॥
महेश्वर ! आप तृतीय नेत्र की अग्नि को और गंगा को, विषधर सर्प को और अमृतमय
चन्द्रमा को, अस्थिमाला को और भगवती पार्वती को समान रूप से धारण करते हैं ॥७०॥
त्वमेव विश्वनिर्माणस्थितिसंहारहेतुकम् ।
वितनोषि त्रिधात्मानं त्रिलोचन गुणैस्त्रिभिः ॥७१॥
त्रिलोचन ! आप सत्वरजस्तमोरूप तीनों गुणों से, विश्व की उत्पत्ति-स्थिति-संहार के
लिये स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में अभिव्यक्त करते हैं ॥७१॥
अष्टमूर्तिं त्रिमूर्तिं वा त्वां वदन्तु पुराविदः ।
आनन्त्यात् तव मूर्तीनां वयमत्र निरुत्तराः ॥७२॥
विद्वान् लोग चाहे आपको अष्टमूर्ति कहें चाहे त्रिमूर्ति, वास्तव में आप अनन्तमूर्ति हैं अतः
हम इस विषय में कुछ नहीं कह सकते ॥७२॥
कोटिशो रसनाः कस्य कस्यानान्ता सरस्वती ।
वक्तुं यः प्रतिजानीते महिमानं महेश ते ॥७३॥
किसके करोड़ों जीभें हैं ? किसकी वाणी अनन्त है ? महेश ! आपकी महिमा का वर्णन कौन
कर सकता है ? ॥७३॥
अध्वराखिलसंभारसंभृतस्यापि धूर्जटे ।
पराचि त्वयि दक्षस्य दारुणाय तपःक्रियाः ॥७४॥
धूर्जटे ! प्रजापति दक्ष की, यज्ञ के समस्त साधनों से सम्पन्न होने पर भी, तप की क्रियायें,
आपके विमुख होने के कारण, विनाश के लिये हुईं ॥७४॥
नाराधितौ पुराराते पुरा ते चरणावतः ।
जननैऽस्मिन्नहं षण्णां वैरिणां पतितो मुखे ॥७५॥
पुरारि.! मैंने पूर्वजन्म में आपके चरणों की आराधना नहीं की । इसीलिये इस जन्म में मैं
कामक्रोधादिक छह शत्रुओं के मुख में पड़ रहा हूँ ॥७५॥
दुर्वासना पिशाचीयं मोहयित्वा मर्तिं मम ।
बलात् कवलयामास भवत्स्मृतिकथामपि ॥७६॥
यह दुर्वासना रूपी पिशाची, मेरी बुद्धि को मोह कर, आपकी स्मृतिकथा को भी बलपूर्वक
खा गई (दुर्वासना में फँस कर मैं आपका स्मरण तक न कर सका) ॥७६॥
एतेनागामि जन्मापि तादृगेव निरूपयन् ।
किं वदाम्यपराद्धोऽहं त्वयि त्रिष्वपि जन्मसु ॥७७॥
अतः अगले जन्म में भी मेरा वही हाल होगा (क्योंकि इस जन्म में भी मैं आपकी आराधना
नहीं कर रहा हूँ) । इस प्रकार तीनों जन्मों में मैं आपका अपराधी हूँ ॥७७॥

६० सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
निरुपाधिकृपापूरपरतन्त्रीकृतात्मनः ।
दीनोद्धरणमात्रं ते व्यसनं वृषभध्वज ॥७८॥
वृषभध्वज ! आप अपनी सहज और असीम करुणा के वश में हैं और दीनों का उद्धार करना
ही आपका एक मात्र व्यसन है ॥७८॥
ममाप्यन्धधियश्छिन्धि बन्धमन्धकमर्दन ।
कृपायास्तव नायासलेशोऽप्यत्र भवेद् विभो ॥७९॥
अन्धक दैत्य के नाशक ! मैं अन्ध बुद्धि वाला हूँ । मेरा बन्धन भी काट दीजिये । प्रभो !
इसमें आपकी कृपा को जरा सा भी परिश्रम नहीं होगा ॥७९॥
इति स्तुतिभिरीशानं संभाव्य स भुवः प्रभुः ॥
प्रादक्षिण्यात् परिक्रम्य प्रणिपत्य विनिर्ययौ ॥८०॥
पृथ्वीपति बीसलदेव इस प्रकार की स्तुति से भगवान् महाकाल की पूजा कर तथा प्रदक्षिणा
परिक्रमा कर और भगवान् को प्रणाम कर चले आये ॥८०॥
कृत्वा करप्रदांस्तत्र बलवानथ मालवान् ।
जितैरनुगतो भूपैः प्राविशत् पुरमात्मनः ॥८१॥
बलवान् राजा, मालवों को कर देने वाले बना कर और विजित राजाओं को अपने पीछे
लेकर, अपनी राजधानी लौट आये ॥८१॥
तस्मात् पृथुगुणात् पुत्रो जातः पृथुसमप्रभः ।
पूरयन् यशसा पृथ्वीं पृथ्वीराज इति स्मृतः ॥८२॥
उन महान् गुणों वाले बीसलदेव के पृथु राजा के समान पराक्रमी एवं अपने यश से पृथ्वी को
पूर देने वाले पृथ्वीराज नामक पुत्र हुये ॥८२॥
उत्पन्नस्तनुजस्तस्य प्रपन्नो दनुजद्विषम् ।
बिभ्राणो गुणबाहुल्यं बल्हणो वल्लभः सताम् ॥८३॥
उन पृथ्वीराज के भगवान् विष्णु के भक्त, अनेक गुणों को धारण करने वाले और सज्जनों
के प्रिय बल्हण नामक पुत्र हुये ॥८३॥
लब्धलक्षा अपि स्वैरं नातृप्यन् पक्षसंश्रिताः ।
शतकोटितुलादानगृध्नवो यस्य मार्गणाः ॥८४॥
जिनके बाण (और याचक), पंख से युक्त होकर (सत्पक्षाश्रित होकर) और इच्छित लक्ष
(लक्ष्य; लाख) को भी प्राप्त करके शतकोटि (वज्र; सौ करोड़) की तुलना की प्राप्ति
(तुलाऽऽदान; तुलादान) के लोभ से तृप्त नहीं हुये ॥८४॥
(८४) लब्धलक्षाः प्राप्तशरव्याः प्राप्तलक्षद्रव्याश्च । शतकोटेर्वज्रस्य तुलायास्तुलनाया आदानस्य ग्रहणस्य
गृध्नवो लोभिनः शतकोटीनां द्रव्याणां तुलादानस्य लोभिनश्च । पक्षयुक्ताः सत्पक्षे स्थिताश्च । मार्गणा बाणा
याचकाश्च ।

षष्ठः सर्गः ६१
निर्वाप्य प्रतिभटपार्थिवप्रतापं
सिञ्चन्त्यः किसलयिनीं स्वकीर्तिवल्लीम् ।
सञ्चेरुः सुचरितशालिनोऽस्य विष्वग्
विस्तीर्णा वितरणनीरनिर्झरिण्यः ॥८५॥
शत्रुराजाओं की प्रतापाग्नि को बुझा देने वालीं और अपने राजा की कोमल पत्तों वाली
कीर्तिलता को सींचने वालीं चरित्रवान् राजा वल्हण की दानजल की विशाल नदियाँ चारों
ओर बहने लगीं ॥८५॥
अथ गतवति नाकं वल्हणे बाहुलेय-
प्रतिनिधिरधिरूढस्तत्पदं तस्य पुत्रः।
अभवदनलदेवः शत्रुवंशाटवीना-
मनल इव समिद्धः सोमवद् बान्धवानाम् ॥८६॥
राजा वल्हण के स्वर्गवासी होने पर, स्वामी कार्तिकेय के समान बलवान् उनके पुत्र अनलदेव
राजसिंहासन पर बैठे, जो शत्रुओं के वंश रूपी बाँस के जंगलों के लिये प्रचण्ड अग्नि के समान
भीषण और बन्धु-वर्ग के लिये चन्द्रमा के समान शीतल थे ॥८६॥
॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये षष्ठः सर्गः ॥
(८६) बाहुलेयः कार्तिकेयः ।

सप्तमः सर्गः
ततः समासाद्य पितुः समृद्धिं श्रियं विववानिव शारदीनाम् ।
प्रचीयमानाऽप्रतिमप्रतापः सुदुःसहोऽभून्महसा महीशः ॥ १ ॥
पृथ्वीपति अनलदेव, पिता की राज्यसमृद्धि को पाकर, शरद्ऋतु की शोभा को पाने वाले
सूर्य के समान, निरन्तर बढ़ने वाले अप्रतिम प्रताप से युक्त और तेज से अत्यन्त दुःसह बन गये ॥ १॥
विशीर्णचापाश्चपला गरिम्णा त्यक्ता विपर्यस्तगभीरघोषाः ।
चिरादकिञ्चित्करतामवापुः पयोधरास्तस्य विरोधिनश्च ॥ २ ॥
उनके शत्रु और शरद्ऋतु के बादल चिरकाल तक टूटे धनुष वाले (टूटे इन्द्रधनुषवाले),
चपल और हल्के बन कर तथा अपना गंभीर गर्जन छोड़ कर बेकार हो गये ॥ २ ॥
उदीयमानात् किल कुम्भयोनेर्जलाशयानामजनि प्रसादः ।
अस्योदये तु स्पृहणीयनीतेः शुद्धाशयाः साधु ययुः प्रसादम् ॥ ३ ॥
अगस्त्य तारे के उदय होने पर जलाशय (सरोवर; जडाशय = मूर्खहृदय) प्रसन्न और निर्मल
हो गये; किन्तु श्लाघ्य नीति वाले अनलदेव के उदय होने पर शुद्ध हृदय वाले सत्पुरुष अत्यन्त
प्रसन्न हुये ॥ ३ ॥
स्वभर्तुशत्रोरुदयादगस्तेर्नूनं रुदत्यः कुररीरुतेन ।
समुद्रपत्न्यस्तनिमानमापुर्यथास्य राज्ञः प्रतिपक्षकान्ताः ॥ ४ ॥
अपने पति समुद्र के शत्रु अगस्त्य के उदय होने पर मानों कुररी पक्षियों के शब्दों के बहाने
रोती हुईं नदियां दुबली हो गई जैसे अनलदेव के शत्रुओं की स्त्रियां अपने पतियों के शत्रु (अनल-
देव) के उदय होने पर कुत्सित स्वर से रोती हुईं दुबली हो गईं ॥ ४ ॥
आह्लादयामासतुसल्लसन्तौ लोकानुभौ शीतकरक्षितीशौ ।
करैर्यथार्थैः समयोरितैस्तानेको वितन्वन्नपरस्तु गृह्णन् ॥ ५ ॥
सुन्दर कान्ति वाले चन्द्रमा और राजा अनलदेव, इन दोनों ने ही लोगों को प्रसन्न किया—
एक ने (चन्द्रमा ने) तो समयोचित, यथार्थ और शीतल कर (किरणों) देकर और दूसरे ने (अन-
लदेव ने) समयोचित, यथार्थ और अल्प कर लेकर ॥ ५ ॥
क्षीरेण सप्तच्छदपादपानां तस्य द्विपानां मदरेखया च ।
आकृष्यमाणाः समसौरभत्वाद् भ्रमुर्द्विरेफाश्चिरमन्तराले ॥ ६ ॥
सप्तपर्ण वृक्षों के दूध से और राजा के हाथियों के मद की रेखा से आकृष्ट हुये भ्रमर, दोनों
की सुगन्ध बराबर होने के कारण (यह निश्चय न कर सकने से कि किस पर बैठें), बहुत देर तक
आकाश में ही उड़ते रहे ॥ ६ ॥

·सप्तमः सर्गः ६३
अन्तःसरागापि रुचामधीशनालम्ब्यमाना सहसा करेण ।
नितान्तमौग्ध्यान्मुखपद्ममुद्रामुपालि नालं नलिनी विमोक्तुम् ॥७॥
कमलिनी, अन्दर से लाल होने पर भी (हृदय से अनुरक्त होने पर भी), सूर्य की किरणों
का (हाथ का) सहसा स्पर्श पाकर, अत्यन्त मुग्ध होने के कारण, अपने मुकुलित मुख-कमल को,
भ्रमर के सामने (उपाऽलि; पर-पुरुष के सामने) विकसित नहीं कर सकी; जिस प्रकार कोई
नवोढ़ा नायिका, हृदय से अनुरक्त होने पर भी, अपने स्वामी के हाथ का (अधीशेन) सहसा
स्पर्श पाकर, अत्यन्त मुग्धा होने के कारण, सखियों के सामने (उपाऽऽलि) लज्जावश अपने
मुख-कमल के घूंघट को नहीं हटाती ॥७॥
करेण रागाद् घनविप्रकीर्णं शनैः शनैरावरणं नियम्य ।
मुखं नलिन्या इव पद्मकोषं प्रकाशतां चण्डरुचिर्निनाय ॥८॥
बादलों के कारण छाये हुये अन्धकार को अपनी रक्त किरणों से धीरे धीरे हटाकर सूर्य ने
कमलिनी के मुख-कमल को विकसित कर दिया, जिस प्रकार तीव्र अनुराग वाला (चण्डरुचिः)
नायक लज्जावश गहरे खींचे गये घूंघट को अपने अनुरक्त हाथ से धीरे धीरे हटा कर घूंघट के
अन्दर छिपे हुये नवोढा नायिका के मुख-कमल को प्रकाशित कर देता है ॥८॥
विदूरभिन्नाधरपत्रमीषद्विकासि किञ्जल्करदं दधाना ।
ससौरभोद्गारमुखारविन्दं विमुक्तनिद्रा नलिनी जजृम्भे ॥९॥
(सोई हुई) कमलिनी (सूर्य के कर-स्पर्श से) जाग कर अपने पत्र रूपी होठों को दूर फैला
कर तथा अपने शुभ्र केसर रूपी दाँतों को कुछ कुछ प्रकट कर, अपने कमल रूपी मुख से सुगन्ध
रूपी साँस निकालती हुई जम्हाई ले रही है ॥९॥
विजृम्भमाणोत्कलिका नलिन्द्यो दरन्नमत्कण्टकिकण्ठनालाः ।
विस्फारितैः पङ्कजकोषनेत्रैर्निभालयामासुरिवात्मबन्धुम् ॥१०॥
खुली हुई पंखुड़ियों वालीं (बढ़ी हुई उत्कण्ठा वालीं) और कुछ झुकते हुये रोयों से शोभित
नालों वालीं (कुछ कुछ खड़े हुये रोंगटों से शोभित कण्ठों वालीं) कमलिनियाँ (नायिकाओं के
समान) अपने पूर्ण खुले हुये कमल-नेत्र से सूर्य को (अपने प्रियतम को) देख रहीं हैं ॥१०॥
चिरप्रवासान्मिलितं मरालं पक्षानिलोद्धूततरङ्गलोला ।
प्रत्युज्जगामेव समालपन्ती सरोजिनी षट्पदहुङ्कृतेन ॥११॥
चिरप्रवास के बाद मिले हुये (वर्षा ऋतु भर बाहर रह कर अब शरद् में वापस आये हुये)
हंस के स्वागत में कमलिनी मानों भ्रमरों की गूंज के बहाने स्वागत-वचन बोलती हुई और (हंस
के) पंखों की वायु के कारण उठने वाली लहरों से हिलती हुई मानों उठ कर गई ॥११॥
(७) उपाऽलि, उपाऽऽलि च ।

कूजन् मुहुः शोणमुखः समन्ताद् व्यापारयन् पक्षमपेतधैर्यः ।
तारुण्यमत्तालिविलासलोलां सरोजिनीं हंसयुवा न सेहे ॥१२॥
लाल चोंच वाला (क्रोध से लाल मुँह वाला), बार बार कूजता हुआ (क्रोध में दुर्वचन
बोलता हुआ), चारों ओर पंख फड़फड़ाता हुआ (चारों ओर हाथ हिलाता हुआ) और अधीर
हुआ हंस-युवक, यौवनमद से उन्मत्त भ्रमर के साथ भोगविलास में चञ्चल सरोजिनी को सहन
नहीं कर सका ॥१२॥
प्रसारयन् शीतकरः सुदूरात् करं परं खेदमिवाप्नुवानः ।
पतन् सरस्यां प्रतिमामिषेण कुमुद्वतीक्रोड़मुपाससाद ॥१३॥
(यह अस्त होने वाला) चन्द्रमा, अत्यन्त खिन्न हुआ, दूर से अपने कर (किरणों; हाथ)
फैलाता हुआ, प्रतिबिम्ब के बहाने मानों सरोवर में गिर कर अपनी प्रेयसी कुमुदिनी की गोद में
छिप रहा है ॥ १३॥
संयम्य नूनं जलदागमेन घनान्धकारं हरितो नि

६ सप्तमः सर्गः ६५
स. हंसलक्ष्मम्बरसङ्गिगौरपयोधरामुत्पलचारुनेत्राम्।
प्रसन्नशीतांशुमुखीं सुतारनक्षत्रमालाभरणोपकण्ठाम् ॥१९॥
विनिद्रबन्धूकदलाधरोष्ठीं शरच्छ्रियं चारुशरं दधानाम्।
प्रकाशपङ्केरुहताम्रपाणौ पतिर्ग्रहाणां जगृहे करेण ॥२०॥
सूर्य ने, उड़ते हुये हंसों की शोभा से युक्त शुभ्र आकाश में स्थित श्वेत मेघों से शोभित,
कमल रूपी सुन्दर नेत्रों वाली, प्रसन्न चन्द्रमा रूपी मुख वाली, सुन्दर तारे और नक्षत्र-माला
रूपी आभूषणों से सुशोभित, विकसित बन्धूक पुष्प रूपी अधर वाली, सुन्दर शर नामक पुष्प को
धारण करने वाली शरद् ऋतु के प्रफुल्लित रक्तकमल रूपी पाणि (हाथ) का अपने कर (किरण;
हाथ) से ग्रहण किया मानों किसी ब्राह्मण ने, हंसों के चित्रों से शोभित साड़ी का स्पर्श करने वाले
गोरे स्तनों वाली, कमल के समान सुन्दर नेत्र वाली, प्रसन्न और पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाली,
सुन्दर तार में पिरोये गये नक्षत्र-माला (मोहन-माला) नामक आभूषण से सुशोभित कण्ठ वाली,
विकसित लाल बन्धूक पुष्प जैसे अधर वाली और एक हाथ में सुन्दर बाण धारण करने वाली
क्षत्रिया के प्रफुल्लित रक्तकमल के समान सुन्दर हाथ को अपने हाथ में लेकर पाणिग्रहण किया
हो। (विवाह में वधू के लिये हंसों के चित्रों से शोभित साड़ी पहनना मांगलिक समझा जाता है।
कालिदास ने भी कुमारसंभव में लिखा है—‘वधूदुकूलं कलहंसलक्षणम्।' धर्मशास्त्र के अनुसार
जब ब्राह्मण क्षत्रिया का पाणिग्रहण करता है तो क्षत्रिया के हाथ में बाण दिया जाता है—‘शरः
क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया।' यहाँ ग्रहराज सूर्य को ब्राह्मण और शरद् को क्षत्रिया माना
गया है) ॥१९-२०॥
पुष्पामवं पत्रपुटैः पिबन्त्यः प्रवृद्धनेत्राननकण्ठरागाः।
विशृङ्खलं शृङ्खलिताध्वनीनं जगुः सुगीतं कलमस्य गोप्यः ॥२१॥
पत्तों के दोनों में फूलों का आसव पीने से बढ़ी हुई नेत्र, मुख और कण्ठ की लाली वाली,
कलम नामक धान्य के खेतों की रखवाली करने वाली स्त्रियाँ मनमाने सुन्दर गीत गा रही थीं,
जिनको सुनकर राहगीर भी हठात् कुछ देर रुक जाते थे ॥२१॥
शुष्यन्मुखः संमुखमापतन्तं विच्छेदखेदं गणयन्निवान्तः।
आलम्बमानो नलिनीं नतेन मूर्ध्ना श्लथोऽभूत् कलमः क्रमेण ॥२२॥
सूखे मुंह वाला कलम का वृक्ष मानों शीघ्र सामने आने वाले विरह के दुःख का मन में विचार
करता हुआ, अपने झुके हुये सिर को कमलिनी के ऊपर रख कर धीरे धीरे शिथिल हो गया ॥२२॥
(१९) हंसानां लक्ष्म्या शोभया युतं यदम्बरमाकाशं तत्संगिनो गौराः शुभ्राः पयोधरा मेघा यस्यास्ताम् ।
अन्यत्र हंसमिथुनस्य या लक्ष्मी शोभा तया चित्रितं यदम्बरं दुकूलं तत्संगिनी गौरी पयोधरौ स्तनौ यस्या-
स्ताम् । तदुक्तं कालिदासेरपि—‘वधूदुकूलं कलहंसलक्षणम्' इति। वक्ष्यति चाग्रे ‘परिधाप्य धौतममलं
दुकूलयोर्युगलं मरालमिथुनोपलक्षितम्' इति (१४, १४) ।
(२०) चारु शरं शरनामकं शरत्कालीनं सुन्दरं पुष्पम् । शरं बाणञ्च। यदा ब्राह्मणः क्षत्रियामुद्वहति
तदा क्षत्रियवध्वा करे शरो गृह्यते । तदुक्तं धर्मशास्त्रे—‘शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया ।' इति ।

६६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
उपैतुकामा कलमान् विदूरान् मरालनिह्लादमथो निशम्य ।
शुकावलिः शङ्कितशालिगोपोमञ्जीरतारक्वणिता निवृत्ता ॥२३॥
दूर के कलमों के खेतों में जाने की इच्छा रखने वाली तोतों की पंक्ति ने, हंसों के स्वरों को
सुन कर, उन्हें कलमों के खेतों की रखवाली करने वाली स्त्रियों के मंजीरों के उच्च स्वर समझ
कर, वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया ॥२३॥
घनोदितानां तमसामपायात् सुनिर्मलं वीतजडानुषङ्गम् ।
ज्योतिःप्रसादाद् विलसत्प्रसादं बभौ नभः संयमिनामिवान्तः ॥२४॥
बादलों के कारण होने वाले घने अन्धकार के हट जाने से अत्यन्त निर्मल और कुहरे के संग
से विमुक्त तथा प्रकाश के कारण प्रसन्न शरद् ऋतु का आकाश योगियों के, अज्ञानान्धकार और
तमोगुण की निवृत्ति के कारण अत्यन्त निर्मल तथा जड़ पदार्थों की आसक्ति से रहित और आत्मा
की ज्योति से प्रकाशित होने के कारण प्रसन्न, अन्तःकरण के समान सुशोभित हुआ ॥२४॥
नवप्रबुद्धाम्बुरुहप्रताना वितायमानारुणरम्यरोचिः ।
निरस्तनिःशेषघनान्धकारा शरत् प्रभातस्य बभार शोभाम् ॥२५॥
नये खिले हुये कमलों के वितान वाली, प्रवृद्ध अरुण और सुन्दर प्रकाश वाली और मेघों
के कारण होने वाले अन्धकार से बिलकुल रहित शरद् ऋतु, प्रातःकाल की शोभा को धारण कर
रही थी ॥२५॥
तुरङ्गचारोचितराजमार्गां व्यपेतजीमूतघनान्धकाराम् ।
शरच्छ्रियं सौम्यसरित्प्रवाहां समीक्ष्य वीतप्रतिपक्षशङ्कः ॥२६॥
पुरोधसा धौम्यसमौजसाऽथ धर्मवितारोऽधिपतिर्धरित्र्याः ।
प्रातिष्ठत प्रात्यहिकं समाप्य कृत्यं कृती कार्त्तिकमासि तीर्थम् ॥२७॥
सड़कें घोड़ों के चलने योग्य हो गई थीं। बादलों का घना अन्धकार मिट चुका था।
नदियाँ धीरे धीरे बह रही थीं। ऐसी शरद् ऋतु की शोभा देखकर, शत्रुओं की आशंका से रहित,
युधिष्ठिर के समान धर्मराज, कार्यकुशल राजा अनलदेव अपने धौम्य ऋषि (पांडवों के पुरोहित)
के समान तेजस्वी पुरोहित के साथ, प्रातःकाल का (संध्यावन्दनादिक) कृत्य समाप्त करके,
(शुभ मुहूर्त में) कार्तिक मास के तीर्थ पुष्कर को चले ॥२६-२७॥
स पुष्करं पुष्करपत्रनेत्रः स्वनेत्रयोराभरणीचकार ।
निर्वाणरत्नस्य खनिं जगत्याः श्रेयः समापन्नमिव द्रवत्वम् ॥२८॥
कमलपत्र के समान सुन्दर नेत्र वाले राजा ने पुष्कर तीर्थ को अपने नेत्रों का आभूषण बनाया
(देखा)—उस पुष्कर को जो संसार में निर्वाण (मोक्ष) रूपी रत्न की खान है और जो मानों
पिघला हुआ साक्षात् कल्याण है ॥२८॥
तपस्विना कुम्भसमुद्भवेन निपीतमालोक्य पतिं नदीनाम् ।
कल्पान्ततल्पं प्रथमेन पुंसा मन्ये परं तोयशयेन सृष्टम् ॥२९॥
क्षीर-सागर में सोने वाले विष्णु भगवान् ने, समुद्र को अगस्त्य मुनि द्वारा पिया हुआ जान कर,
प्रलय काल में अपने सोने के लिये ही मानों इस पुष्कर को बनाया है ॥२९॥

सप्तमः सर्गः ६७
सप्तापि गाधान् सरितामधीशानल्पप्रमाणान् पुरतः परीक्ष्य ।
क्रोडाविमर्दक्षममादिमेन क्रोडेन किं निर्मितमष्टमं वा ॥३०॥
अथवा क्या वराहावतार ने, सातों समुद्रों को परिमित और अल्प देख कर, अपनी गोद
(शरीर) की टक्कर को सहने में समर्थ यह आठवाँ समुद्र बनाया है ? ॥३०॥
तं तत्र विश्रान्तदृशं धरित्रीपुरन्दरं वीक्ष्य पुरः पुरोधाः ।
प्रस्ताववित् प्रस्तुतवस्तुतत्त्वविवेचनीं वाचमिमां बभाषे ॥३१॥
बुद्धिमान् पुरोहित ने पृथ्वी के इन्द्र अनलदेव को एकटक गड़ी हुई दृष्टि से पुष्कर को देखते
हुये देख कर प्रस्तुत वस्तु (पुष्कर) का वर्णन करने वाली यह वाणी कही ॥३१॥
त्रिधा विभक्तात्मतनोरमुष्य धृतावतारस्य जगद्धिताय ।
नामापि कामं समुदीर्यमाणं नारायणस्येव पुनाति विश्वम् ॥३२॥
संसार के हित के लिये अवतार ग्रहण करने वाले और जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय
के लिये स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूपी

६८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
दिवोवतीर्णैर्हरिचन्दनानां निर्माय पर्णैरिह पर्णशालाः।
वल्कं वसानैरमरद्रुमाणां तपोऽत्र चीर्णञ्चिरमादितैयैः ॥३६॥
स्वर्ग से लाये गये हरिचन्दन वृक्षों के पत्तों से यहाँ पर्णशालायें बना कर कल्पवृक्षों के चीवर
पहनने वाले देवताओं ने यहाँ बहुत समय तक तप किया था ॥३६॥
मन्दाकिनी यत्र ममौ विधातुः कमण्डलौ मण्डलितप्रवाहा।
तं कोटिशः पूरयतोप्यमुष्य न पूर्णता स्तोकमपि व्यपैति ॥३७॥
गंगा जी अपने प्राकट्य से पहले अपने उद्गम स्थान ब्रह्मा जी के कमण्डलु में समा कर उसी
में चक्कर काटा करती थीं। ब्रह्मा जी के उस कमण्डलु को, जिसमें सारी गंगा जी एक बार में ही
पूरी समा रही थीं, करोड़ों बार भर देने पर भी इस पुष्कर के जल में ज़रा भी कमी नहीं आई।
(पुष्कर में ब्रह्मा जी का मन्दिर है और यह ब्रह्मा जी का ही तीर्थ माना जाता है। संध्यादि
नियमों के लिये ब्रह्माजी अपने कमण्डलु को पुष्कर के जल से ही भरते हैं) ॥३७॥
उद्गायतामत्र समं चतुर्णां शृण्वन् मुखेभ्यश्चतुरोऽपि वेदान्।
चतुर्मुखीकण्ठनिनादशङ्की चमत्कृतिं याति जरन्मरालः ॥३८॥
एक साथ चार ब्राह्मणों के चार मुखों से चारों वेदों की ध्वनि सुन कर वृद्ध हंस उसे अपने
चार मुख वाले स्वामी ब्रह्माजी द्वारा कृत वेदपाठ समझ कर चौंक पड़ता है ॥३८॥
अन्तेवसन्तः कलशिञ्जितानां वाणीपदाम्भोरुहनूपुराणाम्।
हिन्दोलनाकौतुकमन्वभूवन् हंसा विधेरस्य ततैस्तरङ्गैः ॥३९॥
अपने सुन्दर स्वरों के उच्चारण में सरस्वती के चरणकमलों के नूपुरों की ध्वनि से शिक्षा
लेने वाले ब्रह्मा जी के हंस इस पुष्कर की विस्तृत तरंगों में झूला झूलने का आनन्द ले रहे हैं ॥३९॥
तीर्थान्तराणामपि कोटयोऽस्य सेवाविधिज्ञाः सविधे सदैव।
अध्यासते साधयितुं स्वशक्तिं पुंसामसाधारणशुद्धिदात्रीम् ॥४०॥
अन्य करोड़ों तीर्थ, पुष्कर की सेवा में दत्तचित्त होकर लोगों को असाधारण शुद्धि देने वाली
अपनी शक्ति को सिद्ध करने के लिये यहाँ सदा बैठे रहते हैं ॥४०॥
एकैकमस्मात् कमलं विचिन्वन् नवं नवं प्रत्यहमासनाय।
सरोजिनीखण्डमखण्डरूपमपालयत् कौतुकतो विरिञ्चिः ॥४१॥
अपने आसन के लिये पुष्कर में से प्रति दिन एक नया कमल तोड़ने वाले ब्रह्मा जी ने कौतुक-
वश इसमें कभी समाप्त न होने वाला कमलों का समूह लगा रक्खा है ॥४१॥
अत्रावदातं शतपत्रजातं भृङ्गैः क्वचित् मेचकितञ्चकास्ति।
सव्योम शङ्के शरदभ्रखण्डं सूर्याशुतापात् पतितं पयःसु ॥४२॥
यहाँ पुण्डरीकों (सफेद कमलों) का समूह, काले भ्रमरों से युक्त होने के कारण, ऐसा
(३७) गंगा विधेः कमण्डलोः प्रादुरासीत् ।

सप्तमः सर्गः ६९
शोभित हो रहा है मानों शरद् ऋतु के सफ़ेद बादल का टुकड़ा अपने साथ थोड़े से काले
आकाश के टुकड़े को लेता हुआ, सूर्य की किरणों की गर्मी से घबराकर पुष्कर के जल में शान्ति
पाने के लिये आ गिरा हो ॥४२॥
नवेन्दुवक्त्राऽविरतं बिभर्ति विशालशोभां बिसकन्दलीयम् ।
मग्नस्य मध्येसलिलं सलीलं दंष्ट्रेव भूदारतनोर्मुरारेः ॥४३॥
जलमग्न नीलकमलों की सदा द्वितीया के अर्धचन्द्र के समान शुभ्र और अर्धवृत्ताकार (सफेद)
मृणालकन्दली, लीलावश जल के भीतर निमग्न (नीले) भगवान् विष्णु के वराहावतार की
(सफ़ेद) दाढ़ के समान, सुशोभित हो रही है ॥४३॥
गाहन्त एते गहनं न पाथः पाथोजिनीपल्लवभङ्गभीताः ।
दिग्दन्तिनो दूरत एव गण्डं गण्डूषितैरम्बुभिरार्द्रयन्ति ॥४४॥
(ब्रह्मा द्वारा लगाई हुईं) कमलिनी के पत्तों के टूट जाने के भय से ये दिशाओं के हाथी
पुष्कर के गहरे पानी में न उतर कर दूर से ही सूँड़ों में जल ले लेकर अपने मस्तकों को गीला कर
रहे हैं ॥४४॥
अन्तर्विशत्षट्पदराजिराजत्सिताम्बुजस्तोममिषेण मन्ये ।
शरीरवान् सत्वगुणोऽत्र मूर्तं तमः समस्तं कवलीकरोति ॥४५॥
अपने अन्दर स्थित काले भ्रमरों की पंक्ति से शोभित श्वेत कमल ऐसे प्रतीत होते हैं मानो
शरीरंधारी सत्त्वगुण यहाँ मूर्तिमान् तमोगुण को निगल रहा हो ॥४५॥
अद्याप्यमुष्मिन्नरुणद्युतीनि सद्यः प्रबुद्धानि सरोरुहाणि ।
विरिञ्चिवक्त्रप्रतिबिम्बबुद्ध्या वृद्धा न हंसाः परिमर्द्दयन्ति ॥४६॥
आज भी यहाँ पुष्कर में लगे हुये अरुण शोभा वाले और ताज़ा खिले हुये रक्तकमलों को
ब्रह्मा जी के मुख के समान समझ कर वृद्ध हंस नहीं रौंदते ॥४६॥
अपारयन् प्राणिवधं विधातुं व्यपेतपङ्केऽत्र बको वराकः ।
कारण्डवाऽऽस्वादितकोमलाग्रैः शैवालकैर्वर्तयते कथञ्चित् ॥४७॥
यहाँ पुष्कर में प्राणिहिंसा न कर सकने के कारण और कीचड़ का भी अभाव होने के कारण
(कुछ न मिलने पर बगुला कीचड़ भी खा लेता है) बिचारा बगुला काई में उगने वाले छोटे छोटे
पौधों से ही, जिनके कोमल ऊपरी भागों को भी कारण्डव पक्षी खा गये हैं, किसी प्रकार निर्वाह
कर रहा है ॥४७॥
महान्तमप्याश्रितवान् नितान्तं नीचो न नीचां प्रकृतिं जहाति ।
स्वच्छन्दपद्मोऽपि सरोवरेऽस्मिन् यच्छैवलं शील्यते बकोटः ॥४८॥
(अथवा) महान् व्यक्ति का आश्रय लेने पर भी नीच कभी अपनी नीचता नहीं छोड़ता।
इस पुष्कर में सुन्दर खिले हुये कमलों के होते हुये भी यह क्षुद्र बगुला काई के पौधों का ही आश्रय
ले रहा है ॥४८॥

२. सर्ग ६-१०: राव सुर्जन हाड़ा पराक्रम, रणथम्भौर दुर्ग रक्षा एवं दिग्विजय

७० सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
अस्मिन् निशायामपि पुष्पितानां सरोरुहां रेणुभरैः पिशङ्गम् ।
स्वकान्तबुद्धया किल चक्रवाकी चक्राङ्गमाक्रन्दपरानुयाति ॥४९॥
यहाँ पुष्कर में रात में भी खिले हुये कमलों के पराग से ढके हुये और इसलिये पीले दिखाई
देने वाले हंस के पीछे-पीछे चकवी (कमलों के खिलने से प्रभात का अनुमान लगा कर) उसे
अपना पति समझ कर, कूजती हुई चल रही है ॥४९॥
स्वयं विधाता स विधिर्विधीनां सङ्कल्पमात्रोपचितैः पदार्थैः ।
त्रेतामिहाधाय जुहाव कुर्वन् त्रयीगिरो निस्त्रैगुणाः कृतार्थाः ॥५०॥
संकल्प-मात्र से समस्त पदार्थों को उपस्थित करके सम्पूर्ण विधियों को पूर्ण करने वाले, सब
विधियों के स्वामी स्वयं ब्रह्मा जी ने यहाँ पुष्करतीर्थ में यज्ञ की तीनों अग्नियों को (गार्हपत्य,
आहवनीय और दक्षिण) एकत्रित करके, वेद-मंत्रों को सचमुच निस्त्रैगुण्य सिद्ध करने के लिये
निष्काम भाव से यज्ञ प्रारंभ किया (वेद प्रतिपादित यज्ञ कामनाओं के कारण किये जाते हैं जैसे-
'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि, अतः वेद भी कामना पूर्ण करने के कारण त्रैगुण्यविषय हुये; किन्तु
स्वयं ब्रह्मा जी को किसी कामना की आवश्यकता नहीं थी, अतः उन्होंने निष्काम भाव से यज्ञ
करके मानों वेदों का निस्त्रैगुण्य होना सिद्ध किया) ॥५०॥
स्वयं स ईशः सकलस्य कर्ता समं समस्तैरपि देवतैस्तैः ।
मखैरखण्डैः कतमं नु देवं संप्रीणयामास न तं विदामः ॥५१॥
पूर्ण समर्थ और सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करने वाले स्वयं ब्रह्मा जी ने, सब देवताओं को
साथ लेकर, किस देवता को प्रसन्न करने के लिये वह अखण्ड यज्ञ किया, इस बात को हम नहीं
जानते ॥५१॥
हुताशने यद् विधिवद् वितीर्णं सुधाभुजां नाम सुधा तदेव ।
वषट्कृतं यद् विधिनात्मनैव तत्रापि कः कल्पयितुं क्षमेत ॥५२॥
यज्ञ की अग्नि में विधिपूर्वक जो कुछ हवन किया जाता है वह अमृत बन जाता है और देवता
उसे ग्रहण करते हैं; किन्तु (समस्त देवताओं से सेवित) स्वयं ब्रह्मा जी ने उस यज्ञ में जो आहुति
दी, वह आहुति क्या बनी और किसने उसे ग्रहण किया इसकी कल्पना कौन कर सकता है ? ॥५२॥
सत्यामपि प्रार्थितवस्तुसिद्धेः समग्रतायामिह सप्ततन्तौ ।
वनान्तराद् व्योमसदां समूहः समित्कुशादीन् स्वयमाजहार ॥५३॥
समस्त वाञ्छित वस्तुओं की सम्पूर्ण सिद्धि विद्यमान होने पर भी ब्रह्मा जी द्वारा कृत उस
यज्ञ के लिये स्वयं देवता गण वन में से समिधा और कुश इत्यादि लाये ॥५२॥
(४९) चक्राङ्गं हंसम् ।
(५०) त्रेतामग्नित्रयीं गार्हपत्याहवनीयदक्षिणरूपाम्। वेदप्रतिपादितयज्ञादिकर्मणां. 'स्वर्गकामो यजेत'
इत्यादि वचनात् काम्यकर्मरूपत्वात् 'त्रैगुण्यविषया वेदाः' इत्युक्तं, किन्तु विधिः स्वयं निष्कामभावेन यज्ञं कृतवा-
निति वेदगिरो निस्त्रैगुण्यमेव तेन सम्पादितम् ।
(५२) यज्ञाग्नौ यद् विधिवत् हुतं तदेव सुधा भवति देवाश्च तद् गृह्णन्ति । उक्तं च माघैरपि- 'अमृतं
नाम यत् सन्तो मन्त्रजिह्वेषु जुह्वति' इति । किन्तु यत् स्वयं ब्रह्मणा हुतं तत् किमभवत् केन च तद् गृहीतमिति
विज्ञातुं कः समर्थो भवेत् ?

सप्तमः सर्गः ७१
हविर्भुजस्तत्र पवित्रिताशे वितायमाने दिवि भव्यगन्धे ।
अमन्दमन्दारमरन्दधारासौरभ्यमभ्यस्तमपि प्रलीनम् ॥५४॥
उस यज्ञ की अग्नि की दिशाओं को पवित्र करने वाली अलौकिक सुगन्ध के आकाश में व्याप्त
होने पर उसके आगे देवताओं द्वारा अभ्यस्त, कल्पवृक्षों के मकरन्द की तीव्र और दिव्य सगन्ध
भी फीकी पड़ गई ॥५४॥
तस्मिन् मखे ब्रह्मविदामृषीणां यः सामघोषस्त्रिदिवं जगाम ।
तिरोदधे दैवतदुन्दुभीनामनातं तेन गभीरनादः ॥५५॥
उस यज्ञ में ब्रह्म को जानने वाले ऋषियों की स्वर्ग तक जाने वाली सामवेद की गंभीर ध्वनि
के आगे देवताओं की दुन्दुभियों की ध्वनि छिप गई ॥५५॥
शुद्धिं वितन्वन् मलिनोऽपि सत्वं प्रकाशयन्नत्र तमोमयोऽपि ।
स्वयंभुवा संभृतसाधुहव्याद् धूमः कृशानोरुदभूदुदग्रः ॥५६॥
ब्रह्मा जी द्वारा हवन किये गये उत्तम हव्य से जो यज्ञाग्नि में तीव्र धुयाँ उठा वह मलिन
(मटमैला ; अपवित्र) होने पर भी चारों ओर पवित्रता बरसा रहा था और तमोमय (काला ;
तमोगुणी) होने पर भी सत्वगुण का प्रकाश कर रहा था ॥५६॥
इत्थं वितन्वन् विधिवद् वितानमुत्प्रेक्ष्य विघ्नस्य पुरोऽवतारम् ।
विधिर्विधित्सुः प्रतिकारमस्य दिदेश दृष्टिं दिवसाधिनाथे ॥५७॥
इस प्रकार विधिवत् यज्ञ करते समय ब्रह्मा जी ने, भावी विघ्न की संभावना देखकर, उस
विघ्न का प्रतिकार करने की इच्छा से, सूर्य पर दृष्टि डाली ॥५७॥
बिम्बादथाम्भोजवनस्य बन्धोः स्वधामसन्दोहनिरूढदेहः ।
अवातरद् वातरयेण कश्चित् पुमान् पुरस्तात् परमेष्ठिनोऽस्य ॥५८॥
उसी समय सूर्य के बिम्ब से, अपने तेजःपुञ्ज से ढके हुये शरीर वाले एक पुरुष वायु के
समान वेग से उतर कर ब्रह्मा जी के आगे आ खड़े हुये ॥५८॥
बाणासनं सज्यमसिं सशक्तिं महेषुधी मार्गणपूगपूर्णौ ।
बिभ्रच्चतुर्बाहुरवार्यवीर्यो वधं विधास्यन् मखबाधकानाम् ॥५९॥
वे तेजस्वी पुरुष मौर्वी सहित धनुष को, मंत्रशक्ति से युक्त तलवार को और बाणों के समूह
से भरे हुये दो भारी तरकसों को लिये हुये थे । उनके चार भुजायें थीं । उनका बल अजेय था ।
वे यज्ञ में बाधा पहुँचाने वाले पापियों का वध करने वाले थे ॥५९॥
ध्रुवं चतुर्बाहुरिति प्रसिद्धः स चाहुवाणः किल लौकिकोक्त्या ।
वंशस्य कर्ता भवतां बभूव संरक्षितोऽधिक्षिति विश्वधात्रा ॥६०॥
वे तेजस्वी पुरुष निश्चय ही 'चतुर्बाहुमान्' इस नाम से प्रसिद्ध हुये । लोगों में यह 'चतुर्बाहु-
मान्' नाम अपभ्रंश के कारण 'चाहुवाण' (चौहाण) बन गया । ब्रह्मा जी द्वारा इस पृथ्वी पर
संरक्षित वे चतुर्बाहुमान् आपके वंश के कर्ता थे ॥६०॥

७२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
लोकालोकेनेव भूलोकमेतत् तीर्थश्रेष्ठं तीर्थबन्धैः समन्तात् ।
सम्भाव्यैतत् सम्भृतैः कीर्तिपूरैः पृथ्वीमेतां पूरय क्षोणिपाल ॥६१॥
राजन् ! (आपके वंश के कर्ता यहाँ पुष्कर में ही उत्पन्न हुये थे अतः यह पुष्कर तीर्थ आपके
लिये अत्यन्त पवित्र है।) जिस प्रकार लोकालोक पर्वत से यह पृथ्वीलोक घिरा हुआ है, उसी प्रकार
इस पुष्कर को जो तीर्थों में श्रेष्ठ है, आप चारों ओर दृढ़ घाटों से घेर कर अपनी विशाल-कीर्ति
से इस पृथ्वी को भर दीजिये ॥६१॥
वर्षाण्येवं द्वादशास्मिन्नुषित्वा स्वेच्छाभोज्यैस्तर्पयन् भूमिदेवान् ।
लब्धासि त्वं ब्रह्मसायुज्यमग्रे यद् दुष्प्रापं यज्वभिर्भूरियज्ञैः ॥६२॥
बारह वर्ष यहाँ रह कर ब्राह्मणों को स्वेच्छा भोजन से तृप्त करके आप विपुल यज्ञ करने वाले
याजकों द्वारा भी दुष्प्राप्य ब्रह्मसायुज्य मोक्ष को प्राप्त कीजिये । (मोक्ष चार प्रकार का माना
गया है—सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य । इनमें सायुज्य सर्वश्रेष्ठ है) ॥६२॥
इति सुर्जनचरिते महाकाव्ये सप्तम सर्गः ।
(६१) लोकालोकः भूलोकपरिधिरूपो विशालः पर्वतविशेषः ।