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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 256 में से

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पृष्ठ 95

सप्तमः सर्गः ६९
शोभित हो रहा है मानों शरद् ऋतु के सफ़ेद बादल का टुकड़ा अपने साथ थोड़े से काले
आकाश के टुकड़े को लेता हुआ, सूर्य की किरणों की गर्मी से घबराकर पुष्कर के जल में शान्ति
पाने के लिये आ गिरा हो ॥४२॥
नवेन्दुवक्त्राऽविरतं बिभर्ति विशालशोभां बिसकन्दलीयम् ।
मग्नस्य मध्येसलिलं सलीलं दंष्ट्रेव भूदारतनोर्मुरारेः ॥४३॥
जलमग्न नीलकमलों की सदा द्वितीया के अर्धचन्द्र के समान शुभ्र और अर्धवृत्ताकार (सफेद)
मृणालकन्दली, लीलावश जल के भीतर निमग्न (नीले) भगवान् विष्णु के वराहावतार की
(सफ़ेद) दाढ़ के समान, सुशोभित हो रही है ॥४३॥
गाहन्त एते गहनं न पाथः पाथोजिनीपल्लवभङ्गभीताः ।
दिग्दन्तिनो दूरत एव गण्डं गण्डूषितैरम्बुभिरार्द्रयन्ति ॥४४॥
(ब्रह्मा द्वारा लगाई हुईं) कमलिनी के पत्तों के टूट जाने के भय से ये दिशाओं के हाथी
पुष्कर के गहरे पानी में न उतर कर दूर से ही सूँड़ों में जल ले लेकर अपने मस्तकों को गीला कर
रहे हैं ॥४४॥
अन्तर्विशत्षट्पदराजिराजत्सिताम्बुजस्तोममिषेण मन्ये ।
शरीरवान् सत्वगुणोऽत्र मूर्तं तमः समस्तं कवलीकरोति ॥४५॥
अपने अन्दर स्थित काले भ्रमरों की पंक्ति से शोभित श्वेत कमल ऐसे प्रतीत होते हैं मानो
शरीरंधारी सत्त्वगुण यहाँ मूर्तिमान् तमोगुण को निगल रहा हो ॥४५॥
अद्याप्यमुष्मिन्नरुणद्युतीनि सद्यः प्रबुद्धानि सरोरुहाणि ।
विरिञ्चिवक्त्रप्रतिबिम्बबुद्ध्या वृद्धा न हंसाः परिमर्द्दयन्ति ॥४६॥
आज भी यहाँ पुष्कर में लगे हुये अरुण शोभा वाले और ताज़ा खिले हुये रक्तकमलों को
ब्रह्मा जी के मुख के समान समझ कर वृद्ध हंस नहीं रौंदते ॥४६॥
अपारयन् प्राणिवधं विधातुं व्यपेतपङ्केऽत्र बको वराकः ।
कारण्डवाऽऽस्वादितकोमलाग्रैः शैवालकैर्वर्तयते कथञ्चित् ॥४७॥
यहाँ पुष्कर में प्राणिहिंसा न कर सकने के कारण और कीचड़ का भी अभाव होने के कारण
(कुछ न मिलने पर बगुला कीचड़ भी खा लेता है) बिचारा बगुला काई में उगने वाले छोटे छोटे
पौधों से ही, जिनके कोमल ऊपरी भागों को भी कारण्डव पक्षी खा गये हैं, किसी प्रकार निर्वाह
कर रहा है ॥४७॥
महान्तमप्याश्रितवान् नितान्तं नीचो न नीचां प्रकृतिं जहाति ।
स्वच्छन्दपद्मोऽपि सरोवरेऽस्मिन् यच्छैवलं शील्यते बकोटः ॥४८॥
(अथवा) महान् व्यक्ति का आश्रय लेने पर भी नीच कभी अपनी नीचता नहीं छोड़ता।
इस पुष्कर में सुन्दर खिले हुये कमलों के होते हुये भी यह क्षुद्र बगुला काई के पौधों का ही आश्रय
ले रहा है ॥४८॥