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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 256 में से

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पृष्ठ 84

५८ | सुर्जनचरितमहाकाव्यम्

सारमाकृष्य कैलासात् किंवा ब्रह्माण्डभाण्डतः ।
निर्मिता नु वृषाङ्केन निजावासाय या स्वयम् ॥६२॥
क्या इस अवन्ति नगरी को स्वयं भगवान् शिव ने अपने रहने के लिये कैलास या ब्रह्माण्ड
के सार से निर्मित किया था ? ॥६२॥
शिप्रासरिति स स्नात्वा विप्राणां विहिताऽर्हणः ।
अथ प्रमथनाथस्य प्रासादं प्राविशद् वशी ॥६३॥
शिप्रा नदी में स्नान करके और ब्राह्मणों की पूजा करके जितेन्द्रिय नृपति बीसलदेव महाकाल
के मन्दिर में गये ॥६३॥
अर्चयित्वाऽवनीपालः पुष्पधूपादिसाधनैः ।
प्रभुं प्रभूतया भक्त्या तुष्टावाऽष्टतनूभृतम् ॥६४॥
राजा ने पुष्प धूप आदि साधनों से भगवान् शिव की पूजा करके अष्टमूर्ति महेश्वर को अपनी
प्रगाढ भक्ति से प्रसन्न किया ॥६४॥
जयकर्पूरगौराङ्ग गिरां साम्नामगोचर ।
गरीयःकरुणागार गौरीरूढार्धविग्रह ॥६५॥
हे कपूर के समान् शुभ्र शरीर वाले, सामवेद की ऋचाओं द्वारा भी अगोचर, महान् करुणा
के आगार, अर्द्धनारीश्वर भगवान् शंकर ! आपकी जय हो ॥६५॥
बालचन्द्रलसद्भाल जय व्यालविभूषण ।
जय देव महाकाल जहि कालमहाभयम् ॥६६॥
हे बाल चन्द्र से शोभित मस्तक वाले, सर्प के आभूषण वाले, महाकाल ! आपकी जय हो ।
देव ! हमारे कालरूपी महाभय को नष्ट कीजिये ॥६६॥
कृपापालितदिक्पाल कपालप्रोल्लसत्कर ।
वेतालपूतनापाल कालकण्ठ नमोऽस्तु ते ॥६७॥
हे अपनी कृपा से दिक्पालों का पालन करने वाले, हाथ में कपाल धारण करने वाले, वेतालों
की सेना का पालन करने वाले, नीलकण्ठ भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥६७॥
त्रिलोकीशरण त्र्यक्ष त्र्यम्बक त्रिपुरापते ।
निस्त्रैगुण्य त्रयीसार तारयास्माद् भवार्णवात् ॥६८॥
हे तीनों लोकों के शरण, तीन अक्षमाला धारण करने वाले, त्रिनेत्र वाले, त्रिपुरा देवी के
पति, निस्त्रैगुण्य, तीनों वेदों के सार ! इस भवसागर से हमें तार दीजिये ॥६८॥
स्मृतिमात्रेण जन्तूनां शमयन्तं तमः प्रभो ।
ये त्वां तमोमयं प्राहुस्त एव तमसा हताः ॥६९॥
प्रभो ! आप स्मरणमात्र से प्राणियों के तम को नष्ट कर देते हैं। जो आपको तमोमय कहते
हैं वे ही तम रूपी अज्ञान से मारे गये हैं ॥६९॥