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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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८ षष्ठः सर्गः ५७
यत्रासन्नमहादेवदृष्टिपातभयादिव ।
मालवीलोचनोपान्ते विलीनो मीनकेतनः ॥५४॥
जहाँ समीपस्थित भगवान् शिव के दृष्टिपात के भय से (भस्म हो जाने के भय से) मानों
कामदेव मालव-रमणियोँ के नेत्रों के कोनों में छिप रहा था ॥५४॥
वाणीपाणिलसद्वीणाक्वणितैर्मिलितस्वराः ।
यस्यां सोमं जगुः सोमशेखरं नगरस्त्रियः ॥५५॥
जहाँ सरस्वती के हाथ में शोभित वीणा के स्वरों से स्वर मिला कर नगर की स्त्रियाँ पार्वती-
सहित भगवान् चन्द्रचूड़ साम्बशिव की स्तुतियाँ गाती थीं ॥५५॥
सदा हरशिरश्चन्द्रकरालम्बनलालिताः ।
शिप्राशीकरसम्भिन्नसमीरमृदुलीकृताः ॥५६॥
मानिनीसमुदायस्य यस्यां मानसवृत्तयः ।
आययुर्न कठोरत्वं वल्लीनामपि पल्लवाः ॥५७॥
जहाँ सदा शिव के मस्तक पर स्थित चन्द्र की किरणों द्वारा लालित, और शिप