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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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७२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
लोकालोकेनेव भूलोकमेतत् तीर्थश्रेष्ठं तीर्थबन्धैः समन्तात् ।
सम्भाव्यैतत् सम्भृतैः कीर्तिपूरैः पृथ्वीमेतां पूरय क्षोणिपाल ॥६१॥
राजन् ! (आपके वंश के कर्ता यहाँ पुष्कर में ही उत्पन्न हुये थे अतः यह पुष्कर तीर्थ आपके
लिये अत्यन्त पवित्र है।) जिस प्रकार लोकालोक पर्वत से यह पृथ्वीलोक घिरा हुआ है, उसी प्रकार
इस पुष्कर को जो तीर्थों में श्रेष्ठ है, आप चारों ओर दृढ़ घाटों से घेर कर अपनी विशाल-कीर्ति
से इस पृथ्वी को भर दीजिये ॥६१॥
वर्षाण्येवं द्वादशास्मिन्नुषित्वा स्वेच्छाभोज्यैस्तर्पयन् भूमिदेवान् ।
लब्धासि त्वं ब्रह्मसायुज्यमग्रे यद् दुष्प्रापं यज्वभिर्भूरियज्ञैः ॥६२॥
बारह वर्ष यहाँ रह कर ब्राह्मणों को स्वेच्छा भोजन से तृप्त करके आप विपुल यज्ञ करने वाले
याजकों द्वारा भी दुष्प्राप्य ब्रह्मसायुज्य मोक्ष को प्राप्त कीजिये । (मोक्ष चार प्रकार का माना
गया है—सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य । इनमें सायुज्य सर्वश्रेष्ठ है) ॥६२॥
इति सुर्जनचरिते महाकाव्ये सप्तम सर्गः ।
(६१) लोकालोकः भूलोकपरिधिरूपो विशालः पर्वतविशेषः ।