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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

सप्तमः सर्गः ७१
हविर्भुजस्तत्र पवित्रिताशे वितायमाने दिवि भव्यगन्धे ।
अमन्दमन्दारमरन्दधारासौरभ्यमभ्यस्तमपि प्रलीनम् ॥५४॥
उस यज्ञ की अग्नि की दिशाओं को पवित्र करने वाली अलौकिक सुगन्ध के आकाश में व्याप्त
होने पर उसके आगे देवताओं द्वारा अभ्यस्त, कल्पवृक्षों के मकरन्द की तीव्र और दिव्य सगन्ध
भी फीकी पड़ गई ॥५४॥
तस्मिन् मखे ब्रह्मविदामृषीणां यः सामघोषस्त्रिदिवं जगाम ।
तिरोदधे दैवतदुन्दुभीनामनातं तेन गभीरनादः ॥५५॥
उस यज्ञ में ब्रह्म को जानने वाले ऋषियों की स्वर्ग तक जाने वाली सामवेद की गंभीर ध्वनि
के आगे देवताओं की दुन्दुभियों की ध्वनि छिप गई ॥५५॥
शुद्धिं वितन्वन् मलिनोऽपि सत्वं प्रकाशयन्नत्र तमोमयोऽपि ।
स्वयंभुवा संभृतसाधुहव्याद् धूमः कृशानोरुदभूदुदग्रः ॥५६॥
ब्रह्मा जी द्वारा हवन किये गये उत्तम हव्य से जो यज्ञाग्नि में तीव्र धुयाँ उठा वह मलिन
(मटमैला ; अपवित्र) होने पर भी चारों ओर पवित्रता बरसा रहा था और तमोमय (काला ;
तमोगुणी) होने पर भी सत्वगुण का प्रकाश कर रहा था ॥५६॥
इत्थं वितन्वन् विधिवद् वितानमुत्प्रेक्ष्य विघ्नस्य पुरोऽवतारम् ।
विधिर्विधित्सुः प्रतिकारमस्य दिदेश दृष्टिं दिवसाधिनाथे ॥५७॥
इस प्रकार विधिवत् यज्ञ करते समय ब्रह्मा जी ने, भावी विघ्न की संभावना देखकर, उस
विघ्न का प्रतिकार करने की इच्छा से, सूर्य पर दृष्टि डाली ॥५७॥
बिम्बादथाम्भोजवनस्य बन्धोः स्वधामसन्दोहनिरूढदेहः ।
अवातरद् वातरयेण कश्चित् पुमान् पुरस्तात् परमेष्ठिनोऽस्य ॥५८॥
उसी समय सूर्य के बिम्ब से, अपने तेजःपुञ्ज से ढके हुये शरीर वाले एक पुरुष वायु के
समान वेग से उतर कर ब्रह्मा जी के आगे आ खड़े हुये ॥५८॥
बाणासनं सज्यमसिं सशक्तिं महेषुधी मार्गणपूगपूर्णौ ।
बिभ्रच्चतुर्बाहुरवार्यवीर्यो वधं विधास्यन् मखबाधकानाम् ॥५९॥
वे तेजस्वी पुरुष मौर्वी सहित धनुष को, मंत्रशक्ति से युक्त तलवार को और बाणों के समूह
से भरे हुये दो भारी तरकसों को लिये हुये थे । उनके चार भुजायें थीं । उनका बल अजेय था ।
वे यज्ञ में बाधा पहुँचाने वाले पापियों का वध करने वाले थे ॥५९॥
ध्रुवं चतुर्बाहुरिति प्रसिद्धः स चाहुवाणः किल लौकिकोक्त्या ।
वंशस्य कर्ता भवतां बभूव संरक्षितोऽधिक्षिति विश्वधात्रा ॥६०॥
वे तेजस्वी पुरुष निश्चय ही 'चतुर्बाहुमान्' इस नाम से प्रसिद्ध हुये । लोगों में यह 'चतुर्बाहु-
मान्' नाम अपभ्रंश के कारण 'चाहुवाण' (चौहाण) बन गया । ब्रह्मा जी द्वारा इस पृथ्वी पर
संरक्षित वे चतुर्बाहुमान् आपके वंश के कर्ता थे ॥६०॥