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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

८८ * श्रीरामचरितमानस *
उन्हें [पहरेपर] ठहराकर वे सुग्रीवके पास आये और उनको
सब समाचार कह सुनाये। सुग्रीवने [श्रीरामजीके पास जाकर]
कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये, रावणका भाई [आपसे] मिलने
आया है॥ २॥
कह प्रभु सखा बूझिए काहा।
कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया॥ ३॥
प्रभु श्रीरामजीने कहा—हे मित्र! तुम क्या समझते हो
(तुम्हारी क्या राय है)? वानरराज सुग्रीवने कहा—हे महाराज!
सुनिये, राक्षसोंकी माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप
बदलनेवाला (छली) न जाने किस कारण आया है॥ ३॥
भेद हमार लेन सठ आवा।
राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी।
मम पन सरनागत भयहारी॥ ४॥
[जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिये
मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय।
[श्रीरामजीने कहा—] हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी।
परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागतके भयको हर लेना!॥ ४॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना॥ ५॥
प्रभुके वचन सुनकर हनुमान्जी हर्षित हुए [और मन-ही-