सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
८८ / सुदामा-चरित
दुखिया ब्राह्मणी रहती है।
(७६) शब्दार्थ—सो = से। तिन = उन्होंने। कहि पठवहु = कहला भेजो।
व्याख्या—नगर-निवासियों ने द्वारपाल से कहा—भीतर (सुदामा
की पत्नी के पास) खबर भिजवा दो कि ब्राह्मण-देवता आ गये हैं। अपने पति
का दर्शन कर सनाथ सो जाओ। (इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है—
भीतर यह खबर भिजवा दो, ब्राह्मणदेवता आ गये हैं कि ब्राह्मणी उनका दर्शन
कर कृतकृत्य हो जायें।)
(७७) शब्दार्थ—नूपुर = पेंजनी। किंकिनि—किंकिणी = करधनी; कमर-
कस। दुंदभी = दुन्दुभी, नगाड़ा। मनहु काम चतुरंग = मानो कामदेव की चतुरं-
गिणी सेना। चतुरंगिनी = चार अंगों (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) वाली सेना।
व्याख्या—ब्राह्मणी वह सूचना पाकर बहुत प्रसन्न हुई और अपनी सखियों
के साथ पाजेब, करधनी की घंटिकाओं की ध्वनि करती हुई, नगाड़े के संगीत के
बीच इस प्रकार द्वार की ओर चली मानो कामदेव की चतुरंगिणी सेना आ रही
हो।
विशेष—इस दोहे में श्रीकृष्ण की अपार कृपा से धन-वैभव पाने वाली
सुदामा-पत्नी की साज-सज्जा का अलंकृत वर्णन हुआ है और उत्प्रेक्षा अलंकार
उस सौष्ठव की वृद्धि में सहायक है।
(७८) शब्दार्थ—कंत = पतिदेव। गेह = घर।
व्याख्या—ब्राह्मणी ने सुदामा से आ कर कहा—हे नाथ! यही अपना घर
है। श्रीकृष्ण ने इस प्रकार हमारी दरिद्रता का नाश करके तीनों लोकों में
अपनी मैत्री-प्रेम को प्रकट किया है।
(७६) शब्दार्थ—जनि = मत। जनि कहो = न कहो। सँभारि = सँभाल
कर; सोच-विचार कर। इहैं = यहीं पर। कुटी मेरी हती = मेरी झोपड़ी
थी। बापुरी = बेचारी।
व्याख्या—(सुदामा अपनी पत्नी को पहचान न सके। अपने सामने एक
पटरानी को खड़ी देख कर और उसके द्वारा पति सम्बोधन सुन कर वे बहुत
चकमकाये। उन्होंने कहा—) तुम सोच-समझ कर बोलो; मुझे अपना पति मत
सुदामा-चरित / ८६
कहो। (हाँ,) यहीं पर मेरी झोपड़ी थी जिसमें बेचारी मेरी दुखिया पत्नी रहती
थी।
(८०) शब्दार्थ—तिहारियै=आपकी ही; तुम्हारी ही। सुधि सँभारिए=
होश कीजिये; याद कीजिये। प्रभुता=प्रभुत्व। श्री भगवंत=श्रीकृष्ण।
व्याख्या। (पति का शंका दूर करने के लिए सुदामा की पत्नी ने कहा—)
हे नाथ ! होश सँभालिये, जरा ध्यान से देखिये, मैं आपकी ही स्त्री हूँ। यह
सब धन-सम्पत्ति और सुन्दरता भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त हुई है।
(८१) शब्दार्थ—परी हुती=पड़ी हुई थी। तामैं=उसी में। दुःख काटौं
=दुःख के दिन बिताते थे। हेम-धाम=सोने का घर। जेवर-जराऊ=जड़ाऊ
गहने। साजे=पहने। छूछी=खाली; बिना गहनों की। छाम=क्षीण। सारी-
जरतारी=साड़ी जिस पर ज़री का काम किया हुआ हो। कारी=काली।
कामरी=कम्बल। पड़ाइन=पड़िवाइन; ब्राह्मणी। तिहारी अनुहार=तुम्हारे
समान रूप वाली। बिपदा-सताई=दुःख की मारी। पामरी=अभागिन।
व्याख्या—(अभी भी सुदामा को विश्वास न हुआ कि यह स्त्री मेरी पत्नी
है और यह महल मेरा अपना घर हे। उन्होंने कहा—) यहीं पर मेरी टूटी-फूटी
झोपड़ी थी। उसी में मेरी पत्नी अपने दुःख के दिन व्यतीत करती थी।
उस झोपड़ी के स्थान पर ये सोने के महल कैसे आ गये? (या, उसके रहने के
सोने के महल कहाँ थे?) तुम्हारा प्रत्येक अंग जड़ाऊ गहनों से सुशोभित है
और इतनी सखियाँ तुम्हारे साथ हैं। परन्तु मेरी ब्राह्मणी वह ब्राह्मणी दुबली-
पतली और अकेली थी; उसके शरीर पर कोई गहना न था। तुम ज़री के काम
की साड़ी और किनारेदार रेशमी दुपट्टा पहने हुए हो, परन्तु मेरी ब्राह्मणी के
पास तो ओढ़ने के लिए सिर्फ़ एक काली कामरिया थी। (हाँ,) तुम्हारी ओर
देख कर मैं इतना तो कह सकता हूँ कि मेरी वह ब्राह्मणी तुम्हारी ही सूरत-
शक्ल की थी। पर यह बात मेरी समझ में नहीं आती कि जन्म भर दुःख सहने
वाली बेचारी ब्राह्मणी को कुछ दिनों के अन्दर ही इतना धन-ऐश्वर्य कहाँ से
मिल गया? (अन्तिम पंक्ति का अर्थ, कुछ लोग इस प्रकार लगाते हैं—अपनी
विपदा की सतायी हुई दुखिया ब्राह्मणी को मैं कहाँ पाऊँगा?)
६० / सुदामा-चरित
विशेष—इस कवित्त में सुदामा की हैरानी, दुविधा आदि का अत्यन्त
स्वाभाविक चित्रण हुआ है। अनुप्रास अलंकार का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है।
(८२) शब्दार्थ—मंजु=सुन्दर। भायन सों=भावों से। तिहारोई=
तुम्हारी ही। हरौ=दूर कीजिये। श्रम=थकावट। भूरि=बहुत। दारिद
गमायो=दरिद्रता मिटायी। गह्यौ कर हैं=हाथ पकड़ती है। अविनासी=
अविनाशी=अमर। पूरन-प्रकाशी=पूर्ण ज्योतिर्मय। बरु=श्रेष्ठ।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने खड़ी होकर बड़ी कोमलता से कहा—हे
स्वामी ! मैं आपके चरण छूकर कहती हूं कि यह आपका ही घर है। आप
बहुत दूर से आये हैं, द्वारिका जाने में आपने बड़ा भारी कष्ट उठाया हैं। श्री-
कृष्ण की कृपा से हमारी दरिद्रता दूर हो गयी है। आइये, मैं अपनी सेवा से
आपकी थकावट दूर कर दूं। (सुदामा को इस प्रकार समझाते हुए स्त्री ने
उनका हाथ पकड़ लिया। सुदामा को अपनी बातों पर पूरा विश्वास न करते
देख वह उन्हें फिर समझाती है—) हे नाथ ! सोलहों कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण,
जिनका कभी नाश नहीं होता (जो ईश्वर के अवतार हैं) उन्होंने ही (मित्रता
निभाने के लिए) ऋद्धि-सिद्धियों को आपकी दासी बना दिया है, करोड़ों काम-
धेनु के साथ अपार सम्पत्ति और सब इच्छाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष
भी उन्होंने आपको दिया है। आप घर चलिए, भ्रम को त्यागिये और भगवान्
ने जो कुछ दिया है उसे ग्रहण कीजिए।
विशेष—इस कवित्त में सुदामा-पत्नी अपने अपार वैभव का रहस्य प्रकट
करते हुए श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की ओर अपने पति का ध्यान आकृष्ट करती
है।
(८३) शब्दार्थ —मुदित = प्रसन्न। अन्हवायो=स्नान करवाया। उबटि=
उबटन लगा कर। सुचि=शुचि - पवित्र।
व्याख्या—इस तरह पति को समझा-बुझा कर ब्राह्मणी उन्हें महल में ले
गयी और शीघ्र ही उसने उनके शरीर में पवित्र और सुगंधित उबटन मल-मल
कर उन्हें स्नान कराया।
(८४) शब्दार्थ— अंबर = वस्त्र। अंबर रचे = वस्त्र पहनाये।
सुदामा-चरित / ६१
व्याख्या—इसके बाद पति को सिंहासन पर बैठा कर ब्राह्मणी ने बड़े
आदर-प्रेम से उनकी पूजा की; तब उन्हें पवित्र और सुगंधित वस्त्र तथा सुन्दर-
सुन्दर आभूषण पहनाये ।
(८५) शब्दार्थ—सीतल = शीतल । अँचवायकै = आचमन करा कर ।
छवि = सुन्दर । रविप्रभा = सूर्य की कान्ति ।
व्याख्या—सुदामा को वस्त्र-आभूषण पहनाने के बाद ब्राह्मणी ने ठंडे जल से
उनके हाथ-पाँव धो कर उन्हें बैठाया । फिर पानों से भर कर पानदान उनके
पास ले जा कर रखा । वह पानदान अत्यन्त स्वच्छ और चमकीला था।
विशेष—इस दोहे में उपमा अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है ।
(८६) शब्दार्थ—रम्भा = देवलोक की अप्सरा, चिरयौवना, चिर-सुन्दरी ।
रंभादिक = रम्भा आदि; मेनका, रम्भा, उर्वशी, तिलोतमा और मंजुघोषा —ये
छः स्वर्ग की प्रधान अप्सराएँ हैं । बयारि = वायु ।
व्याख्या—रम्भा आदि अप्सराएँ चारों ओर से सुदामा पर चमर डुलाने
लगीं और उनकी पतिव्रता स्त्री पंखा झलने लगी ।
(८७) शब्दार्थ—स्वेत-छत्र = उजला चँदोवा । राजत = सुन्दर लगते हैं ।
सक्र = शक्र—इन्द्र । बाहन = सवारी । तुरँग = घोड़ा । बर = सुन्दर । अरु =
और । शुभ = मंगलमय । जान = यान—सवारी; रथ ।
व्याख्या—उजले चँदोवा के नीचे बैठे हुए सुदामा इन्द्र के समान सुशोभित
हो रहे थे । सुन्दर हाथी, घोड़े और रथ के अतिरिक्त और भी कई तरह की
सुखद सवारियाँ उनके पास थीं ।
(८८) शब्दार्थ—जानि परी = जान पड़ता है । गुरु-बन्धु = गुरु-भाई;
सहपाठी । हरिलीन्हीं = दूर कर दी । पीर = दुःख ।
व्याख्या—(जान-पड़ता है कि) गुरुभाई श्रीकृष्ण ने कल्पवृक्ष-सहित कामधेनु
दे कर सुदामा के सब कष्ट हर लिये ।
(८६) शब्दार्थ—सुधा = अमृत । वाम = स्त्री । बिनीत = विनीत, नम्र ।
मृदु = कोमल; मीठे । मन काम = मन की अभिलाषा ।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने विविध प्रकार से उनकी सेवा की और उन्हें
६२ / सुदामा-चरित
अमृत (या अमृत-तुल्य जल) पिलाया। इसके बाद उसने बड़ी नम्रता से मीठे
वचन कहे—अब मेरी सारी इच्छाएँ पूर्ण हो गयीं।
(६०) शब्दार्थ—लै=ले कर। आयसु=आज्ञा। तिय=स्त्री। न्हाइ करि
=स्नान करके। गौरि=गौरी—पार्वती। सोहाग-हित=सुहाग अचल रखने
के लिए। हित=हेतु; लिए।
व्याख्या—पति की आज्ञा ले कर सुदामा-पत्नी ने स्नान किया और पवित्र
सुगंध शरीर में लगा कर उसने बड़े प्रेम से अपने सौभाग्य की रक्षा के लिए
पार्वती की पूजा की।
(६१) शब्दार्थ—षटरस=मिष्ट, लवण, कटु, कषाय, अम्ल और तिक्त।
रचाय=सजा कर।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने छहों रसों से युक्त चारों प्रकार के भोजन
बनाये और सोने की थाली में उन्हें सजा कर रखा।
(६२) शब्दार्थ—डारि कै=बिछा कर। सुजानि=चतुर। भाजन-कनक
=सोने का पात्र। आनि=ला कर।
व्याख्या—चतुर दासी ने भोजन तैयार देख कर चंदन की चौकी बिछायी
और रत्नों से जड़े हुए सोने के एक पात्र में गंगाजल भर कर रख दिया।
(६३) शब्दार्थ—कूजा=जल रखने का छोटा पात्र; लुटिया। रच्छाधान
=ढक्कन। जल-प्रकाश=स्वच्छ जल। भर-पूरि=भर कर।
व्याख्या—(फिर) दासी ने ढक्कन सहित (रत्नों से जड़ा हुआ) जलपात्र ला
कर रखा, जिसमें पवित्र, सुगंधित एवं स्वच्छ जल पूरा भरा हुआ था।
(६४) शब्दार्थ—काम=लिए। मरकत मनि=नीलम। छविधाम - बहुत
सुन्दर।
व्याख्या—(फिर उसने) सुदामाजी के बैठने के लिए रत्न-जड़ित सोने का
पीढ़ा रखा और कुछ दूर पर मणियों से जड़ी हुई बहुत सुन्दर चौकी रखी।
(६५) शब्दार्थ—पाथ = पानी; जल। पादुका = खड़ाऊँ। सलिल = जल।
व्याख्या—सुदामाजी के पैर धोने के लिए चौकी मँगा कर रखी गयी तथा
जल के साथ, उनके पहनने को मणियों से जड़ी हुई खड़ाऊँ रखी गयी।
सुदामा-चरित / ६३
(६६) शब्दार्थ—मृदु भाखि = मीठे शब्दों में; मधुर शब्द वाली । साखि =
साक्षी । कृष्ण को साक्षी करके सुदामाजी ने धन्य-धन्य कहा ।
व्याख्या—दासी ने आ कर बड़े मीठे शब्दों में कहा—भोजन करने चलिये ।
(इस समय सुदामा के मन में यह विचार आया कि यह सब धन-ऐश्वर्य श्रीकृष्ण
की कृपा का ही फल है ।) अतः, यह कह कर कि 'हे श्रीकृष्ण ! आप धन्य हैं' वे
भोजन करने के लिए उठे ।
(६७) शब्दार्थ—वसन = वस्त्र; कपड़े । सरोज = कमल । जनु = मानो ।
तनु धरे = शरीर धारण किये । मनोज = कामदेव ।
व्याख्या—वस्त्र उतार कर चरण-कमल धोने के लिए सुदामाजी जब
चौकी पर गये, उस समय वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो साक्षात् कामदेव
शरीर धारण कर उपस्थित हो गये हों ।
विशेष—इस दोहे में धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न सुदामा के सौन्दर्य का चित्रण
हुआ है । रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग भी द्रष्टव्य है ।
(६८) शब्दार्थ—रति = कामदेव की स्त्री । छवि आगरी = सुन्दरता की
खान ।
व्याख्या— (पैर धो कर) सुदामाजी खड़ाऊँ पहन कर भोजन करने के
लिए गये और पीढ़े पर जा बैठे । उस समय रति से भी अधिक सुन्दर उनकी
स्त्री उनके पास आ मुस्करा कर हँसने लगी ।
विशेष—इस दोहे में अपार धन-वैभव मिल जाने के उपरांत, सुदामा-पत्नी
के सौन्दर्य का चित्रण हुआ है । व्यतिरेक अलंकार के प्रयोग द्वारा कवि ने उसे
कामदेव की पत्नी से भी अधिक सुन्दर बताया है ।
(६६) शब्दार्थ—व्यंजन चारि प्रकार = चार प्रकार के भोजन—चर्व्य,
चूच्य, लेह्य और पेय । जोरी = एकत्र की । पछिऔरी = भोजन के बाद दिया
जाने वाला पेय; शिखरन आदि ।
व्याख्या—अनेक प्रकार के भोजन, चारों प्रकार के व्यंजन और अंत में
खायी जाने वाली पछिऔरी सुदामाजी के सामने रखी गयी । कवि कहता है कि
उनके भोजन का वर्णन नहीं किया जा सकता है ।
६४ / सुदामा-चरित
(१००) शब्दार्थ - हरिहि समर्पौ = भगवान् को समर्पित करके भोग
लगाये । नाद = शब्द । मंद = धीरे से । त्यों = वैसे ही ।
व्याख्या - सब कुछ परोसे जाने पर उनकी पत्नी ने मुस्करा कर कहा-
अब भगवान् को समर्पित करके भोग लगाइए । यह सुन कर सुदामा ने घंटी
बजा भगवान् का नाम ले कर उन्हें भोजन समर्पित किया ।
(१०१) शब्दार्थ - अगिन जिमाय = अग्नि में आहुति दे कर । विधान =
विधान - नियम । बैस्व देव करि नेम बलि काढ़ी = नियमपूर्वक विश्वदेव अर्थात्
गो, काक और श्वान को कौर निकाल कर । करति पवन = पंखा झलती है ।
व्याख्या - इसके बाद नियमपूर्वक अग्निहोत्र कर तथा गो, काग और श्वान
को कौर निकाल कर सुदामाजी ने भोजन करना आरम्भ किया । उनकी पत्नी
(पास ही बैठ कर) प्रेम से पंखा झलने लगी ।
(१०२) शब्दार्थ - रुचि = इच्छा । अबै = अभी । सोय = वही ।
व्याख्या - सुदामा की पत्नी बार-बार पूछती है - जो चीजें आपको अच्छी
लगती हैं वे और लीजिये । श्रीकृष्ण की कृपा से सब चीजें भरी हैं, आप जो
कुछ माँगेंगे उसे मैं अभी ला कर परोस दूँगी ।
(१०३) शब्दार्थ - जेइँ चुके = भोजन कर चुके । अचवन लगे = मुँह-हाथ
धोने लगे । पलका = पलंग । बूनो सुरेसम-दाम = सुन्दर बहुमूल्य रेशम से बुना
हुआ ।
व्याख्या - भोजन और आचमन करने के बाद सुदामाजी रेशम की डोरी
से बिने हुए और रत्नों से जड़े हुए सोने के पलंग पर विश्राम करने गये ।
(१०४) शब्दार्थ - ललित = सुन्दर । विरचिकै = सजा कर । पाँइत = पैर
की तरफ । पाँयके कसिकै डोरि = पायताने की डोरियों को कस कर । अतर =
इत्र । बोरि = बसा कर; भिगो कर ।
व्याख्या - चतुर सेवकों ने पलंग पर सुन्दर बिछौने बिछा दिये, पलंग की
डोरी कस दी और इत्र से बिछौने को सुवासित कर दिया ।
(१०५) शब्दार्थ - नेरे = निकट । बीरी = पान का बीरा । छवि-धाम =
सुन्दर । पौढ़न लगे = लेटने लगे ।
सुदामा-चरित / ६५
व्याख्या—(उन्होंने) पलंग के पास ही पान बीड़ों से भरा हुआ सुन्दर
पानदान रख दिया। तब सुदामाजी पैर धो कर विश्राम करने के लिए लेट
गये।
(१०६) शब्दार्थ—बीजना = पंखा। सेवत पद चारु = कोई सुन्दर पाँवों
को दबाता। गजमोतिन = गजमुक्ता। हारु = हार; माला।
व्याख्या—कोई दासी चँवर डुलाने लगी, कोई पंखा झलने लगी। सेवक
उनके चरण दबाने लगे। सब दास-दासियाँ सुन्दर आभूषणों से सजे हुए थे और
गजमुक्ताओं के हार पहने हुए थे।
(१०७) शब्दार्थ—पिय = पति। पै = पास। किमि = किस प्रकार। एहि
भाँति = इस रूप में।
व्याख्या—(सुदामा को विश्राम करते हुए देख कर) उनकी पत्नी श्रृंगार
करके, पान खा कर मुस्कुराती हुई उनके पास आयी और उसने पूछा – अब मुझे
आरम्भ से वह कथा सुनाइये कि किस प्रकार श्रीकृष्ण ने हमको इतनी सम्पत्ति
दी।
(१०८) शब्दार्थ—आदिते = शुरू से। जिमि = जैसे।
व्याख्या—सुदामा ने शुरू से सब कथा सुनाना आरम्भ किया। उन्होंने बत-
लाया कि इस तरह रास्ता चलते-चलते उनके पैर थक गये और वो सो गये।
फिर बतलाया कि किस तरह सोयी हुई दशा में ही श्रीकृष्ण ने उन्हें गोमती के
किनारे पहुँचा दिया।
(१०६) शब्दार्थ—बखान = वर्णन; बड़ाई करते हुए वर्णन करना। मुख
लाख सों = लाख मुख से भी। आन = आ कर।
व्याख्या—जिस प्रकार श्रीकृष्ण के द्वार पर वे पहुँचे, उस कथा का भी
उन्होंने वर्णन किया। और, तब कहा कि श्रीकृष्ण जिस प्रकार आकर उद्वेग
और उमंग से उनसे मिले उसका वर्णन एक मुँह से क्या लाखों मुँहों से भी नहीं
किया जा सकता है।
(११०) शब्दार्थ—रमा-निवास = श्रीकृष्ण ; जिनके हृदय में लक्ष्मी का
निवास है।
६६ / सुदामा-चरित
व्याख्या—(सुदामा ने आगे कहा—) श्रीकृष्ण हाथ पकड़ कर मुझे अन्तः-
पुर में ले गये और स्वयं ही मेरे पैर धोने लगे।
(१११) शब्दार्थ—नयनन तें=आँखों से। वारि चल्यो=आँसू बहने
लगे।
व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) श्रीकृष्ण ने जब धोने के लिए मेरे पैर
उठाये तो मेरे पैरों की दशा देख कर उनकी आँखों से जो जलधारा बही उसी से
मेरे पैर धुल गये। यह दृश्य देख कर वहाँ उपस्थित सभी नर-नारी चकित हो
गये।
(११२) शब्दार्थ—बहुरि=फिर। मेटे=दूर किया। भ्रम=सन्देह,
संकोच। सन्ताप=दुःख।
व्याख्या—इसके बाद सुदामा ने वे बातें कहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने किस
प्रकार स्वयं चावल लेकर खाये और किस प्रकार उन्हें अपने गले से लगा कर
उनके सारे सन्देहों (संकोचों) और दुःखों को दूर कर दिया।
(११३) शब्दार्थ—जेवनार=भोजन की व्यवस्था। पांति=कतार।
व्याख्या—तब सुदामा ने श्रीकृष्ण के यहाँ के जेवनार का वर्णन करते हुए
कहा, जो-जो व्यंजन मैंने वहाँ खाये उन सबका वर्णन मैं कहाँ तक करूँ; अर्थात्
उन सबका वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ।
(११४) शब्दार्थ—सपन=स्वप्न। परतच्छ=प्रत्यक्ष। निसफल=
बेकार।
व्याख्या—(फिर उन्होंने कहा—) जितने दिन मैं वहाँ रहा, श्रीकृष्ण ने
मुझे नित्यप्रति अत्यन्त प्रेम से रख कर धन और वैभव का स्वप्न दिखलाया।
मैं उस स्वप्न को यहाँ प्रत्यक्ष देख रहा हूँ अर्थात् मेरे स्वप्न सत्य हो गये। अब
मुझे विश्वास हो गया कि सपने झूठे नहीं होते।
(११५) शब्दार्थ—कह्यो आयनो मोह=सब कथा कहने के बाद सुदामा ने
अपने उस भ्रम की बात कही जो उन्हें कृष्ण के, प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर
पर कुछ न देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था। कृपानिधि=दयासागर।
भगत-हित=भक्त-हितकारी। चिदानन्द=चित्—आनन्द। भगवान् को सत्
सुदामा-चरित / ६७
(सत्य), चित् (चैतन्य) और आनन्द कहा गया है क्योंकि वे परम सत्य, परम
चेतन और परम आनन्द हैं।
व्याख्या—इस प्रकार पूरी कथा कह जाने के बाद सुदामा ने अपने उस भ्रम
की भी बात कही (जो उन्हें कृष्ण के; प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर पर कुछ न
देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था और जिस भ्रम के कारण उन्होंने
श्रीकृष्ण को एक छोटा-सा निरापद शाप भी दे डाला था।) पर आज उन्होंने
स्वीकार किया कि श्रीकृष्ण भक्तों के हितकारी हैं और चैतन्य तथा आनन्द के
भंडार हैं।
(११६) शब्दार्थ—साजवाज = साज-सामान; सजावट । बाजि = घोड़ा ।
गज = हाथी । राजत = शोभा दे रहा है। बहल = बहली; सुन्दर छायादार
बैलगाड़ी । शुभ-सिंहासन = मंगलमय सिंहासन । चौक प्रति = प्रति चौक में;
प्रति आंगन में । लहलहैं = लहलहा रहे हैं; हरे-भरे हो रहे हैं; झूम रहे हैं।
पाकसासन = इन्द्र । सहल = साधारण; तुच्छ । लागत सहल हैं = तुच्छ लगते
हैं । लौं = तक ।
व्याख्या—कवि कहता है कि श्रीकृष्ण ने सुदामाजी को जो सम्पत्ति दी
उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। अब सुदामाजी के पास सब तरह से सजे
हुए हाथी, घोड़े, रथ, पालकी और छायादार बैलगाड़ियां हैं। बैठने के लिए
रत्नजटित सुन्दर सिंहासन है। प्रत्येक महल के आँगन में कामधेनु और कल्पतरु
हैं। उनके सारे महल सोने के बने हैं ! (और कहाँ तक कहा जाय) सुदामाजी के
दास-दासियों के आभूषण एवं वस्त्रों को देख कर देवराज इन्द्र के ऐश्वर्य भी
तुच्छ लगते हैं।
विशेष—इस कवित्त में वर्णनात्मक शैली का सौष्ठव विशेष रूप से द्रष्टव्य
है । कवि दीन दयालु श्रीकृष्ण द्वारा प्राप्त सुदामा के अपार धन-ऐश्वर्य का
वर्णन करने में पर्याप्त सफल रहा है। उसने अपने वर्णन को प्रभावोत्पादक बनाने
के लिए अनुप्रास अलंकार का अत्यन्त सार्थक प्रयोग किया है। उसका शब्द-
६८ / सुदामा-चरित
चयन सराहनीय है ।
(११७) शब्दार्थ—वाजिसाला = अश्वशाला, घुड़साल । गजसाला = गज-
शाला—हथसार । गजराज = ऐरावत । ब्रजराज = श्रीकृष्ण । बानक = शृंगार ।
झरोखन मैं = खिड़कियों में । झिम-झिम = धीरे-धीरे । झूमक = एक प्रकार का
आभूषण जिसे स्त्रियां कानों में पहनती हैं । मुकतान—मोतियां । बिधान—
व्यवस्था ।
व्याख्या—कवि कहता है कि श्रीकृष्ण के दान का ढंग विचित्र है । (देखिये
न !) श्रीकृष्ण से भेंट होने पर सुदामा का दुःख-दारिद्र्य न जाने किधर चला
गया । (कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण से भेंट होते ही सुदामा का दुःख-
दारिद्र्य दूर हो गया ।) (अब तो) श्रीकृष्ण के समान ही सुदामा के पास भी
हथसार और घुड़साल हैं । उनकी सवारी के लिए हर समय गजराज (ऐरावत)
तैयार रहते हैं। उनके सोने के महल बहुत कलापूर्ण रीति से बने हैं, उनमें
मणियां जड़ी हैं और उनके झरोखों में हीरे और लालों के साथ-साथ मोतियों
की झालरें झूम रही हैं। इन सबको देख कर देवताओं के मन भी मुग्ध हो जाते
हैं ।
विशेष—इस कवित्त में भी मित्र-वत्सल श्रीकृष्ण की अपार कृपा से मिले
सुदामा के धन-वैभव का वर्णन हुआ है । कवि वर्णनात्मक शैली में उस भव्य
वैभव का निरूपण करता है । उसी के अनुरूप शब्द-सम्पदा अनुप्रास आदि शब्दा-
लंकारों का प्रयोग करता है ।
(११८) शब्दार्थ—सुवरन = सुवर्ण—सोना । पौरि = द्वार; फाटक । मनि-
मंडप = मणियों से बने मंडप । वर = सुन्दर । खवास = सेवक; खानसामा । मो
= मुझ । चौर ढरते = चँवर डुलाते । पै = पर । राज-सामा = राज-समाज;
राज-वैभव । एती = इतनी ।
व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी से कहते हैं—हे पतिव्रता ! यदि तुम्हारे
उपदेशों को न मान कर मैं द्वारका न जाता तो ये सोने के बड़े-बड़े महल, द्वारों
पर रखे हुए मणियों से जड़े कलश, बैठने के लिए रत्नजटित सिंहासन, चँवर
सुदामा-चरित / ६६
डुलाने के लिए बहुत से दास और रत्नों से भरे भंडार, मुझे स्वप्न में भी नहीं
प्राप्त होते। यदि तेरे उपदेशों को न मान कर मैं द्वारिका न जाता तो श्रीकृष्ण
मुझ पर इतनी कृपा नहीं करते।
विशेष—इस कवित्त में सुदामा अपनी पत्नी सुबुद्धि के प्रति आभार प्रकट
करते हैं, उसी की सद्प्रेरणा से वे मित्र-वत्सल श्रीकृष्ण के पास द्वारिकापुरी
जाते हैं और उन्हें अपार धन-सम्पत्ति प्राप्त होती है। अनुप्रास अलंकार की
छटा इस छन्द में भी यत्र-तत्र देखी जा सकती है।
(११६) शब्दार्थ — अम्बर = वस्त्र । प्रभुता = ऐश्वर्य । सुरपति = इन्द्र ।
व्याख्या — (विश्राम करने के बाद) सुदामाजी सुन्दर वस्त्रों को धारण कर
सिंहासन पर आ कर बैठे । उस समय उनकी प्रभुता देख कर इन्द्र भी लज्जित
हो गये ।
(१२०) शब्दार्थ — कै = या; अथवा । हति = थी । छानी = झोपड़ी ।
पनही = जूते । जुरतो = जुटता था । परताप = प्रताप । दाख = द्राक्षा;
अंगूर ।
व्याख्या—(कवि सुदामाजी की विगत एवं वर्त्तमान दशा की तुलना करते
हुए कहता है—) द्वारिका जाने के पूर्व उनकी टूटी-फूटी झोपड़ी थी, आज उनके
सोने के महल हैं। पहले (निर्धन और साधनहीन होने के कारण) कहाँ वे नंगे
पैर रहते थे, आज उनकी सवारी के लिए गजराज सजे हुए हैं। पहले कहाँ कठोर
पृथ्वी पर बिना बिछावन के ही वे रात काट लेते थे, आज कोमल सेज पर भी
उन्हें नींद नहीं आती। पहले कहाँ उन्हें कोदों-साँवाँ-जैसे मोटे अनाज भी भर
पेट नहीं मिलते थे, आज भगवान् की कृपा से उन्हें इतना धन मिल गया कि
दाख-जैसे मेवे भी (उन्हें) अच्छे नहीं लगते ।
विशेष—इस सवैया छन्द में सुदामा के गत दारिद्र्य और दीन दयाल श्री-
कृष्ण की अपार कृपा से प्राप्त धन-वैभव का मार्मिक वर्णन हुआ है। कवि का
भाषा पर असाधारण अधिकार है, इसीसे वह अत्यन्त उपयुक्त तथा सार्थक
शब्दों के चयन तथा उनके प्रयोग की दक्षता प्रकट करता है। अनुप्रास अलंकार
का स्वाभाविक प्रयोग भी उसके वर्णन को प्रभावशाली बनाता है ।
१०० / सुदामा-चरित
(१२१) शब्दार्थ—जदुबंस-मनि=यदुवंशमणि—श्रीकृष्ण। अनुकूल=
प्रसन्न। बरषहिं=बरसते हैं।
व्याख्या—सुदामा पर श्रीकृष्ण की दया देखकर देवगण आकाश से फूलों
की वर्षा करते हैं और कहते हैं—दरिद्रों पर दया करने वाले श्रीकृष्ण धन्य हैं;
सुदामा अपनी पत्नी-सहित धन्य हैं।
□□□
परिशिष्ट
पाठ-भेद
‘सुदामा-चरित’ की कुछ प्रतियों में निम्नलिखित छन्द भी मिलते हैं :
मंगलाचरण
छन्द १, २, ३ के स्थान पर निम्नलिखित प्रथम दो छन्द मिलते हैं :
गनपति कृपानिधान, विद्या, वेद, विवेक जुत ।
देहु मोहिं बरदान हर्ष सहित हरिगुन कहौं ॥१॥
हरि चरित्र बहु भाई सेस दिनेस न कहि सकैं ।
प्रेम सहित चित लाइ सुनौ सुदामा की कथा ॥२॥
सुदामा
चंद को मित्र चकोर सदा तेइ भोजन आग विरंचि ने दीनी ।
पंकज कौ हितु द्यौसपती हिम जारत ताहि यहै प्रन लीनो ॥
कर्मबली सुनु री अबला ! नित संग रहै सबकै पुर तीनो ।
लच्छिमी-नाथ सखा जिनके तिनके घर बास दरिद्र ने कीनो ॥३॥
दोहा
मान-बड़ाई प्रेम-रस गरु आपन औ नेहु ।
ये पांचौ तबही गये जबै कही कछु देहु ॥४॥
१०२ / सुदामा-चरित
कवित्त
स्याम सों मिताई मैं तो जब ते जताई यासों,
तबहीं ते मेरे पाछे कढ़िवे को परी है।
याके हँसि बोले हौं न जानत हौं और दुख,
कालिका - निकाई राम ! वहै क्रोध भरी है।
सेवा छांड़ि दई आगे लठिया लै ठाड़ी भई,
हरि पै चलाइबे की कथा कंठ करी है।
बठत, उठत, न्हात, खात, सोए आधी रात,
ऐसी सावधान ज्यों घरावत की धरी है ॥५॥
दाम ही सों मान औ बड़ाई जस दाम ही सों,
दाम ही सों दैवो लैवो दाम ही सों काम है।
दाम ही सों तिथिव्रत नेमधर्म दाम ही सों,
दाम ही सों देवपूजा दाम ही सों नाम है।
दाम ही सों जग में फिरत कवि पंडित हू,
जापै नहिं दाम ताको सूखि जात चाम है।
राजा और राव बादसाहन को कौन गिने,
मेरे जान बीस बिसें दाम ही में राम है ॥६॥
पिता निज पुत्र त्यागै भाई नहिं साथ लागै,
नारी मुख देखि भागै पूछत न बात है।
चाचा हू चवाव करै मां बहन नित्य लरै,
भोजन रिसाय धरै कूकर ज्यौं खात है।
लोग कहैं कूर भए भाई सब दूर भए,
वृथा जग जन्म जात पाछे पछतात है।
सास औ ससुर दैयो लेत न बलैया मैया,
आज के जमाने में रुपैया करामात है ॥७॥
सुदामा-चरित / १०३
दोहा
मान बड़ाई प्रेमरस गरु आपन अरु नेहु ।
ये पांचौ तबही गए जबहि कही कछु देहु ॥८॥
कवित्त
चल्यौ है सुदामा कहै बात घर रामजी सों,
मांगिहौं न दाम तासों सांची ही कहत हौं ।
जो पै मोहिं आपहिं ते बूझिहैं बैकुंठनाथ,
तब हों कहांगो प्रभु खुसी ही रहत हौं ।
अबहूँ विचारि दुखे सुखे दिन टारि कित,
पठवै मुरारि जो पै आपदा लहत हौं ।
विना दाम धाम फिरि ऐहौं भेंटि स्यामजी सों,
तेरे कहें राम की सो लठिया गहत हौं ॥६॥
दोहा
मो मरने को नेम है मरूँ तो हरि के द्वार ।
कबहूं तों हरि पूछिहैं कौन मरो दरबार ॥१०॥
कवित्त
काँपै सुरपति नरपति काँपे ठौर-ठौर,
आगम जनायो द्विजवंत जिय बामा के ।
छाँड़ि दई आस कइलासहू की महा ईस,
सोच ब्रह्मादिकहू सकल सुखधामा के ।
डरपे कुबेर डगमगत सुमेर भए,
जानि डर कर्यो राम गुनकर नामा के ।
एते हहराने घहराने हरि हितू जानि,
द्वारिका की ओर पग धरत सुदामा के ॥११॥
१०४ / सुदामा-चरित
दोहा
करि प्रनाम गनपति सुमिरि पहुँचि गए हरि द्वार ।
देखि भीर सब नृपन की लागे करन विचार ॥१२॥
यह सुनि ड्यौढ़ी पै कह्यो द्वारपाल सकुचात ।
महाराज द्विज एक को कहत सन्देस लजात ॥१३॥
सुन्यौ सुदामा नाम जब तब सुधि रही न और ।
उठि दौरे परजंक तें तजि तरुनिन को झौर ॥१४॥
सुन्दर कनक परात में धर्यौ सलिल ज्यों दास ।
पगधोवन कों आप ही बैठे जगत निवास ॥१५॥
कुसल क्षेम पूछत लगे कहौ सुदामा मित्र ।
भाभी ने कछु कहि दियौ भाखो परम विचित्र ॥१६॥
तुम तौ चतुर सुजान हौ जानत मो मन चित्त ।
एक मास में द्वै परै सौ माकों है नित्त ॥१७॥
तब तौ दिन कछु और हे अब आए कछु और ।
नित होवैगी द्वादसी तुम चित्त राखौ ठौर ॥१८॥
गुरु सेवा दुर्लभ महा चित दै करै जो कोय ।
जो मन में इच्छा करै सो सब पूरन होय ॥१९॥
पवन झकोरत तीव्र सों सीत भयो अधिकाय ।
काठभार मस्तक धर्यौ हाकों लियो छिपाय ॥२०॥
बहुत भांति रक्षा करी आप रहे दुख मांहि ।
तुम्हरी प्रीति अनन्त है उऋन होहुँ मैं नाहिं ॥२१॥
सुदामा-चरित / १०५
सवैया
हाथ गह्यो प्रभु को कमला कहै, नाथ कहा तुमनै चित धारी।
सन्दुल खाय मुठी दुई, दीन कियो तुमने दुई लोक-बिहारी॥
खाय मुठी तिसरी अब नाथ कहां निज बास की आस बिचारी।
रंकहि आप समान कियो तुम चाहत आपहि होन भिखारी॥२२॥
दोहा
करि आचमन मुख धोय के, पान खाय सुख पाय।
पौढ़े पलका पै तबैं कृष्ण पलोटैं पांय॥२३॥
बस्त्रादिक बहु भांति के, पहिराए सुखदाय।
करि प्रनाम कर जोरि कै, बोले त्रिभुवन राय॥२४॥
सवैया
धन्य कहा कहिए द्विजजू तुम सों जग कौन उदार प्रवीनो।
पिछली प्रीति निबाही भली बिधि दोष निवारिकै रोष न कीनो।
हौं द्विज के चरणोदक हेतु अजन्म कहाय कै जन्म सुलीनो।
आवन कै निज पावन सो यहां, मोसो अपावन पावन कीनो॥२५॥
दोहा
नित नित सब द्वारावती दिखराई प्रभु आप।
भले बाग अनुराग सह जहां न व्यापै ताप॥२६॥
परम कृपा दिन दिन करी कृपानाथ जदुराय।
मित्र भावना बिस्तारी दूनो आर भाय॥२७॥
चिंता करि सोवत भयो देख्यौ सपन विनीत।
देव सकल आए गहूरि संपत लिए पुनीत॥२८॥
आज्ञा दई गुपाल जू बिसकर्मा तुम जाहु।
लाइ बिभौ दुइ लोक को नगर सुदाम बसाहु॥२९॥
१०६ / सुदामा-चरित
रैनि मध्य सब लाइकै करि दीजौ इकठौर ।
हय गयंद रथ पालकी विसकर्मा सिरमौर ॥३०॥
कवित्त
कह्यौ विस्वकरमा कों हरि तुम जाय करि,
नगर सुदामा जी को रचौ बेगि अवहीं ।
रतनजटित धाम सुबरनमई सब,
कोट औ वजार बाग फूलन के तबहीं ।
कल्पवृक्ष द्वार गज रथ असवार प्यादे,
कीजिये अपार दास दासी देव छविहीं ।
इंद्र औ कुबेर आदि देववधू अपसरा,
गंधरब गुनी जहां ठाढ़े रहें सबहीं ॥३१॥
दोहा
दंडवत करि बहु भांति सो आज्ञा श्री जदुआय ।
विभौ साँज सब लै चले मंदिर रचे बनाइ ॥३२॥
सवैया
आए हौ आज कै कालि अबै तुम जाहुगे पर्सों कि नर्सों अबारे ।
पत्र लिखौं सोइ मित्र हमारे कहां उतरौगे जु जाग तुम्हारे ॥
मैं तौ रहौं दरबार के भीतर आवत हौं कबौं सांझ सबारे ।
मूरख मित्र की प्रीति सुनौ जहां काग उड़ै सोइ जग्ग हमारे ॥३३॥
दोहा
गोपुर लौं पहुँचाय कै, फिरे सकल दरबार ।
मित्र वियोगी कृष्ण के, नेत्र चली जल धार ॥३४॥
प्रीति आरसी विमल है सब कोउ सेवै जानि ।
कपट मोरचा लगत ही होत दरस की हानि ॥३५॥
सुदामा-चरित / १०७
रहियो आवत जात इत कहत न लागी लाज।
ऐसे आवन जान तें हौं अब आयौ बाज ॥३६॥
इन सोचन सोचत चले हरि को अति दुख मानि।
घर की सुधि बँम्हनै नहीं दीन्हीं सुख की खानि ॥३७॥
कवित्त
जगर-मगर जोति छाय रही चहुं ओर,
अगर-बगर हाथी घोरन कौ सोर है।
चौपर को वनो है बजारे पुनि सोरन के,
महल दुकान की कतार चहुं ओर है॥
भीर-भार धकापेल चहुं दिसि देखियत,
द्वारिका तें दूनों यहाँ प्यादन कौ जोर है॥
रहिबो को ठाम है न, काहु सों पिछान मेरी,
बिन जाने बसे कोउ हाड़ मेरे तोरे है ॥३८॥
वेई सुरतरु प्रफुलित फुलवारिन मैं,
वेई सरवर हँस बोलन-मिलन कों।
वेई हेम-रिन दिसान दहलीजन मैं,
वेई गजराज हय गरज पिलन कों।
द्वार द्वार छरी लिए द्वारपौँरिया हैं खरे,
बोलत मरोर बरजोर त्यों झिलन कों।
द्वारिका तें चल्यौ भूलि द्वारिका ही आयौ नाथ,
मांगियो न मो पै चारि चाउर गिलन कों ॥३६॥
फूटी एक थारी बिना टोंटनी की झारी हुतीं,
बांस की पिटारी औ कथारी हुती टाट की,
बेंठे बिन छुरी औ कमंडल सौ टूंक बहौ,
फटे ते पाये पाटी टूटी एक खाट की।