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सर्वकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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१०६ / सुदामा-चरित
रैनि मध्य सब लाइकै करि दीजौ इकठौर ।
हय गयंद रथ पालकी विसकर्मा सिरमौर ॥३०॥
कवित्त
कह्यौ विस्वकरमा कों हरि तुम जाय करि,
नगर सुदामा जी को रचौ बेगि अवहीं ।
रतनजटित धाम सुबरनमई सब,
कोट औ वजार बाग फूलन के तबहीं ।
कल्पवृक्ष द्वार गज रथ असवार प्यादे,
कीजिये अपार दास दासी देव छविहीं ।
इंद्र औ कुबेर आदि देववधू अपसरा,
गंधरब गुनी जहां ठाढ़े रहें सबहीं ॥३१॥
दोहा
दंडवत करि बहु भांति सो आज्ञा श्री जदुआय ।
विभौ साँज सब लै चले मंदिर रचे बनाइ ॥३२॥
सवैया
आए हौ आज कै कालि अबै तुम जाहुगे पर्सों कि नर्सों अबारे ।
पत्र लिखौं सोइ मित्र हमारे कहां उतरौगे जु जाग तुम्हारे ॥
मैं तौ रहौं दरबार के भीतर आवत हौं कबौं सांझ सबारे ।
मूरख मित्र की प्रीति सुनौ जहां काग उड़ै सोइ जग्ग हमारे ॥३३॥
दोहा
गोपुर लौं पहुँचाय कै, फिरे सकल दरबार ।
मित्र वियोगी कृष्ण के, नेत्र चली जल धार ॥३४॥
प्रीति आरसी विमल है सब कोउ सेवै जानि ।
कपट मोरचा लगत ही होत दरस की हानि ॥३५॥