सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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दोहा
करि प्रनाम गनपति सुमिरि पहुँचि गए हरि द्वार ।
देखि भीर सब नृपन की लागे करन विचार ॥१२॥
यह सुनि ड्यौढ़ी पै कह्यो द्वारपाल सकुचात ।
महाराज द्विज एक को कहत सन्देस लजात ॥१३॥
सुन्यौ सुदामा नाम जब तब सुधि रही न और ।
उठि दौरे परजंक तें तजि तरुनिन को झौर ॥१४॥
सुन्दर कनक परात में धर्यौ सलिल ज्यों दास ।
पगधोवन कों आप ही बैठे जगत निवास ॥१५॥
कुसल क्षेम पूछत लगे कहौ सुदामा मित्र ।
भाभी ने कछु कहि दियौ भाखो परम विचित्र ॥१६॥
तुम तौ चतुर सुजान हौ जानत मो मन चित्त ।
एक मास में द्वै परै सौ माकों है नित्त ॥१७॥
तब तौ दिन कछु और हे अब आए कछु और ।
नित होवैगी द्वादसी तुम चित्त राखौ ठौर ॥१८॥
गुरु सेवा दुर्लभ महा चित दै करै जो कोय ।
जो मन में इच्छा करै सो सब पूरन होय ॥१९॥
पवन झकोरत तीव्र सों सीत भयो अधिकाय ।
काठभार मस्तक धर्यौ हाकों लियो छिपाय ॥२०॥
बहुत भांति रक्षा करी आप रहे दुख मांहि ।
तुम्हरी प्रीति अनन्त है उऋन होहुँ मैं नाहिं ॥२१॥