सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ / सुदामा-चरित
(१००) शब्दार्थ - हरिहि समर्पौ = भगवान् को समर्पित करके भोग
लगाये । नाद = शब्द । मंद = धीरे से । त्यों = वैसे ही ।
व्याख्या - सब कुछ परोसे जाने पर उनकी पत्नी ने मुस्करा कर कहा-
अब भगवान् को समर्पित करके भोग लगाइए । यह सुन कर सुदामा ने घंटी
बजा भगवान् का नाम ले कर उन्हें भोजन समर्पित किया ।
(१०१) शब्दार्थ - अगिन जिमाय = अग्नि में आहुति दे कर । विधान =
विधान - नियम । बैस्व देव करि नेम बलि काढ़ी = नियमपूर्वक विश्वदेव अर्थात्
गो, काक और श्वान को कौर निकाल कर । करति पवन = पंखा झलती है ।
व्याख्या - इसके बाद नियमपूर्वक अग्निहोत्र कर तथा गो, काग और श्वान
को कौर निकाल कर सुदामाजी ने भोजन करना आरम्भ किया । उनकी पत्नी
(पास ही बैठ कर) प्रेम से पंखा झलने लगी ।
(१०२) शब्दार्थ - रुचि = इच्छा । अबै = अभी । सोय = वही ।
व्याख्या - सुदामा की पत्नी बार-बार पूछती है - जो चीजें आपको अच्छी
लगती हैं वे और लीजिये । श्रीकृष्ण की कृपा से सब चीजें भरी हैं, आप जो
कुछ माँगेंगे उसे मैं अभी ला कर परोस दूँगी ।
(१०३) शब्दार्थ - जेइँ चुके = भोजन कर चुके । अचवन लगे = मुँह-हाथ
धोने लगे । पलका = पलंग । बूनो सुरेसम-दाम = सुन्दर बहुमूल्य रेशम से बुना
हुआ ।
व्याख्या - भोजन और आचमन करने के बाद सुदामाजी रेशम की डोरी
से बिने हुए और रत्नों से जड़े हुए सोने के पलंग पर विश्राम करने गये ।
(१०४) शब्दार्थ - ललित = सुन्दर । विरचिकै = सजा कर । पाँइत = पैर
की तरफ । पाँयके कसिकै डोरि = पायताने की डोरियों को कस कर । अतर =
इत्र । बोरि = बसा कर; भिगो कर ।
व्याख्या - चतुर सेवकों ने पलंग पर सुन्दर बिछौने बिछा दिये, पलंग की
डोरी कस दी और इत्र से बिछौने को सुवासित कर दिया ।
(१०५) शब्दार्थ - नेरे = निकट । बीरी = पान का बीरा । छवि-धाम =
सुन्दर । पौढ़न लगे = लेटने लगे ।