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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

सुदामा-चरित / ६१
व्याख्या—इसके बाद पति को सिंहासन पर बैठा कर ब्राह्मणी ने बड़े
आदर-प्रेम से उनकी पूजा की; तब उन्हें पवित्र और सुगंधित वस्त्र तथा सुन्दर-
सुन्दर आभूषण पहनाये ।
(८५) शब्दार्थ—सीतल = शीतल । अँचवायकै = आचमन करा कर ।
छवि = सुन्दर । रविप्रभा = सूर्य की कान्ति ।
व्याख्या—सुदामा को वस्त्र-आभूषण पहनाने के बाद ब्राह्मणी ने ठंडे जल से
उनके हाथ-पाँव धो कर उन्हें बैठाया । फिर पानों से भर कर पानदान उनके
पास ले जा कर रखा । वह पानदान अत्यन्त स्वच्छ और चमकीला था।
विशेष—इस दोहे में उपमा अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है ।
(८६) शब्दार्थ—रम्भा = देवलोक की अप्सरा, चिरयौवना, चिर-सुन्दरी ।
रंभादिक = रम्भा आदि; मेनका, रम्भा, उर्वशी, तिलोतमा और मंजुघोषा —ये
छः स्वर्ग की प्रधान अप्सराएँ हैं । बयारि = वायु ।
व्याख्या—रम्भा आदि अप्सराएँ चारों ओर से सुदामा पर चमर डुलाने
लगीं और उनकी पतिव्रता स्त्री पंखा झलने लगी ।
(८७) शब्दार्थ—स्वेत-छत्र = उजला चँदोवा । राजत = सुन्दर लगते हैं ।
सक्र = शक्र—इन्द्र । बाहन = सवारी । तुरँग = घोड़ा । बर = सुन्दर । अरु =
और । शुभ = मंगलमय । जान = यान—सवारी; रथ ।
व्याख्या—उजले चँदोवा के नीचे बैठे हुए सुदामा इन्द्र के समान सुशोभित
हो रहे थे । सुन्दर हाथी, घोड़े और रथ के अतिरिक्त और भी कई तरह की
सुखद सवारियाँ उनके पास थीं ।
(८८) शब्दार्थ—जानि परी = जान पड़ता है । गुरु-बन्धु = गुरु-भाई;
सहपाठी । हरिलीन्हीं = दूर कर दी । पीर = दुःख ।
व्याख्या—(जान-पड़ता है कि) गुरुभाई श्रीकृष्ण ने कल्पवृक्ष-सहित कामधेनु
दे कर सुदामा के सब कष्ट हर लिये ।
(८६) शब्दार्थ—सुधा = अमृत । वाम = स्त्री । बिनीत = विनीत, नम्र ।
मृदु = कोमल; मीठे । मन काम = मन की अभिलाषा ।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने विविध प्रकार से उनकी सेवा की और उन्हें