सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
७२ / सुदामा-चरित
स्पर्शी चित्रण हुआ है । कविवर नरोत्तमदास ने उसकी दीन-हीन दशा तथा मनः-
स्थिति के उद्घाटन में अपना कवि-कौशल प्रकट किया है ।
(३७) शब्दार्थ-द्वारपालक = द्वारपाल; दरवान । छांड़े = छोड़कर । जी की
गति = हृदय की दशा । को = कौन । धाय = दौड़ कर । गहे पाँय = पैर पकड़ लिये ।
भेंटे लपटाय = गले से लिपट कर मिले । ऐसे दुख सानै कौं = दुःख में इस प्रकार
कौन सम्मिलित होता है । कुसल = कुशल । विपदा = पहिचानै को = इस विपत्ति
में तुम्हारे बिना कौन पहचान सकता है ? जैसी तुम करी = मानै को = हे दया
के सागर ! जैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार तुमने मेरे साथ इस विपत्ति में किया वैसा
दूसरा कौन कर सकता है ?
व्याख्या—जैसे ही कृष्ण ने द्वारपाल के मुख से सुदामा ब्राह्मण का नाम
सुना, वैसे ही सब काम-धाम छोड़ कर हाथ जोड़े और दौड़ पड़े । उस समय उनके
हृदय की दशा कैसी रही होगी, इसे बतलाया नहीं जा सकता । उन्होंने सुदामा
के पैर पकड़ लिये और उन्हें गले से लगा लिया । दुःख में इस प्रकार सम्मिलित
कौन होता है ? सुदामा की दीन दशा देखकर श्रीकृष्ण की आँखों में आँसू भर
आये । उन्होंने सुदामा से कुशल समाचार पूछा । सुदामा ने कहा, (मैं विपत्ति में
हूँ) तुम्हारे सिवा, इस विपत्ति के समय और मुझे पहचानता ही कौन ? हे दया
के सागर ! जैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार तुमने मेरे साथ किया वैसा दूसरा और कौन
कर सकता है ? दीन-दुखियों पर ऐसी कृपा तुम्हारे सिवा और कोई नहीं कर
सकता ।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री के भव्य रूप का निरूपण
हुआ है । वे अपने बाल-सखा सुदामा का नाम सुनते ही बड़े उत्साह के साथ उसका
स्वागत करते हैं । उसे गले लगकर मिलते हैं, उसकी दयनीय स्थिति को देखकर
अपनी आँखों में आँसू भर उसका कुशल समाचार पूछते हैं । धन्य है यह आदर्श
मित्र-वत्सलता । स्वभावोक्ति अलंकार का सौष्ठव भी दर्शनीय है ।
(३८) शब्दार्थ—लोचन = आँख; नैन । पूरि = भरी । लोचन पूरि रहे जल
सो = आँखें आँसू से भर गयीं । दूरि तैं = दूर से ही । दुख मेट्यो = दुःख हो
गया । सुरनायक = इन्द्र । हिय माँझ = हृदय में । कलपद्रुम = नन्दनवन का वृक्ष-
सुदामा-चरित / ७३
विशेष, जो मनोवांछित फल देता है। खेट्यौ = खटका हुआ, आशंका हुई।
कम्प...सरसो = कुबेर का कलेजा काँपने लगा। परसो पग = पैर छूते ही।
जात...समेट्यौ = सोने का सुमेरु सिकुड़ने लगा। राउ = राजा। अंक भरि =
अँकवार भर कर। रमापति = विष्णु, कृष्ण।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने नेत्रों में जल भर कर जब सुदामा की ओर दूर से
देखा, तभी सुदामा के सारे दुःख दूर हो गये। जब उन्होंने सुदामा के पैर पकड़े
तब इन्द्र के मन में यह भय हुआ कि कहीं भगवान् इन्द्रासन ही सुदामा को न
दे दें। कल्पवृक्ष के मन में यह खटका हुआ कि कहीं हमें ही न भगवान् दान कर
दें। कुबेर का हृदय यह सोच कर काँप उठा कि कहीं भगवान् त्रिभुवन की सारी
सम्पत्ति सुदामा को न दे दें। सोने का पर्वत सुमेरु जैसे अपने-आप में सिकुड़ने
लगा कि कहीं उपहारस्वरूप वही न भेंट कर दिया जाय। (मगर अब देना शेष
ही क्या रह गया था) जब श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपनी भुजाओं में प्रीतिवश
भर लिया, तभी वे भिखारी से राजा हो गये।
[कवि ने परोक्ष-रूप से यहाँ यह संकेत किया हैं कि श्रीकृष्ण वास्तव में
तीनों लोकों के स्वामी हैं, इन्द्र, कुबेर आदि उनके इशारे पर चलने वाले सेवक
हैं। उनके दर्शन से ही सांसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं और उनकी कृपा से
सारी सम्पदा प्राप्त हो जाती है।]
विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की ओर संकेत
किया गया है। वे तीनों लोकों के स्वामी हैं, इन्द्र, कुबेर आदि उनके संकेतों पर
कार्य करते हैं, उनके दर्शन-मात्र से ही सभी सांसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं और
वे अपार धन-वैभव प्रदान करने वाले हैं। इसके अतिरिक्त इस छन्द में चंचलाति-
शयोक्ति एवं परिकर अलंकार का भी सुन्दर प्रयोग देखा जा सकता है।
(३६) शब्दार्थ—त्रिभुवन = तीनों लोक। राय = राजा। अंतःपुर = रनि-
वास, रंगमहल। भेंटि = मिल कर। भली विधि = अच्छी तरह। त्रिभुवन-
राय = श्रीकृष्ण। दूजो = दूसरा।
व्याख्या—सुदामा से अच्छी तरह मिल-भेंट कर श्रीकृष्ण हाथ पकड़ कर
उन्हें महल के भीतर ले गये, जहाँ श्रीकृष्ण के सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं
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जो सकता था ।
(४०) शब्दार्थ—मनिमंडित = जिसमें मणियाँ जड़ी हों । कनक = सोना ।
ता = तिस । पगधोवन को = पैर धोने के लिए ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा को मणि-जटित सोने की चौकी पर बैठाया
और उनके पैर धोने के लिए स्वयं ही एक परांत में पानी भर कर रखा ।
(४ ) शब्दार्थ—राज-रमनि = रानियाँ (राज-रमणि) । सोलह-सहस =
सोलह हजार । सह-सेवकन = दास-दासियों के साथ । पटरानी = प्रधान रानी ।
चितै = देखकर । हेत = प्रेम । स-मीत = सखियों के साथ ।
व्याख्या—यह देख कर आठों पटरानियाँ, सोलह हजार रानियाँ और
सहायिकाएँ चकित हो गयीं ।
(४२) शब्दार्थ—जिनके चरनन को सलिल = जिनके चरणों का जल ।
हरत जगत-संताप = संसार का दुःख दूर करता है । (यहाँ संकेत इस बात की
ओर है कि गंगा का उद्गम विष्णु के चरणों से हुआ है ।) तें = वे । आप =
स्वयं ही ।
व्याख्या—(कवि कहता है) जिन परब्रह्म—श्रीकृष्ण के चरणों का जल
(गंगाजी) संसार के कष्टों को दूर करता है, वे स्वयं आज सुदामा ब्राह्मण के
चरण धो रहे हैं ।
(४३) शब्दार्थ—बेहाल = बुरी दशा, दुखी । बेवाइन = बिवाई, पैर की
एड़ियाँ फटने की स्थिति । कंटकजाल = काँटों का छत्ता, काँटों का समूह । पुनि =
फिर । जोए = देखे । इतै = यहाँ । कितै = कहाँ । कितै दिन खोए = कहाँ इतने
दिन बिताये । करुना करिकै = करुणा से अभिभूत हो कर । करुनानिधि =
करुणा के सागर, कृष्ण । पग = पैर ।
व्याख्या—(धोने के लिए जब श्रीकृष्ण ने सुदामा के पैर उठाये तो उन्होंने
देखा कि) बिवाइयों से सुदामा के पैरों के तलुए फटे हुए हैं और उनमें सैकड़ों
काँटे चुभे हुए हैं । (पैरों की इस दुर्दशा से श्रीकृष्ण ने सुदामा के कष्टों का अनु-
मान कर लिया) । उन्होंने रो कर कहा—हे मित्र, तुमने बहुत दुःख पाया है ।
न मालूम तुम कहाँ भटकते रहे । तुम यहाँ क्यों नहीं आये? सुदामा की दीनदशा
सुदामा-चरित / ७५
देख कर करुणा से अभिभूत हो श्रीकृष्ण इतना रोये कि परात का पानी छूने की
आवश्यकता ही न पड़ी, आँखों से बही हुई जल-धारा से ही उन्होंने सुदामा के
पैर धो डाले ।
विशेष — यह सवैया 'सुदामाचरित' के मार्मिक छन्दों में से एक है । इसमें
सुदामा के दारिद्र्य का हृदय-विदारक चित्रण और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का
मर्म-स्पर्शी निरूपण हुआ है । अनुप्रास अलंकार का अति स्वाभाविक प्रयोग
भावों को प्रभावशाली बनाने में बड़ा उपयोगी रहा है ।
(४४) शब्दार्थ—पट-पीत = पीत पट, पीताम्बर, पीला वस्त्र । सतिभामा
= सत्यभामा (श्रीकृष्ण की एक पटरानी) ।
व्याख्या—सुदामा के पैर धो कर श्रीकृष्ण ने अपने पीताम्बर से उन्हें पोंछा
और सत्यभामा से कहा—तुम जा कर इनके लिए भोजन तैयार करो ।
(४५) शब्दार्थ—तंदुल = चावल । तिय = स्त्री । दीन्हें हते = दिये थे ।
आगे धरियो जाय = जा कर भेंटना । विभव = वैभव, ऐश्वर्य ।
व्याख्या—इस प्रकार जब सुदामा निश्चिंत हुए तो उन्हें याद आया कि
उनकी पत्नी ने श्रीकृष्ण को भेंट देने के लिए चावल दिये थे । पर यहाँ का
राजसी ठाट-बाट देख कर उन्हें वह भेंट देने में संकोच हो रहा था ।
(४६) शब्दार्थ—रीति = ढंग, पद्धति, मनोदशा । सुहृद = मित्र । प्रगट =
प्रकट, प्रत्यक्ष ।
व्याख्या—भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्यामी है । भक्त सुदामा के मन का संकोच
उन्होंने जान लिया । अपने मित्र सुदामा ब्राह्मण से प्रत्यक्ष रूप में उन्होंने इस
प्रकार अपना प्रेम प्रकट किया—
(४७) शब्दार्थ—कछु = कुछ । काहे न देत = क्यों नहीं देते ? पोटरी =
गठरी । चाँपि रहे = दबा रहे हो, छिपाये हो । काँख = बगल । हेत = हेतु,
कारण ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने विनोद करते हुए कहा, भाभी ने मेरे लिए जो कुछ
भेंट दी है उसे देते क्यों नहीं ? पोटली को काँख में क्यों दबा रखा है ?
(४८) शब्दार्थ—आगे = पहले । गुरु-मातु = गुरु की पत्नी । ते = तिसको ।
७६ / सुदामा-चरित
चाबि = खा गये। 'चना गुरु-मातु... नहिं दीने = यहाँ श्रीकृष्ण और सुदामा के
विद्यार्थी-जीवन की एक घटना की ओर संकेत है। दोनों सन्दीपन गुरु के पास
पढ़ते थे। एक दिन गुरु-पत्नी ने दोनों को लकड़ी लाने के लिए जंगल भेजा।
सुदामा को उन्होंने कुछ चने दे कर कहा कि भूख लगने पर तुम और कृष्ण
दोनों चबा लेना। संयोगवश वन में आँधी-पानी का सामना करना पड़ा। कृष्ण-
सुदामा भटक कर एक-दूसरे से अलग हो गये। भूख लगने पर सुदामा ने चने
चबा लिये, पर कृष्ण को यह न बतलाया कि गुरु-पत्नी ने चने दिये थे।
लौटने पर कृष्ण को यह बात मालूम हुई। बानि = आदत। प्रवीने = प्रवीण,
चतुर। सुधा-रस-भीने = अमृत-रस से वेष्टित। अजौ = आज भी। तैसेई...
कीनै = भाभी के इन चावलों के साथ वैसे ही करोगे क्या ?
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने हँस कर कहा, चोरी करने में तुम चतुर हो। (याद
है न) एक बार गुरु-माता ने चने दिये थे और तुम हमें न दे कर सब चट कर
गये थे। (और आज भी तुम वही कर रहे हो) भाभी के दिये हुए, सुधा रस से
भीगे, चावलों की पोटली बगल में छिपाये बैठे हो। (देखता हूँ) तुम्हारी चोरी की
पुरानी आदत नहीं गयी।
विशेष—इस सवैया छन्द में हास्य-व्यंग्य की छटा दर्शनीय है। श्रीकृष्ण
अपने बालसखा की झेंप दूर करने के लिए बाल्यकाल की उस घटना की ओर
संकेत करते हैं, जिससे उसका उत्साह बढ़े। सुदामा ने गुरु-माता द्वारा दिए चने
सारे स्वयं खा लिए और श्रीकृष्ण को उनका हिस्सा नहीं दिया। इस घटना
की याद दिलाकर वे उन चावलों को माँगते हैं, जिन्हें सुदामा संकोचवश देने
में सकुचा रहा था। इससे श्रीकृष्ण की आत्मीयता, आदर्श-मैत्री तथा विनोदी-
प्रकृति का आभास मिलता है।
(४६) शब्दार्थ—संकुचत = संकोच करते हुए। चितवत = देखते हुए।
जीरन = जीर्ण, पुराना। तेहि ठौर = उसी जगह। बिखरि गए = छितरा गये,
फैल गये।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण द्वारा पिछली चोरी का भेद खोला जाता देख कर)
सुदामा ने बड़े संकोच से, श्रीकृष्ण की ओर देखते हुए पोटली को खोलना शुरू
सुदामा-चरित / ७७
किया। किन्तु कपड़ा इतना पुराना था कि गाँठ खोलते समय फट गया और
चावल बिखर गये।
विशेष—इस दोहा छन्द में सुदामा के दारिद्र्य का अत्यन्त मर्मस्पर्शी
चित्रण हुआ है। 'जीरन पट फटि छुटि परे' के द्वारा कवि सुदामा की दीन-हीन
दशा का एक और हृदय-विदारक बिम्ब प्रस्तुत करता है।
(५०) शब्दार्थ—चबत—चबाने के साथ ही। चबाउ—कानाफूसी करना,
गुप्त मंत्रणा। चतुरानन—ब्रह्मा। त्रिपुरारि—शिव।
व्याख्या—शीघ्र ही कृष्ण ने (बिखरे हुए चावलों को समेट कर) एक अंजुलि
भर चावल मुँह में डाल लिया। श्रीकृष्ण को इस प्रकार चावल चबाते देखकर
ब्रह्मा और शिव आपस में तरह-तरह की बातें करने लगे।
(५१) शब्दार्थ—कमला—लक्ष्मी। मोसो—मुझसे। कहा—क्या। मन
आँको—मन उकता गया; मन फिर गया। मोसो...आँको ?—क्या मुझसे
भगवान का मन फिर गया ? रिद्धि—ऋद्धि; समृद्धि। सिद्धि—सफलता। रिद्धि-
सिद्धि—समृद्धि और सफ़लता देने वाली देवियां हैं। ये गणेशजी की पत्नी या
अनुचरी हैं। निधि—कुबेर के रत्न - पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द
कुन्द, नील और खर्व। बम्हना—ब्राह्मण। धौंको—न जाने कौन है ? झौंकी—
फाँका। बकसै जनि—कहीं दान न कर दें। कुबेर—धन के देवता, देवताओं के
कोषाध्यक्ष, उत्तर दिशा के स्वामी।
व्याख्या—जब कृष्ण ने चावल की दूसरी फंकी ली तो लक्ष्मी काँप उठीं। वे
मन में सोचने लगीं, क्या अब भगवान् का मन मुझसे फिर गया ? (क्यों वे मुझे
इस गरीब ब्राह्मण को दे देना चाहते हैं)। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ और निधियाँ भी
काँप उठीं और सोचने लगीं कि यह ब्राह्मण कौन है (जिसे भगवान् सब कुछ दे
देना चाहते हैं)। इन्द्र को भय होने लगा कि भगवान् गरीब ब्राह्मण पर प्रसन्न
होकर उसे इन्द्रासन ही न दे दें। सोने का सुमेरु डर गया कि भगवान् कहीं उसे
ही दान में न दे दें। धनाधीश कुबेर चौंक पड़े कि आज क्या भगवान् खजाना
ही खाली कर देंगे।
विशेष—इस सवैया छन्द में अद्भुत रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।
७८ / सुदामा-चरित
श्रीकृष्ण जब अपने मित्र सुदामा की स्नेह-भेंट चावलों को खाने लगते हैं तो लक्ष्मी,
ऋद्धि, सिद्धि, इन्द्र, कुबेर आदि सभी चिंतित हो उठते हैं। उनकी चिंता
का कवि ने अति स्वाभाविक निरूपण किया है। अतिशयोक्ति अलंकार के प्रयोग
से भावोत्कर्ष में अच्छी सहायता मिली है।
(५२) शब्दार्थ— हूल = घबड़ाहट; पीड़ा। हियरा में = हृदय में। कानन =
कानों में। टेर = पुकार, आवाज। भेंटत सुदामैं···आघात ही— (१) सुदामा
ने भेंटस्वरूप जो चावल दिया उसे चाव से खाते हुए कृष्ण नहीं अघाते हैं।
(२) कृष्ण सुदामा से मिलते हैं और चावल चबा कर अघाते नहीं हैं। सोर
भयौ = हल्ला मच गया। ठाढ़ी = खड़ी-खड़ी। थरहरैं = काँपती हैं। तहीं = उसी
जगह। नाक लोक— स्वर्ग लोक। नाग लोक— पाताल लोक। ओक-ओक— घर
घर। थोक-थोक = समूह के समूह, टोली की टोली। गातहीं = शरीर। हालो
परो = हल्ला मच गया। थोकन में = झुंड और समूह में। लालो परो लोकन
मैं = लोकों में त्रास छा गया; अकाल पड़ गया। चालो परो चक्रन में— (१)
जन्म के दरिद्र सुदामा का आज भाग्य पलट रहा है; वह रंक से राजा होने जा
रहा है। इससे कालचक्र भी चलायमान हो गया। (२) चारों ओर उथल-पुथल
मच गई।
व्याख्या—कानों-कानों में यह बात फैल गई कि श्रीकृष्ण ने सुदामा जैसे
दीन का बहुत आदर-सत्कार किया और वे अब उससे भेंटस्वरूप मिले। साधारण
चावल ऐसी रुचि से चबा रहे हैं कि अघाते ही नहीं। सबके हृदय में एक घबरा-
हट-सी हुई। नरोत्तमदास कहते हैं कि समृद्धि और सफलता की अधिष्ठात्री
ऋद्धि-सिद्धियों में कोलहल सा मच गया। (अपने पति भगवान् की यह
अप्रत्याशित विरक्ति देखकर) लक्ष्मीजी वहीं खड़ी-खड़ी काँपने लगीं। स्वर्ग में
पाताल में, घर-घर में, झुण्ड-झुण्ड में इस अनहोनी घटना की खबर फैल गई।
इस संवाद से सबके मुख सूख गए और सब काँपने लगे। श्रीकृष्ण के चावल
चबाते ही देव-समूह में हल्ला मच गया कि अब क्या होगा? लोक-लोक में अकाल
पड़ गया (क्योंकि अधिकांश समृद्धि भगवान् ने सुदामा को दे दी)। श्रीकृष्ण की
यह लीला देखकर कालचक्र भी विचलित हो उठा। (जिस सुदामा के भाग्य में
सुदामा-चरित / ७६
इतनी दरिद्रता लिखी थी, वह दो मुट्ठी चावल खिलाकर आज अपार सम्पत्ति
का मालिक होने जा रहा है, अतः अपनी परवशता पर काल का विचलित हो
उठना स्वाभाविक ही है।)
विशेष—इस कवित्त में भावानुकूल भाषा का प्रयोग, कहावतों तथा अनु-
प्रासों का सौष्ठव भाव को प्रभावोत्पादक बनाने में अत्यन्त उपयोगी रहा है।
इसमें भाव एवं कला का एक साथ सौन्दर्य द्रष्टव्य है।
(५३) शब्दार्थ—भौन—भवन। पकवान—पूरी कचौड़ी आदि। निधि—
खजाना। सुषमा—सुन्दरता। अभिलाषत—चाहते हैं। दाख—मुनक्का, अंगूर
न चाखत—चखते तक नहीं। सिंधु छमा के—क्षमा के सागर, श्रीकृष्ण। सेर-
पावक—लगभग पाव भर। समा—साँवाँ; एक प्रकार का चावल। कंत रमा
के = लक्ष्मी-पति; विष्णु; कृष्ण।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण को सुदामा के साधारण चावलों को चबाते देखकर
लोग आपस में कहने लगे) सौन्दर्य के भण्डार, श्रीकृष्ण के महल तरह-तरह की
मिठाइयों और पकवानों से भरे पड़े हैं। साँझ-सवेरे उनके माता-पिता बड़े दुलार
से उनसे मिठाई-पकवान खाने का आग्रह करते हैं। पर क्षमा के सागर श्रीकृष्ण
अंगूर भी नहीं चखते। (कहने का तात्पर्य यह है कि मेवा-मिठाई में भी श्रीकृष्ण
की रुचि नहीं।) प्रीति की रीति को क्या कहा जाय; एक दुखिया ब्राह्मण एक पाव
साँवाँ जैसे मोटा चावल लाया है, (मेवा-मिठाई में भी रुचि नहीं लेने वाले)
श्रीकृष्ण उन मोटे चावलों को बड़े प्रेम से बैठे चबा रहे हैं।
विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का निरूपण हुआ
है। वे नाना प्रकार के पकवान छोड़कर मित्र के द्वारा भेंट किए गए चावल
जिस प्रेम-भाव से चबाते हैं, उसमें मैत्री-आदर्श का चरमोत्कर्ष देखा जा सकता
हैं। विषम अलंकार का प्रयोग भी भावों को प्रभावोत्पादक बनाने में बड़ा उप-
योगी रहा है।
(५४) शब्दार्थ—रुकुमिनि=रुक्मणी कृष्ण की आठ पटरानियों में एक।
अनचाह=अनिच्छा; उदासीनता।
व्याख्या—(दो मुट्ठी चावल खाने के बाद) श्रीकृष्ण ज्योंही तीसरी मुट्ठी
८० / सुदामा-चरित
चावल लेने लगे तभी रुक्मिणी ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा—आज
आप धन-सम्पत्ति से इतना उदासीन क्यों हो गये हैं ?
(५५) शब्दार्थ—यह धौं कौन मिलाप == यह कैसा मिलन है ? यह कैसी
मित्रता है ? करत सुदामा...सुदामा आप==सुदामा को अपने समान ऐश्वर्यवान
बना रहे हैं और स्वयं सुदामा के समान कंगाल बन रहे हैं।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण का हाथ रोक कर) रुक्मिणी ने उनके कान में कहा—
भला, यह भी मिलने-भेंटने का कोई ढंग है कि आप सुदामा को अपने समान
तीनों लोकों का स्वामी बना रहे हैं और स्वयं सुदामा के समान निर्धन बन
रहे हैं।
विशेष—इस दोहे में महादानी श्रीकृष्ण के दीनबन्धु तथा मित्रवत्सल रूप
का चित्रण हुआ है वे अपना सर्वस्व अपने मित्र को देकर स्वयं उसकी निर्धनता
अपना लेने में गौरव अनुभव करते हैं।
(५६) शब्दार्थ—कौतुक—तमाशा; क्रीड़ा, विस्मयजनक प्रसंग । भई रसोई
सिद्ध = भोजन तैयार हो गया ।
व्याख्या—इसी विस्मयजनक प्रसंग के समय सेवकों ने आकर निवेदन
किया—महाराज, भोजन तैयार है। चल कर भोजन कीजिए ।
(५७) शब्दार्थ—मध्याह्न = दोपहर ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा के साथ स्नान किया, धुली-धुलाई धोती
पहनी और दोपहर की संध्या की। फिर वे खाने के लिए चौके में जा बैठे ।
(५८) शब्दार्थ - रूपे के = चांदी के। रुचिर == सुन्दर । पायस दूध में
बनी खीर । सिता = चीनी; मिसरी । सरद = शरद । सोंधो = सोंधा ।
पहिति = दाल। सुरभी = गाय । फूले-फूले फुलका = फूली-फूली रोटियां ।
प्रफुल्ल = खिला हुआ श्वेत कमल । दुति = द्युति; चमक; शोभा । फूले-फूले...
मंद की = फूली-फूली रोटियों के सामने खिले हुए श्वेत कमलों की शोभा भी
मंद पड़ जाती हैं। व्यंजन = तरकारियां; विविध खाद्य पदार्थ । आछे कै = अच्छी
तरह । जेंवाय = भोजन करा कर; खिला कर । पाछे तैं = पीछे से । पछिया-
वरि = श्रीखण्ड; सिखरन - दही या मट्ठे में शक्कर डाल कर बनी वस्तु ।
३. तृतीय भाग: तण्डुल-भक्षण, विदाई, सुदामापुरी वैभव एवं ग्रन्थ-उपसंहार
सुदामा-चरित / ८१
भोजन के पश्चात् मीठी वस्तु खाने से पाचन शक्ति ठीक रहती है। आनि =
ला कर। कन्द = मिसरी।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण और सुदामा जब खाने बैठे तब उन्हें) चाँदी की
सुन्दर थाली में मिश्री सहित खीर परोसी गई, जो शरद् ऋतु के चन्द्रमा से भी
अधिक स्वच्छ थी। दूसरी थाली में दाल-भात, गाय का सुगन्धित घी और फूले
हुए फुलके परोसे गये। फूल-फूले फुलकों के सामने श्वेत कमलों की शोभा भी
मंद पड़ गई। पापड़, मुँगौरी, बड़ा इत्यादि तरह-तरह के व्यंजन परोसे गए।
भोजन के अन्त में श्रीखंड या सिखरन परोसी गई। श्रीकृष्ण ने अपने मित्र
सुदामा को ऐसे प्रेम से भोजन कराया कि देवता भी वह प्रीति देखते ही रह
गये।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण द्वारा मित्र सुदामा को दिये गये अपार
आदर; सत्कार, अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजनों आदि का अति सुन्दर निरूपण
हुआ है। प्रतीप अलंकार का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है।
(५६) शब्दार्थ विधि = प्रकार। चित चल्यौ = इच्छा हुई। बनाव =
वर्णन।
व्याख्या—इस तरह सात दिन सुदामाजी द्वारिका में रहे। प्रतिदिन उन्हें
श्रीकृष्ण की ओर से अधिक सम्मान मिलता रहा। तब उन्हें घर वापस लौटने
की इच्छा हुई। आगे उसका वर्णन सुनिये।
(५०) शब्दार्थ—दाहिने = दायीं ओर। चतुरानन = ब्रह्मा। सामुहें =
सम्मुख सामने। महेस = महेश; शंकर। दुऔ = दोनों। कर = हाथ। सुरेस =
इन्द्र। ऐतइ बीच = इसी बीच में। पायन = पांवों पर। आय = आ कर।
विभौ = वैभव। वपुरो = बेचारा।
व्याख्या—(जाते समय श्रीकृष्ण ने सुदामा को सब कुछ दे दिया। परन्तु
प्रत्यक्ष रूप में सुदामा को दान की सूचना न देकर उन्होंने एक स्वप्न में उन्हें
सारे ऐश्वर्य की झलक-सी दिखा दी) जाते समय सुदामा ने स्वप्न में देखा,—
ब्रह्मा उनकी दाहिनी ओर वेद पढ़ रहे हैं, सामने शंकर ध्यान लगाये हैं, बायीं
ओर सब देवताओं के साथ इन्द्र हाथ जोड़े खड़े हैं और विविध ऐश्वर्य लिए
८२ / सुदामा-चरित
कुबेर उनके सामने प्रणत हैं। जन्म का दरिद्र ब्राह्मण अपने स्वप्न में इतना
ऐश्वर्य देख कर चौंक पड़ा !
[अपने घर वापस लौटने पर सुदामा ने इस स्वप्न की चर्चा अपनी पत्नी
से की है। वे कहते हैं—
“दिन-प्रति अधिक सनेह सों, सपन दिखायो मोहि।
सो देख्यो परतच्छ ही, सपन न निसफल होंहि ॥”]
विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप को सांकेतिक किया
गया है। इसी से वे अपने भक्त सुदामा को एक असाधारण स्वप्न का दर्शन
कराते हैं। उदात्त अलंकार का सौन्दर्य भावों के उत्कर्ष में पूर्ण सहयोग देता है।
(६१) शब्दार्थ—देनो हुतो = जो देना था। गाथ = गाथा; कथा; रहस्य ।
बेर = बेला; समय ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा को जो कुछ देना था सो दे दिया।
(सुदामा ने उस ऐश्वर्य को स्वप्न में देखा भी ।) परन्तु सुदामा इस रहस्य को
नहीं समझ सके। चलते समय श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्ष रूप में उन्हें कुछ न दिया।
(६२) शब्दार्थ—पुनकनि—प्रसन्नता; रोमांच होना; उमंग; उत्साह। वह
पुलकनि भाँति—श्रीकृष्ण का उत्साह और उमंग से उठ कर आदरपूर्वक ललक
कर सुदामा से गले मिलना। भाँति—रीति। पठवनि—विदाई; भेजना। यह
पुनकनि—और यह (बिना कुछ दिये) विदा करना।
व्याख्या—(चलते समय श्रीकृष्ण ने सुदामा को प्रत्यक्ष रूप में कुछ न
दिया। यह सोच कर सुदामा को बड़ा पछतावा हुआ। रास्ते में वे सोचने लगे)
श्रीकृष्ण का रहस्य कुछ समझ में नहीं आता। कहाँ तो प्रेम से अत्यन्त पुलकित
होकर आतुरता तथा उमंग से उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहाँ इस तरह
खाली हाथ विदा कर दिया ! (अगर अन्त में उन्हें मेरे साथ इतना निष्ठुर
व्यवहार करना था तो उन्होंने पहले मेरे प्रति इतना प्रेम प्रदर्शित क्यों
किया ?)
(६३) शब्दार्थ—कर ओड़त फिरे = हाथ पसारे फिरे। तनक = थोड़ा ।
काज = लिये; कहा भयो ॰॰॰ राज समाज = अब कृष्ण को राजपाट मिल गया तो
सुदामा-चरित / ८३
क्या हुआ ।
व्याख्या - (खाली हाथ लौटने से सुदामा का मन बहुत क्षुब्ध था ।
पर मन ही मन श्रीकृष्ण की आलोचना कर उन्होंने अपने आप को धीरज
दिया । उन्होंने यह सोच कर अपने आप को धीरज दिया कि श्रीकृष्ण स्वभाव
से ही क्षुद्र हैं । संसार में धन पा जाने से किसी की प्रवृत्ति थोड़े ही में बदल
जाती है ।) ये वही कृष्ण हैं जो बाल्यावस्था में जरा सा दही के लिए घर-घर
हाथ फैलाते फिरते थे । अब उन्हें राज-पाट मिल गया तो क्या हुआ, स्वभाव
तो अभी वही है ।
विशेष—इस दोहे में सुदामा का मन स्थिति का अत्यन्त स्वाभाविक
चित्रण हुआ है ।
(६४) शब्दार्थ = हौं = मैं । आवत नाहीं हुतौ = आता नहीं था; आना
चाहता था । वाही = उसी ने (स्त्री ने) । ठेलि = ठेल कर; जबरदस्ती । वाहीं
पठ्यौ ठेलि = स्त्री ने वारबार ठेल कर यहाँ भेजा । धन = स्त्री । = धनधन-
सम्पत्ति । जाइकै = जा कर सकेलि = समेट कर ।
व्याख्या = (सुदामा स्त्री के कहने से ही श्रीकृष्ण के पास आये थे ।
जब श्रीकृष्ण ने चलते समय उन्हें कुछ न दिया तो स्त्री के प्रति भी झुँझला
कर मन ही मन उन्होंने कहा...) मैं तो श्रीकृष्ण के पास आता ही नहीं था
या आना ही नहीं चाहता था, मेरी स्त्री ने ही मुझे बार-बार ठेलकर यहाँ
भेजा । अब मैं घर जाकर अपनी स्त्री से कहूँगा कि श्रीकृष्ण ने तेरे लिए
गाड़ियों में भर-भर कर धन-सम्पत्ति भेजी है, इसे अच्छी तरह सँभाल कर
रख ।)
विशेष—इस दोहे सुदामा की अपनी झुँझलाहट, व्यंग्य-बाणों की वर्षा तथा
यमक अलंकार का सौष्ठव विशेष रूप से देखा जा सकता है ।
(६५) शब्दार्थ = बालापन = बचपन । साप = शाप । कहा...साप मैं शाप
क्या दूँ । जैसो...आप = जैसा कृष्ण ने मुझे दिया, वैसा ही उन्हें भी मिले ।
व्याख्या—(स्त्री पर अपनी झुंझलाहट उतारने के बाद सुदामा का
ध्यान फिर श्रीकृष्ण की ओर गया । उन्होंने मन ही मन कहा—श्रीकृष्ण मेरे
८४ / सुदामा-चरित
बचपन के मित्र हैं, अतः मैं उन्हें शाप क्या दूं ? केवल इतना ही कहता हूँ,
जैसा उन्होंने मुझे दिया, वैसा ही उन्हें भी मिले।
(६६) शब्दार्थ—नौ गुनधारी=नौ गुण धारण करने वाला; नौ तागे का
जनेउ धारण करने वाला; ब्राह्मण सुदामा। छगुनं=ब्राह्मणों के छः गुण
अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान और प्रतिग्रह। तिगुना मध्ये—तीन
गुणों—यजन, पठन, और दान वाले क्षत्रियों के बीच। जाय=जा कर। लायौ
=लाया। चापल—(चापल्य)=चंचलता; विकलता। चौगुनी=काम, क्रोध,
मद, लोभ इन चार लक्षणों वाला। ओंठों गुननि=ज्ञान के साधन—विवेक,
वैराग्य; षट्-सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और सामाधान);
मुमुक्षा, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि।
विशेष—इस दोहे में सुदामा के खाली हाथ लौटने पर उनके मन के संताप,
पश्चाताप तथा अहं का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक निरूपण हुआ है।
(६७) शब्दार्थ—और कहा कहिए=और क्या कहूँ। कंचन—सोना।
निपट—एक दम। कठिन—कठोर। हृदय। मोको—मुझे। दाम—कौड़ी;
छदाम।
व्याख्या=(सुदामा फिर मन में सोचने लगे—) और क्या कहूँ जहाँ
सोने के ही महल हैं, उस द्वारिका के स्वामी श्रीकृष्ण का हृदय इतना कठोर है
कि उन्होंने आते वक्त मुझ जैसे दरिद्र को एक छदाम भी नहीं दिया।
(६८) शब्दार्थ=रतनन=रतनों से। लाग=दोष। लाग आपने भाग को
=अपने भाग्य का ही दोष है। काको=किसको।
व्याख्या=(सुदामा सोचते हैं) श्रीकृष्ण के यहां न जाने कितने
भंडार हैं जिनमें बहु-मूल्य रत्न भरे पड़े हैं (परन्तु उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं
दिया)। (अन्त में वे यह सोच कर अपने आप को सान्त्वना देते हैं कि) यह सब
अपने भाग्य का दोष है, इसमें श्रीकृष्ण का क्या दोष है? अर्थात् मेरा भाग्य ही
खोटा है, मैं श्रीकृष्ण को क्या दोष दूं?
(६६) शब्दार्थ—इमि=इस तरह; इस प्रकार। झखत=पछताते हुए;
झुंझलाते हुए। पुन-तीर=गाँव के निकट। दीठि=नजर; दृष्टि। हय=घोड़ा।
, 'अ' has a top curve, bottom curve, middle bar, vertical stem, and another vertical stem for 'ा' -> आ!
Yes, look: it is हुआ!
प्रयाग हुआ है । -> सार्थक प्रयोग हुआ है ।
Ah, the letter is ह + ु = हु, and आ = आ!
So: सार्थक प्रयोग हुआ है ।!
Let's re-verify: हुआ in line 25:
हुआ है, जिसे प्रभावशाली बनाने में सन्देह अलंकार का सार्थक प्रयोग हुआ है ।
Yes, absolutely हुआ है ।!
Line 26:
(७२) शब्दार्थ-देव-नगर = स्वर्ग, अमरावती । जच्छपुर = यक्षपुर; कुबेर का
(Notice: शब्दार्थ-देव-नगर = स्वर्ग, अमरावती । जच्छपुर = यक्षपुर; कुबेर का).
Line 27:
नगर (अलकापुरी) । भटको = भटक पड़ा । कित आय = कहाँ आ कर । कहा =
Wait, is it कित आय or कित आयौ?
Look at कित आय: क ि त आ य -> कित आय = कहाँ आ कर । कहा =.
Wait, let's check आय: is there a matra on य? No, just आय.
८६ / सुदामा-चरित
क्या। यहि = इस। संभ्रमहिं = भूल जायें। अनैसे = खराब। द्विजदेव = ब्राह्मण
देवता। लखौ द्विज देव नगर कै = देखिये, यह देवतास्वरूप ब्राह्मण (सुदामा)
का नगर है। हरि-देव = श्रीकृष्ण। कै दियो है = कर दिया है; बना दिया है।
व्याख्या (जब बहुत खोजने पर भी सुदामा को अपनी झोपड़ी का पता न लगा
तब उन्होंने उस नगर के निवासियों से झुँझला कर पूछा—) अरे भाई, यह तो
बताओ कि यह कौन-सा नगर है; यह स्वर्ग है या अलकापुरी है? तुम लोग मुझे
समझा कर क्यों नहीं कहते कि इस नगर का क्या नाम है? मैं भटक कर कहाँ
आ गया हूँ? तुम कैसे नगरवासी हो कि भूले हुए पथिक को ठीक रास्ता नहीं
बतलाते? जिस नगर में पथिक रास्ता भूल जायें और कोई ठीक मार्ग न बताये,
वहाँ के लोग तो भले नहीं समझे जाते।
सुदामा का यह आक्षेप सुन कर एक व्यक्ति ने कहा—यहाँ के लोग बुरे
नहीं हैं। देखिये, यह देवतास्वरूप ब्राह्मण (सुदामा) का नगर है। श्रीकृष्ण ने
कृपा करके इस नगर को देवनगर के समान सुन्दर वैभवपूर्ण बना दिया है।
विशेष—इस कुण्डलिया छन्द में भी सुदामा की भ्रमित मनः स्थिति का
निरूपण हुआ है और इसमें भी सन्देह अलंकार का सौष्ठव द्रष्टव्य है।
(७३) शब्दार्थ—मन-मानिक = मणि-माणिक्य । जटित = जड़े हुए ।
सुबरन = स्वर्ण, सोना। भेंटे अकुलाय = आतुर हो कर मिल रहे हैं। छू वै रह्यौ
—छू रहे। बाँभनी = ब्राह्मणी; सुदामा की पत्नी। विविध बिधि = अनेक प्रकार
के। जैहौं = जाऊँगा। हौं—मैं जैहौं हौं निकालौ = मैं निकाला जाऊँगा । सो
तमासौ जग ज्वै रह्यौ = वह तमाशा संसार देख रहा है। तैं—तरत—सुन्दर;
से आकर्षक। ऐसी दशा···ह्वै रह्यौ—सुदामा के, भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन
मात्र से सुदामापुरी द्वारिकापुरी के समान सुन्दर हो रही है।
व्याख्या सुदामा के नगर का वर्णन करता हुआ कवि कहता है कि
वहाँ सुन्दर-सुन्दर महल थे जिनमें मणि और माणिक्य जड़े हुए थे। उन्हें देख
कर ऐसा मालूम होता था मानो सोने का सूर्य प्रकाश दे रहा है। सुदामा को
आते देख कर नगर के लोग दौड़ पड़े। लोग उत्सुकतापूर्वक उनसे मिले और पैर
छू कर दण्डवत किया। (अब भी सुदामा को विश्वास न हुआ कि यह उनका ही
सुदामा-चरित / ८७
नगर है।) तरह-तरह के वस्त्राभूषणों से सजी हुई ब्राह्मणी* को देख कर उन्हें
और भ्रम हो गया कि यह उनका नगर नहीं। वे घबड़ा गये और सोचने लगे,
यहाँ से अब अवश्य मैं निकाला जाऊँगा, यह तमाशा भी लोग देखेंगे ।
(सुदामा को क्या पता था कि) उनके श्रीकृष्ण के दर्शन मात्र से ही सुदामापुरी
की कायापलट हो गयी और अब वह द्वारिकापुरी से भी अधिक सुन्दर हो गयी
है।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण की दानशीलता के फलस्वरूप बने सुदामा
के भव्य भवन का अति सुन्दर वर्णन हुआ है। वर्णनात्मक शैली सौष्ठव के साथ-
साथ उदात्त एवं उत्प्रेक्षा का सौन्दर्य भी द्रष्टव्य है।
(७४) शब्दार्थ—कनक-दंड = सोने की छड़ी। सबनि = सबने ले कर ।
व्याख्या—(नगर-निवासियों ने एक महल के सामने सुदामा को ले
जा कर खड़ा किया) जिसके द्वार पर सोने का दंड हाथ में लिए हुए द्वारपाल
खड़ा था। उन लोगों ने सुदामा से कहा = यही आप का महल है।
(७५) शब्दार्थ—हँसत हौ = दिल्लगी करते हो। ह्वै करि परम प्रवीन =
बहुत चालाक हो कर या अपने को बहुत चालाक समझ कर ।
व्याख्या—(उस महल और द्वारपाल को देख कर सुदामा ने उन
लोगों से कहा—) आप लोग अत्यन्त चतुर हो कर भी मुझ दीन ब्राह्मण के साथ
दिल्लगी क्यों कर रहे हैं ? मुझे मेरी वह झोपड़ी दिखलाइये जहाँ मेरी दीन-
*कुछ लोगों के विचारानुसार ब्राह्मणी से यहाँ तात्पर्य सुदामा की पत्नी से
है। परन्तु सुदामा की पत्नी को सुदामा के आने की खबर पीछे मिलती है, जैसा
कि इस दोहे से स्पष्ट है—
“सुनत चली आनंदयुत, सब सखियान लै संग ।
नूपुर किंकिनि, दुँदभी, मनहुँ काम चतुरंग ॥”
यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि ‘बाँभनी’ शब्द यहाँ किसके लिए आया है। अगर
‘बाँभनी’ से तात्पर्य किसी ब्राह्मण की स्त्री से है तो सुदामा का, परस्त्री को
आभूषणों से लदी देख कर घबड़ा जाना युक्तिसंगत नहीं मालूम होता ।
८८ / सुदामा-चरित
दुखिया ब्राह्मणी रहती है।
(७६) शब्दार्थ—सो = से। तिन = उन्होंने। कहि पठवहु = कहला भेजो।
व्याख्या—नगर-निवासियों ने द्वारपाल से कहा—भीतर (सुदामा
की पत्नी के पास) खबर भिजवा दो कि ब्राह्मण-देवता आ गये हैं। अपने पति
का दर्शन कर सनाथ सो जाओ। (इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है—
भीतर यह खबर भिजवा दो, ब्राह्मणदेवता आ गये हैं कि ब्राह्मणी उनका दर्शन
कर कृतकृत्य हो जायें।)
(७७) शब्दार्थ—नूपुर = पेंजनी। किंकिनि—किंकिणी = करधनी; कमर-
कस। दुंदभी = दुन्दुभी, नगाड़ा। मनहु काम चतुरंग = मानो कामदेव की चतुरं-
गिणी सेना। चतुरंगिनी = चार अंगों (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) वाली सेना।
व्याख्या—ब्राह्मणी वह सूचना पाकर बहुत प्रसन्न हुई और अपनी सखियों
के साथ पाजेब, करधनी की घंटिकाओं की ध्वनि करती हुई, नगाड़े के संगीत के
बीच इस प्रकार द्वार की ओर चली मानो कामदेव की चतुरंगिणी सेना आ रही
हो।
विशेष—इस दोहे में श्रीकृष्ण की अपार कृपा से धन-वैभव पाने वाली
सुदामा-पत्नी की साज-सज्जा का अलंकृत वर्णन हुआ है और उत्प्रेक्षा अलंकार
उस सौष्ठव की वृद्धि में सहायक है।
(७८) शब्दार्थ—कंत = पतिदेव। गेह = घर।
व्याख्या—ब्राह्मणी ने सुदामा से आ कर कहा—हे नाथ! यही अपना घर
है। श्रीकृष्ण ने इस प्रकार हमारी दरिद्रता का नाश करके तीनों लोकों में
अपनी मैत्री-प्रेम को प्रकट किया है।
(७६) शब्दार्थ—जनि = मत। जनि कहो = न कहो। सँभारि = सँभाल
कर; सोच-विचार कर। इहैं = यहीं पर। कुटी मेरी हती = मेरी झोपड़ी
थी। बापुरी = बेचारी।
व्याख्या—(सुदामा अपनी पत्नी को पहचान न सके। अपने सामने एक
पटरानी को खड़ी देख कर और उसके द्वारा पति सम्बोधन सुन कर वे बहुत
चकमकाये। उन्होंने कहा—) तुम सोच-समझ कर बोलो; मुझे अपना पति मत
सुदामा-चरित / ८६
कहो। (हाँ,) यहीं पर मेरी झोपड़ी थी जिसमें बेचारी मेरी दुखिया पत्नी रहती
थी।
(८०) शब्दार्थ—तिहारियै=आपकी ही; तुम्हारी ही। सुधि सँभारिए=
होश कीजिये; याद कीजिये। प्रभुता=प्रभुत्व। श्री भगवंत=श्रीकृष्ण।
व्याख्या। (पति का शंका दूर करने के लिए सुदामा की पत्नी ने कहा—)
हे नाथ ! होश सँभालिये, जरा ध्यान से देखिये, मैं आपकी ही स्त्री हूँ। यह
सब धन-सम्पत्ति और सुन्दरता भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त हुई है।
(८१) शब्दार्थ—परी हुती=पड़ी हुई थी। तामैं=उसी में। दुःख काटौं
=दुःख के दिन बिताते थे। हेम-धाम=सोने का घर। जेवर-जराऊ=जड़ाऊ
गहने। साजे=पहने। छूछी=खाली; बिना गहनों की। छाम=क्षीण। सारी-
जरतारी=साड़ी जिस पर ज़री का काम किया हुआ हो। कारी=काली।
कामरी=कम्बल। पड़ाइन=पड़िवाइन; ब्राह्मणी। तिहारी अनुहार=तुम्हारे
समान रूप वाली। बिपदा-सताई=दुःख की मारी। पामरी=अभागिन।
व्याख्या—(अभी भी सुदामा को विश्वास न हुआ कि यह स्त्री मेरी पत्नी
है और यह महल मेरा अपना घर हे। उन्होंने कहा—) यहीं पर मेरी टूटी-फूटी
झोपड़ी थी। उसी में मेरी पत्नी अपने दुःख के दिन व्यतीत करती थी।
उस झोपड़ी के स्थान पर ये सोने के महल कैसे आ गये? (या, उसके रहने के
सोने के महल कहाँ थे?) तुम्हारा प्रत्येक अंग जड़ाऊ गहनों से सुशोभित है
और इतनी सखियाँ तुम्हारे साथ हैं। परन्तु मेरी ब्राह्मणी वह ब्राह्मणी दुबली-
पतली और अकेली थी; उसके शरीर पर कोई गहना न था। तुम ज़री के काम
की साड़ी और किनारेदार रेशमी दुपट्टा पहने हुए हो, परन्तु मेरी ब्राह्मणी के
पास तो ओढ़ने के लिए सिर्फ़ एक काली कामरिया थी। (हाँ,) तुम्हारी ओर
देख कर मैं इतना तो कह सकता हूँ कि मेरी वह ब्राह्मणी तुम्हारी ही सूरत-
शक्ल की थी। पर यह बात मेरी समझ में नहीं आती कि जन्म भर दुःख सहने
वाली बेचारी ब्राह्मणी को कुछ दिनों के अन्दर ही इतना धन-ऐश्वर्य कहाँ से
मिल गया? (अन्तिम पंक्ति का अर्थ, कुछ लोग इस प्रकार लगाते हैं—अपनी
विपदा की सतायी हुई दुखिया ब्राह्मणी को मैं कहाँ पाऊँगा?)
६० / सुदामा-चरित
विशेष—इस कवित्त में सुदामा की हैरानी, दुविधा आदि का अत्यन्त
स्वाभाविक चित्रण हुआ है। अनुप्रास अलंकार का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है।
(८२) शब्दार्थ—मंजु=सुन्दर। भायन सों=भावों से। तिहारोई=
तुम्हारी ही। हरौ=दूर कीजिये। श्रम=थकावट। भूरि=बहुत। दारिद
गमायो=दरिद्रता मिटायी। गह्यौ कर हैं=हाथ पकड़ती है। अविनासी=
अविनाशी=अमर। पूरन-प्रकाशी=पूर्ण ज्योतिर्मय। बरु=श्रेष्ठ।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने खड़ी होकर बड़ी कोमलता से कहा—हे
स्वामी ! मैं आपके चरण छूकर कहती हूं कि यह आपका ही घर है। आप
बहुत दूर से आये हैं, द्वारिका जाने में आपने बड़ा भारी कष्ट उठाया हैं। श्री-
कृष्ण की कृपा से हमारी दरिद्रता दूर हो गयी है। आइये, मैं अपनी सेवा से
आपकी थकावट दूर कर दूं। (सुदामा को इस प्रकार समझाते हुए स्त्री ने
उनका हाथ पकड़ लिया। सुदामा को अपनी बातों पर पूरा विश्वास न करते
देख वह उन्हें फिर समझाती है—) हे नाथ ! सोलहों कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण,
जिनका कभी नाश नहीं होता (जो ईश्वर के अवतार हैं) उन्होंने ही (मित्रता
निभाने के लिए) ऋद्धि-सिद्धियों को आपकी दासी बना दिया है, करोड़ों काम-
धेनु के साथ अपार सम्पत्ति और सब इच्छाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष
भी उन्होंने आपको दिया है। आप घर चलिए, भ्रम को त्यागिये और भगवान्
ने जो कुछ दिया है उसे ग्रहण कीजिए।
विशेष—इस कवित्त में सुदामा-पत्नी अपने अपार वैभव का रहस्य प्रकट
करते हुए श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की ओर अपने पति का ध्यान आकृष्ट करती
है।
(८३) शब्दार्थ —मुदित = प्रसन्न। अन्हवायो=स्नान करवाया। उबटि=
उबटन लगा कर। सुचि=शुचि - पवित्र।
व्याख्या—इस तरह पति को समझा-बुझा कर ब्राह्मणी उन्हें महल में ले
गयी और शीघ्र ही उसने उनके शरीर में पवित्र और सुगंधित उबटन मल-मल
कर उन्हें स्नान कराया।
(८४) शब्दार्थ— अंबर = वस्त्र। अंबर रचे = वस्त्र पहनाये।
सुदामा-चरित / ६१
व्याख्या—इसके बाद पति को सिंहासन पर बैठा कर ब्राह्मणी ने बड़े
आदर-प्रेम से उनकी पूजा की; तब उन्हें पवित्र और सुगंधित वस्त्र तथा सुन्दर-
सुन्दर आभूषण पहनाये ।
(८५) शब्दार्थ—सीतल = शीतल । अँचवायकै = आचमन करा कर ।
छवि = सुन्दर । रविप्रभा = सूर्य की कान्ति ।
व्याख्या—सुदामा को वस्त्र-आभूषण पहनाने के बाद ब्राह्मणी ने ठंडे जल से
उनके हाथ-पाँव धो कर उन्हें बैठाया । फिर पानों से भर कर पानदान उनके
पास ले जा कर रखा । वह पानदान अत्यन्त स्वच्छ और चमकीला था।
विशेष—इस दोहे में उपमा अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है ।
(८६) शब्दार्थ—रम्भा = देवलोक की अप्सरा, चिरयौवना, चिर-सुन्दरी ।
रंभादिक = रम्भा आदि; मेनका, रम्भा, उर्वशी, तिलोतमा और मंजुघोषा —ये
छः स्वर्ग की प्रधान अप्सराएँ हैं । बयारि = वायु ।
व्याख्या—रम्भा आदि अप्सराएँ चारों ओर से सुदामा पर चमर डुलाने
लगीं और उनकी पतिव्रता स्त्री पंखा झलने लगी ।
(८७) शब्दार्थ—स्वेत-छत्र = उजला चँदोवा । राजत = सुन्दर लगते हैं ।
सक्र = शक्र—इन्द्र । बाहन = सवारी । तुरँग = घोड़ा । बर = सुन्दर । अरु =
और । शुभ = मंगलमय । जान = यान—सवारी; रथ ।
व्याख्या—उजले चँदोवा के नीचे बैठे हुए सुदामा इन्द्र के समान सुशोभित
हो रहे थे । सुन्दर हाथी, घोड़े और रथ के अतिरिक्त और भी कई तरह की
सुखद सवारियाँ उनके पास थीं ।
(८८) शब्दार्थ—जानि परी = जान पड़ता है । गुरु-बन्धु = गुरु-भाई;
सहपाठी । हरिलीन्हीं = दूर कर दी । पीर = दुःख ।
व्याख्या—(जान-पड़ता है कि) गुरुभाई श्रीकृष्ण ने कल्पवृक्ष-सहित कामधेनु
दे कर सुदामा के सब कष्ट हर लिये ।
(८६) शब्दार्थ—सुधा = अमृत । वाम = स्त्री । बिनीत = विनीत, नम्र ।
मृदु = कोमल; मीठे । मन काम = मन की अभिलाषा ।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने विविध प्रकार से उनकी सेवा की और उन्हें