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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 108 में से

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पृष्ठ 78

सुदामा-चरित / ८३
क्या हुआ ।
व्याख्या - (खाली हाथ लौटने से सुदामा का मन बहुत क्षुब्ध था ।
पर मन ही मन श्रीकृष्ण की आलोचना कर उन्होंने अपने आप को धीरज
दिया । उन्होंने यह सोच कर अपने आप को धीरज दिया कि श्रीकृष्ण स्वभाव
से ही क्षुद्र हैं । संसार में धन पा जाने से किसी की प्रवृत्ति थोड़े ही में बदल
जाती है ।) ये वही कृष्ण हैं जो बाल्यावस्था में जरा सा दही के लिए घर-घर
हाथ फैलाते फिरते थे । अब उन्हें राज-पाट मिल गया तो क्या हुआ, स्वभाव
तो अभी वही है ।
विशेष—इस दोहे में सुदामा का मन स्थिति का अत्यन्त स्वाभाविक
चित्रण हुआ है ।
(६४) शब्दार्थ = हौं = मैं । आवत नाहीं हुतौ = आता नहीं था; आना
चाहता था । वाही = उसी ने (स्त्री ने) । ठेलि = ठेल कर; जबरदस्ती । वाहीं
पठ्यौ ठेलि = स्त्री ने वारबार ठेल कर यहाँ भेजा । धन = स्त्री । = धनधन-
सम्पत्ति । जाइकै = जा कर सकेलि = समेट कर ।
व्याख्या = (सुदामा स्त्री के कहने से ही श्रीकृष्ण के पास आये थे ।
जब श्रीकृष्ण ने चलते समय उन्हें कुछ न दिया तो स्त्री के प्रति भी झुँझला
कर मन ही मन उन्होंने कहा...) मैं तो श्रीकृष्ण के पास आता ही नहीं था
या आना ही नहीं चाहता था, मेरी स्त्री ने ही मुझे बार-बार ठेलकर यहाँ
भेजा । अब मैं घर जाकर अपनी स्त्री से कहूँगा कि श्रीकृष्ण ने तेरे लिए
गाड़ियों में भर-भर कर धन-सम्पत्ति भेजी है, इसे अच्छी तरह सँभाल कर
रख ।)
विशेष—इस दोहे सुदामा की अपनी झुँझलाहट, व्यंग्य-बाणों की वर्षा तथा
यमक अलंकार का सौष्ठव विशेष रूप से देखा जा सकता है ।
(६५) शब्दार्थ = बालापन = बचपन । साप = शाप । कहा...साप मैं शाप
क्या दूँ । जैसो...आप = जैसा कृष्ण ने मुझे दिया, वैसा ही उन्हें भी मिले ।
व्याख्या—(स्त्री पर अपनी झुंझलाहट उतारने के बाद सुदामा का
ध्यान फिर श्रीकृष्ण की ओर गया । उन्होंने मन ही मन कहा—श्रीकृष्ण मेरे