सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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किया। किन्तु कपड़ा इतना पुराना था कि गाँठ खोलते समय फट गया और
चावल बिखर गये।
विशेष—इस दोहा छन्द में सुदामा के दारिद्र्य का अत्यन्त मर्मस्पर्शी
चित्रण हुआ है। 'जीरन पट फटि छुटि परे' के द्वारा कवि सुदामा की दीन-हीन
दशा का एक और हृदय-विदारक बिम्ब प्रस्तुत करता है।
(५०) शब्दार्थ—चबत—चबाने के साथ ही। चबाउ—कानाफूसी करना,
गुप्त मंत्रणा। चतुरानन—ब्रह्मा। त्रिपुरारि—शिव।
व्याख्या—शीघ्र ही कृष्ण ने (बिखरे हुए चावलों को समेट कर) एक अंजुलि
भर चावल मुँह में डाल लिया। श्रीकृष्ण को इस प्रकार चावल चबाते देखकर
ब्रह्मा और शिव आपस में तरह-तरह की बातें करने लगे।
(५१) शब्दार्थ—कमला—लक्ष्मी। मोसो—मुझसे। कहा—क्या। मन
आँको—मन उकता गया; मन फिर गया। मोसो...आँको ?—क्या मुझसे
भगवान का मन फिर गया ? रिद्धि—ऋद्धि; समृद्धि। सिद्धि—सफलता। रिद्धि-
सिद्धि—समृद्धि और सफ़लता देने वाली देवियां हैं। ये गणेशजी की पत्नी या
अनुचरी हैं। निधि—कुबेर के रत्न - पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द
कुन्द, नील और खर्व। बम्हना—ब्राह्मण। धौंको—न जाने कौन है ? झौंकी—
फाँका। बकसै जनि—कहीं दान न कर दें। कुबेर—धन के देवता, देवताओं के
कोषाध्यक्ष, उत्तर दिशा के स्वामी।
व्याख्या—जब कृष्ण ने चावल की दूसरी फंकी ली तो लक्ष्मी काँप उठीं। वे
मन में सोचने लगीं, क्या अब भगवान् का मन मुझसे फिर गया ? (क्यों वे मुझे
इस गरीब ब्राह्मण को दे देना चाहते हैं)। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ और निधियाँ भी
काँप उठीं और सोचने लगीं कि यह ब्राह्मण कौन है (जिसे भगवान् सब कुछ दे
देना चाहते हैं)। इन्द्र को भय होने लगा कि भगवान् गरीब ब्राह्मण पर प्रसन्न
होकर उसे इन्द्रासन ही न दे दें। सोने का सुमेरु डर गया कि भगवान् कहीं उसे
ही दान में न दे दें। धनाधीश कुबेर चौंक पड़े कि आज क्या भगवान् खजाना
ही खाली कर देंगे।
विशेष—इस सवैया छन्द में अद्भुत रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।