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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 108 में से

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पृष्ठ 71

७६ / सुदामा-चरित
चाबि = खा गये। 'चना गुरु-मातु... नहिं दीने = यहाँ श्रीकृष्ण और सुदामा के
विद्यार्थी-जीवन की एक घटना की ओर संकेत है। दोनों सन्दीपन गुरु के पास
पढ़ते थे। एक दिन गुरु-पत्नी ने दोनों को लकड़ी लाने के लिए जंगल भेजा।
सुदामा को उन्होंने कुछ चने दे कर कहा कि भूख लगने पर तुम और कृष्ण
दोनों चबा लेना। संयोगवश वन में आँधी-पानी का सामना करना पड़ा। कृष्ण-
सुदामा भटक कर एक-दूसरे से अलग हो गये। भूख लगने पर सुदामा ने चने
चबा लिये, पर कृष्ण को यह न बतलाया कि गुरु-पत्नी ने चने दिये थे।
लौटने पर कृष्ण को यह बात मालूम हुई। बानि = आदत। प्रवीने = प्रवीण,
चतुर। सुधा-रस-भीने = अमृत-रस से वेष्टित। अजौ = आज भी। तैसेई...
कीनै = भाभी के इन चावलों के साथ वैसे ही करोगे क्या ?
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने हँस कर कहा, चोरी करने में तुम चतुर हो। (याद
है न) एक बार गुरु-माता ने चने दिये थे और तुम हमें न दे कर सब चट कर
गये थे। (और आज भी तुम वही कर रहे हो) भाभी के दिये हुए, सुधा रस से
भीगे, चावलों की पोटली बगल में छिपाये बैठे हो। (देखता हूँ) तुम्हारी चोरी की
पुरानी आदत नहीं गयी।
विशेष—इस सवैया छन्द में हास्य-व्यंग्य की छटा दर्शनीय है। श्रीकृष्ण
अपने बालसखा की झेंप दूर करने के लिए बाल्यकाल की उस घटना की ओर
संकेत करते हैं, जिससे उसका उत्साह बढ़े। सुदामा ने गुरु-माता द्वारा दिए चने
सारे स्वयं खा लिए और श्रीकृष्ण को उनका हिस्सा नहीं दिया। इस घटना
की याद दिलाकर वे उन चावलों को माँगते हैं, जिन्हें सुदामा संकोचवश देने
में सकुचा रहा था। इससे श्रीकृष्ण की आत्मीयता, आदर्श-मैत्री तथा विनोदी-
प्रकृति का आभास मिलता है।
(४६) शब्दार्थ—संकुचत = संकोच करते हुए। चितवत = देखते हुए।
जीरन = जीर्ण, पुराना। तेहि ठौर = उसी जगह। बिखरि गए = छितरा गये,
फैल गये।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण द्वारा पिछली चोरी का भेद खोला जाता देख कर)
सुदामा ने बड़े संकोच से, श्रीकृष्ण की ओर देखते हुए पोटली को खोलना शुरू