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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 108 में से

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पृष्ठ 81

८६ / सुदामा-चरित
क्या। यहि = इस। संभ्रमहिं = भूल जायें। अनैसे = खराब। द्विजदेव = ब्राह्मण
देवता। लखौ द्विज देव नगर कै = देखिये, यह देवतास्वरूप ब्राह्मण (सुदामा)
का नगर है। हरि-देव = श्रीकृष्ण। कै दियो है = कर दिया है; बना दिया है।
व्याख्या (जब बहुत खोजने पर भी सुदामा को अपनी झोपड़ी का पता न लगा
तब उन्होंने उस नगर के निवासियों से झुँझला कर पूछा—) अरे भाई, यह तो
बताओ कि यह कौन-सा नगर है; यह स्वर्ग है या अलकापुरी है? तुम लोग मुझे
समझा कर क्यों नहीं कहते कि इस नगर का क्या नाम है? मैं भटक कर कहाँ
आ गया हूँ? तुम कैसे नगरवासी हो कि भूले हुए पथिक को ठीक रास्ता नहीं
बतलाते? जिस नगर में पथिक रास्ता भूल जायें और कोई ठीक मार्ग न बताये,
वहाँ के लोग तो भले नहीं समझे जाते।
सुदामा का यह आक्षेप सुन कर एक व्यक्ति ने कहा—यहाँ के लोग बुरे
नहीं हैं। देखिये, यह देवतास्वरूप ब्राह्मण (सुदामा) का नगर है। श्रीकृष्ण ने
कृपा करके इस नगर को देवनगर के समान सुन्दर वैभवपूर्ण बना दिया है।
विशेष—इस कुण्डलिया छन्द में भी सुदामा की भ्रमित मनः स्थिति का
निरूपण हुआ है और इसमें भी सन्देह अलंकार का सौष्ठव द्रष्टव्य है।
(७३) शब्दार्थ—मन-मानिक = मणि-माणिक्य । जटित = जड़े हुए ।
सुबरन = स्वर्ण, सोना। भेंटे अकुलाय = आतुर हो कर मिल रहे हैं। छू वै रह्यौ
—छू रहे। बाँभनी = ब्राह्मणी; सुदामा की पत्नी। विविध बिधि = अनेक प्रकार
के। जैहौं = जाऊँगा। हौं—मैं जैहौं हौं निकालौ = मैं निकाला जाऊँगा । सो
तमासौ जग ज्वै रह्यौ = वह तमाशा संसार देख रहा है। तैं—तरत—सुन्दर;
से आकर्षक। ऐसी दशा···ह्वै रह्यौ—सुदामा के, भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन
मात्र से सुदामापुरी द्वारिकापुरी के समान सुन्दर हो रही है।
व्याख्या सुदामा के नगर का वर्णन करता हुआ कवि कहता है कि
वहाँ सुन्दर-सुन्दर महल थे जिनमें मणि और माणिक्य जड़े हुए थे। उन्हें देख
कर ऐसा मालूम होता था मानो सोने का सूर्य प्रकाश दे रहा है। सुदामा को
आते देख कर नगर के लोग दौड़ पड़े। लोग उत्सुकतापूर्वक उनसे मिले और पैर
छू कर दण्डवत किया। (अब भी सुदामा को विश्वास न हुआ कि यह उनका ही