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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

17/112-117 ]
ज्योतिषीके द्वारा शरण ग्रहण और प्रेमलाभ :-
सर्वज्ञ कहे, — “आमि ताहा ध्याने देखिलाङ।
ताहाते ऐश्वर्य देखि' फाँफर हइलाङ ॥ 112 ॥
सेइरूपे एइरूपे देखि एकाकार।
कभु भेद देखि, एइ मायाय तोमार ॥ 113 ॥
ज्योतिषीपर कृपा और प्रेमदान :-
ये हओ, से हओ तुमि, तोमाके नमस्कार।”
प्रभु तारे प्रेम दिल, कैल पुरस्कार ॥ 114 ॥
अनुवाद—सर्वज्ञने कहा— “मैंने वह ध्यानमें देखा
था, परन्तु आपका ऐश्वर्य देखकर मैं असमञ्जसमें पड़
गया था। आपका वह रूप और यह रूप कभी एक
समान और कभी उनमें भेद देखता हूँ, यह आपकी
माया ही है। आप जो हैं, सो हैं, मैं आपको नमस्कार
करता हूँ।” तब महाप्रभुने प्रसन्न होकर कृपाकर उसे
प्रेम प्रदान किया॥ 112-114॥
अनुभाष्य—ज्योतिषीका वृत्तान्त चैतन्यभागवतमें
दिखलायी नहीं देता है॥ 103-114॥
महाप्रभुकी बलदेव-आवेशमें यमुनाकर्षण-लीला :-
एकदिन प्रभु विष्णुमण्डपे बसिया।
'मधु आन', 'मधु आन' बलेन डाकिया॥ 115 ॥
नित्यानन्द-गोसाञि प्रभुर आवेश जानिल।
गङ्गाजल-पात्र आनि' सन्मुखे धरिल ॥ 116 ॥
जल पान करिया नाचे हञा विह्वल।
यमुनाकर्षण-लीला देखये सकल ॥ 117 ॥
अनुवाद—एक दिन महाप्रभु विष्णुमण्डपमें बैठकर
जोर-जोरसे कहने लगे—'मधु लाओ', 'मधु लाओ'।
श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके आवेशको समझकर
गङ्गाजलका पात्र उनके सामने लाकर रखा। महाप्रभु
जलपान करके आनन्दसे नृत्य करने लगे। सबने देखा
कि महाप्रभु यमुना-आकर्षण लीला कर रहे हैं॥ 115-117॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'यमुनाकर्षणलीला'—श्रीबलदेव प्रभुने
एक दिन यमुनापर क्रोध करके हल-मूसलके द्वारा
यमुनाको खींचा था। महाप्रभु जब श्रीबलदेवके आवेशमें
'मधु लाओ', 'मधु लाओ' कह रहे थे, उस समय अन्य
सभी उपरोक्त यमुनाकर्षण-लीलाको देख रहे थे॥ 117 ॥
अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, छब्बीसवाँ अध्याय
द्रष्टव्य है॥ 116॥
श्रीबलदेव प्रभु गोकुलमें आकर चैत्र और वैशाख,
दो मास गोपियोंसे परिवृत होकर वास कर रहे थे।
वारूणी पान करते हुए उन्होंने जलक्रीड़ाके लिये
यमुनाजीको अपने निकट आह्वान किया। (भाः
10/65/25-30, 33)—
“स आजुहाव यमुनां जलक्रीड़ार्थमीश्वरः।
निजं वाक्यमनादृत्य मत्त इत्यापगां बलः।
अनागतां हलाग्रेण कुपितो विचकर्ष ह॥
पापे त्वं मामनादृत्य यन्नायासि मयाहता।
नेष्ये त्वां लाङ्गलाग्रेण शतधा कामचारिणीम्॥
एवं निर्भर्त्सिता भीता यमुना यदुनन्दनम्।
उवाच चकिता वाचं पतिता पादयोर्नृप ॥
राम राम महाबाहो न जाने तव विक्रमम्।
यस्यैकांशेन विधृता जगती जगतः पते॥
परं भावं भगवतो भगवन्मामजानतीम्।
मोक्तु
ततो व्यमुञ्चत् यमुनां याचितो भगवान् बलः।
विजगाह जलं स्त्रीभिः करेणुभिरिवेभराट् ॥
अद्यापि दृश्यते राजन् यमुनाकृष्टवर्त्मना।
बलस्यानन्तवीर्यस्य वीर्यं सूचयतीव हि।”
“श्रीबलदेव प्रभुने जलकेलिके लिये यमुनाजीका
आह्वान किया। यमुनाजीने यह समझकर कि ये तो
मतवाले हो रहे हैं, उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन किया
और वे नहीं आयीं। तब श्रीबलदेव प्रभुने क्रोधित
होकर उन्हें अपने हलकी नोकसे खींचा। उन्होंने
कहा,—'पापिनी यमुने! क्योंकि तुम मेरी आदेशकी
अवज्ञा करके यहाँ नहीं आ रही हो और स्वेच्छाचार
करके तुम जो अपराध कर रही हो, उसका फल मैं
तुम्हें अभी चखाता हूँ। मैं अपने हलकी नोकके द्वारा
सतरहवाँ अध्याय | 239

[ 17/117-123
तुम्हारे सौ-सौ भाग किये देता हूँ।' हे राजन्! श्रीबलदेव
प्रभुकी इस प्रकार फटकारसे भयभीत होकर यमुनाजी
काँपते हुए उनके चरण-युगलमें गिर पड़ीं और प्रार्थना
करने लगीं, - 'हे जगन्नाथ! हे महाबाहो! हे राम! आप
अपने एक अंश (शेष) के द्वारा इस जगत्को धारण
करते हैं, ऐसे प्रभावशाली आपके पराक्रमको मैं भूल
गयी थी। हे अखिलान्तर्यामी भक्तवत्सल, भगवन्! मैं
आपके मुख्य स्वरूपसे अवगत नहीं हूँ, इसलिये मुझ
शरणागतको मुक्ति दान करें।' यमुनाजीकी इस प्रकार
प्रार्थना सुनकर भगवान् श्रीबलरामने यमुनाजीको मुक्त
कर दिया और फिर जैसे गजराज हथिनियोंके साथ
क्रीड़ा करता है, वे गोपियोंके साथ जलक्रीड़ा करने
लगे। हे राजन्! अभी भी यमुनाजी श्रीबलदेव प्रभुके
द्वारा खींचे हुए मार्गसे बहती हैं और ऐसा जान पड़ता
है कि वे महाविक्रमशाली श्रीबलदेव प्रभुके यश-पराक्रमका
गान कर रही हों॥" 117॥
अनुभाष्य-चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड-
“वनमाली-नाम ताँर पुत्र एक सङ्गे।
विप्रकुले जन्म, वैसे पूर्वदेश बङ्गे॥
देखिलेक काञ्चन-निर्मित कलेवर।
रत्नविभूषित येन सुमेरु-शिखर ॥
हलायुध-वेशे नाचे तिनलोक-नाथ॥
“वनमाली नामका उनका एक पुत्र था। उनका
जन्म ब्राह्मण कुलमें हुआ था और वे पूर्व बङ्गालमें
रहते थे। उन्होंने देखा कि महाप्रभुका शरीर मानो
सोनेका बना है। वह ऐसा लग रहा था मानो रत्नोंसे
जड़ित सुमेरु पर्वत हो। हलायुधको लेकर त्रिलोकी-नाथ
नृत्य कर रहे थे।" चैःचः आदुलीला, 10/73 संख्यामें
कहा गया है कि 'वनमाली पण्डित' ने भी महाप्रभुके
हाथोंमें सोनेका हल-मूसल देखा था। उनकी 'पण्डित'-पदवी,
और इनकी 'आचार्य'-पदवी, दोनों एक ही व्यक्ति हैं
अथवा पृथक् व्यक्ति हैं? ॥ 119॥
चन्द्रशेखर आचार्यरत्नका महाप्रभुका
बलदेवरूपमें दर्शन :-
मदमत-गति बलदेव-अनुकार।
आचार्य शेखर ताँरे देखे रामाकार ॥ 118॥
वनमाली आचार्यका महाप्रभुके
हाथमें स्वर्ण हल-दर्शन :-
वनमाली आचार्य देखे सोणार लाङ्गल।
सबे मिलि' नृत्य करे आनन्दे विह्वल ॥ 119॥
एइमत नृत्य हइल चारि प्रहर।
सन्ध्याय गङ्गास्नान करि' सबे गेला घर ॥ 120॥
महाप्रभुकी आज्ञासे घर-घरमें श्रीकृष्ण-कीर्त्तन :-
नगरिया लोके प्रभु यबे आज्ञा दिला।
घरे घरे सङ्कीर्त्तन करिते लागिला ॥ 121 ॥
नामगीति :-
'हरि हरये नमः, कृष्ण यादवाय नमः।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन ॥' 122॥
मृदङ्ग-करताल सङ्कीर्त्तन-महाध्वनि।
'हरि' 'हरि'-ध्वनि बिना अन्य नाहि शुनि ॥ 123 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने जब नगरके लोगोंको आज्ञा दी,
वे घर-घरमें सङ्कीर्तन करने लगे। 'हरि हरये नमः,
कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन'
का कीर्तन होने लगा। मृदङ्ग-करतालके साथ सङ्कीर्तनकी
ध्वनि सर्वत्र होने लगी और 'हरि-हरि' की ध्वनिके
अतिरिक्त कुछ भी सुनायी नहीं देता था॥ 121-123॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीबलदेव प्रभुके समान मदमत्त
गतिसे चलने लगे। श्रीचन्द्रशेखर आचार्यने उन्हें श्रीबलरामके
रूपमें देखा। वनमाली आचार्यने महाप्रभुके हाथमें सोनेका
हल देखा। सभी भक्त मिलकर आनन्दसे नृत्य करने
लगे। इस प्रकार चार प्रहर तक नृत्य हुआ। सन्ध्यामें
सभीने गङ्गास्नान किया और सब अपने-अपने घरोंको
गये॥ 118-120 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-नगरमें नाम प्रचार करनेके
समय महाप्रभुने श्रीवास-अङ्गनके निकटमें रहनेवाले
240 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/121–130 ]
नगरवासियोंको पहले करतालके साथ हरिनाम करनेकी
आज्ञा दी; क्रमशः सङ्कीर्त्तनमें मृदङ्ग-करताल़ादि बजने
लगे। तबसे घर-घरमें सङ्कीर्त्तनका प्रचार होता आ रहा
है॥121॥
कीर्त्तन-विरोधी यवन और काजी :-
शुनिय़ा ये क्रु
काजी-पाशे आसि' सब कैल निवेदन ॥ 124॥
अनुवाद-सङ्कीर्त्तनकी ध्वनि सुनकर यवन लोग
क्रोधित हो गये और उन्होंने काजीके पास आकर
सङ्कीर्त्तन बन्द करवानेका निवेदन किया॥ 124॥
अनुभाष्य-नगरवासियोंका श्रीकृष्ण-कीर्त्तन और
काजीका क्रोध तथा काजीका उद्धार-चैः भाः मध्यखण्ड,
तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।
‘काजी’—फौजदार, चाँदकाजी। पहले जमींदार, राजा
अथवा मण्डल भूमिके करका संग्रह करते थे। दण्डका
विधान और शासन आदिका कार्य काजी लोगोंके द्वारा
ही सम्पादित होता था। जमींदार अथवा काजी-ये दोनों
ही बङ्गाल-सूबाके सूबेदारके अधीन थे। नदिया, इस्लामपुर
और बागोयान आदि परगना ही उस समय हरि होड़के
अथवा उनके अधीन कृष्णदास होड़के अधीन था।
इनके भूमि अधिकारी होनेपर भी शासनका भार
काजीके पास ही था। कहा जाता है कि चाँदकाजी
बङ्गालके नवाब 'हुसेन शाह' के गुरु थे। किसीके मतसे
इनका दूसरा नाम 'मौलाना सिराजुद्दीन' तथा किसीके
मतसे 'हबिबर रहमान' था। इनके वंशज अभी भी उस
स्थानपर वर्तमान है और चाँदकाजीकी समाधि भी वहाँ
विद्यमान है॥ 124॥
काजीका मृदङ्ग तोड़ना, कीर्त्तनका
विरोध और न करनेकी आज्ञा :-
क्रोधे सन्ध्याकाले काजी एक घरे आइल।
मृदङ्ग भाङ्गिय़ा लोके कहिते लागिल॥ 125॥
“एतकाल प्रकटे केह ना कैल हिन्दुयानि।
एबे ये उद्यम चालाओ कार बल जानि' ॥ 126॥
केह कीर्त्तन ना करिह सकल नगरे।
आजि आमि क्षमा करि' याइतेछों घरे॥ 127॥
आर यदि कीर्त्तन करिते लाग पाइमु।
सर्वस्व दण्डिय़ा तार जाति ये लइमु॥”128॥
अनुवाद-सन्ध्याके समय काजी क्रोधित होकर एक
हिन्दूके घरमें आया और मृदङ्ग तोड़कर कहने लगा-“अभी
तक तो हिन्दुओंका ऐसा आचरण नहीं था, किसके
बलपर तुम लोग यह सब कर रहे हो? आज मैं तुम्हें
क्षमा करके अपने घर जा रहा हूँ, परन्तु कोई भी
अबसे नगरमें कहीं भी कीर्त्तन नहीं करेगा। और यदि
मैंने किसीको कीर्त्तन करते हुए पाया, तो मैं उसका
सब कुछ हरण करके उसकी जाति भ्रष्ट कर
दूँगा॥”125॥
अमृतप्रवाह भाष्य-बख्तियार खिलजीके आनेके समयसे
लेकर चाँदकाजीके समय तक हिन्दुओंका धर्माचरण
बहुत कमजोर हो गया था। जिनकी वास्तविक हिन्दू
धर्ममें आस्था थी, वे चुपचाप एक बार “हरि हरि”
बोलकर चुप हो जाते थे। इसलिये काजीने कहा-‘अभी
तक तो हिन्दुओंका ऐसा आचरण नहीं था, किसके
बलपर ऐसा प्रयास कर रहे हो?'॥ 126॥
अनुभाष्य-अब भी वह स्थान मायापुरमें ‘खोलभाङ्गार
डाङ्गा’ के नामसे प्रसिद्ध है॥ 125॥
दुःखी सज्जन व्यक्तियोंका महाप्रभुके निकट आवेदन :-
एत बलि' काजी गेल, -नगरिया लोक।
प्रभु-स्थाने निवेदिल पाञा बड़ शोक॥ 129॥
महाप्रभुका क्रोध तथा सभीको
सङ्कीर्त्तन करनेका आदेश :-
प्रभु आज्ञा दिल-“याह, करह कीर्त्तन।
मुञि संहारिमु आजि सकल यवन॥”130॥
सतरहवाँ अध्याय | 241

[ 17/130-139
अनुवाद—यह कहकर काजी चला गया। नगरके
लोगोंको बहुत दुःख हुआ और वे महाप्रभुके पास
जाकर निवेदन करने लगे। महाप्रभुने उन्हें आज्ञा
दी—"तुम लोग जाकर निर्भय होकर कीर्तन करो। मैं
आज ही सभी यवनोंका संहार करूँगा॥" 130 ॥
घरे गिया सब लोक करय कीर्त्तन।
काजीर भये स्वच्छन्द नहे, चमक्ति मन ॥ 131 ॥
ता-सबार अन्तरे भय प्रभु मने जानि'।
कहिते लागिला लोके शीघ्र डाकि' आनि' ॥ 132 ॥
“नगरे नगरे आजि करिमु कीर्त्तन।
सन्ध्याकाले कर सबे नगर मण्डन ॥ 133 ॥
सन्ध्याते देउटि सबे ज्वाल घरे घरे।
देख, कोन् काजी आसि मोरे माना करे ॥" 134 ॥
अनुवाद—सभी लोग अपने-अपने घरमें जाकर
कीर्तन करने लगे। परन्तु काजीका भय उनके मनमें
था, इसलिये वे स्वच्छन्द रूपसे कीर्तन नहीं कर पा रहे
थे। महाप्रभु मन-ही-मनमें उन सबके हृदयके भयको
जानते थे, इसलिये उन्होंने कहा,—“शीघ्र ही सभी
लोगोंको बुलाकर लाओ। आज मैं नगर-नगरमें कीर्तन
करूँगा। सन्ध्याकालमें सारे नगरको सजा दो और उस
समय सब घरोंमें मशालें जला दो। मैं देखूँगा कि कौन
काजी आकर मुझे ऐसा करनेसे मना करता
है?॥” 131-134 ॥
एत कहि' सन्ध्याकाले चले गौरराय।
कीर्त्तनेर कैल प्रभु तिन सम्प्रदाय ॥ 135 ॥
तीन गुटोंमें कीर्तन-विभाग :-
आगे सम्प्रदाये नृत्य करे हरिदास।
मध्ये नाचे आचार्य-गोसाञि परम उल्लास ॥ 136 ॥
पाछे सम्प्रदाये नृत्य करे गौरचन्द्र।
ताँर सङ्गे नाचि' बुले प्रभु नित्यानन्द ॥ 137 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीगौरराय सन्ध्याके समय
चले और उन्होंने कीर्तन करनेवालोंके तीन मण्डलियाँ
बना दीं। सबसे आगेवाली मण्डलीमें श्रीहरिदास नृत्य
कर रहे थे। बीचवाली मण्डलीमें श्रीअद्वैताचार्य परमोल्लासके
साथ नृत्य कर रहे थे और पीछेवाली मण्डलीमें स्वयं
श्रीगौरचन्द्र नृत्य कर रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु भी
महाप्रभुके साथ चलते हुए नृत्य कर रहे थे॥ 135-137 ॥
वृन्दावन-दास इहा 'चैतन्यमङ्गले'।
विस्तारि' वर्णियाछेन, चैतन्य-कृपाबले ॥ 138 ॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावन-दासने महाप्रभुकी कृपाके बलपर
इसका 'चैतन्यमङ्गल' में विस्तारसे वर्णन किया है॥ 138 ॥
कीर्तन करते-करते नवद्वीप-नगर भ्रमण :-
एइमत कीर्त्तन करि' नगरे भ्रमिला।
भ्रमिते भ्रमिते प्रभु काजीद्वारे गेला ॥ 139 ॥
अनुवाद—इस प्रकार वे नगरमें भ्रमण करते हुए
कीर्तन करने लगे। समस्त नगरमें भ्रमण करते-करते
महाप्रभु काजीके द्वार तक जा पहुँचे ॥ 139 ॥
अनुभाष्य—चैःभाः तेइसवाँ अध्याय—
“तुया चरणे मन लागहुँ रे।
(शार्ङ्गधर) तुया चरणे मन लागहुँ रे ॥ 241 ॥
चैतन्यचन्द्रेर एइ आदि सङ्कीर्त्तन।
भक्तगण गाय नाचे श्रीशचीनन्दन ॥ 242 ॥
'गङ्गातीरे तीरे पथ आछे नदीयाय।
आगे सेइ पथे नाचि' याय गौरराय ॥ 298 ॥
आपनार घाटे आगे बहु नृत्य करि'।
तबे माधाइर घाटे गेला गौरहरि ॥ 299 ॥
'नाचे विश्वम्भर, सबार ईश्वर,
भागीरथी-तीरे तीरे'। (ध्रु) ॥ 271 (क) ॥
वारकोणा-घाटे नागरिया-घाटे गिया।
गङ्गानगर दिया प्रभु गेला 'सिमुलिया' ॥ 300 ॥
नदीयार एकान्ते नगर 'सिमुलिया'।
नाचिते नाचिते प्रभु उत्तरिल गिया ॥ 348 ॥
काजिर बाड़ीर पथ धरिला ठाकुर ॥ 359 (क) ॥
आइला नाचिया यथा काजिर नगर ॥ 379 ॥”
242 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/139–147 ]
“चैतन्यचन्द्रका यह आदि कीर्तन है—'तुम्हारे चरणोंमें
मेरा मन लग जाये, हे शार्ङ्गधर ! तुम्हारे चरणोंमें मेरा
मन लग जाये।' (नगर-कीर्तनमें) भक्त लोग गा रहे थे
और श्रीशचीनन्दन नृत्य कर रहे थे। 'नदियामें गङ्गाके
किनारे जो मार्ग था, उसपर श्रीगौरसुन्दर आगे-आगे
नृत्य करते हुए जा रहे थे। पहले 'अपने-घाट' पर
बहुत नृत्य किया और तब श्रीगौरहरि 'माधाइ-घाट' पर
गये। 'नाचे विश्वम्भर, सर्वेश्वर, भागीरथीके तीरे-तीरे।
(ध्रु०)। फिर 'बारकोणा-घाट' और 'नगरिया-घाट' से
'गङ्गानगर' होते हुए महाप्रभु 'सिमुलिया' पहुँचे। नदीयाके
एक प्रान्त भागमें 'सिमुलिया' नगर है, नाचते-नाचते
महाप्रभु वहाँ पहुँच गये। तब ठाकुर (महाप्रभु) काजीके
घरकी ओर चल पड़े। नाचते-नाचते वे काजीके नगरमें
पहुँचे॥” 139 ॥
तर्ज-गर्ज करे लोक, करे कोलाहल।
गौरचन्द्र-बले लोक प्रश्रय-पागल ॥ 140 ॥
अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके बलके आश्रयके कारण
लोग पागलसे हो गये और वे तर्जन-गर्जन करते हुए
कोलाहल करने लगे॥ 140 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीश्रीगौरचन्द्रके बलसे लोग तब
उनके आश्रय प्राप्तकर पागल हो गये॥ 140 ॥
काजीका अपनेको छिपाना :–
कीर्त्तनेर ध्वनिते काजी लुकाइल घरे।
तर्ज्जन गर्ज्जन शुनि' ना हय बाहिरे ॥ 141 ॥
अभद्र व्यक्तियोंका काण्ड :–
उद्धत लोक भाङ्गे काजीर घर-पुष्पवन।
विस्तारि' वर्णिला इहा दास-वृन्दावन ॥ 142 ॥
अनुवाद—कीर्तनकी ध्वनि सुनकर काजी अपने
घरमें छिप गया और तर्जन-गर्जन सुनकर भयसे बाहर
नहीं आया। कुछ अभद्र लोग उत्तेजित होकर काजीके
घरमें घुसकर उसके घर और वाटिकाको नष्ट करने
लगे। इस प्रसङ्गको श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे कहा
है॥ 141-142 ॥
अनुभाष्य—चैःभाः तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य
है॥ 138-142 ॥
भद्र सज्जन व्यक्तियोंके द्वारा काजीका आह्वान :–
तबे महाप्रभु तार द्वारेते बसिला।
भव्यलोक पाठाइया काजी बोलाइला ॥ 143 ॥
काजीको लौकिकी मर्यादा-दान :–
दूर हइते आइला काजी माथा नोडाइया।
काजीरे बसाइला प्रभु सम्मान करिया ॥ 144 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभु काजीके द्वारपर बैठ गये
और उन्होंने कुछ शिष्ट लोगोंको भीतर भेजकर
काजीको बुलवाया। काजीने बाहर आकर दूरसे महाप्रभुको
अपना शीश नवाया। महाप्रभुने काजीको सम्मानपूर्वक
वहाँ बैठाया॥ 143-144 ॥
काजीके आचरणसे महाप्रभुकी विस्मयसूचक उक्ति :–
प्रभु बलेन, — “आमि तोमार आइलाम अभ्यागत।
आमा देखि' लुकाइला, – ए धर्म केमत ॥” 145 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “मैं तुम्हारा अतिथि बनकर
आया हूँ और मुझे देखकर तुम छुप रहे हो, यह कैसा
धर्मका आचरण है?” ॥ 145 ॥
काजीका प्रत्युत्तर :–
काजी कहे, – “तुमि आइस क्रु
तोमा शान्त कराइते रहिनु लुकाइया ॥ 146 ॥
एबे तुमि शान्त हैले, आसि' मिलिलाङ।
भाग्य मोर, – तुमि-हेन अतिथि पाइलाङ ॥ 147 ॥
अनुवाद—काजीने कहा, – “आप तो क्रोधित होकर
आये हो, आपके क्रोधको शान्त करनेके लिये ही मैं
छुपा हुआ था। अब आप शान्त हो गये हो, इसलिये
मैं आपसे आकर मिल रहा हूँ। यह तो मेरा सौभाग्य
है कि आप मेरे अतिथि बने हैं॥ 146-147 ॥
सतरहवाँ अध्याय | 243

[ 17/148-158
ग्राम-सम्बन्धे 'चक्रवर्त्ती' हय मोर चाचा।
देह-सम्बन्ध हैते ग्राम-सम्बन्ध साँचा॥ 148 ॥
नीलाम्बर चक्रवर्त्ती हय तोमार नाना।
से सम्बन्धे हओ तुमि आमार भागिना॥ 149 ॥
भागिनार क्रोध मामा अवश्य सहय।
मातुलरे अपराध भागिना ना लय॥" 150 ॥
अनुवाद-ग्रामके सम्बन्धसे नीलाम्बर चक्रवर्ती मेरे चाचा लगते हैं और देहके सम्बन्धसे भी श्रेष्ठ ग्रामका सम्बन्ध होता है। नीलाम्बर चक्रवर्ती तुम्हारे नाना हैं और इस सम्बन्धसे तुम मेरे भाञ्जे लगते हो। भाञ्जेका क्रोध मामा अवश्य ही सहन करता है और मामाका अपराध भाञ्जा नहीं लेता है॥" 148-150 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'ब्राह्मणपुष्करिणी' ग्रामके एक भागमें काजियोंका पुराना घर अभी भी वर्तमान है। उस ग्रामके दूसरे भागसे लगा हुआ 'तारणवास' है, जो पहले 'बिल्वपुष्करिणी' था। वह ग्राम और काजियोंका 'ब्राह्मणपुष्करिणी' एक ही ग्राम होनेसे चाँदकाजीका महाप्रभुके साथ मामाका सम्बन्ध था॥ 148 ॥
अनुभाष्य - 'चक्रवर्त्ती'- नीलाम्बर चक्रवर्त्ती। 'चाचा'- पिताका छोटा भाई, बङ्गालमें चलती भाषामें उन्हें 'काका' कहते हैं। 'साँचा'-वास्तविक, शुद्ध, सच्चा॥ 148 ॥
एह मत दुँहार कथा हय ठारे-ठोरे।
भितरेर अर्थ केह बुझिते ना पारे॥ 151 ॥
अनुवाद-इस प्रकार उन दोनोंकी सङ्केतमें बातें हो रही थीं, उनका भीतरी अर्थ कोई नहीं समझ पाया॥ 151 ॥
महाप्रभु और काजीकी उक्ति एवं प्रत्युक्ति :-
प्रभु कहे,–“प्रश्न लागि' आइलाम तोमार स्थाने।”
काजी कहे,–“आज्ञा कर, ये तोमार मने ॥” 152 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मेरे मनमें कुछ प्रश्न हैं, जिनके समाधानके लिये मैं आपके घरपर आया हूँ।" काजीने कहा, - "आज्ञा करो जो आपके मनमें है॥" 152 ॥
इस्लाम धर्मके आचारके सम्बन्धमें महाप्रभुका प्रश्न :-
प्रभु कहे, - "गोदुग्ध खाओ, गाभी तोमार माता।
वृष अन्न उपजाय, ताते तँहो पिता॥ 153 ॥
पिता माता मारि' खाओ-एबा कोन् धर्म।
कोन् बले कर तुमि एमत विकर्म ॥" 154 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "आप गायका दूध पीते हैं, इस कारण गाय आपकी माता हुई। बैल [खेतोंमें हल चलाकर] अन्न उत्पन्न करते हैं, इसलिये वे आपके पिता हुए। पिता-माताको मारकर खाना, यह कौनसा धर्म है। किसके बलपर आप ऐसा पाप करते हैं?"॥ 153-154 ॥
अनुभाष्य - 'अन्न उपजाय'-बैल हलको खींचकर धानादि फसलको बोने और रोपणके लिये खेतको तैयार करके किसानको बीज और चावलादि अन्नके उत्पादनमें मुख्यरूपसे सहायता करता है।
'एबा'-यह॥ 153-154 ॥
काजीका उत्तर :-
काजी कहे, - "तोमार यैछे वेद-पुराण।
तैछे आमार शास्त्र-केताब 'कोराण' ॥ 155 ॥
सेइ शास्त्रे कहे, -प्रवृत्ति-निवृत्ति-मार्ग-भेद।
निवृत्ति-मार्गे जीवमात्र-वधेर निषेध॥ 156 ॥
प्रवृत्ति-मार्गे गोवध करिते विधि हय।
शास्त्र-आज्ञाय वध कैले नाहि पाप-भय ॥ 157 ॥
तोमार वेदेते आछे गोवधेर वाणी।
अतएव गोवध करे बड़ बड़ मुनि॥" 158 ॥
अनुवाद-काजीने कहा, - "आपके जैसे वेद-पुराण हैं, वैसे ही हमारा शास्त्र-ग्रन्थ 'कुरान' है। उस शास्त्रमें
244 | श्रीचैतन्यचरितामृत

प्रवृत्ति और निवृत्ति भेदसे दो मार्ग दिखलाये हैं।
निवृत्ति-मार्गमें जीवमात्रका वध निषेध है। प्रवृत्ति-मार्गमें
गोवधकी विधिका विधान है, इसलिये हमें शास्त्रकी
आज्ञानुसार वध करनेसे पापका भय नहीं है। आपके
वेदोंमें भी तो गोवधके विषयमें कहा गया है, इसलिये
बड़े-बड़े मुनि भी तो गोवध करते हैं॥" 155-158॥
अनुभाष्य-'केताब'-ग्रन्थ। 'सरियत्', 'तरिकत्' और
'मारफत्'—ये तीन प्रकारके पथ हैं॥ 155-158॥
अमृतानुकणिका-श्रीमद्भागवतम् ग्यारहवें स्कन्ध
(11/5/11, 13-15) में आठवें योगेन्द्र चमसेने राजा
निमिसे कहा—
“लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्या
हि जन्तोर्न हि तत्र चोदना।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञ-
सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा॥ 11॥
यद्घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा
पशोरालभनं न हिंसा।
एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै
इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम्॥ 13॥
ये त्वनेवंविदोऽसन्तः स्तब्धाः सदभिमानिनः।
पशून् द्रुह्यन्ति विश्रब्धाः प्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥ 14॥
द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्।
मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः॥" 15॥
“कर्म मीमांसक वेदोंके अर्थवादमें निरत होकर
ऐसा सिद्धान्त स्थापित करते हैं कि स्त्रीसङ्ग, आमिष
(मांस) भोजन एवं मदिरापान करनेके लिये वेदोंकी
प्रेरणा है, अर्थात् इन सभी क्रियाओंको करनेकी प्रेरणा
देनेके लिये ही वेदोंमें इस प्रकारके यज्ञोंकी व्यवस्था दी
गयी है। किन्तु वे यह नहीं जानते कि ये सभी
प्रवृत्तियाँ जीव-जन्तुमात्रके (वास्तविक आत्माके स्वभावमें
नहीं, बल्कि देहके) निसर्गगत स्वभावमें ही हैं, इसलिये
वे प्रेरणाकी अपेक्षा नहीं रखतीं। इन सभी प्रवृत्तियोंकी
निवृत्तिके लिये ही विवाहके द्वारा स्त्रीसङ्ग, यज्ञके
माध्यमसे आमिष भोजन और (सौत्रामणि यज्ञमें ही)
सुरा-ग्रहणकी व्यवस्था वेदोंमें दी गयी है। इसलिये
निवृत्ति ही वेदोंका गूढ़ तात्पर्य है। किसी विशेष
परिस्थितिमें मद्यके सूँघनेमात्रको ही भक्षणके रूपमें कहा
गया है और (वृद्ध) पशुओंका वध करके उसे
पुनर्जीवितकर युवा शरीर देनेके उद्देश्यसे ही विधान है,
पशु वधका नहीं। इसी प्रकार स्त्रीसङ्ग भी केवल
सन्तानोत्पत्तिके लिये विहित है, रतिक्रीड़ाके लिये नहीं।
यह विशुद्ध वेदमत ही स्वधर्म है, परन्तु वेदार्थवादीगण
इस निगूढ़ सिद्धान्तको जानते ही नहीं हैं। जो व्यक्ति
वेदोंके इस तात्पर्यको नहीं जानते, वे वास्तवमें धर्मके
तत्त्वको नहीं जाननेवाले, अविनीत और साधु होनेका
अभिमान करनेवाले हैं। ये लोग निर्भीक होकर पशुओंका
वध करते हैं और इन लोगोंके मरनेके बाद वे पशु
ही इन्हें खाते हैं। देखो ! आत्मास्वरूप ईश्वर श्रीहरि
(हमारे एवं अन्यान्य) सभी प्राणियोंके शरीरमें अवस्थान
कर रहे हैं, किन्तु मूर्ख लोग (अन्योंके शरीरमें स्थित
हरिके प्रति विद्वेष करके) अपने शवतुल्य अनित्य
शरीरके पोषणके अभिप्रायसे पशुओंका वध करते हैं,
जिसके फलस्वरूप वे देहमें आसक्त होकर अधःपतित
हो जाते हैं॥” 155-158॥
पुनर्जीवन प्राप्तिके कारण वेद-विहित वध-समर्थन :-
प्रभु कहे,—“वेदे कहे गोवध निषेध।
अतएव हिन्दुमात्र ना करे गोवध॥ 159॥
जियाइते पारे यदि, तबे मारे प्राणी।
वेद-पुराणे आछे हेन आज्ञा-वाणी॥ 160॥
अतएव जरद्गव मारे मुनिगण।
वेदमन्त्रे सिद्ध करे ताहार जीवन॥ 161॥
जरद्गव हञा युवा हय आरबार।
ताते तार वध नहे, हय उपकार॥ 162॥
कलिकालमें ब्राह्मण निःशक्तिक :-
कलिकाल तैछे शक्ति नाहिक ब्राह्मणे।
अतएव गोवध केह ना करे एखने॥ 163॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “वेदोंमें गोवध निषेध

[ 17/156-169
किया गया है। इसलिये कोई भी हिन्दू गोवध नहीं
करता है। वेद-पुराणोंकी यह आज्ञा है कि यदि किसी
प्राणीको जीवन दे सकते हो, तभी उसे मार सकते हो।
इसलिये हमारे मुनि लोग बूढ़ी गायका वध करके वेदके
मन्त्रोंके द्वारा उसे पुनः जीवित कर देते थे। बूढ़ी
गायको वे पुनः युवा बना देते थे, इसलिये वे वध नहीं
अपितु उसका उपकार करते थे। कलिकालमें ब्राह्मणोंके
पास वैसी शक्ति नहीं है, इसलिये वे अब गोवध नहीं
करते हैं॥ 159-163 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—(काजीने कहा,—) उस
कुरानशास्त्रमें 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति'—इन दो प्रकारसे
मार्गका भेद है। निवृत्ति-मार्गमें जीवोंके वधका निषेध
है, किन्तु मेरे जैसे जो प्रवृत्ति-मार्गमें हैं, वे शास्त्र
आज्ञानुसार गोवध करनेपर पापके भागी नहीं होते हैं।
और देखो, आपके वेदशास्त्रोंमें गोवधकी विधिके निर्देश
प्राप्त होते हैं, इसलिये बड़े-बड़े मुनि लोग चिरकालसे
गोवध करते आये हैं। महाप्रभुने कहा,—वेदशास्त्रोंमें
गोवधकी विधि नहीं है, तो भी गोवधके द्वारा जो यज्ञ
करनेका वाक्य शास्त्रमें देखा जाता है, वह केवल
अत्यन्त वृद्ध गायके सम्बन्धमें कहा गया है। मुनि लोग
अति वृद्ध गायको मारकर वेदमन्त्रोंके द्वारा उसे पुनः
युवा रूपमें जीवित करते थे। उस प्रकारका वध, वध
नहीं है, वह तो वृद्ध गायके लिये उपकार मात्र है।
कलियुगमें ब्राह्मणोंमें वैसी शक्ति नहीं है, इसलिये अब
गोवध नहीं हो सकता है॥ 156-163 ॥
मलमासतत्त्वमें उद्धृत ब्रह्मवैवर्त्तीय कृष्णजन्मखण्डमें
(185/180)—
अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्।
देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्ज्जयेत् ॥ 164 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 164 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अश्वमेध, गोमेध, संन्यास, मांसके
द्वारा पितृ-श्राद्ध, देवरके द्वारा पुत्रोत्पत्ति—कलियुगमें ये
पाँच कार्य निषिद्ध हैं॥ 164 ॥
अनुभाष्य—अश्वमेधं (अश्वहनन-यज्ञविशेषं), गवालम्भं
(गोमेधं) संन्यासं (चतुर्थाश्रमग्रहणं), पलपैतृकं (मांसेन पितृश्राद्धं)
देवरेण (पत्युः कनिष्ठ भ्राता) सुतोत्पत्तिं (पुत्रोत्पादनं)—[एतानि]
पञ्च कलौ (कलियुगे) विवर्ज्जयेत् (परित्यज्येत)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य
है॥ 164 ॥
महाप्रभुके द्वारा इस्लाम-धर्माचारकी समालोचना :—
तोमरा जीयाइते नार, —वधमात्र सार।
नरक हइते तोमार नाहिक निस्तार ॥ 165 ॥
गो-अङ्गे यत लोम, तत सहस्र वत्सर।
गोवधे रौरव-मध्ये पचे निरन्तर ॥ 166 ॥
तोमा-सबार शास्त्रकर्त्ता—सेह भ्रान्त हैल।
ना जानिं' शास्त्रेर मर्म ऐछे आज्ञा दिल ॥”167 ॥
अनुवाद—तुम लोग पशुओंको जीवित नहीं कर
सकते हो, इसलिये तुम केवल उनका वध करते हो।
इस पापके फलस्वरूप नरकमें जानेपर भी तुम्हारा
उद्धार नहीं हो सकेगा। गायके शरीरमें जितने रोम हैं,
उतने हजार वर्षतक गोवध करनेवाला रौरव नरकमें
सड़ता रहता है। तुम्हारे शास्त्रकर्त्ता भ्रान्त हो गये थे,
इसलिये शास्त्रके वास्तविक अर्थको न जानकर उन्होंने
तुम्हें ऐसी (गोवधकी) आज्ञा दी है॥”165-167 ॥
अनुभाष्य—'भ्रान्त'—द्वितीयाभिनिवेश (देहमें आत्मबुद्धि)
के फलस्वरूप बुद्धि विपरीत अथवा भ्रमयुक्त होनेके
कारण वृथा ही जीव-हिंसाका अनुमोदन किया है॥ 167 ॥
काजी निरुत्तर और शास्त्रकी असम्पूर्णता-स्वीकार :—
शुनि' स्तब्ध हैल काजी, नाहि स्फुरे वाणी।
विचारिया कहे काजी पराभव मानिं' ॥ 168 ॥
“तुमि ये कहिले, पण्डित, सेइ सत्य हय।
आधुनिक आमार शास्त्र, विचार-सह नय ॥ 169 ॥
अनुवाद—यह सुनकर काजी स्तब्ध हो गया और
246 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/168–177 ]
उसके मुखसे वाणी नहीं निकल पायी। तब विचार
करके काजीने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए
कहा,–"हे पण्डित ! आप जो कह रहे हैं, वह सत्य है।
हमारे शास्त्र आधुनिक हैं और नित्य-वास्तव सत्यके
प्रतिपादक नहीं हैं ॥ 168-169 ॥
अनुभाष्य–‘आधुनिक’—नवीन, कालके अन्तर्गत हैं,
वेदोंके समान अपौरुषेय (किसी मनुष्यके द्वारा नहीं
रचित) नहीं हैं।
‘विचार-सह नय’—नित्य-वास्तव सत्यके प्रतिपादक
नहीं हैं और इसका युक्तिके द्वारा सहज ही खण्डन
किया जा सकता है ॥ 169 ॥
कल्पित आमार शास्त्र, —आमि सब जानि।
जाति-अनुरोधे तबु सेइ शास्त्र मानि ॥ 170 ॥
सहजे यवन-शास्त्रे अदृढ़ विचार।”
हासि' ताहे महाप्रभु पुछेन आरबार ॥ 171 ॥
अनुवाद–मैं यह सब जानता हूँ कि हमारे शास्त्र
कल्पित हैं, परन्तु सम्प्रदायमें निष्ठासे तब भी उन्हीं
शास्त्रोंको मानता हूँ। यवन-शास्त्रका विचार स्वाभाविक
रूपसे दृढ़ सिद्धान्तपर आधारित नहीं है।” यह सुनकर
महाप्रभु हँसे और फिर पूछने लगे ॥ 170-171 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—यवनशास्त्र तीन प्रकारके
हैं—यहूदियोंकी पुरानी पोथी, कुरान और बाइबल। इन
समस्त ग्रन्थोंके आदिकालका ज्ञान होता है, कोई भी
वेदवाक्यके समान अनादि नहीं है। इसलिये इन सब
शास्त्रोंमें जो विचार हैं, उनका मूल दृढ़ नहीं होकर
सन्देहास्पद है ॥ 169-171 ॥
अनुभाष्य–‘कल्पित’—मनोधर्मसे प्रकटित, इसलिये
नित्य सत्य नहीं है।
‘जाति’—सम्प्रदाय और उसमें निष्ठा।
‘अदृढ़ विचार’—जिसका युक्तिके द्वारा खण्डन किया
जा सके ॥ 170-171 ॥
महाप्रभुके द्वारा पुनः प्रश्न :–
“आर एक प्रश्न करि, शुन, तुमि मामा।
यथार्थ कहिबे, छले ना वञ्चिबे आमा ॥ 172 ॥
तोमार नगरे हय सदा सङ्कीर्त्तन।
वाद्यगीत-कोलाहल, सङ्गीत, नर्त्तन ॥ 173 ॥
तुमि काजी-हिन्दु-धर्म-विरोधे अधिकारी।
एबे ये ना कर माना, बुझिते ना पारि ॥” 174 ॥
अनुवाद–“सुनो मामा ! मैं एक और प्रश्न कर रहा
हूँ, उसका उत्तर सत्य-सत्य देना, कोई छल करके मुझे
ठगना नहीं। वाद्य-गीतके कोलाहल, सङ्गीत और नृत्यके
साथ तुम्हारे नगरमें सदा कीर्तन हो रहा है। तुम हिन्दू
धर्मका विरोध करनेके लिये नियुक्त अधिकारी काजी
हो, परन्तु तुम इस सबको निषेध क्यों नहीं करते हो,
यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ॥” 172-174 ॥
उत्तरमें काजीकी अपने स्वप्नकी कहानी :–
काजी बोले,—“सबे तोमाय बोले 'गौरहरि'।
सेइ नामे आमि तोमाय सम्बोधन करि ॥ 175 ॥
शुन, गौरहरि, एइ प्रश्नेर कारण।
निभृत हओ यदि, तबे करि निवेदन ॥” 176 ॥
अनुवाद–काजीने कहा,—“सब आपको 'गौरहरि'
कहते हैं, मैं भी आपको उसी नामसे सम्बोधन करूँगा।
हे गौरहरि ! इस प्रश्नका उत्तर यदि आप एकान्तमें मेरे
साथ हों, तो मैं उसे निवेदन करूँ ॥” 175-176 ॥
महाप्रभुके द्वारा आश्वासन-दान :–
प्रभु बोले,—“ए लोक आमार अन्तरङ्ग हय।
स्फुट करि' कह तुमि, ना करिह भय ॥” 177 ॥
अनुवाद–महाप्रभुने कहा,—“ये लोग मेरे अन्तरङ्ग
हैं, इसलिये तुम्हें जो कुछ कहना है, उसे स्पष्ट कहो,
कोई भी भय मत करो॥” 177 ॥
अनुभाष्य–‘स्फुट’—स्पष्ट ॥ 177 ॥
सतरहवाँ अध्याय | 247

[ 17/178-190
काजीके द्वारा स्वप्न-वृत्तान्तका वर्णन :-
काजी कहे,—“यबे आमि हिन्दुर घरे गिया।
कीर्त्तन करिलुँ माना मृदङ्ग भाङ्गिया॥ 178 ॥
स्वप्नमें नृसिंहदेवसे भय प्राप्ति :-
सेइ रात्रे एक सिंह महाभयङ्कर।
नरदेह, सिंहमुख, गर्ज्जये विस्तर ॥ 179 ॥
शयने आमार उपर लाफ दिया चड़ि'।
अट्ट अट्ट हासे, करे दन्त-कड़मड़ि ॥ 180 ॥
मोर बुके नख दिया घोर-स्वरे बले।
'फाड़िमु तोमार बुक मृदङ्ग-बदले ॥ 181 ॥
मोर कीर्त्तन माना करिस्, करिमु तोर क्षय।'
आँखि मुदि' काँपि आमि पाञा बड़ भय ॥ 182 ॥
अनुवाद—काजीने कहा, - “जिस दिन मैं हिन्दूके घर
गया और कीर्त्तनके लिये मना किया तथा उसके
मृदङ्गको भी तोड़ा था, उस रात्रिमें एक बहुत भयङ्कर
सिंह, जिसका शरीर मनुष्यका था और मुख सिंहका था,
बहुत जोरसे गर्जन करते हुए मेरे ऊपर कूदकर चढ़
गया। वह जोर-जोरसे हँसते हुए और दाँतोंको कड़कड़ाते
हुए मेरी छातीपर अपने नख रखकर गम्भीर स्वरमें
बोला, - 'मैं मृदङ्गके बदले तेरी छातीको फाड़ दूँगा। मेरे
कीर्त्तनके लिये मना करता है, मैं तेरा सर्वनाश कर
दूँगा।' मैंने डरकर आँखें मूँद लीं ॥ 178-182 ॥
अनुभाष्य- 'नरदेह, सिंहमुख'- श्रीनृसिंहदेव; ये भक्त,
भक्ति और भगवान्‌के विद्वेष और विद्वेषियोंका विनाश
करते हैं।
'फाड़िमु'-विदीर्ण करके फेंक दूँगा ॥ 179-181 ॥
भीत देखि' सिंह बले हइया सदय।
'तोरे शिक्षा दिते कैलु तोर पराजय ॥ 183 ॥
से दिन बहुत नाहि कैलि उत्पात।
तेञि क्षमा करि, ना करिनु प्राणघात ॥ 184 ॥
ऐछे यदि पुनः कर, तबे ना सहिमु।
सवंशे तोमारे आर यवन नाशिमु ॥ '185 ॥
अनुवाद-मुझे भयभीत देखकर सिंहको दया आ
गयी और बोले, -'तुम्हें शिक्षा देनेके लिये मैंने तुम्हें
पराजित किया है। उस दिन तुमने अधिक उत्पात नहीं
किया था, इसलिये मैंने तुम्हें क्षमा करके तुम्हारे प्राण
नहीं लिये हैं। ऐसे यदि तुम पुनः करोगे, तो मैं उसे
सहन नहीं करूँगा और वंशसहित तुम्हारा और सभी
यवनोंको नाश कर दूँगा ॥' 183-185 ॥
एत कहि' सिंह गेल, आमार हैल भय।
एइ देख, नखचिह्न आमार हृदय ॥ ”186 ॥
अनुवाद-यह कहकर वह सिंह चला गया, परन्तु
मैं बहुत डर गया हूँ। यह देखो, मेरे वक्षस्थलपर उसके
नखचिह्न हैं॥”186 ॥
एत बलि' काजी निज-बुक देखाइल।
शुनि' देखि' सर्वलोक आश्चर्य मानिल ॥ 187 ॥
अनुवाद-यह कहकर काजीने अपना वक्षस्थल
दिखलाया। इस बातको सुनकर और नखचिह्न देखकर
सभी आश्चर्यचकित हो गये॥ 187 ॥
काजी कहे,—“इहा आमि कारे ना कहिल।
सेइ दिन एक आमार पियादा आइल ॥ 188 ॥
आसि' कहे, - 'गेलुँ मुञि कीर्त्तन निषेधिते।
अग्नि उल्का मोर मुखे लागे आचम्बिते ॥ 189 ॥
पुड़िल सकल दाड़ि, मुखे हैल व्रण।
येइ पेयादा याय, तार एइ विवरण ॥' 190 ॥
अनुवाद-काजीने कहा, - “इस बातको मैंने किसीसे
नहीं कहा। उस दिन मेरा एक पियादा (सेवक) आया
और आकर बोला, - 'मैं एक स्थानपर कीर्त्तनके लिये
मना करनेके लिये गया था, तो अचानक ना जाने
248 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/188-197 ]
कहाँसे आगका एक उल्का मेरे मुखपर आ गिरा।
उससे मेरी सारी दाढ़ी जल गयी और मुखपर छाले
पड़ गये।' जो भी पियादा [कीर्त्तनके विरोधमें] जाता,
उसके साथ भी ऐसा ही होता॥188-190॥
अनुभाष्य—'पियादा'—निम्न श्रेणीका सेवक, संवाद
अथवा पत्र लेकर जानेवाला। साधारण भाषामें जिसे
'चपरासी' कहते हैं॥188॥
ताहा देखि' रहिनु मुञि महाभय पाञा।
कीर्त्तन ना वर्ज्जिया घरे रहौं त' बसिया॥191॥
तबे त' नगरे हइबे स्वच्छन्दे कीर्त्तन।
शुनि' सब म्लेच्छ आसि' कैल निवेदन॥192॥
'नगरे हिन्दुर धर्म बाड़िल अपार।
'हरि' 'हरि' ध्वनि बइ नाहि शुनि आर॥'193॥
अनुवाद—ऐसा देखकर मैं बहुत भयभीत हो गया।
मैंने सभी पियादोंको कीर्त्तन बन्द करानेके लिये कहीं
भी जानेसे मना किया और उन्हें कहा कि वे केवल
अपने घरोंमें बैठे रहें। यह सुनकर सब म्लेच्छ आकर
निवेदन करने लगे—'तब तो नगरमें स्वच्छन्द रूपसे
कीर्त्तन होगा। नगरमें हिन्दुओंका धर्म बहुत बढ़ गया है
और 'हरि' 'हरि' के अतिरिक्त और कोई ध्वनि सुनायी
नहीं देती॥'192-193॥
अनुभाष्य—'म्लेच्छ'—
“गो-मांस-खादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते।
सर्वाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते॥”
“जो गो-मांसको खानेवाला हो, शास्त्रके विरुद्ध
बहुत बोलनेवाला हो तथा सम्पूर्ण आचारसे विहीन हो,
उसे म्लेच्छ कहा जाता है॥”192॥
आर म्लेच्छ कहे,—'हिन्दु 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि'।
हासे, कान्दे, नाचे, गाय, गड़ि याय धूलि॥194॥
'हरि' 'हरि' करि' हिन्दु करे कोलाहल।
पातसाह शुनिले तोमार करिबेक फल॥'195॥
अनुवाद—एक और म्लेच्छने कहा,—'हिन्दू तो
'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलकर कभी हँसते, रोते, नाचते, गाते
हैं और कभी भूमिपर लोटपोट करते हैं। 'हरि' 'हरि'
कहकर हिन्दू कोलाहल कर रहे हैं। यदि बादशाह
(पातसाह) यह सुनेगा, तो वह तुम्हें इसका फल
चखायेगा॥194-195॥
अमृतप्रवाह भाष्य—बादशाह तुम्हारा स्वजन होनेपर
भी तुम्हें दण्ड दे सकता है। बादशाह अर्थात् गौड़देशका
बादशाह 'हुसैन' शाह॥195॥
अनुभाष्य—'पातसाह'—आलाउद्दीन सैयद हुसैन शाह
(सन् 1498 ई. से 1521 ई. तक) बङ्गालका स्वाधीन
राजा था। अपने संरक्षक और स्वामी हाब्सी-वंशके
भीषण अत्याचारी नवाब मुज़फ़्फ़र खाँको मारकर वह
स्वयं बङ्गालके सिंहासनपर बैठ गया। बङ्गालके सिंहासनपर
बैठकर उसने 'सैयद हुसैन आलाउद्दीन शरीफ मक्का'-नाम
धारण किया। 'रियाज उस्-सलातिन' नामक इतिहासके
प्रणेता गुलाम हुसैनका कहना हैं कि नवाब हुसैन
शाहके कोई पूर्वज मक्का-शरीफमें रहते थे, इसलिये
लगता है कि अपने वंशके गौरवको स्मरण करके
उसने यह नाम ग्रहण किया, तो भी गौड़के इतिहासमें
वह 'हुसैन शाह' के नामसे ही परिचित है। उसकी
मृत्युके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र नसरत् शाह सन् 1521
ई. से 1533 ई. तक बङ्गालका नवाब बना। वह
निष्ठुर प्रकृतिका नवाब वैष्णवोंपर निर्दयतापूर्वक अत्याचार
करता था और अपने पापोंके फलस्वरूप अपने ही
एक नपुंसक कर्मचारीके हाथों मस्जिदमें मारा गया॥195॥
तबे सेइ यवनेरे आमि त' पुछिल।
'हिन्दु 'हरि' बोले, तार स्वभाव जानिल॥196॥
तुमिह यवन हञा केने अनुक्षण।
हिन्दुर देवतार नाम लह कि कारण॥'197॥
अनुवाद—तब मैंने उस यवनसे पूछा,—'हिन्दू तो
'हरि' बोलते हैं, यह उनका स्वभाव है। तुम यवन
सतरहवाँ अध्याय | 249

[ 17/196-203
होकर सदा हिन्दुओंके देवताका नाम ले रहे हो, इसका
क्या कारण है?'॥ 196-197॥
म्लेच्छ कहे,–'हिन्दुरे आमि करि परिहास।
केह केह–कृष्णदास, केह–रामदास॥ 198॥
केह–हरिदास, सदा बले 'हरि' 'हरि'।
जानि कार घरे धन करिबेक चुरि॥ 199॥
सेइ हैते जिह्वा मोर बले 'हरि' 'हरि'।
इच्छा नाहि, तबु बले,–कि उपाय करि॥' 200॥
अनुवाद–म्लेच्छने कहा,–'मैंने हिन्दुओंसे परिहासमें
कहा कि तुम लोग कोई कृष्णदास हो, कोई रामदास
हो और कोई हरिदास हो। तुम सदा 'हरि' 'हरि' बोलते
हो। लगता है कि किसीके घरमें चोरी करोगे? तबसे
मेरी जिह्वा भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगी। मेरी इच्छा नहीं
है, तो भी यह बोलना नहीं छोड़ती है, मैं क्या उपाय
करूँ?'॥ 198-200॥
आर म्लेच्छ कहे, शुन–'आमि त' एइमते।
हिन्दुके परिहास कैनु से दिन हइते॥ 201॥
जिह्वा कृष्णनाम करे, ना माने वर्ज्जन।
ना जानि, कि मन्त्रौषधि जाने हिन्दुगण॥' 202॥
अनुवाद–और एक म्लेच्छ कहने लगा,–'सुनो!
मैंने भी जिस दिनसे इसी प्रकार हिन्दुओंसे परिहास
किया था, उसी दिनसे मेरी जिह्वा भी कृष्णनाम करने
लगी है और अब यह मेरे बहुत रोकनेपर भी रुकती
नहीं है। न जाने ये हिन्दू कौनसी मन्त्रौषधि जानते
हैं?'॥ '201-202॥
अमृतप्रवाह भाष्य–काजीने कहा,–"हे गौरहरि! मैंने
जिस भी म्लेच्छ पियादेसे पूछा, उसने यही उत्तर
दिया,–मैंने हिन्दुओंको कहा, 'तुम लोग कोई कोई
'कृष्णदास', 'रामदास', 'हरिदास'–इस नामके परिचयसे
'हरि' 'हरि' बोलते हो, किन्तु 'हरि' 'हरि' शब्दका अर्थ
तो 'चोरी करता हूँ' 'चोरी करता हूँ' होता है। ऐसा
लगता है कि दूसरोंके घरोंसे धन चोरी करनेके
अभिप्रायसे 'हरि' 'हरि' ('हरण करूँ' 'हरण करूँ') ऐसा
कहते हो।' मैंने जिस दिनसे उनके साथ यह परिहास
किया, उस दिनसे मेरी जिह्वा इच्छा न होनेपर भी 'हरि'
'हरि' बोल रही है, मैं इसे रोकनेका कोई उपाय नहीं
कर पा रहा हूँ॥" 196-202॥
अनुभाष्य–'परिहास'–चार प्रकारके नामाभासोंमें एक।
जैसे, (भाः 6/2/14)–
“साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥”
“सङ्केत (दूसरी वस्तुको लक्ष्य करके भगवन्नाम
उच्चारण), परिहास (उपहासपूर्वक नामोच्चारण), स्तोभ
(तिरस्कारपूर्वक नामोच्चारण) और हेला (अनादरपूर्वक
नामोच्चारण), ये चार छाया नामाभास हैं, विद्वान लोग
ऐसे नामाभासको समस्त पापोंका नाशक मानते हैं।”
क्योंकि इनका उच्चारण जड़ीय अक्षर-उच्चारणमात्र नहीं
है। नामाभास नित्य-वास्तव वस्तुको लक्ष्य करके
विष्णुकी स्मृति जाग्रत कराता है, यह जीवोंकी
विषय-वासनाओंका विनाश करता है और इसके
फलस्वरूप सेवोनमुख मुक्तजीवोंके द्वारा उच्चारित शुद्ध
नाममें बद्धजीवका अधिकार उदित होता है॥ 198-202॥
काजीसे स्मार्त्त पाखण्डियोंका अभियोग :–
एत शुनि' ता सभारे घरे पाठाइल।
हेनकाले पाषण्डी हिन्दु पाँच-सात आइल॥ 203॥
अनुवाद–यह सुनकर मैंने उन सबको अपने
घरोंमें भेज दिया। तब पाँच-सात पाषण्डी हिन्दू मेरे पास
आये॥ 203॥
अनुभाष्य–'पाषण्डी'–सांसारिक कर्मोंमें श्रद्धा रखनेवाले,
अनेक ईश्वरोंको माननेवाले और विष्णु-वैष्णव-द्वेषी
मूर्त्तिपूजक (श्रीविग्रहमें काष्ठ-पत्थरकी बुद्धि
रखनेवाले)॥ 203॥
250 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/204-212 ]
आसि' कहे, - 'हिन्दुर धर्म भाङ्गिला निमाञि।
ये कीर्त्तन प्रवर्त्ताइल, कभु शुनि नाइ॥ 204 ॥
मङ्गलचण्डी, विषहरि करि जागरण।
तांते नृत्य, गीत, वाद्य - योग्य आचरण॥ 205 ॥
पूर्वे भाल छिल एइ निमाइ पण्डित।
गया हैते आसिया चालाय विपरीत॥ 206 ॥
उच्च करि' गाय गीत, देय करतालि।
मृदङ्ग-करताल-शब्दे कर्णे लागे तालि॥ 207 ॥
न जानि, -कि खाञा मत्त हञा नाचे, गाय।
हासे, कान्दे, पड़े, उठे, गड़ागड़ि याय॥ 208 ॥
नगरिया पागल कैल सदा सङ्कीर्त्तन।
रात्रे निद्रा नाहि याइ, करि जागरण॥ 209 ॥
अनुवाद - उन्होंने आकर कहा, - 'निमाइने हिन्दुओंके धर्मको नष्ट कर दिया है। उसने जिस प्रकारका कीर्त्तन प्रारम्भ किया है, उसे तो हमने पहले कभी सुना नहीं है। हम जो मङ्गलचण्डी, शङ्करादिका जागरण करते हैं, उसमें तो वाद्यादिके साथ नृत्य-गीत हिन्दुओंके लिये उचित है। निमाइ पण्डित पहले तो बहुत अच्छा था, परन्तु गयासे आनेके बाद यह विपरीत चाल चलने लगा है। निमाइ और उसके सङ्गी हाथोंसे ताली बजाते हुए ऊँचे स्वरमें गीत गाते हैं और साथमें मृदङ्ग-करतालादि भी बजते हैं। उनके शोरसे तो कानमें कुछ और सुनायी ही नहीं देता। न जाने क्या खाकर (क्या किसी मादक द्रव्यका पानकर) मत्त होकर नाचते, गाते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, गिरते हैं, उठते हैं और भूमिपर लोट-पोट होते हैं। निमाइके सङ्कीर्त्तनने तो सारे नगरवासियोंको पागल बना दिया है। उनके सङ्कीर्त्तनसे हमें रातमें नींद नहीं आती, हम तो जागरण करते हैं॥ 204-209 ॥
'निमाञि' नाम छाड़ि' एबे बोलाय 'गौरहरि'।
हिन्दुर धर्म नष्ट कैल पाषण्डी सञ्चारि' ॥ 210 ॥
कृष्णेर कीर्त्तन करे नीच बाड़ बाड़।
एइ पापे नवद्वीप हइबे उजाड़॥ 211 ॥
अनुवाद - अब वह अपना 'निमाइ' नाम छोड़कर अपनेको 'गौरहरि' कहता है और पाषण्डताका प्रचारकर हिन्दू धर्मको नष्ट कर रहा है। अब तो इसके साथ श्रीकृष्णनामके कीर्त्तनमें (जिनका कीर्त्तनमें अधिकार नहीं है, ऐसे) नीच जातिके लोग बढ़ रहे हैं, इस पापसे तो नवद्वीप उजड़ जायेगा॥ 210-211 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'नीच बाड़बाड़'-अनेक नीच जातिके लोगोंको लेकर श्रीकृष्णकीर्त्तन कर रहा है, इससे नीच जातिकी बाढ़ अर्थात् वृद्धि हो रही है॥ 211 ॥
हिन्दुशास्त्रे 'ईश्वर' नाम - महामन्त्र जानि।
सर्वलोक शुनिले मन्त्रेर वीर्य हय हानि॥ 212 ॥
अनुवाद - हिन्दू शास्त्रोंमें ईश्वरके नामको महामन्त्र बतलाया गया है, [उच्च स्वरसे कीर्त्तन करनेपर] सभी लोगोंके द्वारा मन्त्र सुननेपर मन्त्रकी शक्ति लुप्त हो जाती है॥ 212 ॥
अनुभाष्य - अनेक ईश्वरोंको माननेवाले ईश्वरको और ईश्वरके नामको 'कर्मका अङ्ग' समझते हैं, इसलिये वे 'पाषण्डी' कहलाते हैं। श्रीकृष्णनामकी महान् औदार्यमयी महिमाको न जाननेके कारण सांसारिक उच्च-कुलमें जन्म और सामाजिक पदवीके मोहमें भूलकर वे सोचते हैं कि नीच अर्थात् नीच-कुलमें उत्पन्न व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करना विशेष पापका कार्य है। इसलिये सत्कुल अथवा उच्चकुलमें जन्में व्यक्तिका ही श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेमें अधिकार है। ये सब बहु-ईश्वरवादी सदा कीर्त्तनीय श्रीकृष्णनाम-महामन्त्रको अन्यान्य जप्यमन्त्रोंके समान मानते हैं। जो अपने अद्वितीय परमैश्वर्यको प्रकाशित करके ब्रह्मासे लेकर चींटीतकका उद्धार करनेकी शक्ति रखता है, ऐसे महामन्त्रका उच्च-स्वरसे कीर्त्तन करनेपर
सतरहवाँ अध्याय | 251

[ 17/211-221
उसके हठात् ही जिह्वा और कानोंपर अवतीर्ण होनेपर
वह स्वयं निष्फल हो जाता है—इन लोगोंका ऐसा
मानना है। अहो! प्रत्यक्ष ज्ञानको ही सर्वोच्च ज्ञान
माननेवाले ये लोग श्रौतपन्थाके इतने अधिक विरोधी
हैं!!॥ 211-212॥
ग्रामेर ठाकुर तुमि, सब तोमार जन।
निमाइ बोलाइया तारे करह वर्ज्जन॥'213॥
अनुवाद—आप तो इस ग्रामके स्वामी हैं और हम
सभी आपकी प्रजा हैं। इसलिये आप कृपाकर निमाइको
बुलाकर उसे निष्कासित कर दीजिये॥'213॥
अनुभाष्य—इसके बाद उन्होंने काजीसे कहा, —'आप
इस स्थानके सर्वस्व कर्त्ता-धर्त्ता हैं, ग्रामके सभी लोग
आपके अधीन हैं, इसलिये आप निमाइ पण्डितको
अपने पास बुलाकर उसे निष्कासित कर दो॥'213॥
काजीके द्वारा उनको सान्त्वना-प्रदान :—
तबे आमि प्रीतिवाक्य कहिल सबारे।
'सबे घरे याह, आमि निषेधिव तारे॥'214॥
अनुवाद—उनकी प्रार्थना सुनकर मैंने उन सबसे
प्रीतिपूर्वक कहा, —'आप सभी अपने-अपने घर जाँय, मैं
निमाइको सङ्कीर्त्तनके लिये मना कर दूँगा॥'214॥
महाप्रभुके प्रति काजीकी उक्ति :—
हिन्दुर ईश्वर बड़ येइ नारायण।
सेइ तुमि हओ,—हेन लय मोर मन॥'215॥
अनुवाद—हिन्दुओंके सबसे बड़े ईश्वर जो नारायण
हैं, मेरा मन कहता है कि तुम वही हो॥'215॥
महाप्रभुकी कृपापूर्ण उक्ति :—
एत शुनि' महाप्रभु हासिया हासिया।
कहिते लागिला प्रभु काजीरे छुँइया॥ 216॥
नामाभाससे पापक्षय :—
“तोमार मुखे कृष्णनाम,—ए बड़ विचित्र।
पापक्षय गेल, हैला परम पवित्र॥ 217॥
'हरि' 'कृष्ण' 'नारायण'—लैले तिन नाम।
बड़ भाग्यवान् तुमि, बड़ पुण्यवान्॥'218॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर महाप्रभु हँसते-हँसते काजीको
स्पर्श करके कहने लगे, —“यह बड़ी ही विचित्र बात है
कि तुम्हारे मुखसे कृष्णनाम निकल रहा है। इस
कृष्णनामसे तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो गये हैं तथा
तुम परम पवित्र हो गये हो। तुमने 'हरि', 'कृष्ण' और
'नारायण'—इन तीन नामोंका उच्चारण किया है। तुम
बहुत ही भाग्यवान् और पुण्यवान् हो॥"216-218॥
अनुभाष्य—काजीके मुखमें नामाभास उदित हुआ
था॥217-218॥
काजीकी दैन्योक्ति :—
एत शुनि' काजीर दुइ चक्षे पड़े पानि।
प्रभुर चरण छुँइ बले प्रियवाणी॥ 219॥
“तोमार प्रसादे मोर घुचिल कुमति।
एइ कृपा कर,—येन तोमाते रहु भक्ति॥"220॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर काजीके दोनों नेत्रोंसे अश्रु
प्रवाहित होने लगे और वह महाप्रभुके चरणकमलोंको
स्पर्श करके प्रियवाणी कहने लगा, —“आपकी कृपासे
मेरी कुमति दूर हो गयी है। अब आप मुझपर ऐसी
कृपा करें जिससे मेरे हृदयमें आपके प्रति भक्ति
रहे॥"220॥
महाप्रभुकी उक्ति :—
प्रभु कहे, —“एक दान मागिये तोमाय।
सङ्कीर्त्तन बाद यैछे नहे नदीयाय॥"221॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं आपसे एक दान
माँगता हूँ कि नदियामें सङ्कीर्त्तनमें कभी भी बाधा न
हो॥'221॥
अनुभाष्य—जिससे नवद्वीपमें श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनमें
कोई बाधा न हो॥ 221॥
252 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/222–229 ]
काजीकी प्रतिज्ञा :-
काजी कहे,–“मोर वंशे यत उपजिवे।
ताहाके ‘तालाक’ दिब,—कीर्त्तन ना बाधिबे॥” 222॥
अनुवाद—काजीने कहा,—“मेरे वंशमें जो भी उत्पन्न
होंगे, मैं उन सबको प्रतिज्ञा करवा दूँगा कि वे कीर्त्तनमें
किसी भी प्रकारकी बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे॥” 222॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘तालाक’—गम्भीररूपसे की गयी
जो प्रतिज्ञा॥ 222॥
अनुभाष्य—आज भी काजीके वंशधर श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनमें
योगदान करते हैं, वे किसी भी प्रकारकी कोई आपत्ति
नहीं करते हैं॥ 222॥
महाप्रभु और भक्तोंमें हर्ष :-
शुनि प्रभु ‘हरि’ बलि’ उठिला आपनि।
उठिल वैष्णव सब करि’ हरिध्वनि॥ 223॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुका घर लौटना :-
कीर्त्तन करिते प्रभु करिला गमन।
सङ्गे चलि’ आइसे काजी उल्लसित मन॥ 224॥
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु ‘हरि-हरि’ बोलते
हुए उठकर खड़े हो गये। सभी वैष्णव भी ‘हरि-हरि’
ध्वनि करते हुये उठ गये। कीर्त्तन करते हुए महाप्रभु
वहाँसे चले और काजी भी बड़े उल्लासके साथ उनके
सङ्ग चलने लगा॥ 223-224॥
काजीरे विदाय दिल शचीर नन्दन।
नाचिते नाचिते आइला आपन भवन॥ 225॥
अनुवाद—थोड़ी दूर चलनेपर शचीनन्दन श्रीगौरहरिने
काजीको विदायी दी। काजी नाचते-नाचते अपने भवनमें
लौट आया॥ 225॥
एइ मते काजीरे प्रभु करिला प्रसाद।
इहा येइ शुने तार खण्डे अपराध॥ 226॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने काजीपर कृपा की।
जो व्यक्ति इस कथाको श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके
सभी अपराध नष्ट हो जाते हैं॥ 226॥
श्रीवास-भवनमें महाप्रभुके कीर्त्तनके समय
श्रीवास पण्डितके पुत्रका देहत्याग :-
एक दिन श्रीवासेर मन्दिरे गोसाञि।
नित्यानन्द-सङ्गे नृत्य करे दुइ भाइ॥ 227॥
श्रीवास-पुत्रेरे ताँहा हैल परलोक।
तबु श्रीवासेर चित्ते ना जन्मिल शोक॥ 228॥
अनुवाद—एक दिन श्रीचैतन्य गोसाईं और श्रीनित्यानन्द
प्रभु, दोनों भाई श्रीवास पण्डितके मन्दिरमें नृत्य कर रहे
थे। उसी समय श्रीवास पण्डितका पुत्र परलोक सिधार
गया। ऐसा होनेपर भी श्रीवास पण्डितके चित्तमें किसी
प्रकारका शोक उत्पन्न नहीं हुआ॥ 227-228॥
मृतपुत्रके मुखसे तत्त्वकथा :-
मृतपुत्र-मुखे कैल ज्ञानेर कथन।
आपने दुइ भाइ हैला श्रीवास-नन्दन॥ 229॥
अनुवाद—महाप्रभुने उस मृत पुत्रके मुखसे ज्ञानकी
कथा कहलवायी। तब महाप्रभुने श्रीवास पण्डितसे कहा
कि हम दोनों भाइयों (मुझे और नित्यानन्द प्रभु) को
अपना पुत्र ही समझो॥ 229॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एक रात महाप्रभु श्रीवास-अङ्गनमें
कीर्त्तन कर रहे थे, उसी समय श्रीवास पण्डितके एक
पुत्र परलोक सिधार गये। श्रीवास पण्डितने कीर्त्तनका
रसभङ्ग होनेके भयसे सभीको शोक प्रकाशित करनेसे
निषेध किया और महाप्रभु बहुत रात तक कीर्त्तन करते
रहे। कीर्त्तन समाप्त होनेपर महाप्रभु समझ गये कि इस
घरपर कोई विपत्ति आयी है। श्रीवासके पुत्रकी मृत्युका
संवाद सुनकर पहले तो महाप्रभुने देरीसे संवाद देनेके
लिये दुःख प्रकट किया और मृत बालकसे सभीके
सम्मुखस्थ करवाकर पूछा,—“ओहे बालक ! तुमने श्रीवासका
क्यों परित्याग किया ?” मृत बालकने कहा,—“मेरा
सतरहवाँ अध्याय | 253

[ 17/228-237
जितने दिन तक श्रीवासके घरमें रहना निर्धारित था,
वह समाप्त होनेपर अब मैं आपकी इच्छासे अन्य
स्थानपर जा रहा हूँ। मैं आपका नित्य अनुगत परतन्त्र
जीव हूँ—आपकी इच्छाके अतिरिक्त और कुछ करनेका
मुझे अधिकार नहीं है।” मृत बालकके मुखसे इन
वचनोंको सुनकर श्रीवास पण्डितके परिवारवालोंको
दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति हुई और उनको कोई शोक नहीं
रहा। इसके बाद उन्होंने मृत बालकका संस्कार किया।
महाप्रभुने श्रीवासको कहा, —‘जो तुम्हारा पुत्र था, वह
तुम्हें छोड़कर चला गया। मैं और नित्यानन्द–तुम्हारे
नित्यपुत्र हैं, हम तुम्हें कभी भी नहीं छोड़ पायेंगे।'॥ 229॥
अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, पच्चीसवाँ अध्याय
द्रष्टव्य है॥ 228-229॥
श्रीवासकी भतीजी नारायणीको अपना उच्छिष्ट-प्रदान :-
तबे त' करिला सब भक्ते वर दान।
उच्छिष्ट दिया नारायणीर करिल सम्मान॥ 230॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको वरदान दिया
और नारायणीको अपना उच्छिष्ट प्रदान करके कृतार्थ
किया॥ 230॥
अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य
है। कोई-कोई चरित्रहीन पाषण्ड-प्रकृतिके प्राकृतसहजिया
लोग प्राकृत बुद्धि होनेके कारण श्रील वृन्दावनदासकी
निन्दा और उनसे द्वेष करनेके कारण ऐसा कहते
हैं,—'महाप्रभुके उच्छिष्ट अथवा ताम्बुल खानेके फलस्वरूप
विधवा अवस्थामें श्रीमती नारायणीदेवीसे श्रीवृन्दावनदास
ठाकुरका जन्म हुआ था।' ऐसी निन्दनीय बात नितान्त
अपराधमय है, इसलिये यह कभी भी सुनने योग्य नहीं
है॥ 230॥
यवनकुलमें उत्पन्न दर्जीका महाप्रभुका
रूपदर्शन और उन्माद :-
श्रीवासेर वस्त्र सिये दरजी यवन।
प्रभु तारे कराइल निजरूप दर्शन॥ 231॥
'देखिनु' 'देखिनु' बलि' हइल पागल।
प्रेमे नृत्य करे, हैल वैष्णव आगल॥ 232॥
अनुवाद—श्रीवासके वस्त्र सिलनेवाला दर्जी यवन
था, उसे महाप्रभुने अपने रूपके दर्शन कराये। 'मैंने
देखा है', 'मैंने देखा है', यह कहते-कहते वह पागलसा
हो गया। प्रेममें पागल होकर वह नृत्य करने लगा और
वह श्रेष्ठ वैष्णव बन गया॥ 231-232॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवासके घरके निकट रहनेवाला
कोई एक यवन दर्जी उनके वस्त्र सिलता था। वह
श्रद्धापूर्वक महाप्रभुका नृत्य देखकर मन्त्र-मुग्ध हो गया,
महाप्रभुने उसे अपने रूपके चिन्मय-भावका दर्शन
कराया। वह दर्जी 'मैंने देखा है! मैंने देखा है!' ऐसा
कहते हुए प्रेममें पागल होकर नृत्य करने लगा।
'आगल' - अग्रगण्य॥ 231-232॥
महाप्रभुकी इच्छानुसार श्रीवासका
मधुर श्रीकृष्णलीला-वर्णन :-
आवेशेते महाप्रभु वंशी त' मागिल।
श्रीवास कहे, —“वंशी तोमार गोपी हरि' निल॥" 233॥
अनुवाद—एक समय व्रजभावके आवेशमें महाप्रभुने
अपनी वंशी माँगी, तब श्रीवास पण्डितने कहा,—“आपकी
वंशी तो गोपियोंने चुरा ली है॥" 233॥
शुनि' प्रभु 'बल' 'बल' बलेन आवेशे।
श्रीवास वर्णन वृन्दावन-लीलारसे॥ 234॥
प्रथमेते वृन्दावन-माधुर्य वर्णिल।
शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द बाड़िल॥ 235॥
तबे 'बल' 'बल' प्रभु बले बारबार।
पुनः पुनः कहे श्रीवास करिया विस्तार॥ 236॥
वंशीवाद्ये गोपीगणेरे वने आकर्षण।
ताँ-सबार सङ्गे यैछे वन-विहरण॥ 237॥
254 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/234-244 ]
ताहि मध्ये छयऋतुर लीलार वर्णन।
मधुपान, रासोत्सव, जलकेलि कथन॥ 238 ॥
‘बल’ ‘बल’ बले प्रभु शुनिते उल्लास।
श्रीवास कहेन तबे रास-विलास॥ 239 ॥
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु आवेशमें ‘बोलो’,
‘बोलो’ कहने लगे। श्रीवास पण्डित वृन्दावनकी रसमयी
लीलाओंका वर्णन करने लगे। उन्होंने पहले वृन्दावनके
माधुर्यका वर्णन किया। जिसे सुनकर महाप्रभुका चित्त
अत्यधिक आनन्दित हो गया। तब महाप्रभु बार-बार
‘बोलो’, ‘बोलो’ कहने लगे। श्रीवास पण्डित पुनः-पुनः
विस्तारपूर्वक वृन्दावनकी कथाका वर्णन करने लगे।
श्रीकृष्णने कैसे वंशीकी ध्वनिके द्वारा गोपियोंको वनमें
आकर्षण करके उनके साथ किस प्रकार वनमें विहार
किया। उस विहारके समय छह ऋतुओंमें की गयी
लीलाओंका श्रीवासने वर्णन किया [श्रीकृष्णकी इच्छानुसार
वृन्दादेवीकी आज्ञासे लीलारसके वर्धनके लिये छहों
ऋतुओंने भिन्न-भिन्न वनोंमें एक ही समयमें अपने-अपने
प्रभावका विस्तार किया। इस प्रकार श्रीकृष्णने गोपियोंके
साथ एक वनसे दूसरे वनमें विहार करते हुए उन सभी
ऋतुओंके अनुरूप लीलाओंका रसास्वादन किया]। और
मधुपान, रासोत्सव तथा जलकेलिकी लीलाओंका भी
गान किया। महाप्रभुके मनमें ये लीलाएँ सुनकर बहुत
उल्लास हुआ और उन्होंने श्रीवाससे रास-विलासका
वर्णन करनेके लिये कहा॥ 234-239 ॥
अनुभाष्य—श्रीवास पण्डितके द्वारा व्रजकी गोपियोंके
साथ श्रीकृष्णके मधुर (शृंगार) रसका वर्णन विशेषरूपसे
लक्ष्य करनेका विषय है॥ 235-239 ॥
कहिते, शुनिते ऐछे प्रातःकाल हैल।
प्रभु श्रीवासेरे तोषि’ आलिङ्गन कैल॥ 240 ॥
अनुवाद—इस प्रकार कहते-सुनते प्रातःकाल हो
गया। महाप्रभुने परम प्रसन्न होकर श्रीवास पण्डितका
आलिङ्गन किया॥ 240 ॥
आचार्यरत्नके घर महाप्रभुका लक्ष्मीवेशमें नृत्य :—
तबे आचार्येर घरे कैल कृष्णलीला।
रुक्मिण्यादि-रूप प्रभु याते आपने हैला॥ 241 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखर आचार्यके घरमें
श्रीकृष्णलीलाका अभिनय किया। महाप्रभुने स्वयं ही
श्रीरुक्मिणी आदिके रूपको धारण किया॥ 241 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एक रात्रि श्रीचन्द्रशेखर
आचार्यरत्नके घरमें महाप्रभुने रुक्मिणी आदिके रूपको
धारण करके एक लीलाका अभिनय किया था। उसमें
श्रीअद्वैताचार्य, श्रीहरिदासादि अनेकोंको नाना वेशोंमें
सजाया था॥ 241 ॥
अनुभाष्य—रुक्मिणीभावमें और वेशमें महाप्रभुका
प्रसङ्ग चैःभाः मध्यखण्ड, अठारहवें अध्यायमें द्रष्टव्य
है॥ 241 ॥
कभु दुर्गा, लक्ष्मी हय, कभु वा चिच्छक्ति।
खाटे बसि’ भक्तगणे दिल प्रेमभक्ति॥ 242 ॥
अनुवाद—महाप्रभु कभी दुर्गा, कभी लक्ष्मी और
कभी चित्शक्ति बन जाते। तब महाप्रभुने सिंहासनपर
बैठकर सभी भक्तोंको प्रेमदान किया॥ 242 ॥
अनुभाष्य—आद्याशक्तिके वेशमें महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको
स्तनपान कराना और प्रेमभक्ति प्रदान करनेका प्रसङ्ग
चैःभाः मध्यखण्ड, अठारहवें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥ 242 ॥
ब्राह्मणीके द्वारा महाप्रभुके चरणस्पर्श
करनेपर महाप्रभुका गङ्गामें स्नान :—
एकदिन महाप्रभुर नृत्य-अवसाने।
एक ब्राह्मणी आसि’ धरिल चरणे॥ 243 ॥
चरणेर धूलि सेइ लय बार बार।
देखिया प्रभुर दुःख हइल अपार॥ 244 ॥
सतरहवाँ अध्याय | 255

[ 17/243-255
सेइक्षणे धाञा प्रभु गङ्गाते पड़िल।
नित्यानन्द-हरिदास धरि' उठाइल ॥ 245 ॥
विजय आचार्येर घरे से रात्रे रहिला।
प्रातःकाले भक्त सबे घरे लञा गेला ॥ 246 ॥
अनुवाद-एक दिन महाप्रभुके नृत्यके अन्तमें एक
ब्राह्मणीने आकर उनके चरणोंको पकड़ लिये। वह
ब्राह्मणी बार-बार उनके चरणोंकी धूलिको लेने लगी,
उसको ऐसा करते देखकर महाप्रभुको बहुत दुःख हुआ।
उसी समय महाप्रभु दौड़कर गङ्गामें जाकर कूद पड़े।
श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीहरिदास ठाकुरने जाकर उन्हें
बाहर निकाला। उस रात्रि महाप्रभु विजय आचार्यके घर
पर ही रहे। प्रातःकाल सभी भक्त उन्हें घर ले
गये॥ 243-246 ॥
अनुभाष्य-इस घटनाका चैतन्यभागवतमें वर्णन नहीं
है॥ 243-246 ॥
उच्चस्वरमें 'गोपी' 'गोपी' पुकारते हुए महाप्रभु :-
एकदिन गोपीभावे गृहेते बसिया।
'गोपी' 'गोपी' नाम लय विषण्ण हञा ॥ 247 ॥
अनुवाद-एक दिन अपने घरमें बैठे हुए महाप्रभु
गोपीभावमें आविष्ट होकर दुःखित हृदयसे 'गोपी' 'गोपी'
पुकार रहे थे॥ 247 ॥
मर्म-अनभिज्ञ पाषण्डी छात्रका महाप्रभुको मना करना :-
एक पड़ुया आइल प्रभुके देखिते।
'गोपी' 'गोपी' नाम शुनि' लागिल बलिते ॥ 248 ॥
“कृष्णनाम ना लओ केने, कृष्णनाम-धन्य।
'गोपी' 'गोपी' बलिले वा किवा हय पुण्य ॥"249 ॥
अनुवाद-उस समय एक छात्र महाप्रभुसे मिलने
आया और महाप्रभुके मुखसे 'गोपी' 'गोपी' नाम सुनकर
वह कहने लगा,- “आप कृष्णनाम क्यों नहीं लेते?
कृष्णनाम तो परम धन्य है। 'गोपी' 'गोपी' कहनेसे क्या
कोई पुण्य होता है? ॥" 249 ॥
प्रहार करनेके लिये महाप्रभुका उसके
पीछे दौड़ना; छात्रका भागना :-
शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे दोषोद्गार।
ठेङ्गा लञा उठिला प्रभु पड़ुया मारिबार ॥ 250 ॥
अनुवाद-उसकी बात सुनकर महाप्रभु क्रोधित
होकर श्रीकृष्णके दोषोंका वर्णन करने लगे और लाठी
लेकर छात्रको मारनेके लिये उठ खड़े हुए॥ 250 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'दोषोद्गार' - परिहासपूर्वक
दोषारोपण ॥ 250 ॥
भये पलाय पड़ुया, प्रभु पाछे पाछे धाय।
आस्ते व्यस्ते भक्तगण प्रभुरे रहाय ॥ 251 ॥
अनुवाद-वह छात्र डरकर भागा और महाप्रभु
उसके पीछे दौड़े। जैसे-तैसे करके भक्तोंने महाप्रभुको
रोका ॥ 251 ॥
महाप्रभुको सान्त्वना :-
प्रभुरे शान्त करि' आनिल निज घरे।
पड़ुया पलाया गेल पड़ुया-सभारे ॥ 252 ॥
छात्रसमाजमें महाप्रभुके प्रति कटु बातें और क्रोध :-
पड़ुया सहस्र याहाँ पड़े एकठाञि।
प्रभुर वृत्तान्त द्विज कहे ताहाँ याइ ॥ 253 ॥
अनुवाद-भक्त महाप्रभुको शान्त करके उनके घरपर
ले आये। वह छात्र भागकर छात्रोंकी सभांमें जा पहुँचा
जहाँ एक साथ सैकड़ों छात्र पढ़ रहे थे। उस ब्राह्मण
छात्रने उस सभामें महाप्रभुका वृत्तान्त सुनाया ॥ 252-253 ॥
शुनि' क्रोध कैल सब पड़ुयार गण।
सबे मेलि' करे तब प्रभु निन्दन ॥ 254 ॥
“सब देश भ्रष्ट कैल एकला निमाञि।
ब्राह्मण मारिते चाहे, धर्मभय नाञि ॥ 255 ॥
256 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/254-259 ]
महाप्रभुपरे प्रहार करनेके लिये षड्यन्त्र :-
पुनः यदि ऐछे करे, मारिब ताहारे।
कोन् वा मानुष हय, कि करिते पारे ॥ "256 ॥
अनुवाद-ऐसा सुनकर सभी छात्र क्रोधित हो गये और सभी मिलकर महाप्रभुकी निन्दा करने लगे, - "अकेले निमाइने सारे देशको भ्रष्ट कर दिया है। वह ब्राह्मणको मारना चाहता है, उसे धर्मका कोई भी भय नहीं है। यदि फिर कभी वह ऐसा करनेका प्रयास करेगा, तो हम भी उसे मारेंगे। वह कोई भी हो, वह हमारा क्या बिगाड़ लेगा? ॥ "254-256 ॥
महाप्रभुसे ईर्ष्या करनेके फलस्वरूप
उनकी विद्या-बुद्धि-लुप्त :-
प्रभुर निन्दाय सबार बुद्धि हैल नाश।
सुपठित विद्या कारओ ना हय प्रकाश ॥ 257 ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी निन्दा करनेसे उन सबकी बुद्धि नष्ट हो गयी और उनकी भली-भाँति पढ़ी हुई विद्या विस्मृत हो गयी ॥ 257 ॥
अनुभाष्य-क्योंकि, (श्वेताश्वर उपनिषद्में)—
“यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥”
“जिसकी, परदेवता विष्णुके प्रति जैसी, उनके प्रिय श्रीगुरुदेवके प्रति भी वैसी परमा (अहैतुकी और निरन्तर) भक्ति है, उसी महात्माके शुद्धचित्तमें ही सभी श्रुतियोंके वास्तविक हरिभक्ति तात्पर्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं, अन्य किसीके हृदयमें नहीं।” श्रीप्रह्लाद महाराजकी उक्ति (भाः 7/5/24)-
“इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेत्रवलक्षणा।
क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥”
“जो भगवान् श्रीविष्णुके प्रति आत्मसमर्पणपूर्वक ये नौ प्रकारकी भक्ति करते हैं, उन्होंने ही उत्तमरूपसे शास्त्र अध्ययन किया है- ऐसा कहा जाता है।" इस श्लोककी श्रीधर स्वामीकी टीका-
“सा चार्पिंतैव सती यदि क्रियते, न तु कृता सती पश्चादर्प्येत, तदुत्तममधीतं मन्ये, न त्वस्माद्दुरोर्धीतं शिक्षितं वा तथाविधं किञ्चिदस्तीति भावः।"
“पहले आत्मसमर्पण, बाद में हरिभजन-क्रिया-यही विधि है। ऐसा होनेपर ही उत्तम शास्त्र अध्ययन हुआ है, ऐसा विचार है। आत्मसमर्पणपूर्वक विष्णुपूजाकी अपेक्षा और कुछ भी श्रेष्ठ शिक्षा अथवा अध्ययन नहीं हो सकता।"
अविद्याके वशमें होकर उन जड़विद्या-अभिमानी (छात्रों) ने परविद्यारूपी वधूके जीवन-स्वरूप विष्णुकी अवज्ञा की और नित्य वास्तववस्तु विष्णुके चरणोंमें आत्मसमर्पणके अभावके कारण उन दाम्भिकोंके कलुषित-मलिन हृदयमें विद्याकी स्फूर्ति नहीं हुई। इसलिये (भाः 11/11/18)-
“शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।
श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥”
“यदि कोई वेदादि शास्त्रोंमें पारदर्शी होनेपर भी परब्रह्म विष्णुमें भक्तिपरायण न हो, तो उसका समस्त शास्त्रानुशीलन-श्रम केवल व्यर्थके परिश्रममें ही समाप्त होता है ॥ "257 ॥
तथापि दाम्भिक पडुया नम्र नाहि हय।
याहाँ ताहाँ प्रभुर निन्दा हासि' से करय ॥ 258 ॥
अनुवाद-तब भी वे दाम्भिक छात्र नम्र नहीं हुए। जहाँ-तहाँ सभी स्थानोंपर वे हँसी उड़ाते हुए महाप्रभुकी निन्दा करने लगे॥ 258 ॥
पाखण्डियोंकी दुर्गति देख महाप्रभुकी करुणा :-
सर्वज्ञ गोसाञि जानि' सबार दुर्गति।
घरे बसि' चिन्तेन ता'-सबार अव्याहति ॥ 259 ॥
अनुवाद-सर्वज्ञ महाप्रभु उन सबकी उस अपराधके फलस्वरूप दुर्गति को जानकर घरमें बैठकर उनके उद्धारकी चिन्ता करने लगे॥ 259॥
सत्रहवाँ अध्याय | 257

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:

[ 17/260-266
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
अभक्त व्यक्तियोंका परिचय :-
'यत अध्यापक, आर ताँर शिष्यगण।
धर्मी, कर्मी, तपोनिष्ठ, निन्दक, दुर्जन॥ 260 ॥
श्रीकृष्णविद्वेष-अपराधसे मुक्त करनेके उपायकी चिन्ता :-
एइ सब मोर निन्दा-अपराध हैते।
आमि ना लओयाइले भक्ति, ना पारे लइते ॥ 261 ॥
निस्तारिते आइलाम आमि, हैल विपरीत।
एसब दुर्जनेर कैछे हइबेक हित ॥ 262 ॥
अनुवाद—'जितने भी अध्यापक और उनके शिष्य
हैं, वे सभी धर्मी-कर्मी (वर्णाश्रम धर्म और कर्मकाण्डमें
रत) अथवा तपादिको मुख्य धर्म माननेवाले हैं और
वैष्णवोंके निन्दक हैं, इसलिये ये दुर्जन हैं। ये सब मेरी
निन्दारूपी अपराधके कारण स्वयं भक्ति नहीं कर
सकते, जब तक मैं इन्हें भक्ति प्रदान न करूँ। मैं तो
सभीका उद्धार करनेके लिये आया था, किन्तु सब
विपरीत हो रहा है। इन सभी दुर्जनोंका कैसे कल्याण
होगा ? ॥ 260-262 ॥
अनुभाष्य—गोपीभावमें आविष्ट होनेके कारण महाप्रभुका
श्रीकृष्णके प्रति क्रोध और दोषारोपणको अप्राकृत न
समझनेके कारण एक कर्मजड़ स्मार्त्त छात्रका महाप्रभुके
साथ वादानुवाद और गोपीभावमय महाप्रभुका उसको
श्रीकृष्णका पक्षपाती समझकर क्रोधित होकर उसके
पीछे दौड़ना; ऐसा देखकर कर्मजड़ हरिविमुख नाम
मात्रके ब्राह्मणोंके द्वारा मोहवशतः महाप्रभुको पीटनेका
परामर्श; उनकी दुर्गति और दुर्दशा दूर करनेके लिये
प्राकृत समाजकी दृष्टिमें श्रेष्ठ जन्म और वर्णके
अभिमानी लोगोंके गुरुका संन्यास आश्रम स्वीकार
करनेकी अभिलाषा— चैःभाः मध्यखण्ड, छब्बीसवाँ
अध्याय द्रष्टव्य है।॥ 247-262 ॥
आमाके प्रणति करे, हय पापक्षय।
तबे से इहारे भक्ति लओयाइले लय ॥ 263 ॥
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
पाषण्डियोंके उद्धारकी इच्छा :-
मोरे निन्दा करे ये, ना करे नमस्कार।
एसब जीवेरे अवश्य करिब उद्धार ॥ 264 ॥
अनुवाद—यदि ये मुझे नमस्कार करेंगे, तो इनके
पाप नष्ट हो जायेंगे। तब मेरे द्वारा इनको भक्ति प्रदान
करनेपर ये उसे धारण कर सकेंगे। जो मेरी निन्दा
करते हैं, मुझे नमस्कार भी नहीं करते, तो भी मैं उन
सभी जीवोंका अवश्य ही उद्धार करूँगा ॥ 263-264 ॥
लौकिक मर्यादामय संन्यास-लीलाभिनयका सङ्कल्प :-
अतएव अवश्य आमि संन्यास करिब।
संन्यासि-बुद्धये मोरे प्रणत हइब ॥ 265 ॥
अनुवाद—इसलिये मैं अवश्य ही संन्यास ग्रहण
करूँगा। तब ये सभी मुझे संन्यासी जानकर प्रणाम
करेंगे ॥ 265 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंके मतानुसार यदि कोई
ब्राह्मण संन्यास ग्रहण करे, तो संन्यासी-बुद्धिसे अर्थात्
संन्यासीको प्रणामके योग्य समझकर गृहस्थ और ब्राह्मणादि
सभी प्रणाम करते हैं। मेरे संन्यास लेनेपर निन्दक
ब्राह्मण अवश्य ही प्रणाम करके मुझसे सुबुद्धि लाभ
करेंगे ॥ 265 ॥
संन्यासी जानकर महाप्रभुको नमस्कारके फलस्वरूप पाषण्ड
ब्राह्मणादि उच्चजातिके व्यक्तियोंमें
भी शुद्धचित्तसे सेवा-प्रवृत्तिका उदय :-
प्रणतिते ह'बे इहार अपराध-क्षय।
निर्मल हृदये भक्ति कराइब उदय ॥ 266 ॥
अनुवाद—मुझे प्रणाम करनेसे जब इनके अपराध
नष्ट हो जायेंगे, तब इनके निर्मल हृदयमें मैं भक्ति
उदय कराऊँगा ॥ 266 ॥
अनुभाष्य—पाषण्डी ब्राह्मणब्रुव अर्थात् नाम मात्रके
ब्राह्मण जो ब्राह्मण जातिके विहित कर्त्तव्योंका पालन
नहीं करते, वे भी वैष्णव-संन्यासीको दण्डवत् प्रणाम
258 | श्रीचैतन्यचरितामृत