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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 782, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 782

[ 17/156-169
किया गया है। इसलिये कोई भी हिन्दू गोवध नहीं
करता है। वेद-पुराणोंकी यह आज्ञा है कि यदि किसी
प्राणीको जीवन दे सकते हो, तभी उसे मार सकते हो।
इसलिये हमारे मुनि लोग बूढ़ी गायका वध करके वेदके
मन्त्रोंके द्वारा उसे पुनः जीवित कर देते थे। बूढ़ी
गायको वे पुनः युवा बना देते थे, इसलिये वे वध नहीं
अपितु उसका उपकार करते थे। कलिकालमें ब्राह्मणोंके
पास वैसी शक्ति नहीं है, इसलिये वे अब गोवध नहीं
करते हैं॥ 159-163 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—(काजीने कहा,—) उस
कुरानशास्त्रमें 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति'—इन दो प्रकारसे
मार्गका भेद है। निवृत्ति-मार्गमें जीवोंके वधका निषेध
है, किन्तु मेरे जैसे जो प्रवृत्ति-मार्गमें हैं, वे शास्त्र
आज्ञानुसार गोवध करनेपर पापके भागी नहीं होते हैं।
और देखो, आपके वेदशास्त्रोंमें गोवधकी विधिके निर्देश
प्राप्त होते हैं, इसलिये बड़े-बड़े मुनि लोग चिरकालसे
गोवध करते आये हैं। महाप्रभुने कहा,—वेदशास्त्रोंमें
गोवधकी विधि नहीं है, तो भी गोवधके द्वारा जो यज्ञ
करनेका वाक्य शास्त्रमें देखा जाता है, वह केवल
अत्यन्त वृद्ध गायके सम्बन्धमें कहा गया है। मुनि लोग
अति वृद्ध गायको मारकर वेदमन्त्रोंके द्वारा उसे पुनः
युवा रूपमें जीवित करते थे। उस प्रकारका वध, वध
नहीं है, वह तो वृद्ध गायके लिये उपकार मात्र है।
कलियुगमें ब्राह्मणोंमें वैसी शक्ति नहीं है, इसलिये अब
गोवध नहीं हो सकता है॥ 156-163 ॥
मलमासतत्त्वमें उद्धृत ब्रह्मवैवर्त्तीय कृष्णजन्मखण्डमें
(185/180)—
अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्।
देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्ज्जयेत् ॥ 164 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 164 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अश्वमेध, गोमेध, संन्यास, मांसके
द्वारा पितृ-श्राद्ध, देवरके द्वारा पुत्रोत्पत्ति—कलियुगमें ये
पाँच कार्य निषिद्ध हैं॥ 164 ॥
अनुभाष्य—अश्वमेधं (अश्वहनन-यज्ञविशेषं), गवालम्भं
(गोमेधं) संन्यासं (चतुर्थाश्रमग्रहणं), पलपैतृकं (मांसेन पितृश्राद्धं)
देवरेण (पत्युः कनिष्ठ भ्राता) सुतोत्पत्तिं (पुत्रोत्पादनं)—[एतानि]
पञ्च कलौ (कलियुगे) विवर्ज्जयेत् (परित्यज्येत)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य
है॥ 164 ॥
महाप्रभुके द्वारा इस्लाम-धर्माचारकी समालोचना :—
तोमरा जीयाइते नार, —वधमात्र सार।
नरक हइते तोमार नाहिक निस्तार ॥ 165 ॥
गो-अङ्गे यत लोम, तत सहस्र वत्सर।
गोवधे रौरव-मध्ये पचे निरन्तर ॥ 166 ॥
तोमा-सबार शास्त्रकर्त्ता—सेह भ्रान्त हैल।
ना जानिं' शास्त्रेर मर्म ऐछे आज्ञा दिल ॥”167 ॥
अनुवाद—तुम लोग पशुओंको जीवित नहीं कर
सकते हो, इसलिये तुम केवल उनका वध करते हो।
इस पापके फलस्वरूप नरकमें जानेपर भी तुम्हारा
उद्धार नहीं हो सकेगा। गायके शरीरमें जितने रोम हैं,
उतने हजार वर्षतक गोवध करनेवाला रौरव नरकमें
सड़ता रहता है। तुम्हारे शास्त्रकर्त्ता भ्रान्त हो गये थे,
इसलिये शास्त्रके वास्तविक अर्थको न जानकर उन्होंने
तुम्हें ऐसी (गोवधकी) आज्ञा दी है॥”165-167 ॥
अनुभाष्य—'भ्रान्त'—द्वितीयाभिनिवेश (देहमें आत्मबुद्धि)
के फलस्वरूप बुद्धि विपरीत अथवा भ्रमयुक्त होनेके
कारण वृथा ही जीव-हिंसाका अनुमोदन किया है॥ 167 ॥
काजी निरुत्तर और शास्त्रकी असम्पूर्णता-स्वीकार :—
शुनि' स्तब्ध हैल काजी, नाहि स्फुरे वाणी।
विचारिया कहे काजी पराभव मानिं' ॥ 168 ॥
“तुमि ये कहिले, पण्डित, सेइ सत्य हय।
आधुनिक आमार शास्त्र, विचार-सह नय ॥ 169 ॥
अनुवाद—यह सुनकर काजी स्तब्ध हो गया और
246 | श्रीचैतन्यचरितामृत