श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 780, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/148-158
ग्राम-सम्बन्धे 'चक्रवर्त्ती' हय मोर चाचा।
देह-सम्बन्ध हैते ग्राम-सम्बन्ध साँचा॥ 148 ॥
नीलाम्बर चक्रवर्त्ती हय तोमार नाना।
से सम्बन्धे हओ तुमि आमार भागिना॥ 149 ॥
भागिनार क्रोध मामा अवश्य सहय।
मातुलरे अपराध भागिना ना लय॥" 150 ॥
अनुवाद-ग्रामके सम्बन्धसे नीलाम्बर चक्रवर्ती मेरे चाचा लगते हैं और देहके सम्बन्धसे भी श्रेष्ठ ग्रामका सम्बन्ध होता है। नीलाम्बर चक्रवर्ती तुम्हारे नाना हैं और इस सम्बन्धसे तुम मेरे भाञ्जे लगते हो। भाञ्जेका क्रोध मामा अवश्य ही सहन करता है और मामाका अपराध भाञ्जा नहीं लेता है॥" 148-150 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'ब्राह्मणपुष्करिणी' ग्रामके एक भागमें काजियोंका पुराना घर अभी भी वर्तमान है। उस ग्रामके दूसरे भागसे लगा हुआ 'तारणवास' है, जो पहले 'बिल्वपुष्करिणी' था। वह ग्राम और काजियोंका 'ब्राह्मणपुष्करिणी' एक ही ग्राम होनेसे चाँदकाजीका महाप्रभुके साथ मामाका सम्बन्ध था॥ 148 ॥
अनुभाष्य - 'चक्रवर्त्ती'- नीलाम्बर चक्रवर्त्ती। 'चाचा'- पिताका छोटा भाई, बङ्गालमें चलती भाषामें उन्हें 'काका' कहते हैं। 'साँचा'-वास्तविक, शुद्ध, सच्चा॥ 148 ॥
एह मत दुँहार कथा हय ठारे-ठोरे।
भितरेर अर्थ केह बुझिते ना पारे॥ 151 ॥
अनुवाद-इस प्रकार उन दोनोंकी सङ्केतमें बातें हो रही थीं, उनका भीतरी अर्थ कोई नहीं समझ पाया॥ 151 ॥
महाप्रभु और काजीकी उक्ति एवं प्रत्युक्ति :-
प्रभु कहे,–“प्रश्न लागि' आइलाम तोमार स्थाने।”
काजी कहे,–“आज्ञा कर, ये तोमार मने ॥” 152 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मेरे मनमें कुछ प्रश्न हैं, जिनके समाधानके लिये मैं आपके घरपर आया हूँ।" काजीने कहा, - "आज्ञा करो जो आपके मनमें है॥" 152 ॥
इस्लाम धर्मके आचारके सम्बन्धमें महाप्रभुका प्रश्न :-
प्रभु कहे, - "गोदुग्ध खाओ, गाभी तोमार माता।
वृष अन्न उपजाय, ताते तँहो पिता॥ 153 ॥
पिता माता मारि' खाओ-एबा कोन् धर्म।
कोन् बले कर तुमि एमत विकर्म ॥" 154 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "आप गायका दूध पीते हैं, इस कारण गाय आपकी माता हुई। बैल [खेतोंमें हल चलाकर] अन्न उत्पन्न करते हैं, इसलिये वे आपके पिता हुए। पिता-माताको मारकर खाना, यह कौनसा धर्म है। किसके बलपर आप ऐसा पाप करते हैं?"॥ 153-154 ॥
अनुभाष्य - 'अन्न उपजाय'-बैल हलको खींचकर धानादि फसलको बोने और रोपणके लिये खेतको तैयार करके किसानको बीज और चावलादि अन्नके उत्पादनमें मुख्यरूपसे सहायता करता है।
'एबा'-यह॥ 153-154 ॥
काजीका उत्तर :-
काजी कहे, - "तोमार यैछे वेद-पुराण।
तैछे आमार शास्त्र-केताब 'कोराण' ॥ 155 ॥
सेइ शास्त्रे कहे, -प्रवृत्ति-निवृत्ति-मार्ग-भेद।
निवृत्ति-मार्गे जीवमात्र-वधेर निषेध॥ 156 ॥
प्रवृत्ति-मार्गे गोवध करिते विधि हय।
शास्त्र-आज्ञाय वध कैले नाहि पाप-भय ॥ 157 ॥
तोमार वेदेते आछे गोवधेर वाणी।
अतएव गोवध करे बड़ बड़ मुनि॥" 158 ॥
अनुवाद-काजीने कहा, - "आपके जैसे वेद-पुराण हैं, वैसे ही हमारा शास्त्र-ग्रन्थ 'कुरान' है। उस शास्त्रमें
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